ताराबाई शिंदे

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ताराबाई शिंदे
जन्म 1850
बुलढाना, बरार प्रांत, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 1910
राष्ट्रीयता भारतीय
व्यवसाय नारीवादी, महिला अधिकार कार्यकर्ता, लेखक

ताराबाई शिंदे (1850–1910)[1] एक नारीवादी कार्यकर्ता थी, जिसने 19 वीं सदी के भारत में पितृसत्ता और जाति का विरोध किया था। वह अपने प्रकाशित काम, स्त्री-पुरुष तुलना ("महिलाओं और पुरुषों के बीच एक तुलना"), मूल रूप में 1882 में मराठी में प्रकाशित के लिए जानी जाती है। यह पैम्फलेट उच्च जाति के पितृसत्ता की आलोचना है, और अक्सर पहला आधुनिक भारतीय नारीवादी पाठ माना जाता है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों को महिलाओं के उत्पीड़न के स्रोत के रूप में चुनौती देने में अपने समय के लिए यह बहुत ही विवादास्पद था, आज भी विवादास्पद और बहस का मुद्दा बना हुआ है।[2]

प्रारंभिक जीवन और परिवार[संपादित करें]

वर्तमान में महाराष्ट्र के बुलढाणा, बड़हाड़ प्रांत में 1850 में बापूजी हरि शिंदे के के घर में जन्मी, वह सत्यशोधक समाज, पुणे की संस्थापक सदस्य थी। उनके पिता राजस्व के उपायुक्त के कार्यालय में एक रैडिकल और प्रमुख क्लर्क थे, उन्होंने 1871 में "हिंट टू द एज्यूकेटेड नेटिवस" नामक एक किताब प्रकाशित की। इस क्षेत्र में लड़कियों का कोई भी स्कूल नहीं थी। ताराबाई एकलौती बेटी थीं और उनके पिता ने उसे मराठी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई। उसके चार भाई भी थे[3][4] ताराबाई का विवाह बहुत ही कम आयु में हुआ था, लेकिन उनके पति के उनके माता-पिता के घर में आ जाने के बाद से अन्य मराठी पत्नियों की तुलना में अधिक आजादी दी गई थी।

सामाजिक कार्य[संपादित करें]

शिंदे सामाजिक कार्यकर्ताओं जोतीराव और सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थी और उनके सत्यशोधक समाज ("सत्य की शोध करने के लिए समुदाय") संगठन की संस्थापक सदस्य थी। फुले दंपति शिंदे के साथ लिंग और जाति का गठन करने वाले उत्पीड़न के अलग-अलग अक्षों के बारे में जागरूकता साझा करते थे, साथ ही साथ दोनों का   अंतरंग स्वरूप भी था। 

स्त्री-पुरुष तुलना[संपादित करें]

अपने निबंध में शिंदे ने जाति की सामाजिक असमानता की, साथ ही साथ अन्य कार्यकर्ताओं के पितृसत्तात्मक विचारों की आलोचना भी की, जो हिंदू समाज में जाति को ही विरोध-भाव का मुख्य रूप मानते  थे। सूसी थरू और के ललिता के अनुसार, "... भक्ति काल की कविता के बाद स्त्री-पुरुष तुलना शायद पहली पूर्ण और प्रचलित नारीवादी तर्क हैं। लेकिन ताराबाई का काम भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जब एक समय में बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ता दोनों ही मुख्य रूप से एक हिंदू विधवा की जिंदगी और महिलाओं पर आसानी से पहचानने वाली अत्याचारों की कठिनाइयों से संबोधित थे, जाहिरा तौर पर अलगाव में काम कर रही ताराबाई शिंदे, पितृसत्तात्मक समाज के वैचारिक ढांचे को शामिल करके विश्लेषण के दायरे को व्यापक बनाने में सक्षम थी। हर जगह महिलाएं, उनका तात्पर्य है, इसी तरह से ही पीड़ित हैं।"

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Phadke, Y.D., संपा॰ (1991). Complete Works of Mahatma Phule (मराठी में).
  2. Delhi, University of. Indian Literature : An Introduction. Pearson Education. पृ॰ 133. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-317-0520-X. |author-link= और |authorlink= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |ISBN= और |isbn= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद)
  3. Feldhaus, Anne (1998). Images of women in Maharashtrian society. SUNY Press. पृ॰ 205. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-7914-3659-4. |ISBN= और |isbn= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद)
  4. DeLamotte, Eugenia C.; Natania Meeker; Jean F. O'Barr (1997). "Tarabai Shinde". Women imagine change: a global anthology of women's resistance from 600 B.C.E. to present. Routledge. पृ॰ 483. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-415-91531-7. |author2= और |last2= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |author3= और |last3= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |ISBN= और |isbn= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद)