ज्यामितीय प्रकाशिकी

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तेरहवीं शदी का एक डिजाइन जिसमें पानी से भरे गोलाकार बर्तन द्वारा प्रकाश के अपवर्तन द्वारा प्रतिबिम्ब निर्माण को दर्शाया गया है।

प्रकाशिकी ज्यामितीय (Geometrical Optics) प्रकाशिकी का वह भाग है जो प्रकाश को 'किरण' जैसा मानकर उसकी गति का अध्ययन किया जाता है। इसलिये इसे 'किरण प्रकाशिकी' (ray optics) भी कहते हैं। किरण प्रकाशिकी की मान्यता के अनुसार जब तक समांगी माध्यम में प्रकाश गति करता है तब तक उसका मार्ग सीधी रेखा में होता है। जहाँ पर दो माध्यम मिलते हैं, वहाँ प्रकाश किरणे मुड़ जाती हैं ( किरणे दो भागों में बंट भी सकतीं हैं।)

वस्तुतः प्रकाशिकी का बड़ी सीमा तक सरलीकरण ही ज्यामितीय प्रकाशिकी है। ज्यामितीय प्रकाशिकी के अन्तर्गत प्रकाश के विवर्तन और व्यतिकरण की कोई व्याख्या नहीं दी जा सकती। किन्तु ज्यामितीय प्रकाशिकी छबियों के निर्माण एवं प्रकाशिक विपथम (optical aberrations) आदि की व्याख्या करने में सक्षम है। दूसरे शब्दों में, ज्यामितीय प्रकाशिकी के द्वारा परिणाम तब तक शुद्ध आते हैं जब तक वस्तुओं का आकार प्रकाश के तरंगदैर्घ्य की तुलना में काफी बड़ा हो।

परिचय[संपादित करें]

ज्यामितीय प्रकाशिकी, प्रकाशिकी का वह अंग है जिसमें प्रकाश की किरणों की ज्यामिति तथा प्रकाशकीय तंत्र (optical system) द्वारा प्रतिबिंब-निर्माण-प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इसमें प्रकाशीय उपकरणों (optical instruments) के गुणों तथा उन लेंस|लेंसों]], दर्पणों एवं समपार्श्वो (प्रिज्म) का विवरण सन्निहित होता है जिनके द्वारा प्रकाशीय उपकरणों की रचना होती है।

यह सुज्ञात तथ्य है कि प्रकाश की किरणें सरल रेखा में गमन करती हैं। उनके इस गुण को प्रकाश का ऋजुरेखीय संचरण (rectilinear propagation of light) कहते हैं। जिस पदार्थ से होकर प्रकाश की किरणें गुजरती हैं, उसे 'माध्यम' (medium) कहते हैं। जब प्रकाश की किरणें किसी माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम में पहुँचती हैं तो तीन क्रियाएँ होती हैं :

(1) प्रकाश की किरणों का कुछ, या अधिक, भाग दोनों माध्यमों के विभाजक तल से पहले ही माध्यम में वापस लौटा दिया जाता है। इस क्रिया का परावर्तन (Reflection) कहते हैं।

(2) प्रकाश की किरणों का कुछ भाग विभाजक तल पर अवशोषित हो जाता है। , और

(3) प्रकाश की किरणों का शेष भाग दूसरे माध्यम में चला जाता है। इस क्रिया को अपवर्तन (refraction) कहते हैं।

ज्यामितीय प्रकाशिकी के अभिगृहीत (axioms)[संपादित करें]

ज्यामितीय प्रकाशिकी कुछ सरल मान्यताओं (नियमों) पर आधारित है। वे हैं -

(१) समांग माध्यम में प्रकाश की किरणें सरल रेखा में चलतीं हैं।

(२) प्रकाश किरणों के स्वतंत्र वितरण का नियम

(३) परावर्तन का नियम

(४) अपवर्तन का नियम (स्नेल का नियम)

(५) प्रकशपुंज (light beam) की उत्क्रमगति का नियम - इसके अनुसार, किसी प्रकाश पुंज की गति को, उसकी आगे की तरफ की गति के ठीक विपरीत दिशा में गति करते हुए भी माना जाता है।

परावर्तन और अपवर्तन प्रक्रिया के समय प्रकाश की किरणें कुछ नियमों का पालन करती हैं।

परावर्तन[संपादित करें]

परावर्तन संबंधी नियम निम्नलिखित है :

1. आपाती किरण, विभाजक तल में आपतन बिंदु पर डाला गया अभिलंब एवं परावर्तित किरण, तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं

(2) आपाती एवं परावर्तित किरणें अभिलंब के परस्पर विपरीत ओर स्थित होती हैं, और

(3) आपतन एवं परावर्तन कोण परस्पर बराबर होते हैं।

अपवर्तन[संपादित करें]

अपवर्तन संबंधी नियम निम्नलिखित हैं :

1. आपाती किरण, विभाजक तल में आपतन बिंदु पर डाला गया अभिलंब एवं अपवर्तित किरण, तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।

2. आपाती एवं अपवर्तित किरणें अभिलंब के परस्पर विपरीत ओर स्थित होती हैं। और

(3) आपतन एवं अपवर्तन कोणों की ज्याओं (sines) में एक स्थिर अनुपात होता है। इस अनुपात को ग्रीक अक्षर म्यू (m ) द्वारा व्यक्त किया जाता है और इसे पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक कहा जाता है।

प्रिज्म से अपवर्तन[संपादित करें]

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन[संपादित करें]

गोलीय तल पर अपवर्तन[संपादित करें]

सममित प्रकाशीय प्रणलियाँ (Symmetrical Optical System) तथा प्रधान बिंदु (Cardinal Point)[संपादित करें]

सामान्यत: व्यवहृत होनेवाले प्रकाशीय यंत्रों के अपवर्तक तल ऐसे परिक्रमण तल (surface of revolution) होते हैं, जिनका सममिति अक्ष (axis of symmetry) सर्वनिष्ठ (common) होता है। इस सममिति से यह स्पष्ट हो जाता है कि अक्ष पर स्थित प्रत्येक बिंदु का बिंब अक्ष पर ही स्थित किसी दूसरे बिंदु पर बनता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संपूर्ण अक्ष स्वयं अपना ही बिंब होता है।

किसी अपवर्तक तंत्र के अक्ष पर एक ऐसा बिंदु होता है जिससे निकलनेवाली प्रकाश की किरणें अपवर्तक तंत्र के बाहर अक्ष के समांतर निकलती हैं और इस प्रकार उस बिंदु का बिंब अनंत (infinity) पर बनता है। उस बिंदु को अपवर्तक तंत्र (या लेंस) का प्रथम फोकस बिंदु कहते हैं। प्रथम फोकस बिंदु से होकर अक्ष के समकोणिक खींचा हुआ माना गया तल प्रथम फोकस तल कहा जाता है। इस तल के किसी बिंदु से चलनेवाली किरणें अपवर्तन के उपरांत परस्पर समांतर हो जाती है।

द्वितीय फोकस बिंदु अपवर्तक तंत्र के अक्ष पर स्थित वह बिंदु है जिसपर अनंत से अक्ष के समांतर आनेवाली सभी किरणें अभिसरित (converge) होती हैं, अर्थात्‌ जिस बिंदु पर, अनंत पर स्थित वस्तु का बिंब बनता है। इस बिंदु से अक्ष के समकोणिक कल्पित समतल को द्वितीय फोकस तल कहते हैं।

किसी लेंस के प्रथम फोकस बिंदु से अपसारित (diverge) होनेवाली किरणों का शंकु लेंस के दोनों धरातलों पर विचलित होता है। आपाती किरणो को आगे की ओर तथा निर्गत किरणों को पीछे की ओर बढ़ाने पर, जो परिच्छेद बिंदु मिलते हैं, वे सर्वनिष्ठ तल पर स्थित होते हैं, जिसे लेंस का प्रथम मुख्य समतल कहते हैं। लेंस के दो धरातलों पर दो बार विचलन, मुख्य समतल पर किरण के एक ही बार विचलन के तुल्य होता है। इसी प्रकार लेंस के अक्ष के समांतर आनेवाली किरणें अपवर्तन के उपरांत द्वितीय फोकस बिंदु की ओर अग्रसर होती हैं। यदि आपाती किरणों को आगे की ओर तथा अपवर्तित किरणों को पीछे की ओर बढ़ाया जाय तो उनके परिच्छेद बिंदु एक समतल पर स्थित होंगे, जिसे द्वितीय मुख्य समतल कहते हैं। इन समतलों के अक्ष के साथ परिच्छेद बिंदु को क्रमश: प्रथम तथा द्वितीय मुख्य बिंदु कहते हैं। प्रथम फोकस दूरी तथा द्वितीय मुख्य बिंदु से द्वितीय फोकस बिंदु की दूरी को द्वितीय फोकस दूरी कहते हैं।

अभिलक्षण फलन (Characteristic Function)[संपादित करें]

प्रकाशीय यंत्रों के निर्माण में कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है, विशेषकर यह कि किसी बिंदुवत्‌ वस्तु से आनेवाली सभी किरणें एक बिंदुवत्‌ बिंब पर ही एकत्र हों, अर्थात्‌ वे विपथन (aberration) के दोष से मुक्त हों। इस हेतु यह आवश्यक है कि बिंब में गोलीय तथा वर्णी विपथन न होने पाएँ, अन्यथा बिंब विकृत होगा और एक स्थान पर बनने के बजाय भिन्न भिन्न रंगों के कई बिंब बन जाएँगे। इन समस्याओं के निदान के लिये एक अभिलक्षण फलन ढूँढ़ना पड़ता है।

गाउसीय प्रकाशिकी (Gaussian Optics)[संपादित करें]

किसी वस्तु से चलकर अपवर्तक तल पर पहुँचनेवाली सभी किरणों द्वारा बननेवाले बिंब का विवेचन करने पर हमें पता चलता है कि वह बिंब क्षेत्रवक्रता (field curvature) तथा विकृति (distortion) आदि दोषों से युक्त रहता है। इसलिये गाउस ने केवल उन्हीं किरणों तक विचार सीमित रखने का सुझाव दिया, जो अपवर्तक प्रणाली के अक्ष के अत्यंत निकट से गमन करती हैं।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]