ज़ाँ प्याज़े

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
ज़ाँ प्याज़े

Piaget at the University of Michigan, c. 1968
जन्म Jean William Fritz Piaget
9 अगस्त 1896
Neuchâtel, Switzerland
मृत्यु 16 सितम्बर 1980(1980-09-16) (उम्र 84)
Geneva, Switzerland
क्षेत्र Developmental psychology, epistemology
शिक्षा University of Neuchâtel
प्रसिद्धि Constructivism, genetic epistemology, theory of cognitive development, object permanence, egocentrism
प्रभाव Immanuel Kant, Henri Bergson,[1] Pierre Janet, James Mark Baldwin[2]
प्रभावित Bärbel Inhelder,[3] Jerome Bruner,[4] Kenneth Kaye,[कृपया उद्धरण जोड़ें] Lawrence Kohlberg,[5] Robert Kegan,[6] Howard Gardner,[7] Thomas Kuhn,[8] Seymour Papert,[9] Umberto Eco,[कृपया उद्धरण जोड़ें] Lev Vygotsky[10][11]

ज़ाँ प्याज़े (Jean Piaget ; 9 अगस्त, 1896 – 16 सितम्बर, 1980) स्विटजरलैण्ड के एक चिकित्सा मनोविज्ञानी थे जो बाल विकास पर किये गये अपने कार्यों के कारण प्रसिद्ध हैं।

पियाजे, विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी हस्ती हैं। अनेक पांडित्यपूर्ण अवधारणाओं के लिए हम पियाजे के ऋणी हैं जिनमें आज भी टिके रहने की क्षमता और आकर्षण है, जैसे समायोजन/आत्मसातकरण (Assimilation), अनुकूलन वस्तु स्थायित्व (object permanence), आत्मकेंन्द्रीकरण (Egocentrism), संरक्षण (conservation), तथा परिकाल्पनिक-निगमित सोच (Hypothetico-deductive reasoning)। बच्चों के सक्रिय, रचनात्मक विचारक होने की वर्तमान दृष्टि के लिए भी हम, विलियम जेम्स तथा जॉन डुई के साथ-साथ, पियाजे के ऋणी हैं।

बच्चों का निरीक्षण करने की पियाजे में विलक्षण प्रतिभा थी। उसके सावधानीपूर्वक किये गये प्रेक्षणों ने हमें यह खोजने के सूझबूझ भरे तरीके दिखाये कि बच्चे कैसे अपने संसार के साथ क्रिया करते हैं और तालमेल बिठाते हैं। पियाजे ने हमें संज्ञानात्मक विकास में कुछ खास चीजें खोजना सिखाया, जैसे पूर्वसंक्रियात्मक सोच से मूर्त संक्रियात्मक सोच में होने वाला बदलाव। उसने हमें यह भी दिखाया कि कैसे बच्चों को अपने अनुभवों की संगत अपनी योजनाओं (schemas/congnitive frameworks), संज्ञानात्मक ढांचों और साथ ही साथ अपनी योजनाओं की संगत अपने अनुभवों से बिठाने की जरूरत होती है। पियाजे ने यह भी दिखलाया कि यदि परिवेश की संरचना ऐसी हो जिसमें एक स्तर से दूसरे स्तर तक धीरे-धीरे बढ़ने की सुविधा हो तो, संज्ञानात्मक विकास होने की संभावना रहती है।हम अब इस प्रचलित मान्यता के लिए भी उसके ऋणी हैं कि अवधारणाएं अचानक अपने पूरे स्वरूप में प्रकट नहीं हो जातीं, बल्कि वे ऐसी छोटी-छोटी आंशिक उपलब्धियों की श्रृंखला से होती हुई विकसित होती हैं जिनके परिणाम स्वरूप क्रमशः अधिक परिपूर्ण समझ पैदा होती है।

प्याज़े और शिक्षा[संपादित करें]

शिक्षा पर पियाजे का बहुत प्रभाव पड़ा है, विशेष रूप से प्रारंभिक और मध्य बचपन के दौरान शिक्षा पर। उसकी मीमांसा (theory) से निकले तीन सिद्धांतों का आज भी शिक्षकों के प्रशिक्षण पर और कक्षा के भीतर अपनाये जाने वाले तौर तरीकों पर व्यापक असर होता है।

खोज पद्धति से सीखना (discovery learning)[संपादित करें]

पियाजे का अनुसरण करने वाली कक्षा में बच्चों को परिवेश के साथ स्वतः स्फूर्त/सहज रूप से क्रिया करते हुए चीजों को खुद से खोजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। पहले से तैयार ज्ञान को शाब्दिक रूप से प्रस्तुत करने के बजाय, शिक्षक ऐसी विविध गतिविधियों की सुविधा प्रदान करते हैं जो खोजने को बढ़ावा देती हैं- जैसे कला, पहेलियॉंँ, मेज वाले खेल, विभिन्न परिधान, चीजें बनाने वाले गुट्टे (building blocks), किताबें, नापने के औजार, संगीत, वाद्य तथा और भी बहुत कुछ।

बच्चों की सीखने की तत्परता के प्रति संवदेनशीलता[संपादित करें]

पियाजे वाली कक्षा विकास की गति को बढ़ाने की कोशिश नहीं करती। पियाजे मानता था कि बच्चों के सीखने के उपयुक्त अनुभव उनकी तात्कालिक सोच से ही विकसित होते हैं। शिक्षक बच्चों को ध्यानपूर्वक देखते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, और उन्हें ऐसे अनुभव सुलभ कराते हैं, जिनमें वे नई खोजी गई योजनाओं का अभ्यास कर सकें और जो उनके संसार को देखने के गलत तरीकों को चुनौती दे सकें। लेकिन शिक्षक बच्चों पर कोई नये कौशल नहीं थोपते जब तक वे उनमें रूचि और उनके लिए तैयारी नहीं दिखाते, क्योंकि ऐसा करने से वे वयस्कों के सूत्रों (formulas) को सतही ढंग से स्वीकार कर लेते हैं, पर उससे सच्ची समझ पैदा नहीं होती।

व्यक्तिगत भेदों को स्वीकारना[संपादित करें]

पियाजे का सिद्धांत यह मानकर चलता है कि सभी बच्चे विकास के समान अनुक्रम से गुजरते हैं, लेकिन उनकी गति/रफ्तार अलग-अलग होती है। इसलिए शिक्षकों को अलग-अलग विद्यार्थियों के लिए और छोटे-छोटे समूहों के लिए गतिविधियों की योजना बनाना चाहिए, ना कि एक साथ पूरी कक्षा के लिए। इसके अतिरिक्त शिक्षक शैक्षणिक प्रगति का मूल्यांकन करते समय हर बच्चे की तुलना उसी की पिछली स्थिति से करते हैं। उनकी रूचि इस बात में कम होती है कि बच्चे किन्हीं मानक स्तरों के सापेक्ष या कि समान उम्र के बच्चों के औसत प्रदर्शन के सापेक्ष कैसा प्रदर्शन करते हैं।

आलोचनाएँ[संपादित करें]

पियाजे का सिद्धान्त चुनौतियों से मुक्त नहीं रह पाया। उसके इन क्षेत्रों पर प्रश्न उठाये गये हैं :

  • विभिन्न विकास स्तरों पर बच्चों की क्षमताओं के अनुमान,
  • अवस्थाएं,
  • उच्च स्तरों पर तर्क करने के लिए बच्चों का प्रशिक्षण,
  • संस्कृति एवं शिक्षा।

प्याज़े का नैतिक विकास सिद्धान्त[संपादित करें]

बच्चे नैतिक मुद्दों के बारे में किस तरह सोचते हैं; इसके बारे में प्याजे (1932) ने रूचि जागृत की थी। उन्होंने बहुत अधिक गहराई से चार से बारह साल के उम्र के बच्चों का अवलोकन और साक्षात्कार किया। पियाजे ने बच्चों को कंचे खेलते हुए देखा ताकि वे यह जान सकें कि बच्चों ने खेल के नियम पर किस तरह से विचार किया। उन्होंने बच्चों से नैतिक मुद्दों (जैसे, सजा और न्याय) के बारे में भी बात की। पियाजे ने पाया कि जब बच्चे नैतिकता के बारे में सोचते हैं, तो वे दो अलग-अलग अवस्थाओं से होकर गुजरते है।

  • चार से सात साल के बच्चे (बाहरी सत्ता से प्राप्त) नैतिकता दिखाते है जो कि प्याजे के नैतिक विकास के सिद्धान्तों की पहली अवस्था है। बच्चे न्याय और नियमों को दुनिया के ना बदलने वाले गुणधर्म मानते हैं। उनके लिए न्याय और नियम ऐसी चीजें हैं जो लोगों के बस से बाहर होती हैं।
  • सात से दस साल की उम्र में बच्चे नैतिक चिन्तन की पहली से दूसरी अवस्था के बीच एक मिली-जुली स्थिति में होते है।
  • दस साल या उससे बड़े बच्चे आटोनोमस (स्वतंत्रता पर आधारित) नैतिकता दिखाते है। वे यह बात जान जाते है कि नियम और कानून लोगों के बनाए हुए हैं। और किसी के कार्य का मूल्यांकन करने में वे कार्य को करने वाले व्यक्ति के इरादों और कार्य के परिणामों के ऊपर भी विचार करते हैं।

चूंकि छोटे बच्चे बाहरी सत्ता वाली नैतिकता के स्तर पर होते है, वे किसी के व्यवहार के बारे में सही या गलत का निर्णय उस व्यवहार से होने वाले परिणामों को देखकर लेते हैं, न कि व्यवहार कर्त्ता के उद्देश्यों के आधार पर। जैसे कि उनके के लिए जानबूझ कर तोड़े गए एक कप की तुलना में हादसे में 12 कप टूटने की घटना ज्यादा बुरी है। जैसे बच्चे स्वतन्त्र अवस्था पर आने लगते हैं, वैसे-वैसे किसी काम को करने वाले का उद्देश्य/इरादा उनके नैतिक चिन्तन का एक आवश्यक बिन्दु बनने लगता है।

बाहरी सत्ता के आधर पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे यह भी मानते हैं कि नियम न बदलने वाली चीज है और यह नियम किसी शक्तिशाली सत्ता के द्वारा बनाए गए हैं। प्याजे ने छोटे बच्चों को सुझाया कि वह कंचे के खेल के नए नियम बनाएं, तो छोटे बच्चों ने मना कर दिया। दूसरी तरफ बड़े बच्चों ने परिवर्तन को स्वीकारा और पहचाना कि नियम सिर्फ हमारी सुविधा के लिए बनाए गए हैं, जिन्हें बदला जा सकता है।

बाहरी सत्ता के आधार पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे 'तुरन्त न्याय' की धारणा में भी विश्वास रखते हैं। यानि कि अगर एक नियम तोड़ा जाता है तो सजा भी मिलनी चाहिए। छोटे बच्चे मानते हैं कि अगर किसी चीज को खंडित किया या तोड़ा गया है तब यह काम अपने आप सजा से जुड़ जाता है। इसीलिए छोटे बच्चे जब भी कोई गलत काम करते हैं तब चिन्ता से अपने आसपास देखने लगते हैं, यह सोचकर कि उन्हें सजा तो मिलेगी। तुरंत न्याय का सिद्धान्त यह भी कहता है कि अगर किसी के साथ कुछ दुर्भाग्यपूर्ण हुआ हो तो उस व्यक्ति ने जरूर पहले कुछ किया होगा, जिसके परिणास्वरूप ऐसा हुआ। बड़े बच्चे जो नैतिकता की स्वतन्त्रता रखने लगते है, यह पहचानते है कि सजा तभी मिलती है जब किसी ने कुछ गलत होते देख लिया हो और उसके बाद भी जरूरी नहीं कि सजा मिले ही।

नैतिक तर्क को लेकर इस तरह के परिवर्तन कैसे आते हैं? पियाजे मानते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते है उनकी सोच सामाजिक मुद्दों के बारे में गहरी होती चली जाती है। प्याजे का मानना है कि सामाजिक समझ साथियों के साथ आपसी लेन-देन से आती है। जिन साथियों के पास एक जैसी शक्ति और ओहदा होता है वहां योजनाओं के बीच समझौता किया जाता है और सहमत न होने पर तर्क दिया जाता है और आखिर में सब कुछ ठीक हो जाता है। अभिभावक और बच्चे के रिश्तों में जहां अभिभावक के पास शक्ति होती है लेकिन बच्चों के पास नहीं, वहां नैतिक तर्क की समझ को विकसित करने की संभावना कम रहती है क्योंकि अधिकतर नियम आदेशात्मक तरीके से दिए जाते हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Susan Pass, Parallel Paths to Constructivism: Jean Piaget and Lev Vygotsky, Information Age Publishing, 2004, p. 74.
  2. Piaget, J. (1982). Reflections on Baldwin [interview with J. J. Vonèche]. In J. M. Broughton & D. J. Freeman-Moir (Eds.), The cognitive developmental psychology of James Mark Baldwin (pp. 80-86). Norwood, NJ: Ablex.
  3. Inhelder, B. (1989). Bärbel Inhelder [Autobiography] (H. Sinclair & M. Sinclair, Trans.). In G. Lindzey (Ed.), A History of Psychology in Autobiography (Vol. VIII, pp. 208-243). Stanford, CA: Stanford University Press. Tryphon, A., & Vonèche, J. J. (Eds.). (2001). Working with Piaget: Essays in honour of Bärbel Inhelder. Hove, East Sussex, UK: Psychology Press.
  4. Bruner, J. S. (1983). In search of mind: Essays in autobiography. New York: Harper & Row.
  5. Kohlberg, L. (1982). Moral development. In J. M. Broughton & D. J. Freeman-Moir (Eds.), The cognitive developmental psychology of James Mark Baldwin: Current theory and research in genetic epistemology (pp. 277-325). Norwood, NJ: Ablex.
  6. Kegan, Robert (1994). In Over Our Heads (p. 29). Cambridge, MA: Harvasrd University Press.
  7. Gardner, H. (2008). Wrestling with Jean Piaget, my paragon. What have you changed your mind about? http://www.edge.org/q2008/q08_1.html#gardner
  8. Burman, J. T. (2007). "Piaget no "remedy" for Kuhn, but the two should be read together: Comment on Tsou's "Piaget vs. Kuhn on scientific progress"". Theory & Psychology. 17 (5): 721–732. डीओआइ:10.1177/0959354307079306.
  9. Papert, S (March 29, 1999). "Child Psychologist: Jean Piaget". Time. 153: 104–107.
  10. Piaget, J (1979). "Comments on Vygotsky's critical remarks". Archives de Psychologie. 47 (183): 237–249.
  11. Piaget, J (2000). "Commentary on Vygotsky's criticisms of Language and Thought of the Child and Judgement and Reasoning in the Child (L. Smith, Trans.)". New Ideas in Psychology. 18 (2–3): 241–259. डीओआइ:10.1016/s0732-118x(00)00012-x. (Original work published 1962.)