त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती

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त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (1888 - 1 अगस्त 1970) भारत के क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत को स्वतंत्र कराने के लिए उन्होने अपने जीवन के श्रेष्ठतम तीस वर्ष जेल की काल कोठरियों में बिताये। उनका संघर्षशील व्यक्तित्व, अन्याय, अनीति से जीवनपर्यन्त जूझने की प्रेरक कहानी है। त्रैलोक्य चक्रवर्ती को 'ढाका षडयंत्र केस' तथा 'बारीसाल षडयंत्र केस' का अभियुक्त बनाया गया था। आप 'महाराज' के नाम से प्रसिद्ध थे।

जीवन परिचय[संपादित करें]

इनका जन्म 1889 ई. में बंगाल के मेमनसिंह जिले के कपासतिया गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है। बचपन से ही त्रैलोक्य चक्रवर्ती के परिवार का वातावरण राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत था। पिता 'दुर्गाचरन' तथा भाई 'व्यामिनी मोहन' का इनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा था। पिता दुर्गाचरण स्वदेशी आन्दोलन के समर्थक थे। भाई व्यामिनी मोहन का क्रान्तिकारियों से संपर्क था। इसका प्रभाव त्रैलोक्य चक्रवर्ती पर भी पड़ा। देश प्रेम की भावना उनके मन में गहराई तक समाई थी। इंटर की परीक्षा देने से पहले ही अंग्रेज सरकार ने उन्हे बन्दी बना लिया। जेल से छूटते ही वे ‘अनुशीलन समिति’ में सम्मिलित हो गए। 1909 ई. में उन्हें 'ढाका षडयंत्र केस' का अभियुक्त बनाया गया, पर वे पुलिस के हाथ नहीं आए। 1912 ई. में वे गिरफ्तार तो हुए, पर अदालत में उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो सके। 1914 ई. में उन्हें 'बारीसाल षडयंत्र केस' में सजा हुई और सजा काटने के लिए उन्हें अंडमान भेज दिया गया। वे इसे सजा नहीं तपस्या मानते थे और यह विश्वास करते थे कि उनकी इस तपस्या के परिणामस्वरुप भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलेगी। वीर सावरकर और गुरुमुख सिंह जैसे क्रान्तिकारी उनके साथ रहे थे। इन लोगों ने वहां संगठन शक्ति के बल पर रचनात्मक कार्य किया।

क्रान्तिकारी गतिविधियाँ[संपादित करें]

यद्यपि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत की राजनीति गांधी जी के प्रभाव में आ गई थी, लेकिन साथ-साथ क्रान्तिकारी आंदोलन भी चलता रहा। 1928 में त्रैलोक्य संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) आकर चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि की ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट एसोसियेशन’ में सम्मिलित हो गए। साथ ही कांग्रेस से भी उनका संपर्क रहा। 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक 'लाहौर अधिवेशन' में उन्होंने भाग लिया था। 1930 में वे फिर गिरफ्तार हुए और छूटने के बाद 1938 की रामगढ़ कांग्रेस में सम्मिलित हुए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का उन पर बहुत प्रभाव था। 'भारत छोड़ो आंदोलन' में जेल जाने के बाद त्रैलोक्य चक्रवर्ती ने 1946 ई. में नोआखाली में रचनात्मक कार्य आरंभ किया।

वीर सावरकर के सहयोगी के रूप में उन्होंने जेल में ही हिन्दी भाषा के प्रचार का कार्य अपनाया। सावरकर से हिन्दी सीखने वाले वे पहले व्यक्ति थे। परतंत्र भारत में भी वह स्वतंत्र भारत की बातें सोचा करते थे। उन्हें विश्वास था कि अब देश स्वतंत्र हो जायेगा। इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक भाषा का होना बहुत आवश्यक है। यह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। अत: इस भाषा के प्रचार का कार्य उन्होंने सावरकर के साथ वहीँ काले पानी की जेल में ही आरम्भ कर दिया था। उनके सम्मिलित प्रयास से २00 से भी अधिक कैदियों ने वहां हिंदी सीखी। चाहें जेल की दीवारें हों या काले पानी की कोठरियां, वहां भी मनस्वी और कर्मनिष्ठ चुप नहीं बैठते।

1934 में वे जेल से फरार हो गए। जब देश आजाद हुआ तो उनकी जन्म भूमि पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्र में आई। वहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर अत्याचार होते थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने वहीँ रहकर अपने अल्प संख्यक भाइयों के हितों की रक्षा के लिए अन्याय से संघर्ष करना ही अपना लक्ष्य बनाया।

पाकिस्तान सरकार ने उन्हें वर्षों तक नजरबन्द बनाये रखा। 1970 में वे तीन महीने के लिए भारत आये और 1 अगस्त 1970 को उनका देहावसान हो गया। उसके दो वर्ष बाद उस धरती से पाकिस्तान का नाम ही उठ गया।