नलिन विलोचन शर्मा

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नलिन विलोचन शर्मा (1916–1961) पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक, हिन्दी लेखक एवं आलोचक थे। वे हिन्दी में 'नकेनवाद' आन्दोलन के तीन पुरस्कर्ताओं में से एक थे।

जीवन-परिचय[संपादित करें]

नलिन जी का जन्म भारद्वाज गोत्र के सरयूपारीण ब्राह्मण-कुल में विक्रम संवत् 1972 माघ शुक्ल चतुर्दशी, तदनुसार 18 फरवरी सन् 1916 ई. को सन्ध्या छह बजे पटना सिटी के बदरघाट के पास हुआ था। वे दर्शन और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान् महामहोपाध्याय पं. रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। मात्र लगभग 46 वर्ष की आयु में 12 सितम्बर 1961 ई. को अपराह्न डेढ़ बजे हृदय-गति रुक जाने से उनका देहान्त हो गया।[1]

नलिन जी संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेजी के निष्णात विद्वान् थे। साथ ही फ्रेंच एवं जर्मन भाषा का भी उन्होंने यथेष्ट ज्ञान प्राप्त किया था। चित्रकला में भी उनकी गहरी रुचि थी।

नलिन जी ने हिन्दी आलोचना का नया मापदंड निर्मित किया। अपने प्रखर आलोचनात्मक लेखों, साहित्यिक टिप्पणियों और पुस्तक समीक्षाओं के जरिये वे हिंदी-संसार को नये ढंग से आंदोलित करने में सफल हुए। नये-पुराने सभी लेखकों के बीच के आलोचक के रूप में वे समान रूप से प्रतिष्ठित थे। पुराने साहित्य के बारे में उनकी पसंद का जितना महत्त्व था, उतना ही नये साहित्य के बारे में भी।

लेखन कार्य एवं प्रकाशन[संपादित करें]

उनकी लिखित आलोचना पुस्तकों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। उनके जीवन-काल में 'दृष्टिकोण' (1947ई.) और 'साहित्य का इतिहास दर्शन' (1960ई.) नामक दो आलोचना पुस्तकें प्रकाशित हुईं। मरणोपरांत उनकी तीन आलोचना पुस्तकें- 'मानदंड' (1963ई.), 'हिंदी उपन्यास : विशेषतः प्रेमचंद' (1968ई.), तथा 'साहित्य: तत्त्व और आलोचना' (1995ई.) अस्त-व्यस्त ढंग से प्रकाशित हुईं।

इनके अतिरिक्त नलिन जी विशिष्ट शैली के एक उत्तम कहानीकार भी थे। उनकी कहानियों के दो संग्रह प्रकाशित हैं -- ' विष के दाँत' (1951ई.) तथा 'सत्रह असंगृहीत पूर्व छोटी कहानियाँ' (1960ई.)। उनकी कविताओं के भी दो संकलन हैं -- 'नकेन के प्रपद्य' (1956ई.) तथा 'नकेन-2' (1981ई.)। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया।[2]

कहानीकार के रूप में[संपादित करें]

नलिन जी की कहानियों के सन्दर्भ में निशान्तकेतु जी ने लिखा है कि "नलिन विलोचन शर्मा ने 'विष के दाँत' तथा 'सत्रह असंगृहीत पूर्व कहानियाँ' इन दो संग्रहों के माध्यम से हिन्दी में वह प्रयोग और चमत्कार किया जो मंटो उर्दू में, कैथरीन मैंसफील्ड अंग्रेजी में और बालजाक फ्रेंच में एक साथ मिलकर करते। शर्मा जी ने यौन-विच्युति, विकृति दंश, सूक्ष्म मनोविज्ञान और प्रच्छन्न विरेचन-दर्शन का कहानियों में जैसा स्वरूपण किया है; वह वस्तुतः अन्यतम है। भाषा का ऐसा घनत्व और शिल्प की ऐसी तराश के धरातल पर हिन्दी में थोड़ी ही कहानियाँ प्रशंसित होंगी।"[3]

आलोचक के रूप में[संपादित करें]

नलिन जी पर अपेक्षाकृत विस्तार से विचार करते हुए अपनी पुस्तक 'हिन्दी आलोचना का विकास' के प्रायः तीस पृष्ठों में[4] नन्दकिशोर नवल जी ने उनकी उन्हीं उक्तियों को चुनकर, जिनसे रूपवाद का समर्थन होते जान पड़ता है, उन्हें पूरी तरह रूपवादी करार दिया है और विनम्रतापूर्वक उनका वैचारिक संहार कर डाला है। नवल जी के इस विस्तृत विवेचन में एक वाक्य भी नलिन जी के प्रति पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। यही आश्चर्य होता है कि नलिन जी जब ऐसे ही उपलब्धि-शून्य आलोचक हैं तो नवल जी ने उन्हें अपनी इस हिन्दी आलोचना का 'विकास' दिखलाने को 'प्रतिबद्ध' पुस्तक में विवेचनीय माना ही क्यों है !

इस परिप्रेक्ष्य में नलिन जी का महत्व जानने के लिए यह अनिवार्यतः ध्यातव्य है कि वे विचार या दृष्टिकोण के विरोधी नहीं थे बल्कि उसे ही रचना का निर्णायक तत्त्व न मानकर उसे भी रचना के संघटक तत्त्वों में से ही एक मानते थे। इसके अनेक प्रमाण उनकी आलोचना-कृतियों में उपलब्ध हैं। आज रूप-वैशिष्ट्य के कारण ही अनेक मार्क्सवादी आलोचक भी अज्ञेय की बहुविध प्रशंसा कर रहे हैं और उनके सुप्रसिद्ध उपन्यास 'शेखर : एक जीवनी' को तो प्रायः एक स्वर से हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में एक मान लिया गया है, तब इस सन्दर्भ में नलिन जी के विचारों को देखना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। नलिन जी ने शैली की दृष्टि से 'शेखर : एक जीवनी' को हिन्दी में अद्वितीय मानते हुए भी वैचारिक दृष्टिकोण से ही सर्वश्रेष्ठ की सूची से खारिज कर दिया है।[5] जिस स्थापत्य पर सर्वाधिक जोर देने के कारण नलिन जी को रूपवादी माना गया है उसके सम्बन्ध में उनका स्पष्ट कथन है कि " स्थापत्य का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब वह चित्रणीय वस्तु के लिए अनिवार्य परिणाम हो, किन्तु साथ-ही-साथ विशिष्ट दृष्टिकोण का कारण भी बन सके।"[6] यही कारण है कि गोदान में प्रेमचन्द के परिपक्व दृष्टिकोण के अनुरूप ही वे गोदान के स्थापत्य को भी परिपक्व/ परिपूर्ण मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि यदि प्रेमचन्द गोदान में दो भिन्न सामाजिक वर्गों का इस तरह समानान्तर संयोजन नहीं करते तो वह दृष्टिकोण भी सही रूप में अभिव्यक्त नहीं हो सकता था। इसीलिए वे स्थापत्य को भी कारक तत्त्व के रूप में विवेचित करते हैं।

अपने इन विचारों के कारण नलिन जी ने गोदान ही नहीं बल्कि प्रगतिशीलता के स्तम्भ निराला तथा मैला आँचल के साथ-साथ बाणभट्ट की आत्मकथा के महत्त्व को भी पहचाना और सबसे पहले पहचाना, बल्कि स्पष्ट उद्घोषणा की।[7][8][9]

तात्पर्य यह है कि नलिन जी हिन्दी साहित्य में भी फैशन की शक्ल अपनाये संक्रामक रोग की तरह फैलते जा रहे विषय-वस्तु के कारण ही अगड़ा या पिछड़ा, सफल या असफल घोषित करने के सख्त खिलाफ थे और रचना के संघटक तत्त्वों (जिनमें विचार या दृष्टिकोण भी अनिवार्य है[10]) के समुचित समायोजन को आवश्यक मानने के कारण स्थापत्य पर अतिरिक्त बल देते थे। उनके इस मन्तव्य को समझने और साहित्य के समुचित विकास हेतु अपनाने की जरूरत है न कि उन्हें रूपवादी मानकर खारिज करने की।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. नलिन विलोचन शर्मा (विनिबन्ध), गोपेश्वर सिंह; साहित्य अकादेमी, संस्करण-2002.
  2. Manager Pandey (2013). Upanyas Aur Loktantra. Vāṇī Prakāśana. पपृ॰ 180–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-5072-556-6.
  3. कथांतर (भूमिका), सं.निशान्तकेतु; बी.टी.सी. पटना, संस्करण-2005, पृ. viii.
  4. हिन्दी आलोचना का विकास, नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ०-277 से 307.
  5. हिंदी उपन्यास : विशेषतः प्रेमचंद; आचार्य नलिन विलोचन शर्मा; ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना; संस्करण-(प्रथम)1968, पृ.98.
  6. वही, पृ.59.
  7. निराला की साहित्य साधना, भाग-1 (पेपरबैक), डाॅ० रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2002, पृ.197.
  8. मैला आँचल : वाद-विवाद और संवाद (पेपरबैक), सं.भारत यायावर, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा), संस्करण-2006, पृ०-9.
  9. आलोचना (त्रैमासिक), सहस्राब्दी अंक-28, पृ०-12 ('प्रतीक' में चार समीक्षाओं के एक साथ प्रकाशन की सूचना)।
  10. हिंदी उपन्यास : विशेषतः प्रेमचंद; आचार्य नलिन विलोचन शर्मा; ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना; संस्करण-(प्रथम)1968, पृ.59.