कृत्रिम परिवेशी निषेचन (इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन)

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पात्रे निषेचन (IVF) का सरलीकृत चित्रण जिसमें एकल-वीर्य इन्जेक्शन का चित्रण है।

कृत्रिम परिवेशी निषेचन (आईवीएफ (IVF)) वह प्रक्रिया है जिसमें गर्भाशय से बाहर, अर्थात इन विट्रो यानी कृत्रिम परिवेश में, शुक्राणुओं द्वारा अंड कोशिकाओं का निषेचन किया जाता है।[1] जब सहायता-प्राप्त प्रजनन तकनीक की अन्य पद्धतियां असफल हो जाती हैं, तो आईवीएफ़ (IVF) बंध्यता का एक प्रमुख उपचार होता है। इस प्रक्रिया में डिम्बक्षरण प्रक्रिया को हार्मोन द्वारा नियंत्रि‍त करते हुए स्त्री की डिम्बग्रंथि से डिम्ब (अंडाणु) निकाल कर एक तरल माध्यम में शुक्राणुओं द्वारा उनका निषेचन करवाया जाता है। इसके बाद सफल गर्भाधान को स्थापित करने के उद्देश्य से इस निषेचित अंडाणु (ज़ाइगोट) को रोगी के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है। प्रथम सफल ‘’टेस्ट ट्यूब शिशु’’, लुइस ब्राउन का जन्म 1978 में हुआ था। उससे पहले ऑस्ट्रलियन फ़ॉक्सटन स्कूल के शोधकर्ताओं ने 1973 में एक अस्थायी जैव-रासायनिक गर्भाधान की और 1976 में स्टेप्टो और एडवर्ड्स ने एक बहिगर्भाशयिक गर्भाधान की घोषणा की थी।

लातिनी मूल के शब्द इन विट्रो, जिसका अर्थ कांच के भीतर होता है, का उपयोग इसलिए किया गया था क्योंकि जीवित प्राणी के ऊतकों का उस प्राणी के शरीर से बाहर संवर्धन करने के जो आरंभिक जीव वैज्ञानिक प्रयोग हुए थे, वे सारे प्रयोग कांच के बर्तनों, जैसे, बीकरों, परखनलियों, या पेट्री डिशेज़ में किए गए थे। आज कृत्रिम परिवेशी शब्द का उपयोग ऐसी किसी भी जीववैज्ञानिक प्रक्रिया के लिए किया जाता है जो उस जीव से बाहर की जाती है जिसके भीतर वह सामान्यतः घटती है। यह इन वाइवो (in vivo) प्रक्रिया से अलग है, जिसमें ऊतक उस जीव के भीतर ही रहता है जिसमें वह सामान्यतः पाया जाता है। आईवीएफ़ (IVF) प्रक्रिया की मदद से जन्म लेने वाले बच्चों के लिए एक आम बोलचाल का शब्द है टेस्ट ट्यूब बेबी , जिसका कारण रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं में कांच या प्लास्टिक रेज़ि‍न के बने नली के आकार के कंटेनर हैं, जिन्हें टेस्ट ट्यूब (परखनली) कहा जाता है। हालांकि कृत्रिम परिवेशी निषेचन आम तौर पर उथले कंटेनरों में किया जाता है जिन्हें पेट्री डिश कहते हैं। (पेट्री डिश भी प्लास्टिक रेज़ि‍न की बनी हो सकती हैं।) हालांकि ऑटोलॉगस एंडोमेट्रियल कोकल्चर नामक आईवीएफ़ (IVF) पद्धति असल में कार्बनिक पदार्थों पर संपन्न की जाती है, लेकिन उसे भी कृत्रिम परिवेशी कहा जाता है। यह तब किया जाता है जब माता पिता बंध्यता की समस्या का सामना कर रहे हों या वे एक से अधिक शिशु चाहते हों. यह महिलाओं में कृत्रिम गर्भाधान की सबसे प्रभावी तकनीक मानी जाती है। आमतौर पर इसका प्रयोग तब करते हैं जब महिला की अण्डवाही नलियाँ बन्द होने हैं या जब मर्द बहुत कम शुक्राणु (स्पर्म) पैदा कर पाता है।

इस प्रक्रिया में कई बार दूसरों द्वारा दान में दिए गए अण्डों, दान में दिए वीर्य या पहले से फ्रोजन एमबरायस का उपयोग भी किया जाता है। दान में दिए गए अण्डों का प्रयोग उन स्त्रियों के लिए किया जाता है है जो कि अण्डा उत्पन्न नहीं कर पातीं। इसी प्रकार दान में दिए गए अण्डों या वीर्य का उपयोग कई बार ऐसे स्त्री पूरूष के लिए भी किया जाता है जिन्हें कोई ऐसी जन्मजात बीमारी होती है जिसका आगे बच्चे को भी लग जाने का भय होता है।

३५ वर्ष तक की आयु की स्त्रियों में इस की सफलता की औसत दर ३७ प्रतिशत देखी गई है। आयु वृद्धि के साथ साथ सफलता की दर घटने लगती है। आयु के अतिरिक्त भी सफलता की दर बदलती रहती है और अन्य कई बातों पर भी निर्भर करती है। तकनीक की सफलता की दर बदलती रहती है और अन्य कई बातों पर भी निर्भर करती है। तकनीक की सफलता दर को प्रभावित करने वाली चीज़ों में शामिल है -

  • अनुर्वरकता का कारण
  • तकनीक का प्रकार
  • अण्डा ताज़ा है या फ्रोज़न
  • एमब्रो (भ्रूण) ताज़ा है या फ्रोज़न।

अनुक्रम

इतिहास[संपादित करें]

विश्व में पहली बार इस प्रक्रिया का प्रयोग यूनाइटेड किंगडम में पैट्रिक स्टेपो और रॉबर्ट एडवर्डस ने किया था। उनके इस प्रक्रिया से जन्मे बच्चे का नाम लुईस ब्राउन था जिसका जन्म २५ जुलाई, १९७८ को मैनचेस्टर में हुआ था। भारत में पहली बार डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने इस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया था।[2] आज ये तकनीक निस्संतान दंपत्तियों के लिए एक नयी आशा की किरण है।[3] इनके द्वारा तैयार कि गयी परखनली शिशु, दुर्गा थी, जो विश्व की दूसरी परखनली शिशु थी।[2] इस तकनीक द्वारा मनचाहे गुणों वाली संतान और बहुत से रोगों से जीवन पर्यन्त सुरक्षित संतान उत्पन्न करने के प्रयास भी जारी है। बहुत से प्रयास सफल भी हो चुके हैं।[4]

आरंभिक दौर में आईवीएफ का इस्तेमाल महिलाओं में फैलोपिन ट्यूब की समस्या के समाधान के तौर पर किया जाता है, लेकिन बाद में इसकी ऐसी तकनीक भी विकसित की गई, जो पुरुषों की नपुंसकता का भी इलाज करती हो। वर्तमान में आईवीएफ में कई तकनीक प्रचलन में है जिसमें आईसीएसआई, जेडआईएफटी, जीआईएफटी और पीजीडी है।

विधि[संपादित करें]

आईसीएसई का प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है जब अंडों की संख्या कम होती है या फिर शुक्राणु, अंडाणु से क्रिया करने लायक बेहतर अवस्था में नहीं होते। इसमें माइक्रोमेनीपुलेशन तकनीक द्वारा शुक्राणुओं को सीधे अंडाणुओं में इंजेक्ट कराया जाता है। जेडआईएफटी में महिला के अंडाणुओं को निकाल कर उन्हें निषेचित कर महिला के गर्भाशय में स्थापित करने के बजाए उसके फेलोपिन टच्यूब में स्थापित किया जाता है। आईवीएफ की प्रक्रिया सुपरओव्यूलेशन, अंडे की पुन:प्राप्ति, निषेचन और भ्रूण स्थानांतरण के रूप में पूर्ण होती है। इसका प्रयोग वे महिलाएं भी कर सकती हैं जिनमें रजोनिवृत्ति हो चुकी है और फैलोपियन ट्यूब बंद हो चेके हैं। इस प्रकार ये सुविधा एक वरदान सिद्ध होती है।

अन्य प्रकार के निषेचन[संपादित करें]

ज़िगोटे इन्टराफैलोपियन ट्रांस्फर[संपादित करें]

जेड आई एफ टी भी आई वी एफ के सदृश होता है। उर्वरण लेब्रोटरी में किया जाता है। तब अति सद्य भ्रूण को गर्भाशय की अपेक्षा फैलोपियन ट्यूब में डाल दिया जाता है।

गैमेटे इन्टरफैलोपियन ट्रांस्फर[संपादित करें]

जी आई एफ टी के अन्तर्गत महिला की अण्डवाही ट्यूब में अण्डा और वीर्य स्थानान्तरित किया जाता है। उर्वरण महिला के शरीर में ही होता है।

इन्टरासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजैक्शन[संपादित करें]

आई सी एस आई में उर्वरित अण्डे में मात्र एक शुक्राणु को इंजैक्ट किया जाता है। तब भ्रूण को गर्भाशय या अण्डवाही ट्यूब में ट्रांस्फर (स्थानान्तरित) किया जाता है। इसका प्रयोग उन दम्पतियों के लिए किया जाता है जिन्हें वीर्य सम्बन्धी कोई घोर रोग होता है। कभी कभी इसका उपयोग आयु में बड़े दम्पतियों के लिए भी किया जाता है या जिनका आई वी एफ का प्रयास असफल रहा हो।

संकेत[संपादित करें]

आईवीएफ़ (IVF) का उपयोग डिम्बवाही नलिका की समस्याओं के कारण स्त्रि‍यों में होने वाली बंध्यता के उपचार के लिए किया जा सकता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में शरीर के भीतर (in vivo) निषेचन मुश्किल हो जाता है। यह विधि पुरुष बंध्यता में भी सहायक हो सकती है, जहां शुक्राणुओं की गुणवत्ता में खराबी हो. और ऐसे मामलों में इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) का उपयोग किया जा सकता है, जहां एक शुक्राणु कोशिका को सीधे डिम्ब कोशिका में इंजेक्ट किया जाता है। यह विधि तब इस्तेमाल की जाती है जब शुक्राणुओं को डिम्ब में प्रवेश करने में समस्या होती है और इन स्थितियों में जीवन साथी या दानकर्ता के शुक्राणुओं का भी उपयाग किया जा सकता है। आईसीएसई (ICSI) का उपयोग तब भी किया जाता है जब शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम हो. आईसीएसई (ICSI) की सफलता की दर आईवीएफ़ (IVF) निषेचन की सफलता की दर के बराबर होती है।

यह कहना आसान है कि आईवीएफ़ (IVF) की सफलता के लिए बस स्वस्थ अंडाणु, निषेचित करने वाले शुक्राणु और गर्भाधान करने वाले एक गर्भाशय की आवश्यकता होती है। लेकिन इस प्रक्रिया की उच्च लागत के कारण आम तौर पर आईवीएफ़ (IVF) का प्रयास अन्य सारे सस्ते विकल्पों के विफल होने के बाद ही किया जाता है।

यह डिम्ब दान या स्थानापन्न मातृत्व के लिए भी किया जा सकता है जहां डिम्ब प्रदान करने वाली महिला वह महिला नहीं होती जो गर्भावस्था की अवधि को पूर्ण करेगी. इसका अर्थ यह है कि आईवीएफ़ (IVF) का उपयोग उन महिलाओं के लिए किया जा सकता है जिनकी रजोनिवृत्ति हो चुकी है। दान की गई डिम्बाणुजनकोशिका एक क्रूसिबल में नि‍षेचित की जा सकती है। यदि निषेचन सफल होता है, तो ज़ायगोट या निषेचनज को गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जिसके भीतर वह एक भ्रूण में विकसित हो जाता है।

आनुवांशिक विकारों की गैर-मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (PGD) के साथ भी आईवीएफ़ (IVF) का उपयोग किया जा सकता है। एक ऐसा ही लेकिन और अधिक सामान्य परीक्षण विकसित किया गया है जिसका नाम है प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक हैप्लोटाइपिंग (PGH).

विधि[संपादित करें]

उपचार चक्र आम तौर पर मासिक धर्म के तीसरे दिन आरंभ किए जाते हैं और इनमें डिम्बग्रंथियों के एकाधिक पुटकों (follicles) के विकास का उद्दीपन करने के लिए प्रजननशक्ति की औषधियों की नियमित खुराक शामिल होती है। अधिकांश रोगियों में गहन मॉनिटरिंग के तहत इंजेक्टेबल गोनैडोट्रॉपिन्स (सामान्यतः FSH एनालॉग्स) का उपयोग किया जाता है। ऐसी मॉनिटरिंग में समय समय पर एस्ट्रडियोल स्तरों को देखा जाता है और गायनेकोलॉजिक अल्ट्रासोनोग्राफ़ी के ज़रिए पुटकों की बढ़त देखी जाती है। आम तौर पर लगभग 10 दिनों तक इंजेक्शन देना आवश्यक होगा. इस चक्र के दौरान स्वाभाविक डिम्बोत्सर्जन को सामान्यतः उन GnRH एगोनिस्ट के उपयोग से रोका जाता है जो उद्दीपन से पहले या उसके समय आरंभ होते हैं या उन GnRH एंटागोनिस्ट के उपयोग से रोका जाता है जिनका उपयोग बस उद्दीपन के अंतिम दिनों में किया जाता है; दोनों कारक ल्यूटनाइज़िंग हार्मोन (LH) के स्वाभाविक उफान को अवरोधित करते हैं और चिकित्सक औषधियों, आम तौर पर इंजेक्ट करने योग्य ह्यूमन कॉरियॉनिक गोनेडोट्रॉपिन्स (human chorionic gonadotropin), की मदद से डिम्बोत्सर्जन की प्रक्रिया को आरंभ कर सकता है।

जब यह तय किया जाता है पुटकीय परिपक्वता उपयुक्त है, तो ह्यूमन कॉरियॉनिक गोनेडोट्रॉपिन्स (human chorionic gonadotropin) दिया जाता है। ल्यूटनाइज़िंग हार्मोन के एनालॉग के रूप में कार्य करने वाला इस कारक के कारण इंजेक्शन देने के 42 घंटे बाद डिम्बोत्सर्जन होता था, लेकिन डिम्बाशय से डिम्ब कोशिकाओं को प्राप्त करने के लिए उससे ठीक पहले एक पुनः प्राप्ति प्रक्रिया आरंभ होती है। एक ट्रांसवैजाइनल तकनीक (transvaginal technique) की सहायता से रोगी से डिम्ब पुनः प्राप्त किए जाते हैं जिसमें एक अल्ट्रासाउंड चलित सुई योनि की दीवार को भेद कर डिम्ब ग्रंथियों तक पहुंचती है। इस सुई के द्वारा पुटकों (follicle) का चूषण किया जा सकता है और इस पुटकीय द्रव को डिम्बों की पहचान करने के लिए आईवीएफ़ (IVF) प्रयोगशाला में भेज दिया जाता है। आम तौर पर दस से तीस डिम्ब निकाले जाते हैं। पुनः प्राप्ति की इस प्रक्रिया में लगभग 20 मिनट लगते हैं और यह आम तौर पर सचेत प्रशमन या जनरल एने‍स्थेशिया (general anaesthesia) के प्रभाव में किया जाता है।

डिम्ब व शुक्राणु की तैयारी[संपादित करें]

प्रयोगशाला में, पहचाने गए डिम्बों से उनके इर्द गिर्द की कोशिकाएं निकाल कर डिम्बों को निषेचन के लिए तैयार किया जाता है। सफल गर्भाधान के अनुकूलतम अवसरों वाले डिम्ब चुनने के लिए निषेचन से पहले डिम्बाणुजनकोशिका चयन किया जा सकता है। इस बीच, वीर्य को निषेचन हेतु तैयार करने के लिए उसमें से निष्क्रिय कोशिकाओं और वीर्य द्रव को निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया को शुक्राणु धावन कहते हैं। यदि वीर्य किसी शुक्राणु दानदाता द्वारा उपलब्ध कराया गया है, तो आम तौर पर उसे उपचार के लिए तैयार करने के बाद जमाया और रोगाणुरहित किया जाएगा और उपयोग के लिए तैयार करने हेतु उसे पिघलाया जाएगा.

निषेचन[संपादित करें]

शुक्राणु और अंडाणु को लगभग 18 घंटों तक 75,000:1 के अनुपात में संवर्धन माध्यम में इनक्यूबेट किया जाता है। अधिकांश स्थितियों में, इस समय तक अंडाणु निषेचित हो जाता है और नि‍षेचित अंडाणु दो प्रोन्यूक्लियस दिखाता है। कुछ स्थितियों, जैसे न्यून शुक्राणु संख्या या गतिशीलता, में इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (intracytoplasmic sperm injection (ICSI)) का उपयोग करके एक शुक्राणु को सीधे अंडाणु में इंजेक्ट किया जा सकता है। निषेचित अंडाणु को विशेष विकास माध्यम में रख कर लगभग 48 घंटों के लिए छोड़ दिया जाता है जब तक कि अंडाणु में छः से आठ कोशिकाएं न हो जाएं.

गैमिट इंट्रोफ़ैलोपियन हस्तांतरण विधि में, अंडाणुओं को स्त्री के शरीर से निकाल कर उन्हें पुरुष के शुक्राणु के साथ स्त्री की किसी एक डिम्बवाही नली में रख दिया जाता है। इससे स्त्री के शरीर के भीतर निषेचन की प्रक्रिया संपन्न होती है। इसलिए, यह विविधता वास्तव में इन विवों निषेचन है, न कि कृत्रिम परिवेशी निषेचन .

भ्रूण संवर्धन[संपादित करें]

आम तौर पर भ्रूण को पुनः प्राप्ति के बाद 6-8 कोशिका की अवस्था में पहुंचने तक संवर्धित किया जाता है। हालांकि कई कनाड़ाई, अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई कार्यक्रमों[कृपया उद्धरण जोड़ें] में, भ्रूणों को एक लंबी संवर्धन प्रणाली में रखा जाता है और स्थानांतरण ब्लास्टोसिस्ट चरण में पुनः प्राप्ति के करीब पांच दिन बाद किया जाता है, खास कर यदि तीसरे दिन भी कई उच्च गुणवत्ता वाले भ्रूण उपलब्ध हों. यह देखा गया है कि ब्लास्टोसिस्ट चरण स्थानांतरणों के परिणामस्वरूप गर्भाधान की दरें ऊंची होती है।[5] यूरोप में 2 दिनों के बाद स्थानांतरण आम बात है।

भ्रूणों का संवर्धन कृत्रि‍म संवर्धन माध्यम में किया जा सकता है या फिर ऑटोलॉगस एंडोमेट्रियल कोकल्चर (स्वयं स्त्री के गर्भाशय की दीवार की कोशिकाओं की परत पर) में किया जा सकता है। कृत्रि‍म संवर्धन माध्यम में, या तो सारी अवधि में एक ही संवर्धन माध्यम हो सकता है, या एक क्रमिक प्रणाली का उपयोग किया जा सकता है, जिसमें भ्रूण को अलग-अलग माध्यमों में क्रमिक रूप से रखा जाता है। उदाहरण के लिए, ब्लास्टोसिस्ट चरण में संवर्धन करते समय, 3 दिनों तक एक माध्यम में संवर्धन किया जा सकता है और उसके बाद कोई दूसरा माध्यम इस्तेमाल किया जा सकता है।[6] माध्यम ब्लास्टोसिस्ट चरण में मानव भ्रूण के लिए एकल या क्रमिक दोनों समान रूप से प्रभावी होते हैं।[7] कृत्रि‍म भ्रूण संवर्धन माध्यम में मूलतः ग्लूकोज़, पायरूवेट और ऊर्जादायी तत्व होते हैं, लेकिन अमीनो अम्लों, न्यूक्लियोटाइड्स, विटामिन और कॉलेस्ट्रॉल जुड़ने से भ्रूण के विकास की प्रक्रिया और बेहतर हो जाती है।[8]

भ्रूण का चयन[संपादित करें]

डिम्बाणुजनकोशिका और भ्रूण की गुणवत्ता परखने के लिए प्रयोगशालाओं ने ग्रेडिंग की विधियां विकसित की हैं। गर्भाधान की दरों को अनुकूलित करने के लिए, इस बात के ठोस प्रमाण मिले हैं कि भ्रूण के चयन के लिए मार्फ़ोलॉजिकल स्कोरिंग प्रणाली सबसे बेहतर उपाय है।[9] हालांकि यदि मार्फ़ोलॉजिकल रूप से समान गुणवत्ता वाले भ्रूणों के बीच चयन करना हो, तो घुलनशील एचएलए-जी (HLA-G) की मौजूदगी को दूसरा पैरामीटर माना जा सकता है।[9] साथ ही, 1पीएन या 3पीएन अवस्थाओं से होकर जाने वाले टू-प्रोन्यूक्लीयर ज़ायगोट्स (two-pronuclear zygotes (2PN)) सामान्यतः लगातार 2PN रहने वाले ज़ायगोट्स की तुलना में कम गुणवत्ता वाले भ्रूणों में विकसित होते हैं।[10] गर्भाधान की संभावनाओं को अनुकूलित करने वाले परीक्षणों के अलावा, आनुवांशिक रूप से मिलने वाले रोगों से बचने के लिए प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (Preimplantation Genetic Diagnosis (PGD)) या स्क्रीनिंग का उपयोग किया जा सकता है।[11]

भ्रूणों को भ्रूणविज्ञानी द्वारा कोशिकाओं की संख्या, वृद्धि की समरूपता और विखंडन के परिमाण के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है। हस्तांतरित की जाने वाली संख्या उपलब्ध संख्या, स्त्री की आयु और अन्य स्वास्थ्य संबंधी और नैदानिक कारकों पर निर्भर होती है। कनाड़ा, यूके, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में असाधारण परिस्थितियों को छोड़ कर सामान्यतः अधिकतम दो भ्रूण हस्तांतरित किए जाते हैं। यूके में और (एचएफ़ईए (HFEA)) नियमों के अनुसार, 40 वर्ष से अधिक आयु की महिला के शरीर में अधिकतम तीन भ्रूण हस्तांतरित किए जा सकते हैं, जबकि यूएसए में व्यक्तिगत प्रजननक्षमता निदान के आधार पर युवा महिलाओं में कई भ्रूण हस्तां‍तरित किए जा सकते हैं। अधिकांश क्लिनिक और राष्ट्रीय विनियामक संस्थाओं का प्रयास यही रहता है कि एक से अधिक शिशुओं वाले गर्भाधानों के जोखिम को कम से कम किया जाए. "सर्वश्रेष्ठ" के रूप में चुने गए भ्रूणों को रोगी की योनि और गर्भाशय ग्रीवा तक जाने वाली एक पतली, प्लास्टिक की नलिका के द्वारा रोगी के गर्भाशय में हस्तांतरित कर दिया जाता है। आरोपण और गर्भाधान की संभावनाओं को बेहतर करने के लिए गर्भाशय में कई भ्रूण प्रविष्ट कराए जा सकते हैं।

गर्भाधान दरें[संपादित करें]

गर्भाधान की सफलता की दर को गर्भाधान दर कहते हैं। आईवीएफ़ (IVF) की स्थिति में यह सभी प्रयासों का वह प्रतिशत होता है जिसके फलस्वरूप गर्भाधान होता है, जिसका अर्थ आम तौर पर उपचार चक्रों से होता है जिनमें डिम्ब पुनः प्राप्त करके उन्हें कृत्रिम परिवेशी निषेचन किया जाता है। "गर्भाधान" संबंधी आंकड़े मात्र सकारात्मक गर्भाधान परीक्षण का संकेत हो सकते हैं और आवश्यक नहीं कि वे “जीवनक्षम गर्भाधान” के हों, जो भ्रूण की धड़कनों का पता लगने का संकेत देता है। जिन गर्भाधानों के फलस्वरूप जीवित शिशु जन्म होता है, उन्हें जीवित जन्म दर कहते हैं। आजकल अधिकाधिक मामलों में एकल और जुड़वां या एक से अधिक गर्भाधानों के बीच भी भेद किया जाता है, क्योंकि एक से अधिक, खास तौर पर जुड़वां से अधिक, गर्भाधानों से बचा जाना चाहिए क्योंकि उनमें मां और गर्भ के लिए कई जोखिम होते हैं।

उन्नत तकनीक की मदद से कुछ वर्ष पहले की तुलना में आज गर्भाधान की दरें काफ़ी बेहतर हो गई हैं। 2006 में कैनेडियन क्लिनिकों में गर्भाधान की औसत दर 35% पाई गई थी।[12] फ़्रांस में एक शोध में यह अनुमान लगाया गया कि आईवीएफ़ (IVF) उपचार आरंभ करने वाले रोगियों में 66% रोगियों को अंततः शिशु प्राप्ति हुई (इनमें से 40% को केन्द्र में आईवीएफ़ (IVF) उपचार के दौरान और 26% को आईवीएफ़ (IVF) उपचार बंद करने के बाद). आईवीएफ़ (IVF) उपचार बंद करने के बाद शिशु जन्म मुख्यतः दत्तक लेने के कारण (46%) या सहज गर्भाधान के कारण (42%) हुआ।[13]

जीवित जन्म दर[संपादित करें]

जीवित जन्म दर सभी आईवीएफ़ (IVF) चक्रों का वह प्रतिशत है जिसके फलस्वरूप शिशु जन्म होता है और यह दर गर्भपात और मृतजन्म के लिए समायोजित गर्भाधान दर के बराबर होती है। यह प्रतिशत सफल गर्भाधानों के लिए हैं, जन्मे शिशुओं की संख्या चाहे जो भी हो, क्योंकि आईवीएफ़ (IVF) चक्रों में अधिकांश जुड़वां और उससे अधिक शिशुओं का जन्म देखा गया है।

2006 में कैनेडियन क्लिनिकों में तीवित जन्म की दर 27% पाई गई।[12] युवा रोगियों में जन्म दरें थोड़ी अधिक थीं, जिनमें 21 या उससे कम आयु के लिए सफलता की दर 35.3% थी, जो कि मूल्यांकित समूहों में सबसे युवा समूह था। अधिक आयु की रोगियों में भी सफलता की दर कम थी और आयु के साथ घट रही थी, जिनमें 37 वर्ष की रोगियों की दर 27.4% थी और मूल्यांकित समूहों में सबसे अधिक आयु के समूह 48 वर्ष से अधिक आयु समूह में कोई जीवित जन्म नहीं था।[14] कुछ क्लिनिकों में ये दरें अधिक थीं, लेकिन यह तय करना असंभव है कि ऐसा उच्चतर तकनीक या रोगी के चयन के कारण हुआ था, क्योंकि सबसे मुश्किल रोगियों को मना करके या उन्हें डिम्बाणुजनकोशिका दाता चक्र (जो कि अलग से किया जाता है) में शामिल करके सफलता की दरों को कृत्रि‍म रूप से बढ़ाया जा सकता है।

असिस्टेड प्रजनन प्रौद्योगिकी के लिए सोसायटी (एसएआरटी (SART)) ताजा भ्रूण चक्र के दाता अंडे को शामिल नहीं किया है के लिए 2008 अमेरिकी क्लीनिकों के लिए सफलता की दर संक्षेप भावी मां की उम्र से जीवित जन्म दर दी चक्र प्रति 41.3% पर एक चोटी के साथ शुरू कर दिया और 47.3% भ्रूण स्थानांतरण प्रति रोगियों के लिए 35 के तहत उम्र के साल.

एकाधिक चक्रों में आईवीएफ़ (IVF) प्रयासों के फलस्वरूप संचयी जन्म दरों में वृद्धि होती है। जनसांख्यिकीय समूह पर निर्भर करते हुए एक अध्ययन में तीन प्रयासों के लिए 45% से 53% और छः प्रयासों के लिए 51% से 71% दरें पाई गईं। [15]

सफलता या विफलता के कारक[संपादित करें]

आईवीएफ़ (IVF) गर्भाधान (और जीवित जन्म) की दरों को प्रभावित कर सकने वाले संभावित घटकों में तनाव, एक्यूपंक्चर, डीएनए (DNA) विखंडन[16] का स्तर जो उदाहरण के लिए कॉ‍मेट एसे द्वारा मापा गया हो, मां की अधिक आयु और वीर्य की गुणवत्ता शामिल हैं।

तनाव[संपादित करें]

2005 में किए गए एक स्वीडिश अध्ययन[17] में 166 महिलाओं को उनके आईवीएफ़ (IVF) चक्र से एक महीना पहले मॉनीटर किया गया और उसके परिणामों में मनोवैज्ञानिक तनाव और आईवीएफ़ (IVF) के नतीजों के बीच कोई खास संबंध नहीं पाया गया। इस अध्ययन के निष्कर्ष में क्लिनिक्स को यह सुझाव दिया गया कि उपचार प्रक्रिया के दौरान इन निष्कर्षों के बारे में आईवीएफ़ (IVF) के रोगियों को बता कर उन्हें महसूस होने वाले तनाव को कम किया जा सकता है। जहां एक चक्र के दौरान अनुभव किया गया मनोवैज्ञानिक तनाव शायद आईवीएफ़ (IVF) के परिणामों को प्रभावित न करे, लेकिन यह संभव है कि आईवीएफ़ (IVF) के अनुभव के परिणामस्वरूप तनाव हो सकता है, जो बाद में विषाद में बदल सकता है। आईवीएफ़ (IVF) की आर्थिक लागत चिंता बढ़ा कर रोगी को भावविह्वल कर सकती है। लेकिन कई जोड़ों के लिए इसका विकल्प बच्चे न होना होता है और इस स्थिति के अनुभव से ही रोगी को अत्यधिक तनाव व विषाद घेर सकते हैं।

सूचीभेदन (एक्यूपंक्चर)[संपादित करें]

प्रजननक्षमता के विशेषज्ञों और स्वास्थ्य केन्द्रों की एक बढ़ती तादाद अपने आईवीएफ़ (IVF) प्रोटोकॉल के एक हिस्से के रूप में एक्यूपंक्चर सुविधा प्रदान करती है। क्लिनिकल परीक्षणों और केस अध्ययन से मिले सीमित लेकिन सहायक प्रमाण यह इशारा करते हैं कि एक्यूपंक्चर आईवीएफ़ (IVF) की सफलता दर को और आईवीएफ़ (IVF) का उपचार लेने वाले रोगियों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करता है और वह एक सुरक्षित सहायक उपचार है।[18] ब्रिटिश मेडिकल जरनल में प्रकाशित एक सुव्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में यह पाया गया कि भ्रूण हस्तांतरण प्रक्रिया के साथ एक्यूपंक्चर का उपचार देने का संबंध क्लिनिकल गर्भावस्था (जहां 1 अतिरिक्त गर्भावस्था के लिए उपचार देने हेतु रोगियों की अपेक्षित संख्या 10 थी), जारी गर्भावस्था (NNT 9) और जीवित जन्म NNT 9) में महत्वपूर्ण और नैदानिक रूप से प्रासंगिक सुधारों से जुड़ा हुआ है।[19]

सूचीभेदन प्रणालियां
जिन चार प्रणालियों के द्वारा यह दर्शाया गया है कि एक्यूपंक्चर आईवीएफ़ (IVF) परिणामों को बेहतर बनाता है, वे हैं[18]

  • न्यूरोएंडोक्रिनॉलॉजिकल मॉड्यूलेशन्स (Neuroendocrinological modulations)
  • गर्भाशय और डिम्बग्रंथियों में रक्त प्रवाह की वृद्धि
  • साइटोकाइल में मॉड्यूलेशन
  • तनाव, व्यग्रता और विषाद में कमी

आईवीएफ़ (IVF) के लिए डिम्बाणुजनकोशिका पुनः प्रप्ति प्रक्रिया में इलेक्ट्रो-एक्यूपंक्चर
यह पाया गया है कि इलेक्ट्रो-एक्यूपंक्चर पारंपरिक मेडिकल एनालजेसिया के लिए एक उत्तम विकल्प है, इसके परिणामस्वरूप अस्पताल में भर्ती की अवधि और लागत कम होती है।[20]

अन्य कारक[संपादित करें]

आईवीएफ़ (IVF) के परिणाम के अन्य निर्धारकों में शामिल हैं:

  • तंबाखू का धूम्रपान आईवीएफ़ (IVF) द्वारा जीवित शिशु जन्म की संभावनाओं को 34% घटा देता है और आईवीएफ़ (IVF) गर्भाधान के गर्भपात होने के जोखिम को 30% बढ़ा देता है।[21]
  • जिन लोगों का शरीर द्रव्यमान सूचकांक 20 और 27 के बीच है, उनकी तुलना में आईवीएफ़ (IVF) के प्रथम चक्र के बाद 27 से अधिक शरीर द्रव्यमान सूचकांक वाले रोगियों में जीवित शिशु जन्म होने की संभावना में 33% कमी होती है।[21] साथ ही, जो गर्भवती महिलाएं स्थूलकाय हैं, उनमें प्रसूति के दौरान जन्मजात असामान्यता, गर्भपात, गर्भकालिक मधुमेह, उच्च रक्तदाब, घनास्रअंतःशल्यता (थ्रोम्बोएम्बोलिज्म) और अन्य समस्याओं की दरें अधिक होती हैं।[21] आदर्श शरीर द्रव्यमान सूचकांक 19-30 होता है।[22]
  • आईवीएफ़ (IVF) से पहले डिम्बवाहिनी उच्छेदन (साल्पिंगेक्टोमी) से जल डिम्बवाहिनी (हाइड्रोसाल्पिंगर्स) से ग्रस्त महिलाओं के लिए संभावनाएं बढ़ जाती हैं।[22]
  • उपचार के समय महिला की अनुकूलतम आयु 23–39 है।[22]
  • गर्भाधान गर्भावस्था और/या जीवित शिशु जन्म में सफलता भी संभावनाओं को बढ़ा देती है।[22]
  • अल्कोहल/कैफ़ीन के न्यून सेवन से सफलता की दर बढ़ जाती है।[22]

जटिलताएं[संपादित करें]

आईवीएफ़ (IVF) की प्रमुख जटिलता है एक गर्भ में एक से अधिक शिशुओं का जन्म होना. यह घटना भ्रूण हस्तांतरण के दौरान एक से अधिक भ्रूणों को हस्तांतरित करने की प्रथा से सीधी जुड़ी हुई है। एकाधिक जन्म के साथ गर्भपात, प्रासूतिक जटिताएं, समय पूर्व जन्म और दीर्घकलिक क्षति की संभावना के साथ नवजात शिशु की अस्वस्थता के खतरे बढ़ जाते हैं। एकाधिक गर्भाधान (ट्रिप्लेट (Triplet) या अधिक) के खतरे को घटाने के लिए कुछ देशों (जैसे इंग्लैंड) ने हस्तांतरित किए जाने वाले भ्रूणों की संख्या पर सीमाएं लागू की हैं, लेकिन इन सीमाओं का सभी स्थानों पर पालन नहीं किया जाता है या उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता. हस्तांतरण के बाद गर्भाशय में भ्रूणों का सहज विभाजन हो तो सकता है, लेकिन यह बहुत कम होता है और इससे एक समान जुड़वां शिशु जन्म लेते हैं। एक डबल ब्लाइंड, यादृच्छिक अध्ययन में उन आईवीएफ़ (IVF) गर्भावस्थाओं का अध्ययन किया गया जिनके परिणामस्वरूप 73 (33 लड़के और 40 लड़कियां) शिशुओं के जन्म हुए थे और यह पाया गया कि 8.7% एकल शिशुओं और 54.2% जुड़वां शिशुओं का जन्म के समय वज़न 2500 ग्रा से अधिक था।[23] हालांकि हाल में प्राप्त प्रमाण दर्शाते हैं कि आईवीएफ़ (IVF) के बाद जन्म लेने वाले एकल शिशु में अज्ञात कारणों से कम जन्म भार का खतरा मौजूद होता है।

डिम्बाशयी उद्दीपन का एक अन्य खतरा है ओवेरियन हाइपरस्टीम्युलेशन सिंड्रोम (ovarian hyperstimulation syndrome) विकसित होना, खास कर जब "डिम्बोत्सर्जन को ट्रिगर या आरंभ" करने के लिए एचसीजी (hCG) का उपयोग किया गया हो।

यदि अंतर्निहित बंध्यता शुक्राणु जनन क्रिया में असामान्यताओं से जुड़ी हो, तो यह संभव है नर शिशु में शुक्राणु असामान्यताओं का अधिक जोखिम हो सकता है, लेकिन इतने छोटे शिशु में इसका परीक्षण नहीं किया जा सकता.

9-18 वर्ष आयु के आईवीएफ़ (IVF) शिशुओं पर किए गए अध्ययनों के अनुसार आईवीएफ़ (IVF) द्वारा गर्भ धारण करने से जन्मे शिशुओं का व्यवहार और उनकी सामाजिक भावनात्मक कार्य पद्धतियां समग्र रूप से सामान्य होती है।[24]

आईवीएफ़ (IVF) के बाद गर्भाधान परीक्षण नकारात्मक होने से महिलाओं में विषाद का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन इससे व्यग्रता संबंधित विकारों के खतरों में कोई वृद्धि नहीं होती.[25] गर्भाधान परीक्षण के परिणाम पुरुषों में विषाद या व्यग्रता के लिए जोखिम का घटक होते नहीं देखे गए हैं।[25]

जन्म दोष[संपादित करें]

जन्म दोष का मुद्दा आईवीएफ़ (IVF) में एक विवादास्पद विषय रहा है। कई अध्ययन आईवीएफ़ (IVF) के उपयोग के बाद कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं दर्शाते और कुछ अध्ययनों में आईसीएसआई (ICSI) की उच्च दरें सुझाई गई हैं, जबकि कुछ अन्य इन निष्कर्षों का समर्थन नहीं करते.[26] 2008 में अमेरिका में राष्ट्रीय जन्म दोष अध्ययन के डेटा के विश्लेषण में पाया गया कि आईवीएफ़ (IVF) की मदद से गर्भ धारण होने से जन्मे शिशुओं में कुछ विशेष जन्म दोष महत्वपूर्ण रूप से अधिक आम थे, खास तौर पर सेप्टल हृदय विकार, कटे हुए तालु सहित या उसके बिना कटा हुआ ऊपरी होंठ (cleft lip with or without cleft palate), ग्रासनली अछिद्रता (इसोफेगल एट्रेसिया) और गुदा व मलाशय अछिद्रता (एनोरेक्टल एट्रेसिया); इसके कारण-कार्य संबंध का तंत्र अस्पष्ट है।[27]

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में “सभी आईवीएफ़ (IVF) शिशुओं के जन्म रेकॉर्ड” की समीक्षा करने वाले, 2002 में किए गए एक अध्ययन में “यह पाया गया कि सामान्य जन्म की तुलना में आईवीएफ़ (IVF) शिशुओं में जन्म दोष होने की संभावना अधिक होती है”. इस अध्ययन में एकाधिक शिशु जन्म और मां की आयु को गणना में लिया गया था। “एक वर्ष की आयु तक” अधिक संख्या में पाए गए जन्म दोषों में शामिल हैं: हृदय दोष, "क्रोमोसोमल असामान्यताएं जैसे डाउन सिंड्रोम, स्पिना बिफ़ि‍डा, गैस्ट्रोइंटेस्टिनल असामान्यताएं, मस्क्यूलो-स्केलेटल, डिस्लोकेटेड हिप " और विकृत पैर (क्लब फ़ीट). आईवीएफ़ (IVF) शिशुओं में अल्प जन्म भार, समय पूर्व जन्म और सेरेब्रल पाल्सी (cerebral palsy) के मामले भी अधिक पाए गए।[28]

जापान की सरकार में ने ऐसे युगलों के लिए कृत्रिम परिवेशी निषेचन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था जिनमें दोनों संगी एचआईवी (HIV) से संक्रमित हो। एथिक्स कमिटी (ethics committee) द्वारा पूर्व में टोक्यो स्थित ओगीक्यूबो टोक्यो अस्पताल को एचआईवी (HIV) से संक्रमित जोड़ों को कृत्रिम परिवेशी निषेचन के उपयोग की अनुमति दिए जाने के बावजूद जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय ने इस प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया। ओगीक्यूबो अस्पताल के उपाध्यक्ष हिडेजी हानाबुसा कहते हैं कि उन्होंने अपने सहकर्मियों के साथ मिल कर एक विधि विकसित कर ली है जिसके द्वारा वैज्ञानिक शुक्राण से एचआईवी (HIV) को निकाल सकते हैं।[29]

1990 के दशक की शुरूआत में आईवीएफ़ (IVF) उपचार के साथ प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस के उपयोग की प्रथा आरंभ हुई और तब से लेकर आज तक इस उन्नत प्रजनन तकनीक का उपयोग करके सैकड़ों सामान्य, स्वस्थ शिशु जन्म ले चुके हैं। पीजीडी (PGD) तकनीक रोगियों के दो स्पष्ट रूप से भिन्न समूहों के लिए सफल गर्भावस्था और जन्म की संभावना को बेहतर करती है। वे युगल जो बार बार गर्भपात होने से संबंधित बंध्यता के शिकार हैं और वे युगल जिन पर वंशानुगत मिले किसी आनुवांशिक रोग को अपने शिशु तक पहुंचाने का खतरा है।

पीजीडी (PGD) से लाभ ले सकने वाले रोगियों में शामिल हैं:

  • जिन जोड़ों में वंशानुगत रोग का पारिवारिक इतिहास हो
  • वे जोड़े जो किसी लिंग-संबंधित रोग से बचने के लिए लिंग चयन का उपयोग करना चाहते हों
  • जिन महिलाओं को आईवीएफ़ (IVF) में बार बार विफलता मिली हो
  • जिन महिलाओं का अस्पष्ट गर्भपात का इतिहास रहा हो
  • जिन महिलाओं की आयु 39 वर्ष से अधिक हो

पीजीडी (PGD) में क्रोमोसोमल असामान्यताओं के लिए स्क्रीनिंग की जाती है। इसमें आईवीएफ़ (IVF) प्रक्रिया के दौरान प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) की एक-एक कोशिका को स्क्रीन किया जाता है। प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) का स्त्री के गर्भाशय में वापस स्थानांतरण करने से पहले प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) से एक या दो कोशिका निकाल ली जाती हैं। फिर इन कोशिकाओं का सामान्यता के लिए मूल्यांकन किया जाता है। सामान्यतः एक से दो दिनों के भीतर, मूल्यांकन समाप्त होने के बाद, केवल सामान्य प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) ही स्त्री के गर्भाशय में वापस रखे जाते हैं। इसके अलावा पीजीडी (PGD) एकाधिक गर्भाधान का जोखिम घटा देता है क्योंकि आरोपण के लिए बहुत कम एम्ब्रायो की आवश्यकता होती है।[30]

जमे हुए मानव भ्रूण की सहायता से सबसे पहले गर्भाधान की घोषणा एलन ट्रॉन्सन और लिंडा मोर ने सन 1983 में की थी (यद्यपि गर्भावस्था के 20 वें सप्ताह में बिना किसी संकेत के गर्भपात हो गया था); जमे हुए मानव भ्रूण की सहायता से पहली पूर्ण गर्भावस्था से शिशु का जन्म 1984 में हुआ था।[तथ्य वांछित] यह अनुमान है कि तब से लेकर 2008 तक, नियंत्रि‍त दर फ़्रीज़र में जमा कर और द्रवित नाइट्रोजन में भंडारित करके रखे गए भ्रूणों से 35000 से पांच लाख आईवीएफ़ (IVF) शिशु जन्म ले चुके हैं; इसके अतिरिक्त विट्रिफ़ाइड डिम्बाणुजनकोशिकाओं से सैकड़ों शिशु जन्म हो चुके हैं लेकिन ठोस आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

भ्रूण के क्रायोसंरक्षण की सुरक्षा पर यूरोपियन सोसायटी ऑफ़ ह्युमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रायोलॉजी में घोषित एक अध्ययन में खुलासा किया गया भ्रूण के ताज़ा हस्तांतरण की तुलना में जमे हुए भ्रूणों से जन्मे बच्चे “बे‍हतर थे और जन्म के समय उनका वज़न अधिक था”. यह अध्ययन कोपेनहेगन में किया गया था और इसमें 1995–2006 के दौरान जन्मे बच्चों का मूल्यांकन किया गया था। नियंत्रि‍त दर फ़्रीज़र में जमा कर और द्रवित नाइट्रोजन में भंडारित करके रखे गए भ्रूणों की मदद से फ़्रोजन एम्ब्रायो रिप्लेसमेंट (Frozen Embryo Replacement (FER)) की प्रक्रिया के बाद जन्मे 1267 बच्चों का अध्ययन किया गया और उन्हें तीन वर्गों में बांटा गया। इनमें से 878 का जन्म ऐसे मानक कृत्रिम परिवेशी निषेचन का उपयोग करके बनाए गए हिमीकृत भ्रूणों से हुआ था जिसमें शुक्राणुओं को एक डिश में डिम्ब के पास रखा गया था लेकिन शुक्राणुओं को स्वयं ही डिम्ब में प्रवेश करना था। 310 शिशुओं का जन्म आईसीएसआई (ICSI) का उपयोग करके निर्मित हिमीकृत भ्रूणों की मदद से हुआ था जिसमें एक शुक्राणु को एक डिम्ब में इंजेक्ट किया गया था और 79 शिशुओं के जन्म में उपयोग की गई भ्रूण निर्माण विधि ज्ञात नहीं थी।

ताज़े भ्रूण की मदद से की गई सामान्य आईवीएफ़/आईसीएसआई (IVF/ICSI) प्रक्रिया से जन्मे 17857 शिशुओं का भी अध्ययन किया गया और उन्हें एक नियंत्रण समूह या संदर्भ समूह के रूप में इस्तेमाल किया गया। सभी शिशुओं के बारे में जन्म दोष, जन्म भार और गर्भावस्था की अवधि से संबंधित डेटा लिया गया। इस अध्ययन के परिणामों ने दर्शाया कि जमे हुए भ्रूण से जन्मे शिशुओं में जन्म के समय भार अधिक था, गर्भावस्था की अवधि लंबी थी और उनमें "समय-पूर्व" जन्मे शिशुओं की संख्या कम थी। जन्म दोषों की दरों में कोई अंतर नहीं था, चाहे शिशुओं का जन्म जमे हुए भ्रूण से हुआ हो या फिर ताज़े भ्रूण से. एफ़ईआर (FER) समूह में जन्म दोष दर 7.7% थी, जबकि ताज़ा भ्रूण हस्तांतरण समूह की दर कुछ अधिक थी, यानी 8.8%. वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि ताज़े भ्रूण हस्तांतरणों में एकाधिक गर्भाों का खतरा अधिक था।

लगभग 11.7% आईवीएफ़ (IVF) और लगभग 14.2% आईवीएफ़ (IVF) मामले ऐसे थे जिनमें गर्भ में एक से अधिक शिशु था। ताज़े भ्रूण के मामलों में, लगभग 24.8% आईवीएफ़ (IVF) और लगभग 27.3% आईवीएफ़ (IVF) मामलों में गर्भ में एक से अधिक शिशु था। यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि एफ़ईआर (FER) समूह में मां की आयु काफ़ी अधिक थी। यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य था क्योंकि आयु के आधार पर समस्याओं और जन्म दोषों की ऊंची दर की अपेक्षा होनी चाहिए थी। इस अध्ययन ने इस जानकारी की पुष्टि की कि भ्रूण हिमीकरण एक सुरक्षित पद्धति है। हालांकि यह एक रहस्य ही था कि हिमीकृत भ्रूण से जन्मे शिशु ताज़े भ्रूण से जन्मे शिशुओं से बेहतर क्यों साबित हुए.

यदि एक से अधिक भ्रूणों का निर्माण होता है, तो रोगी चुन सकते हैं कि जिन भ्रूणों का हस्तांतरण नहीं हुआ है उन भ्रूणों का हिमीकरण कर लिया जाए. इन भ्रूणों का धीमा हिमीकरण करके द्रवित नाइट्रोजन में रखा जाता है और उन्हें लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है। युनाइटेड स्टेट्स में वर्तमान में 500000 हिमीकृत भ्रूण हैं।[31] इसका लाभ यह है कि जो रोगी गर्भ धारण नहीं कर पाते हैं, वे बिना पूर्ण आईवीएफ़ (IVF) चक्र से गुज़रे इन भ्रूणों का उपयोग कर सकते हैं। या, यदि गर्भ धारण होता है, तो वे बाद में दूसरी बार गर्भ धारण के लिए लौट सकते हैं। प्रजननक्षमता के उपचारों के फलस्वरूप बचे अतिरिक्त भ्रूण किसी अन्य स्त्री या युगल को दान किए जा सकते हैं और दाता डिम्ब और शुक्राणु का उपयोग करके भ्रूणों को खास तौर पर हस्तांतरण और दान के लिए बनाया, जमाया और भंडारित किया जा सकता है।

डिम्बाणुजनकोशिका क्रायोसंरक्षण[संपादित करें]

अनिषेचित परिपक्व डिम्बाणुजनकोशिकाओं का क्रायोसंरक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है, उदाहरण के लिए ऐसी महिलाओं में जिनमें कीमोथेरेपी उपचार के कारण उनके द्वारा अपने डिम्बाशयी संचय खो देने की संभावना है।[32]

बचे हुए भ्रूण या डिम्ब[संपादित करें]

यदि आईवीएफ़ (IVF) प्रक्रिया से जिस महिला के लिए भ्रूण या डिम्ब बनाए गए थे, उसने सफलतापूर्वक एक या अधिक गर्भाधानों को पूरा कर लिया है, तो कुछ भ्रूण या डिम्ब बचे रह सकते हैं। महिला या युगल की अनुमति से इन्हें अन्य महिलाओं या जोड़ों को तृतीय पक्ष प्रजनन के रूप में मदद करने के लिए दान किए ज सकते हैं।

भ्रूण दान में, ये अतिरिक्त भ्रूण सफल गर्भाधान के उद्देश्य से हस्तांतरण के लिए अन्य युगलों या महिलाओं को दे दिए जाते हैं। जन्मा शिशु उस महिला का माना जाता है जिसने उसे गर्भ में रखा और जन्म दिया, न कि दाता का, ठीक उसी तरह जैसे डिम्ब दान या शुक्राणु दान में किया जाता है।

आम तौर पर जननिक अभिभावक डिम्ब को किसी फ़र्टिलिटी क्लिनिक या भ्रूण बैंक में दान करते हैं जहां उनके लिए कोई धारक मिलने तक उन्हें क्रायोजेनिक रूप से संरक्षित किया जाता है। सामान्यतः भ्रूण का भावी माता-पिता से मिलान करने की प्रक्रिया एजेंसी द्वारा ही की जाती है और उस समय क्लिनिक भ्रूणों का स्वामित्व भावी माता-पिता को हस्तांतरित कर देता है।[33]

युनाइटेड स्टेट्स में भ्रूण प्राप्त करने की इच्छुक महिलाओं को सं‍क्रमित रोग के लिए स्क्रीनिंग करानी होती है, जो कि यूएस फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा अनिवार्य है और वास्तविक भ्रूण हस्तांतरण होने से पहले सर्वोत्तम स्थान और चक्र समय निर्धारित करने के लिए प्रजनन परीक्षण करवाने होते हैं। भ्रूण की पहले से की गई स्क्रीनिंग मुख्यतः जननिक माता-पिता के स्वयं के आईवीएफ़ (IVF) क्लिनिक और आईवीएफ़ (IVF) प्रक्रिया पर निर्भर करता है। भ्रूण प्राप्तकर्ता चाहे तो अपने स्वयं के भ्रूणविज्ञानी से और अतिरिक्त परीक्षण करवा सकती है।

अप्रयुक्त भ्रूणों को दान देने का एक विकल्प है उन्हें फेंक देना (या उन्हें उस समय आरोपित करवाना जब गर्भधारण की संभावना बेहद कम हो[34]), उन्हें अनिश्चितकाल के लिए हिमीकृत रखना, या उन्हें भ्रूणविषयक स्टेम सेल अनुसंधान में उपयोग के लिए दान में दे देना.

इतिहास[संपादित करें]

जॉन रॉक एक अक्षत निषेचित डिम्ब निकालने वाले पहले व्यक्ति थे।[35] मानव डिम्बजनकोशिका के कृत्रिम परिवेशी मानव निषेचन के ज़रिए पहला गर्भाधान 1973 में दि लैंसेट फ़्रॉम दि मोनाश टीम द्वारा घोषित किया गया था, हालांकि वह गर्भ केवल कुछ दिन रहा और आज उसे जैव रासायनिक गर्भावस्था कहा जाता.[36] 1977 में पैट्रिक स्टेप्टो और रॉबर्ट एडवर्डस ने सफलतापूर्वक एक पथप्रदर्शक धारणा को अंजाम दिया जिसके परिणामस्वरूप आईवीएफ़ (IVF) प्रक्रिया के द्वारा दुनिया के पहले शिशु ने जन्म लिया। वह शिशु था 25 जुलाई 1978 को ओल्डैम जनरल हॉस्पिटल, ग्रेटर मैनचेस्टर, यूके[37][38] में जन्मा लुईस ब्राउन, उसके बाद 16 अक्टूबर 1978 को कोर्टनी क्रॉस और 14 जनवरी 1979 को एलेस्टेयर मैकडोनाल्ड का जन्म हुआ। इसके बाद फिर 1980 में मेलबोर्न में कैंडिस रीड का जन्म हुआ। इसके बाद क्लोमिफ़ेन साइट्रेट के साथ उद्दीपन चक्रों का उपयोग और डिम्बजनकोशिका को नियंत्रि‍त और समयबद्ध करने के लिए ह्यूमन कॉरियॉनिक गोनेडोट्रॉपिन्स (hCG) का उपयोग करके संग्रहण का समय नियंत्रि‍त करने की प्रक्रिया, ये ऐसे परिवर्तन थे जिन्होंने आईवीएफ़ (IVF) को शोध के एक उपरण से एक नैदानिक उपचार में परिवर्तित कर दिया।

इसके बाद मोनाश विश्वविद्यालय की टीम को 1981 में 14 गर्भाधानों में सफलता मिली जिनमें से नौ शिशु जन्म हुए. नॉरफ़ॉक, वर्जीनिया के ईस्टर्न वर्जीनिया मेडिकल स्कूल की जोन्स टीम[39] ने एक फ़ॉलिकल-उद्दीपक हार्मोन (uHMG) का उपयोग करके उद्दीपन चक्रों में और सुधार किया। बाद में इसे कंट्रोल्ड ओवेरियन हाइपरस्टीम्यूलेशन (ovarian hyperstimulation (COH)) के नाम से जाना गया। इस उपचार में विकास का एक और सोपान था गोनैडोट्रॉफ़ि‍न-स्रावक हार्मोन एगॉनिस्ट (gonadotrophin-releasing hormone agonists (GnRHA)) का उपयोग, जिससे समय पूर्व डिम्बोत्सर्जन की रोकथाम करके निगरानी की आवश्यकता घट गई। और हाल ही में गोनैडोट्रॉफ़ि‍न-स्रावक हार्मोन एंटागॉनिस्ट (gonadotrophin-releasing hormone agonists (GnRH Ant)) का उपयोग किया गया, जो कि यही कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त गभ्रनिरोधकों गोलियों के उपयोग से आईवीएफ़ (IVF) चक्रों को निर्धारित करना संभव हो सका हे, जिससे यह उपचार कर्मियों और रोगियों दोनों के लिए अधिक सुविधाजनक हो गया है।

भ्रूणों का हिमीकरण करने और फिर उन्हें पिघला कर हस्तांतरित करने की क्षमता ने आईवीएफ़ (IVF) के उपयोग की व्यावहारिकता में ज़बर्दस्त सुधार किया है।[40] आईवीएफ़ (IVF) उपचार में अगला अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर था 1992 में ब्रसेल्स के आंद्रे वान स्टीयर्टेगम द्वारा एकल शुक्राणुओं के इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन (intracytoplasmic sperm injection (ICSI)) को विकसित करना। इसकी मदद से न्यूनतम शुक्राणु निर्माण की क्षमता वाले पुरुष भी गर्भाधान प्रेरित कर सकते हैं। आईसीएसआई का उपयोग कभी कभी शुक्राणु प्राप्ति के लिए भी किया जाता है, जिसमें एक टेस्टिक्यूलर फ़ाइन नीडल (testicular fine needle) या ओपन टेस्टिक्यूलर बायोप्सी (open testicular biopsy) का उपयोग किया जाता है। इस विधि का उपयोग करके क्लाइनफ़ेल्टर्स सिंड्रोम से ग्रस्त कुछ पुरुष, जो कि अन्यथा बंध्यता के शिकार होते, कभी कभी गर्भाधान का कारण भी बन चुके हैं।[40][41] इस प्रकार आईवीएफ़ (IVF) प्रजननक्षमता संबंधी अधिकांश समस्याओं के लिए अंतिम समाधान बन चुका है, जिनमें ट्यूबल रोग से लेकर पुरुष घटक, इडियोपैथिक सबफ़र्टिलिटी, एंडोमेट्रियॉसिस, मां की अधिक आयु और डिम्बोत्सर्जन प्रेरण को प्रतिसाद न देने वाला एनोव्यूलेशन शामिल हैं।

हिमीकृत भ्रूणों के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कार्ल वूड्स को "आईवीएफ़ (IVF) का पितामह" कहा गया।[42]

यूएस में, 2006 में आरंभ किए गए एआरटी (ART) के परिणामस्वरूप 41343 शिशुओं (54656 नवजात शिशु) के जन्म हुएं, यह संख्या यूएस के कुल जन्मों के 1% से कुछ अधिक है।[43]

नैतिक पहलू[संपादित करें]

मुद्दे[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: गर्भावस्था विवाद की शुरुआत

कुछ मामलों में, प्रयोगशालाओं में कई गड़बड़ि‍यां (गलत पहचाने गए गेमिट, गलत भ्रूणों का हस्तांतरण) हुई हैं, जिसके फलस्वरूप आईवीएफ़ (IVF) प्रदाता के विरुद्ध कानूनी मुकदमे दायर किए गए और पेचीदा पितृत्व संबंधी मुकदमे चले. एक उदाहरण कैलिफ़ोर्निया की एक महिला का है जिसने एक अन्य जोड़े का भ्रूण प्राप्त किया और इसकी सूचना उसे उसके बेटे के जन्म के बाद दी गई।[44] इसके चलते कई आधिकारिक संस्थाओं और क्लिनिकों ने ऐसी गड़बड़ि‍यों के खतरे को कम से कम करने के लिए कई कार्यवाहियां लागू की हैं। उदाहरण के लिए एचएफ़ईए (HFEA) ने अब क्लिनिकों के लिए दोहरी साक्ष्य प्रणाली का पालन करना आवश्यक कर दिया है, जिसमें नमूनों को हस्तांतरित करने के प्रत्येक बिंदु पर दो व्यक्तियों द्वारा नमूने की पहचान की जांच करना आवश्यक होगा। वैकल्पिक रूप से, कर्मियों द्वारा दोहरे साक्ष्य करने की श्रमशक्ति लागत को घटाने और मानवीय त्रुटि को घटाने के लिए तकनीकी समाधानों को अधिक पसंद किया जा रहा है।[45] तकनीकी समाधानों में आम तौर पर नमूने के हर कंटेनर पर अनन्य संख्या वाले आरएफ़आईडी (RFID) टैग लगाए जाते हैं जिन्हें कंप्यूटर से जुड़े हुए रीडर्स द्वारा पहचाना जा सकता है। कंप्यूटर संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान आरएफ़आईडी (RFID) टैग ट्रैक करता है और न मिलने वाले नमूने दिखाई देने पर भ्रूणविज्ञानी को सचेत कर देता है।

इसी से जुड़ी एक अन्य चिंता यह है कि प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (Preimplantation Genetic Diagnosis) का उपयोग करके लोग विशिष्ट गुणों को स्क्रीन इन या आउट कर सकते हैं। उदाहरण के लिए एक बधिर ब्रिटिश युगल टॉम और पॉला लिची ने आईवीएफ़ (IVF) का उपयोग करके एक बधिर शिशु को जन्म देने के लिए अदालत में गुहार लगाई है।[46] कुछ मेडिकल नैतिकतावादियों ले इस दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की है। जैकब एपल ने लिखा था "इरादतन नेत्रहीन या बधिर भ्रूणों को नष्ट कर देने से भविष्य में लोगों को होने वाली तकलीफ़ काफ़ी हद तक कम हो सकती है, लेकिन यदि कोई ऐसी नीति है जो नेत्रहीन या बधिर माता-पिता को जानबूझ कर ऐसी विशेषता (नेत्रहीन या बधिर) के समर्थन की की अनुमति दे, वह तो बहुत सी परेशानियां खड़ी कर देगी.[47]

रजोनिवृत्ति पश्चात गर्भाधान[संपादित करें]

यद्यपि रजोनिवृत्ति भविष्य में गर्भ धारण करने के मार्ग में एक प्राकृतिक रुकावट है, लेकिन आईवीएफ़ (IVF) की मदद से पचास व साठ वर्ष की महिलाएं भी गर्भवती हो चुकी हैं। जिन महिलाओं के गर्भाशय उचित रूप से तैयार हैं, वे किसी डिम्ब दाता के डिम्ब से निर्मित भ्रूण प्राप्त करती हैं। इसलिए, हालांकि इन महिलाओं का शिशु के साथ कोई आनुवांशिक संबंध नहीं होता, लेकिन फिर भी गर्भावस्था और शिशु जन्म के माध्यम से इनका एक भावनात्मक रिश्ता तो होता ही है। कई मामलों में शिशु का आनुवांशिक पिता ही महिला का संगी होता है। रजोनिवृत्ति के बाद भी गर्भाशय गर्भधारण करने के लिए पूरी तरह सक्षम होता है।[48]

समलिंगी जोड़े, एकल और अविवाहित अभिभावक[संपादित करें]

2009 में दिए गए एक बयान में एएसआरएम (ASRM) को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जो यह दर्शाता है कि बच्चों को केवल एकल अभिभावकों, अविवाहित अभिभावकों और समलैंगिक अभिभावकों द्वारा परवरिश किए जाने के कारण ही क्षति या हानि होती है। उसने वैवाहिक स्थिति या यौन प्राथमिकत के आधार पर सहायता प्राप्त प्रजनन तकनीकों तक पहुंच पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं किया।[49]

नैतिक मुद्दों में प्रजनन अधिकार, शिशु का कल्याण, अविवाहित व्यक्तियों, समलैंगिकों के साथ भेदभाव न करना और स्वायत्तता शामिल है।[49]

कैलिफ़ोर्निया में हाल ही में उठे एक विवाद का केन्द्र यह सवाल था कि क्या समलिंगी संबंधों का विरोध करने वाले चिकित्सकों के लिए किसी लेस्बियन जोड़े के लिए आईवीएफ़ (IVF) उपचार देना आवश्यक होना चाहिए या नहीं. सैन डीगो के एक मेडिकल सहायक ग्वाडेलूप टी. बेनिटेज़ ने नॉर्थ कोस्ट विमेन्स केअर मेडिकल ग्रुप के डॉक्टर क्रिस्टीन ब्रॉडी और डगलस फ़ेंटन पर तब अदालत में मुकदमा दायर कर दिया जब ब्रॉडी ने उससे कहा कि "समलैंगिकों को कृ‍त्रि‍म वीर्यारोपण द्वारा गर्भ धारण करने में मदद करने पर उसकी धर्म आधारित आपत्तियां हैं," और फ़ेंटन ने इसी आधार पर उसे सुझाई गई निर्देशित प्रजननक्षमता की दवा क्लॉमिड दोबारा देना अस्वीकार दिया। [50][51] नॉर्थ कोस्ट विमेन्स केअर मेडिकल ग्रुप बनाम उच्चतर कोर्ट का यह मामला 19 अगस्त 2008 को बेनिटेज़ के हक में सुनाया गया।[52]

धार्मिक आपत्तियां[संपादित करें]

रोमन कैथोलिक चर्च सभी प्रकार के कृत्रिम परिवेशी निषेचन का विरोध करता है क्योंकि, गर्भ निरोध की तरह, इस प्रक्रिया में वैवाहिक कृत्य के प्रजननीय उद्देश्य को उसके मेल कराने वाले उद्देश्य से अलग किया जाता है:

चर्च के मैजिस्टीरियम द्वारा अक्सर वर्णित यह विशेष सिद्धांत ["प्राकृतिक नियमों का पालन करने" का सिद्धांत] ईश्वर द्वारा स्थापित उस अटूट संबंध पर आधारित है जिसे मनुष्य नहीं तोड़ सकता. यह संबंध उस मेल कराने वाले महत्व और प्रजननीय महत्व के बीच है जो दोनों ही वैवाहिक कृत्य का हिस्सा हैं।

इसका कारण यह है कि वैवाहिक कृत्य की बुनियादी प्रकृति यह है कि जहां यह कृत्य पति और पत्नी को पूर्ण अंतरंगता में करीब लाता है, वहीं वह उन्हें एक नए जीवन को जन्म देने की क्षमता भी देता है। और यह पुरुष और स्त्री की वास्तविक प्रकृति के बारे में लिखे गए नियमों का परिणाम है। और यदि इन आवश्यक गुणों में से प्रत्येक, यानी एकात्मक और प्रजननीय गुणों, को संरक्षित रखा जाए, तो विवाह का उपयोग सच्चे परस्पर प्रेम की अनुभूति को और पुरुष को प्रदान की गई मातृत्व/पितृत्व की सर्वोच्च ज़ि‍म्मेदारी के विधान के निष्ठा को पूरी तरह कायम रखता है। हम मानते हैं कि हमारे समकालीन यह समझने में खास तौर पर सक्षम हैं कि यह शिक्षा मानवीय तर्क के साथ पूरी तरह संगति में है।[53] कैटेचिस्म ऑफ़ कैथोलिक चर्च के अनुसार.

केवल विवाहित जोड़ों में उपयोग की जाने वाली तकनीक होमोलॉगस कृ‍त्रि‍म वीर्यारोपण व निषेचन (homologous artificial insemination and fertilization) यौन क्रिया को प्रजनन क्रिया से अलग कर देती है। किसी शिशु को अस्तित्व प्रदान करने वाला यह मिलन अब वह कृत्य नहीं रह गया है जिसमें दो व्यक्ति अपने आप को एक दूसरे को सौंप देते हैं, बल्कि एक ऐसा कृत्य हो गया है जिसमें "भ्रूण के जीवन और उसकी पहचान को चिकित्सकों और जीवविज्ञानियों के भरोसे सौंप दिया जाता है और इस तरह यह कृत्य मनुष्य के मूल स्वरूप और उसके भाग्य पर टेक्नॉलॉजी का प्रभुत्व स्थापित करता है। प्रभुत्व का यह संबंध ही उस गरिमा और समानता के खिलाफ़ जाता है जो अभिभावकों और बच्चों दोनों में होना चाहिए."[54]

कैथोलिक चर्च का यह मानना है कि बंध्यता ईश्वर की ओर से बच्चों को गोद लेने के लिए किया गया आह्वान है क्योंकि

गॉस्पेल में यह दर्शाया गया है कि अनुर्वरता कोई घोर पोप नहीं है। जो पति या पत्नी वैध रूप से सारे चिकित्सकीय उपचार करने के बावजूद बंध्यता से ग्रस्त है, उन्हें संपूर्ण आध्यात्मिक उर्वरता के स्रोत ईश्वर के सलीब के साथ खुद को आत्मसात् कर लेना चाहिए. वे परित्यक्त बच्चों को गोद लेकर या दूसरों के लिए कड़ी सेवाएं प्रदान करके अपनी उदारता को अभिव्यक्ति दे सकते हैं।[54]

इसके अतिरिक्त कई बार कृत्रिम परिवेशी निषेचन में भ्रूणों को फेंक दिया जाता है। कैथोलिक और अन्य धर्मों के कई लोग भ्रूण को जीवित मानव के रूप में देखते हैं जिसके बाकी लोगों के समान ही अधिकार हैं और इसलिए वे भ्रूण के विनाश को मानव जीवन की क्षति के रूप में देखते हैं।

गैमिट इंट्राफ़ैलोपियन हस्तांतरण (Gamete Intrafallopian Transfer (GIFT)) वास्तव में देखा जाए तो कृत्रिम परिवेशी निषेचन नहीं है क्योंकि जीआईएफ़टी (GIFT) की प्रक्रिया में निषेचन शरीर के भीतर होता है, किसी पेट्री डिश में नहीं। इसके बावजूद कैथोलिक चर्च इसके प्रति चिंतित है क्योंकि "कुछ धर्मशास्त्री इसे वैवाहिक कृत्य का स्थान लेने वाला मानते हैं और इसलिए यह अनैतिक है।"[55]

उपलब्धता और उपयोग[संपादित करें]

2005 में यूएसए में आईवीएफ़ (IVF) की उपलब्धता प्रति 100000 की आबादी में 2.5IVF चिकित्सक थी और उसका उपयोग प्रति 100000 की आबादी में 236 IVF चक्र था।[56] उपयोग उपलब्धता और IVF बीमा आवरण के साथ बढ़ता है और काफ़ी हद तक अविवाहित लोगों और मीडियन आय के प्रतिशत के साथ भी बढ़ता है।[56]

आईवीएफ़ (IVF) की लागत विनियामक या निधीयन परिवेश के बजाय अं‍तर्निहित स्वास्थ्य प्रणाली की महंगी प्रकृति को प्रतिबिंबित करती है,[57] और यह मानक एक आईवीएफ़ (IVF) चक्र और 2006 के यूएस डॉलर मूल्य के अनुसार, औसतन युनाइटेड स्टेट्स में $12,500 से लेकर जापान में $4,000 के बीच होती है।[57] आयरलैंड में, आईवीएफ़ (IVF) की लागत लगभग €4,000 और आवश्यक होने पर प्रजननक्षमता औषधियों की कीमत €3,000 तक होती है।[58] प्रति जीवित शिशु जन्म की लागत युनाइटेड स्टेट्स ($41,000[57]) और युनाइटेड किंग्डम ($40,000[57]) में सर्वाधिक है और स्कैंडिनेविया और जापान में सबसे कम (दोनों में लगभग $24,500[57]) है।

युनाइटेड स्टेट्स के कई फ़र्टिलिटी क्लिनिक महिलाओं द्वारा आईवीएफ़ (IVF) उपचार प्राप्त करने के लिए योग्य ऊपरी आयु सीमा 50 या 55 वर्ष निर्धारित करते हैं।[59] इस सीमा के कारण पचपन वर्ष से अधिक आयु की महिलाएं इस पद्धति का लाभ नहीं ले पातीं.[59]

ऑस्ट्रेलिया में एआरटी (ART) उपचार पाने वाली महिलाओं की औसत आयु, स्वयं के डिम्ब का उपयोग करने वाली महिलाओं के लिए 35.5 वर्ष (चार में से एक 40 या अधिक आयु की) और दान किए गए डिम्ब का उपयोग करने वाली महिलाओं के लिए 40.5 वर्ष है।[60]

पुरस्कार[संपादित करें]

दुनिया में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म दिलाने वाले डॉक्टर ब्रिटेन के रॉबर्ट एडवर्ड को २०१० का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। ये पुरस्कार उन्हें मेडिसिन के क्षेत्र में दिया गया है। 1950, 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने जो प्रयास किए, उसके परिणामस्वरूप विश्व का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी 1978 की जुलाई में पैदा हुआ। ये एक लड़की थी और उसका नाम लुई ब्राउन था।

तब से अब तक दुनिया भर में आईवीएफ़ तकनीक से क़रीब 40 लाख बच्चे पैदा हो चुके हैं। नोबेल पुरस्कार देनेवाली समिति का कहना है कि संतानोत्त्पत्ति में असमर्थता एक ऐसी समस्या है जो विश्व के 10 प्रतिशत दंपतियों को प्रभावित करती है। और ऐसी समस्या के निदान में जो अभूतपूर्व योगदान रॉबर्ट एडवर्ड ने दिया है, इसके लिए उन्हें मेडिसिन के क्षेत्र में इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार दिया गया। रॉबर्ट एडवर्ड ने निस्संतान लोगों की मदद के लिए इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़) तकनीक का विकास किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

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