ग्राम अभिरंजन

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स्टैफ़िलोकोकस ऑरियस (जो ग्राम-धनात्मक है और जामुनी दिख रहा है) और ऍशेरिचिया कोलाए (जो ग्राम-ऋणात्मक है और लाल दिख रहा है) के मिश्रित समूह का ग्राम अभिरंजन

ग्राम अभिरंजन (Gram staining) या ग्राम प्रणाली (Gram's method) बैक्टीरिया की अनेक जीववैज्ञानिक जातियों को दो बड़े गुटों में विभाजित करने की एक विधि है। इसमें किसी भी बैक्टीरिया के समूह को क्रिस्टल वायोलेट (crystal violet) नामक रंग से रंगा जाता है। अपनी कोशिका भित्ति (कोशिकाओं की दिवारों के भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर कुछ जातियों की कोशिकाएँ नीला रंग पकड़ लेती हैं जबकि अन्य रंगहीन रहती हैं। इन सब पर फिर गुलाबी रंग उडेलने से नीले रंग पकड़ चुकी कोशिकाएँ नीली या जामुनी रहती हैं जबकि रंगहीन कोशिकाएँ गुलाबी या लाल रंगी जाती हैं। किसी भी नमूने में उपस्थित बैक्टीरिया की पहचान करने के लिये ग्राम अभिरंजन अक्सर सर्वप्रथम परीक्षण होता है।[1]

नीले रंगे जाने वाले बैक्टीरिया को "ग्राम-धनात्मक" (Gram positive) और नीला न रंगे जाने वालों को "ग्राम-ऋणात्मक" (Gram negative) कहा जाता है। इस परीक्षण का आविष्कार डेनमार्क के हान्स क्रिस्चन ग्राम ने करा था और इसका नाम उन्हीं पर रखा गया है। ध्यान दें कि इसमें वज़न से सम्बन्धित ग्राम मापन का कोई लेना-देना नहीं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. John G. Holt; Noel R. Krieg; Peter H.A. Sneath; James T. Staley; Stanley T. Williams (1994). Bergey's Manual of Determinative Bacteriology (9th ed.). Lippincott Williams & Wilkins. p. 11. ISBN 0-683-00603-7.