केप्लर के ग्रहीय गति के नियम

(1) कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार हैं एवं उनकी नाभियाँ पहले ग्रह के लिये (focal points) ƒ1 and ƒ2 पर हैं तथा दूसरे ग्रह के लिये ƒ1 और ƒ2हैं। सूर्य नाभिक बिन्दु ƒ1 पर स्थित है।
(2) ग्रह (१) के लिये दोनो छायांकित (shaded) सेक्टर A1और A2 का क्षेत्रफल समान है तथा ग्रह (१) के लिये सेगमेन्ट A1 को पार करने में लगा समय उतना ही है जितना सेगमेन्ट A2 को पार करने में लगता है।
(3) ग्रह (१) एवं ग्रह (२) को अपनी-अपनी कक्षा की परिक्रमा करने में लगे कुल समय a13/2 : a23/2 के अनुपात में हैं।
खगोल विज्ञान में केप्लर के ग्रहीय गति के तीन नियम सूर्य के चारों ओर ग्रहों के कक्षा के लिए उत्तम अनुमान देते हैं। इन्हें योहानेस केप्लर ने १६०८ एवं १६२० के बीच अपनी तीन पुस्तकों "एस्ट्रोनोमिया नोवा" (=नवीन खगोलविज्ञान), "हार्मोनिके मुंडी" तथा "एपिटोम एस्ट्रोनोमिया कोपरनिकाने" में प्रकाशित किया था। ये नियम केप्लर के सौर तन्तु के संकल्पनाओं पर आधारित थे, जिसे टैको ब्राहे के सटीक खगोलीय आँकड़ों के हिसाब से बदला गया था। इन नियमों ने कोपरनिकस के ग्रहों के सौरस्थिर प्रतिरूप के वृत्ताकार कक्षा एवं एपिसाइकल को एक सूर्यकेंद्रीय प्रतिरूप से बदल दिया, जो दीर्घवृत्त कक्षा के बारे में बताता था, जिनकी ग्रहों की वेग उसी हिसाब से बदलती रहती थी। तीनों नियम इस प्रकार हैं:
- सभी ग्रहों की कक्षा दीर्घवृत्ताकार होती है तथा सूर्य इस कक्षा के एक नाभि पर होता है।
- ग्रह को सूर्य से जोड़ने वाली रेखा समान समयान्तराल में समान क्षेत्रफल तय करती है।
- किसी ग्रह की कक्षीय अवधि का वर्ग उसकी कक्षा के अर्ध-प्रमुख अक्ष के घन के सीधे आनुपातिक है।
इन तीन नियमों की खोज जर्मनी के गणितज्ञ एवं खगोलविद् योहानेस केप्लर (Johannes Kepler 1571–1632) ने की थी। और सौर मंडल के ग्रहों की गति के लिये वह इनका उपयोग करते थे। वास्तव में ये नियम किन्ही भी दो आकाशीय पिण्डों की गति का वर्णन करते हैं जो एक-दूसरे का चक्कर काटते हैं।
केप्लर द्वारा उपयोग में लाए गए आंकडे
[संपादित करें]केप्लर ने अपने तृतीय नियम के लिए निम्नलिखित सारणी में दर्शाए गए आंकड़ों का उपयोग किया था।
| ग्रह | सूर्य से माध्य दूरी |
आवर्तकाल (दिन) |
|
|---|---|---|---|
| बुध | 0.389 | 87.77 | 7.64 |
| शुक्र | 0.724 | 224.70 | 7.52 |
| पृथ्वी | 1 | 365.25 | 7.50 |
| मंगल | 1.524 | 686.95 | 7.50 |
| बृहस्पति | 5.2 | 4332.62 | 7.49 |
| शनि | 9.510 | 10759.2 | 7.43 |
उपरोक्त पैटर्न को देखते हुए केप्लर ने लिखा:[1]
"पहले मुझे लगा कि मैं स्वप्न देख रहा हूँ… लेकिन यह पूर्णतः असंदिग्ध और सुनिश्चित है कि दो ग्रहों के आवर्त काल के बीच जो अनुपात है वही अनुपात उनकी सूर्य से माध्य दूरियों के (3/2)वें घात के अनुपात के बराबर है।
नीचे की सारणि में उपरोक्त आंकड़ों के आधुनिक अनुमानित मान दिए गए हैं:
| ग्रह | अर्ध-दीर्घ अक्ष | आवर्तकाल (दिन) |
|
|---|---|---|---|
| बुध | 0.38710 | 87.9693 | 7.496 |
| शुक्र | 0.72333 | 224.7008 | 7.496 |
| पृथ्वी | 1 | 365.2564 | 7.496 |
| मंगल | 1.52366 | 686.9796 | 7.495 |
| बृहस्पति | 5.20336 | 4332.8201 | 7.504 |
| शनि | 9.53707 | 10775.599 | 7.498 |
| युरेनस | 19.1913 | 30687.153 | 7.506 |
| नेप्चून | 30.0690 | 60190.03 | 7.504 |