एम.डी.वाल्साम्मा

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मंथूर देवसिया वल्साम्मा (जन्म-२१ अक्तूबर १९६०), एक सेवानिवृत्त भारतीय एथलीट है। वह एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली व्यक्तिगत रूप से दूसरी भारतीय महिला थी और भारतीय धरती पर इसे जीतने वाली पहली महिला थी।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

वल्साम्मा का जन्म २१ अक्तूबर,१९६० केरला के कन्नूर जिले के ओत्ताथई में हुआ था। स्कूल के शुरूआती दिनों से ही उन्होंने एथलेटिक्स में करियर बनाने के लिए सोच लिया था परन्तु मर्सी कॉलेज[1], पलक्कड़ जाने के बाद वह उसे और गंभीरता से लेने लगी। उनका पहला पदक १९७९ में पुणे में इंटर-यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में १०० मीटर की बाधा और पेंटाथलॉन में केरल के लिए था। वह दक्षिणी रेलवे (भारत) में नामांकित थी व उन्हें ऐ.के कुट्टी द्वारा प्रशिक्षित किया गया था। उन्होंने १९८१ में बैंगलोर में इंटर-स्टेट मीटिंग में पांच स्वर्ण पदक जीतकर, ४०० मीटर फ्लैट और ४०० मीटर और १०० मीटर रिले के अतिरिक्त १०० से ४०० मीटर की दूरी पर बाधा दौड़ में सबको प्रभावित किया।

पेशेवर एथलेटिक्स करियर[संपादित करें]

१९८२ एशियाई खेलों में जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में, वाल्समम् ने ५८.४७ सेकेंड में भारतीय और एशियाई रिकॉर्ड समय में ४०० मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। इससे कमलजीत संधू (४०० मीटर-१९७४) के बाद, भारत के लिए एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली दूसरी महिला खिलाड़ी बनी। १९८२ में भारत सरकार द्वारा उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया और १९८३ में पदम् श्री से सम्मान दिया गया। लगभग १५ वर्षों के कैरियर में, एम.डी.वल्साम्मा ने हवाना, टोक्यो, लंदन में, १९८२, १९८६, १९९०, १९९४ एशियाई खेलों के संस्करणों में भाग लिया,और सभी एशियन ट्रैक एंड फील्ड मीट में और एस.ए.एफ गेम्स में भाग लिया प्रत्येक प्रतियोगिता अपनी अलग छाप छोड़ी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Mercy College, Palakkad