जगन्नाथ प्रसाद चौबे 'वनमाली'

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जगन्नाथ प्रसाद चौबे 'वनमाली' (१९१२ आगरा -१९७६ (भोपाल) हिन्दी साहित्यकार थे। वे चालीस से साठ के दशक के बीच हिंदी के कथा जगत के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। उन्होंने करीब सौ से ऊपर कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं निबंध लिखे।

1934 में उनकी पहली कहानी "जिल्दसाज" कलकत्ते से निकलने वाले ‘विश्वमित्र‘ मासिक में छपी और उसके बाद लगभग पच्चीस वर्षो तक वे प्रतिष्ठित साहित्यक पत्र पत्रिकाओं 'सरस्वती', ‘कहानी‘, ‘विश्वमित्र‘, 'विशाल भारत' ‘लोकमित्र‘, ‘भारती‘, ‘माया‘, ‘माधुरी‘ आदि में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे अनुभूति की तीव्रता, कहानी में नाटकीय प्रभाव, सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक समझ और विश्लेषण की क्षमता के कारण उनकी कहानियों को व्यापक पाठक वर्ग और आलोचकों, दोनों से ही सराहना प्राप्त हुई।

आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने अपने श्रेष्ठ कहानियों के संकलन में उनकी कहानी ‘आदमी और कुत्ता‘ को स्थान दिया था, करीब बीस वर्षो तक मध्य प्रदेश के अनेक विद्यालयों, महाविद्यालयों में वनमाली जी की कहानियाँ पढाई जाती रहीं। कक्षा साहित्य के अलावा उनके व्यंग्य निबंध भी खासे चर्चित रहे है, आकाशवाणी इंदौर से उनकी कहानियों नियमित रूप से प्रसारित होती रही।

कक्षा साहित्य के अतिरिक्त ‘वनमाली‘ जी का शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान रहा। वे मध्य प्रदेश के अग्रगण्य शिक्षाविदों में थे। शिक्षक, प्रधानाध्यापक एवं उपसंचालक के रूप में उन्होंने बिलासपुर, खंडवा और भोपाल में कार्य किया और इस बीच अपनी पुस्तकों के माध्यम से, शालाओं और शिक्षक विधियों में नवाचार के कारण और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद् की समिति के सदस्य के रूप में शिक्षा जगत में उन्होंने महत्वपूर्ण जगह बनाई। 1962 में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हाथों उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से विभूषित किया गया।

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