क्रुप

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क्रुप का प्रतीक : तीन छल्ले । आजकल ये तीन छल्ले थिसेनक्रुप (ThyssenKrupp) के लोगो में विद्यमान हैं।

क्रुप (Krupp) एक जर्मन व्यवसायी परिवार जो लोहे और इस्पात के सामान तथा शस्त्रास्त्र (ammunition and armaments) तैयार करनेवाले यूरोप के सबसे बड़े और प्रसिद्ध कारखाने का स्वामी रहा। इस परिवार के व्यापारिक समूह का नाम फ्रीड्रिख क्रुप एजी (Friedrich Krupp AG) है। इस परिवार की उन्नति तथा अवनति जर्मनी के राजनीतिक उत्थान तथा पतन से संबंधित रही है। लोहे तथा इस्पात के व्यापार से क्रुप परिवार का संबंध यों तो १६वीं शताब्दी से ही रहा है, किंतु १९वीं तथा २०वीं शताब्दियों में जर्मन इस्पात की उन्नति तथा विश्वव्यापक युद्धों से यह परिवार मुख्यत: संबद्ध था।

परिचय[संपादित करें]

अल्फ्रेड क्रुप

इस व्यवसाय के पूर्व संचालकों में फ्रीडरिख क्रुप (१७८७-१८२६ ई.) ने सर्वप्रथम ढला हुआ इस्पात बनाने की चेष्टा की थी। उनकी चेष्टाओं को सफलता नहीं मिली, किंतु जब उनके पुत्र ऐल्फ्रडे (१८१२-१८८७ ई.) ने सन् १८४८ ई. में कारबार सँभाला तब वे इस्पात की ढली तोपें बनाने में सफल हुए और उनका तोपों का व्यवसाय इतना बढ़ा कि वे 'तोपों के राजा' कहलाने लगे। इनके कारखाने ने १८५१ ई. में हुई इंग्लैंड की विराट् प्रदर्शिनी में लगभग ४,००० किलोग्राम भारवाली इस्पात की निर्दोष ढली हुई सिल का प्रदर्शन कर तत्कालीन उद्योगपतियों को आश्चर्य में डाल दिया था। १८६२ ई. में इस्पात तैयार करने की बेसेमर प्रक्रिया (Bessemer process) नामक रीति का यूरोप में सर्वप्रथम प्रयोग इस कारखाने ने किया। जर्मनी के युद्ध में लगे रहने से तोपें तथा इस्पात की अन्य वस्तुएँ बनाने के कारण इस कारखाने की अतुलनीय उन्नति हुई। ऐल्फ्रडे की मृत्यु के समय उनके कारखाने में २१,००० मनुष्य काम करते थे। जर्मनी की औद्योगिक उन्नति के साथ साथ क्रुप के कारखाना भी अभूतपूर्व उन्नति करता गया।

फ्रीड्रिख़ ऐल्फ्रडे (१८५४-१९०२ ई.) ने १८९० ई. से कवचपट्ट निर्माण, खानों से धातु निकालने, पोतनिर्माण तथा अन्य कामों के कारखाने स्थापित आरंभ किया। रासायनिक तथा भौतिक अनुसंधान के लिये भी उन्होंने एक संस्था स्थापित की जो क्रोम-निकेल-इस्पात संबंधी अनुसंधान के लिये विश्वप्रसिद्ध हुई। फ्रीर्डिख़ ऐल्फ्रडे की मृत्यु के समय उनके कारखाने में ४३,००० कार्यकर्ता थे। जर्मनी के सम्राट् ने इनकी अंत्येष्टि क्रिया के समय उपस्थित होकर इनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया था।

इनके पश्चात् इनकी पुत्री बर्था मालिक हुई और उन्होंने अपना सब कारबार सन् १९०५ में अपने पति गस्तैव फ़ान बोहलेन अंड हैलबैख़ (Alfried Krupp von Bohlen und Halbach) को सौंप दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक जर्मनी के अस्त्र शस्त्रों की लगभग सभी आवश्यकताएँ पूरी करनेवाला एकमात्र क्रुप का ही कारखाना था। इस युद्ध की समाप्ति से इस कारखाने को बड़ा धक्का लगा; तब उसने शस्त्रों के स्थान पर रेल के इंजन तथा कृषि के यंत्र तैयार करना आरंभ किया। नात्सी दल तथा हिटलर के अभ्युदय के साथ कारखाने का उत्पादन तथा स्थिति फिर बदली। क्रुप ने हिटलर की धन से सहायता की। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् १९४५ ई. में मित्रराष्ट्रों ने कारखाने को अपने हाथ में ले लिया। क्रुप फ़ॉन बोहलेन पर युद्धापराधी होने का अभियोग लगाया जानेवाला था, किंतु न्यायालय के सम्मुख अपने पक्ष का प्रतिपादन करने में असमर्थ जानकर उन्हें छोड़ दिया गया।

उनके पुत्र ऐल्फ्रडी तथा कारखाने के ११ अधिकारियों पर १९४७ ई. में न्यूरेमबर्ग में मुकदमा चला और ऐल्फ्रडी को १२ वर्ष का कारावास तथा उनकी समस्त संपत्ति के जब्त होने का दंड मिला; किंतु जनवरी, १९५१ ई. में वे छोड़ दिए गए और उनकी संपत्ति जब्तों की आज्ञा भी रद्द कर दी गई। १९५३ ई. में क्रुप को कोयले और इस्पात उत्पादन का कार्य कभी न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी; और उन्हें इन उद्योगों के प्रतिकर के स्वरूप लगभग ३३ करोड़ रुपए दिए गए। उनके अन्य उद्योग, जिनका मूल्य ७० करोड़ रुपया आँका जाता हैं, उन्हें वापस दे दिए गए।