जलवायुविज्ञान

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जलवायु विज्ञान (climatology) भौतिक भूगोल की एक शाखा है जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण पृथ्वी अथवा किसी स्थान विशेष की जलवायु का अध्ययन किया जाता है।

भौतिक पर्यावरण के विभिन्न घटकों में जलवायु महत्वपूर्ण घटक है। जलवायु को प्रादेशिक विभिनता की कुंजी कहते हैं। मानव एवं उसके भौतिक पर्यावरण के बीच होने वाली क्रिया प्रतिक्रिया के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव के क्रियाकलापों खान-पान रहन-सहन वेशभूषा बोलचाल एवं संस्कृति सभी पर जलवायु का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है।

मौसम एक अल्पकालिक वायुमंडलीय दशाओं का घोतक होता है जबकि जलवायु किसी स्थान विशेष की दीर्घकालीन वायुमण्डलीय दशाओं जैसे तापमान, दाब, पवन, आर्द्रता, वर्षा आदि का औसत होता है।

हंबोलट ने पृथ्वी की अपने अक्ष पर झुकाव को क्लाइमा कहा, इसीलिए हंबोल्ट को जलवायु विज्ञान का पिता कहा जाता है।


जलवायु विज्ञान (Climatology) मौसम और जलवायु दो अलग बातें हैं। वायुमंडल की तात्कालिक या अल्पकालिक स्थिति को मौसम कहते हैं और जलवायु किसी स्थान की तीस वर्ष या इससे अधिक समय की औसत परिस्थिति को बताता है। किसी वर्ष के किसी नियत दिन का मौसम दूसरे वर्ष के उसी दिन वैसा ही रहे, यह आवश्यक नहीं है। उसमें बहुत कुछ हेरफेर हो सकता है, किंतु दोनों दिनों के जलवायु में कोई अंतर नहीं पड़ेगा यदि लंबी अवधि की औसत स्थिति में इस बात का संकेत न हो कि उस स्थान के जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। विश्व के विभिन्न भूभागों के जलवायु का अध्ययन जलवायु विज्ञान कहलाता है। किसी भूभाग के जलवायु का निर्णय मौसम विज्ञान घटक के किसी एक ही तत्व के बहुवार्षिक औसत से नहीं होता, वरन्‌ कई महत्वपूर्ण तत्वों, जैसे दाब, ताप, वर्षा, आर्द्रता, बदली, वायु और धूप आदि के सामान्य मानों के संयोजन से होता है। साथ ही इन तत्वों के सामान्य दैनिक और वार्षिक परिवर्तन, इनके चरम मान तथा चरम मानों के संपात या असंपात का ज्ञान भी आवश्यक है। उदाहरणार्थ ताप, आर्द्रता, और वर्षा का दैनिक तथा वार्षिक परिवर्तन, वर्षा जाड़े में होती है या गर्मी में, जाड़े और गर्मी के विभिन्न महीनों में वर्षा का वितरण, वायु की गति और दिशा आदि बातों की जानकारी परमावश्यक है। विभिन्न महीनों में इन तत्वों के सामान्य आवर्ती तथा अनावर्ती हेरफेर भी जलवायु के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

सौर विकिरण और जलवायु- जलवायु और उसके हेरफेर की प्रथम सन्निकटता तक व्याख्या आतपन (insolation) के विश्ववितरण द्वारा संभव है, क्योंकि ऋतुओं का कारण है पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा और उसका अपनी धुरी पर झुकाव, जिसके परिणामस्वरूप आतपन का मौसमी हेरफेर होता है। सूर्य दहकती हुई गैसों का पिंड है। उसकी ऊर्जा का कारण तापनाभिकीय सतत अभिक्रियाएँ हैं। यह अभिक्रिया सायुज्य की है, जिसके परिणामस्वरूप हाइड्रोजन की हिलियम में और संहति की ऊर्जा में परिणति होती है। सूर्य प्रति सेकंड अपार ऊर्जा प्रेषित करता है। यह ऊर्जा 2,500 खर्व पाउंड कोयला जलाने पर प्राप्य ऊर्जा के समान है। इस ऊर्जा की तीव्रता दूरी के प्रतिलोम (inversely) वर्गानुपाती है। पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी के हिसाब से वायुमंडल के उदग्र भाग पर सूर्यकिरणों की लंबवत्‌ स्थिति के कारण प्रतिवर्ग सेंमी. स्थान पर, प्रति मिनट दो कैलॉरी ऊष्मा पहुँचती है। हर साल प्रति इकाई क्षेत्र की सतह पर औसत आतपन विषुवद्वृत्त में उच्चतम और ध्रुवों पर न्यूनतम है। इसका कारण यह है कि औसत सौर उच्चता विषुवद्वृत्त पर उच्चतम से लेकर ध्रुवों पर निम्नतम मान तक घटती जाती है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर वार्षिक गति के परिणामस्वरूप होनेवाले आतपन के आवर्ती हेरफेर के कारण किसी स्थान पर मौसम किस प्रकार बदल जाता है। विषुवद्वृत्त पर आतपन का उतार चढ़ाव न्यूनतम होता है, अत: इस क्षेत्र में ताप तथा मौसम का वार्षिक परिवर्तन प्राय: नहीं होता। केवल सूखे और नमी का थोड़ा सा प्रभाव पड़ता है। विषुवत्‌ क्षेत्र में अत्यंत गरम और अत्यंत ठंडे मौसम का तापांतर शायद ही कभी 1सें. से अधिक होता है। वार्षिक आतपन का परास (range) अक्षांतर के साथ बढ़ता है, जिसके कारण ताप परास यानी गर्मी और सर्दी का तापांतर, ज्यों ज्यों हम विषुवत्‌ क्षेत्र से ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, बढ़ता जाता है। इस संदर्भ में यह समझ लेना चाहिए कि आतपन का वार्षिक पथ वायुताप के वार्षिक पथ से लगभग एक महीना पिछड़ जाता है, जिसके कारण शीततम और उष्णतम मौसम मकर और कर्क संक्रांति के कुछ समय बाद होते हैं।

सूर्य के प्रवेशी विकिरण की दृष्टि से पृथ्वी को पाँच कटिबंधों में विभाजित किया जा सकता है।

(क) विषुवत्‌ कटिबंध- उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म काल में सूर्य विषुवत्‌ रेखा के उत्तर में और दक्षिणी गोलार्ध में ग्रीष्म काल में सूर्य उसके दक्षिण में होता है। विषुवद्वृत्त में दोनों विषुवों (equinoxes) में सूर्य शिरोबिंदु पर होता है। इस प्रकार साल में दो बार सूर्य विषुवत्क्षेत्र में शिरोबिंदु पर होता है। फलत: वसंत में और शरद् में, प्रवेशी विकिरण उच्चतम होगा। विषुवत्‌ कटिबंध में चूँकि सूर्य प्रति दिन आकाश में ऊँचाई पर होता है और दिन के घंटों में हेरफेर बहुत कम होता है, अत: ताप का वार्षिक परिवर्तन बहुत कम होता है। लेकिन इसके सापेक्ष दैनिक तापपरिवर्तन अधिक होता है, क्योंकि दिन के घंटे बदलते नहीं और सूर्य प्रति दिन ऊँचाई पर होता है।

(ख) शीतोष्ण कटिबंध (उत्तरी और दक्षिणी)- इन कटिबंधों में मध्यग्रीष्म में सूर्य शिरोबिंदु पर नहीं होता। गर्मी के दिन बड़े होते हैं और इन दिनों सूर्य ऊँचाई पर होता है, किंतु जाड़ों के दिन छोटे होते हैं और सूर्य निचाई पर होता है, जिसके परिणामस्वरूप साल में आनेवाले विकिरण में काफी परिवर्तन होता रहता है। इसके कारण, जैसा पहले ही कहा जा चुका है, अक्षांशों की ऊँचाई के साथ ताप का परिवर्तन बढ़ता जाता है। लेकिन ताप का दैनिक परिवर्तन अक्षांशों की वृद्धि के साथ घटता है, क्योंकि सूर्य की मध्यान्ह ऊँचाई घटती है।

(ग) ध्रुवीय कटिबंध (उत्तर ध्रुवीय और दक्षिण ध्रुवीय कटिबंध,)- ध्रुवीय वृत्त के ध्रुव की ओर वाले प्रदेश के मध्य जाड़े में दिन और रात सूर्य क्षितिज के नीचे होता है और मध्यग्रीष्म में सूर्य दिन और रात में क्षितिज के ऊपर होता है। दैनिक प्रवेशी विकिरण में कोई अंतर नहीं पड़ता और ताप का दैनिक परिवर्तन गायब हो जाता है। लेकिन जाड़े और गर्मी में प्रवेशी विकिरण का अंतर उच्चतम हो जाता है, जिसके कारण ताप का वार्षिक परिवर्तन बढ़ जाता है।

ध्रुवों पर गर्मी में सूर्य दिन रात क्षितिज के ऊपर रहता है और विषुवद्वृत्त पर दिन और रात के घंटे समान होते हैं। ग्रीष्म में पृथ्वी के वायुमंडल के उदग्र भाग पर प्रवेशी विकिरण विषुवद्वृत्त की अपेक्षा ध्रुवों पर अधिक होता है। लेकिन उच्च अक्षांशों वाले प्रदेशों में धरती की सतह पर विकिरण उतना ही अनुकूल नहीं हो सकता है, जितना विषुवत्‌ कटिबंधों में। इसका कारण यह है कि अक्षांतर प्रदेशों में सूर्य की किरणें वायुमंडल में अधिक दूर यात्रा करती हैं। इस कारण वे काफी क्षीण हो जाती हैं। यदि पृथ्वी का धरातल सम होता, जिससे प्रवेशी विकिरण समान रूप से अवशोषित होता, और यदि हवाएँ ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक न पहुँचातीं और धरातल के निकट तापवितरण क नियंत्रण विकिरण द्वारा होता तो ऐसी स्थिति में पृथ्वी के धरातल के निकट परिणामी तापवितरण निम्नलिखित होता:

(क) औसत वार्षिक ताप विषुवद्वृत्त पर उच्चतम और ध्रुवों पर न्यूनतम होता।

(ख) विषुवद्वृत्त पर तप का वार्षिक परिवर्तन कम होता और उच्चतम ताप वसंत और शरत्‌ में होता।

(ग) ताप का वार्षिक परिवर्तन अक्षांशों के बढ़ने के साथ बढ़ता और उच्चतम ताप गर्मी में होता।

(घ) ताप का दैनिक परिवर्तन विषुवद्वृत्त पर उच्चतम और अक्षांशों के बढ़ने के साथ घटता जाता।

धरती पर, इन परिणामों में किसी हद तक हेर फेर होता है, जिसका कारण जल और थल का वितरण और उष्मा का स्थानांतरण करनेवाली हवाएँ होती है।

जलवायु को प्रभावित करनेवाले बाह्य कारक  किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करनेवाले महत्वपूर्ण कार निम्नलिखित हैं : (क) अक्षांश- इसपर सौर विकिरण के आपतन का कोण, दिन के घंटे, मौसम की लंबाई और कुल प्रवेशी विकिरण निर्भर हैं। यह कारक अत्यंत महत्वपूर्ण है।

(ख) ऊँचाई- अधिकांश मौसम विज्ञान संबंधी तत्व ऊँचाई के साथ बदला करते हैं। दाब और ताप ऊँचाई के साथ बदलते हैं। हवा की तीव्रता भी ऊँचाई के साथ बढ़ती है। मेघ भी स्थान की ऊँचाई पर निर्भर करते हैं। सामान्य वायुमंडलीय स्थिति में अधिक ऊँचाई पर बादल प्राय: नहीं होते।

(ग) मृदा के गुण- नम और सूखी मृदा, काष्ठ या अकाष्ठ मृदा और हिमाच्छादित मृदा में ऐसे गुणधर्म हैं, जो जलवायु को प्रभावित करते हैं।

(घ) समतल की ढाल- यह अवक्षेपण की मात्रा और ताप को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए पहाड़ी इलाके के वाताभिमुख भाग (windward side) में हवा की ओटवाली दिशा (leeward side) की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।

(ङ) महाद्वीपीयता- इसका निर्णय महासागर और समुद्र के सबंध में स्थान की स्थिति से होता है। किसी स्थान पर प्रचलित पवन की मात्रा बहुत कुछ महाद्वीपीयता पर निर्भर है। समुद्री पवनपुंज स्थान को नम बनाता है, लेकिन महाद्वीप का स्थलीय पवनपुंज उसे सूखा बना देगा।

समुद्र और महादेश का पवन ताप पर प्रभाव- यह तो सभी जानते हैं कि समुद्र के निकटवर्ती भूभागों में ताप कम होता है। तटवर्ती स्थानों में जलवाष्प के प्रभाव के कारण, जिसका आपेक्षिक ताप अधिक होता हे, कभी अधिक गर्मी या ठंडक नहीं होती। महासागर तथा उसके निकट ताप का वार्षिक तथा दैनिक परिवर्तन कम होता है और तट से दूरी के साथ यह अंतर बढ़ता जाता है। अंतस्थलीय क्षेत्र समुद्री पवनपुंज से प्रभावित है या नहीं, और यदि है, जो किस सीमा तक, यह बात प्रवाहित पवन पर निर्भर करती है। जैसे पछुवा हवाओं के क्षेत्र में महासागरीय, अर्थात्‌ समुद्री, पवनपुंज का प्रभाव महादेश के पूर्वी भाग से अधिक उसके पश्चिमी भाग में होता है। मध्य अक्षांशों में पश्चिम तट पर पूर्वी तट की अपेक्षा माध्यवार्षिक ताप प्राय: अधिक होता है। व्यापारिक हवाओं के क्षेत्र में हवाएँ प्राय: पूर्वी होती हैं और ताप का वार्षिक तथा दैनिक परिवर्तन पूर्वी तट की अपेक्षा पश्चिमी तट में अधिक होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में, जहाँ उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिमी मानसून चला करते हैं, मानसून धाराएँ ताप को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि विश्व में सभी जगह जल और थल का वितरण और प्रचलित पवन का गुणधर्म ही ताप की परिस्थितियों का नियंत्रण करते हैं।

सामान्य वितरण से जलवायु पर वर्षा का प्रत्याशित प्रभाव  समुद्र और महासागर वायुमंडल में वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा नमी की पूर्ति करते हैं; समुद्र और महासागर से जल का आंतरस्थलीय भूभागों में वहन, संघनन और अवक्षेपण की प्रक्रिया से संबद्ध है। किसी परिदर्श वायु को संतृप्त करने के लिए उच्चताप पर निम्न ताप की अपेक्षा अधिक जलवाष्प की आवश्यकता होती है। अत: उत्तरी महादेशों में ग्रीष्म में, जबकि ताप अधिक और पवन अस्थिर होता है, शीत ऋतु की अपेक्षा, जब ताप निम्न होता है, अवक्षेपण अधिक होता है। ऐसे ऊर्ध्वगामी पवनपुंज के रुद्धोष्म शीतायन से संघनन तथा अवक्षेपण होता है। ऐसी ऊर्ध्वगामी धाराएँ निम्नदाबीय क्षेत्रों (चक्रवाती तूफान और अवनमन) में और पहाड़ियों के वाताभिमुख भागों में बहुत प्रमुख हैं। क्षैतिज प्रवह का अभिसारी तंत्र संतप्त वायु के अवक्षेपण के लिए अनुकूल और अपसारी प्रवाह प्रतिकूल होता है। विषुवप्रशांत मंडल (doldrums) और ध्रुवीय वाताग्रकटिबंध ऊपर वर्णित अभिसारी प्रवाह के मुख्य क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में वायुमंडल के प्रधान परिसंचरण के आदर्श चित्रानुसार वायु विपरीत पार्श्व से अभिसरण करती है। अपसारी वायुधाराओं का मुख्य क्षेत्र उपोष्ण कटिबंधीय प्रतिचक्रवात है। अत: पृथ्वी के सभी भागों की तुलना में विषुव-प्रशांत मंडल और ध्रुवीय अग्र कटिबंधों में अवक्षेपण की अधिक संभावना है।

रुद्धोष्मत: उष्ण अधोगामी वायुधाराएँ और अपसारी वायुधाराएँ चलती हैं। ग्रीष्म गोलार्ध की तरफ उत्तर-दक्षिण चलती हुई एक वार्षिक गति (rhythm) है। अत: पृथ्वी के वायुमंडल के प्रारंभिक परिसंचरण का आदर्श चित्र लेने पर भी अवक्षेपण कटिबंध का कुछ हेरफेर संभव है। श्री एस. पैटरसन के चित्र में धरातल पर अवक्षेपण के कटिबंधों को पूर्वलिखित चर्चाओं के संदर्भ में दिखाया गया है ।

अवक्षेपण- आदर्श स्थितियों के आधार पर अवक्षेपण का क्षेत्रीय वितरण पृथ्वी के भिन्न भिन्न भूभागों की औसत वार्षिक वर्षा से अच्छी तरह मेल खाता है। पूर्वी गोलार्ध में अफ्रीका, यूरोप और एशिया में विषुव-प्रशांत-मंडल-क्षेत्र में उच्चतम वर्षा क्षेत्र है। जैसा कहा जा चुका है, यह क्षेत्र उत्तर और दक्षिण में ग्रीष्म गोलार्ध की ओर परिवर्तनशील है। उत्तरी अफ्रीका के पश्चिम तट से लेकर अरब होते हुए केंद्रीय एशिया तक अतिशय सूखा प्रदेश फैला हुआ है। इस क्षेत्र का उत्तरी भाग पछुआ हवाओं की वर्षा का प्रदेश है। यह प्रदेश जाड़ों में दक्षिण की ओर परिवर्तनशील है। भूमध्यसागरीय प्रदेशों में शीतकालीन वर्षा होती है। इसके भी उत्तर में, वर्षा सभी ऋतुओं में होती है, किंतु ज्यों ज्यों हम अंदर घुसते हैं, वर्षा कम होती जाती है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में धुआँधार वर्षा का कारण ग्रीष्मकालीन दक्षिण-पश्चिमी मानसून है। जाड़े के दिनों में पूर्वी एशिया के तटवर्ती क्षेत्रों में थोड़े बहुत अवक्षेपण को छोड़कर अधिकतर सूखा ही रहता है। जहाँ तक पश्चिमी गोलार्ध का प्रश्न है, बढ़ते हुए अक्षांशों के साथ ऐसा ही वर्षावितरण देखा जाता है। ग्रीष्मकालीन विषुव वर्षा मेक्सिको तक और पछुआ हवाओं का वर्षाक्षेत्र सुदूर उत्तर तक फैला हुआ है। जाड़ों में दक्षिणी वर्षाक्षेत्र पश्चगामी होता है और उत्तरी क्षेत्र दक्षिणी कैलिफोर्निया तक चला आता है। उत्तरी अमरीका के पूर्वी तट पर गर्मियों में प्रचलित पवन स्थल पर होते हैं और जाड़ों में ध्रुवीय वाताग्रतट के इतने निकट होते हैं कि प्राय: अवक्षेपण हुआ करता है। अत: पूर्वी तट के निकट उपोष्ण कटिबंधीय सूखा प्रदेश नहीं है। उत्तरी अमरीका के संबंध में श्री एस. पैटर्सन के ये स्पष्ट अवलोकन हैं। दक्षिण गोलार्ध में वर्षावितरण से भी इसी कटिबंधीय व्यवस्था का बोध होता है। उष्ण कटिबंधीय अक्षांशों में पश्चिमी तट सूखे रहते हैं और पूर्वी तट पर वर्षा होती है। ऊँचे अक्षांशों में आर्द्र पश्चिमी तट और अपेक्षाकृत सूखे पूर्वी तट पाए जाते हैं। यह महत्वपूर्ण बात है कि पहाड़ियों की वाताभिमुख ढाल में साल भर में काफी वर्षा होती है।

वर्षा और ताप का वितरण, जिसका वर्णन अभी तक हुआ है, भूमंडल पर जलवायु के वितरण का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है।

जलवायु का वर्गीकरण- विश्व के सभी भूभागों के जलवायु का वर्गीकरण करते समय ऊपर वर्णित मौसम विज्ञान संबंधी, स्थल रूपरेखीय, महादेशीयता आदि कारकों पर उचित ध्यान देना आवश्यक है।

इन कारकों के अलावा पेड़ पौधों की हालत भी ध्यान देने योग्य है, क्योंकि अकृष्य भूमि की वनस्पतियों के प्रकार और उस स्थान के जलवायु में बहुत निकट का संबंध होता है। कई शोधकर्ताओं ने जलवायु का वर्गीकरण किया है। कूपेन (Koopen) का वर्गीकरण सर्वाधिक प्रचलित है, जो नीचे दिया जा रहा है। कूपेन ने कई उपविभागों के साथ निम्नलिखित 11 मुख्य प्रकार के जलवायु का वर्णन किया है :

(1) उष्ण कटिबंधीय वर्षा तथा जलवायु  यह कटिबंध मुख्यतया विषुव-प्रशांत-मंडल (विषुव कटिबंध) के ऊपर होता है। व्यापारिक हवाओं की अभिबिंदुता के कारण यह कटिबंध पश्चिमी तट पर सँकरा है। पूर्वी तट पर, जहाँ प्राय: वर्ष भर मानसून और स्थल भाग की व्यापारिक हवाओं के कारण वर्षा होती है और गर्मी पड़ती है, यह प्रदेश 260 उत्तर अक्षांश से 260 दक्षिणी अक्षांश तक फैला हुआ है। इस प्रकार के जलवायु की विशेषताएँ हैं। (क) उच्च ताप। अधिकतम सर्दी के दिनों में ताप 180सें. से ऊपर और ताप का वार्षिक परिवर्तन 60सें. से कम, (ख) उष्ण कटिबंधीय वनों के उपयुक्त वर्षा। दो बार अत्यधिक मात्रा की वर्षा के साथ साल भर वर्षा या एक लंबी और एक छोटी बरसात की ऋतु। प्रधानता सूखे मौसम की। लेकिन सबसे सूखे महीने में भी 6 सेंमी. तक वर्षा। (ग) महोष्म (megatherm) प्रकार की वनस्पतियाँ।

(2) उष्ण कटिबंधीय सवाना जलवायु- इसका क्षेत्र उष्ण कटिबंधीय वनों के चतुर्दिक का प्रदेश है और विषुव प्रशांत मंडल की परिवर्तनशीलता के कारण इस उष्ण कटिबंधीय जलवायु की ये विशेषताएँ हैं : (क) उच्च ताप। अधिकतम शीत के मास का ताप 180सें. से अधिक, वार्षिक ताप का अंतर 120सें. से कम; (ख) गर्मी में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा, जाड़े में सूखा, जाड़े के किसी एक महीने में 6 सेंमी. से कम वर्षा तथा (ग) थोड़ी बहुत उष्णकटिबंधीय-वर्षा, वन-जलवायु किस्म की वनस्पतियाँ। कहीं कहीं मैदान और वृक्ष।

(3) स्टेप्प (steppe)- सवाना के मैदान ध्रुवों की ओर अर्धशुष्क प्रदेशों में विलीन हो जाते हैं। इन प्रदेशों में गर्मी में कुछ वर्षा होती है और जाड़ों में सूखा पड़ता है। इन्हें स्टेप्प कहते हैं। ये महाद्वीप में अंदर तक फैले हुए हैं जहाँ समुद्र की नम हवाओं के अभाव में जलवायु सूखी होती है। स्टेप्पों के विषुव भाग में कुछ उष्णकालीन वर्षा होती है। प्रचलित पछुआ हवाओं के अनुदक्षिण प्रवास के कारण कुछ भाग में जाड़ों में वर्षा होती है और गर्मी में सूखा पड़ता है। स्टेप्प जलवायु की विशेषताएँ हैं : (क) ताप का अधिक परिवर्तन ; (ख) पर्याप्त वर्षा का अभाव, अधिक समय के अंतर पर बौछार के रूप में वर्षा तथा (ग) उच्च ताप और सूखे प्रदेश के लायक वनस्पतियाँ।

(4) मरुस्थल- महादेशों के उपोष्णकटिबंधीय अक्षांशवाले पश्चिमी भाग प्रतिचक्रवातों के परिसंचरण से उत्पन्न अत्यधिक शुष्क हवाओं के कारण मरुस्थल हो जाते हैं। महादेश के पूर्वी भाग मानसून और व्यापारी हवाओं के कारण मरुस्थल नहीं होते। मरुस्थल की विशेषताएँ : (क) गर्मी में अत्यधिक ताप, दैनिक ताप का अत्यधिक परिवर्तन और ताप का वार्षिक परिवर्तन; (ख) स्वच्छ आकाश की प्रधानता। अत्यधिक सूखा, धूल और रेत के तूफान, विरल अंतर पर प्रचंड वर्षा तथा (ग) स्टेप्प कोटि की वनस्पतियाँ।

(5) उष्ण जलवायु के साथ वर्षारहित शीत- उष्ण जलवायु का क्षेत्र निम्न और मध्य अक्षांतरों पर स्थित है और सवाना से सटा हुआ होता है। यहाँ ताप सवाना से कम होता है। मानसून हवाओं से गर्मी में वर्षा होती है और जाड़ों में सूखा पड़ता है। इस जलवायु की विशेषताएँ : (क) सबसे ठंढे महीने का औसत ताप 180सें. से कम और 30 सें. से अधिक तथा सबसे गर्म महीने का औसत ताप 100सें. से अधिक; (ख) वर्षा गर्मी में, जाड़ों में सूखा, अत्यंत सूखे महीने की तुलना में अत्यंत नम महीने में 10 गुनी वर्षा तथा (ग) मध्योष्म (mesothermal) कोटि की वनस्पतियाँ।

(6) उष्ण जलवायु के साय वर्षारहित गर्मी- यह जलवायु, उपोष्ण कटिबंध प्रतिचक्रवातों के ध्रुवोन्मुख भागों में, जहाँ प्रतिचक्रवातों के वार्षिक प्रवास से प्रचलित व्यापारिक हवाओं से जाड़ों में वर्षा होती है, पाई जाती है। इसे प्राय: भूमध्यसागरीय जलवायु कहते हैं। विशेषताएँ : (क) ताप की स्थिति प्राय: वही है जो उष्ण जलवायु के साथ, वर्षारहित शीत में वर्णित है; (ख) गर्मी में सूखा पड़ता है और जाड़ों में वर्षा होती है। सबसे नम महीने में सबसे सूखे महीने की तिगुनी वर्षा। सबसे सूखे महीने में 3 सेंमी. से कम वर्षा होती है तथा (ग) अवर्षण और उष्ण ग्रीष्म। साधारण शीत और वर्षा के उपयुक्त मध्योष्म वनस्पतियाँ।

(7) नम शीतोष्ण जलवायु- नम शीतोष्ण जलवायु के प्रदेश समुद्री पवनपुंज से साल भर प्रभावित रहनेवाले प्रदेश हैं। इस जलवायु की विशेषताएँ : (क) ताप की अवस्था लगभग उष्ण जलवायु की सी है, जिसमें वर्षा ग्रीष्म या शीत ऋतु में होती है; (ख) सभी ऋतुओं में पर्याप्त वर्षा, वार्षिक परिवर्तन अपर्याप्त तथा (ग) साल भर वर्षा होने के कारण सदा हरित मध्योष्म वनस्पतियाँ।

(8) शीत जलवायु, नम जाड़ा- उपध्रुवीय चीड़ के जंगलों में ऐसी, जलवायु होती है। यह जलवायु महादेश के पश्चिमी भाग में बहुत बड़े क्षेत्र में, और उसकी तुलना में पूर्वी तट पर काफी छोटे भाग में, होता है। इस जलवायु की विशेषताएँ : (क) सर्दी का निम्नतम ताप 30सें. से कम होता है और गर्मी का उच्चतम ताप 100सें. से अधिक होता है; (ख) सर्दी की निम्नतम ताप 30सें. से कम होता है और गर्मी का उच्चतम ताप 100सें. से अधिक होता है ; (ख) वर्ष भर अवक्षेपण  तटवर्ती भूभाग में जाड़े में और आंतरस्थलीय भूभाग में गर्मी में। किसी मौसम में भी अत्यधिक सूखा नहीं पड़ता तथा (ग) अणूष्मा (Microthermal) प्रकार की वनस्पतियाँ।

(9) शीत जलवायु, सूख जाड़ा- महाप्रदेश के ऊँचे अक्षांशों में यह जलवायु फैला हुआ है। इसकी विशेषताएँ शीत जलवायु तथा नम जाड़ा हैं। अंतर इस बात का है कि अवक्षेपण की मात्रा जाड़े के महीनों में बहुत कम होती है। इसका कारण जाड़ों में ताप की कमी और नम वायु का अभाव है।

(10) टुंड्रा जलवायु- यह महादेश के सुदूर उत्तर में है। गर्मी का उच्चतम ताप 100 सें. से कम है। यहाँ जंगलों का अभाव है और अधोभूमि हमेशा बर्फीली रहती है।

(11) हिम जलवायु- यह जलवायु ध्रुवीय आवरण में है, जहाँ हिम और बर्फ का वर्ष भर एकछत्र राज्य रहता है और गर्मी का उच्चतम ताप शून्य अंश सें. से कम ही होता है।

वैमानिकी (aviation) की दृष्टि से विश्व के भिन्न भिन्न स्थानों के जलवायु के वर्गीकरण का आधार पवनपुंज (air mass) की आवृत्ति होनी चाहिए। इस विभाजन में पवनपुंज की उच्चतम अंतर्क्रियावाले प्रदेश, वे प्रदेश जहाँ रेत और धूल के तूफान उठते हैं, प्रचंडवात (squally) मौसम रहता है और वायु अत्यंत असंतुलित होती है तथा चक्रवात और अवनमन से प्रभावित क्षेत्रों के अतिरिक्त कुहरे आदि के क्षेत्रों का भी सही प्रदर्शन आवश्यक है। अभी तक इस विभाजन की दिशा में प्रयत्न नहीं किया गया है।

भारत की जलवायु- भारत के विभिन्न स्थानों का जलवायु विविधता के कारण अत्यंत रोचक है। भारत के उत्तर-पश्चिम, राजपूताना मरुस्थल, में 7 सेंमी. या इससे कम औसत सालाना वर्षा होती है, जबकि उत्तर-पूर्व में चेरापूंजी में 1,000 सेंमी. औसत सालाना वर्षा होती है, जो एशिया में सर्वाधिक है। कुछ पहाड़ी स्टेशनों में जाड़ों में 00सें. से भी कम ताप होता है, तो मध्यभारत के कुछ स्टेशनों में उच्चतम ताप 500 सें. के लगभग होता है। हिमालय के पहाड़ी स्टेशन शत प्रति शत नमी के साथ कई दिनों तक मेघावृत्त रह सकते हैं, लेकिन संभव है कि जाड़ों में वहाँ हवा में आर्द्रता शून्य प्रतिशत हो। दक्षिण भारत के कई तटीय स्टेशनों में औसत सालाना ताप का परास उत्तर भारत के कई स्टेशनों के दैनिक ताप के परास से भी कम होती है। एक और रोचक बात है, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम मानसून से संबंधित ऋतु विज्ञानीय कारकों का अतिश्य परिवर्तन। भारत में उत्तर-पूर्वी मानसूनी मौसम दिसंबर से फरवरी तक जाड़े के साथ संपतित होता है। इन दिनों आसमान साफ रहता है, मौसम काफी अच्छा होता है और आर्द्रता कम होती है। उत्तर भारत में खासकर यह अवस्था कभी कभी ईरान और उत्तर भारत की ओर चलनेवाले पछुआ विक्षोभ (disturbances) के कारण, जिसमें वर्षा, बदली और थोड़ा अवक्षेपण भी हो जाता है, गड़बड़ा जाती है। उत्तर-पूर्वी मानसून के बाद मार्च से मई तक ग्रीष्म रहता है। इसकी विशेषता यदा कदा रेत और धूल के तूफान हैं। मई का अंत होते होते भारतीय क्षेत्रों पर वायुसंचरण प्रबल हो जाता है और लगभग उसी समय विषुवद्वृत्त के दक्षिण-पूर्व में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से व्यापारिक हवाएँ उठकर भारत के पवनसंचरण में समा जाती हैं। इसी को दक्षिण-पश्चिमी मानसून कहते हैं, जो भारत को प्रभावित करता है। यह आर्द्र धारा धीरे धीरे भारत के स्थल भाग की ओर बढ़ती है और जुलाई के पहले सप्ताह तक भारत भर में फैल जाती है। भारत सितंबर तक दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्रभावित रहता है। यहाँ पर यह कह देना ठीक होगा कि उत्तर-पूर्वी मानसून दक्षिण भारत के पूर्वी तट पर ही वर्षा करता है, अन्यत्र नहीं। सच तो यह है कि अधिकतर स्थानों की साल भर की कुल वर्षा का 75 प्रतिशत दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रभाव से होता है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून की एक और विशेषता यह है कि इस मौसम में कहीं भी अनवरत वर्षा नहीं होती। वर्षा थोड़े थोड़े समय के अंतर पर होती हे, जो फसल की उपज के लिए लाभदायक होती है। मानसून के बाद अक्टूबर और नवंबर गर्मी और जाड़े के बीच के संक्रमण का समय है। इन दिनों मौसम प्राय: अच्छा रहता है।

समुद्र से उठनेवाले चक्रवाती तूफान और अवनमन भी भारत के जलवायु को प्रभावित करते हैं। दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दिनों में तूफान और अवनमन बंगाल की खाड़ी के उत्तर से उठकर मानसून धारा को सक्रिय करते और राह में साधारण से लेकर अत्यधिक वर्षा करते हुए भारत में पश्चिमोत्तर दिशा में प्रवेश करते हैं।

दक्षिण-पश्चिमी मानसून के प्रत्येक महीने में इस अवनमन और तूफान की आवृत्ति 4 और 5 के बीच होती है। मानसून से पहले अप्रैल, मई में और बाद अक्टूबर से दिसंबर तक में उठनेवाले अल्पसंख्यक (साल में एकाध) चक्रवाती तूफान विषुवद्वृत्त से उठकर भारत में प्रवेश करते हैं। इनका भीतरी क्रोड प्रभंजन पवन का होता है। ये प्राय: तटवर्ती भूभागों में कोहराम मचा देते हैं और भयंकर वर्षा, तेज हवा और तूफानी तरंगों का दौर लाते हैं।

भारत की जलवायु के संबंध में ऊपर के वर्णन से स्पष्ट है कि भारत की जलवायु को कूपेन के वर्गीकरण में से किसी एक वर्ग में रखना अत्यंत कठिन है। भारत के अधिकांश भाग की जलवायु के लिए उपयुक्त अर्थगर्भित शब्द होगा 'मानसूनी जलवायु'


                    Editor
                Shivangi Gupta