इन्द्रजाल
दिखावट
इन्द्रजाल (चीनीः 因陀羅網) एक रूपक है जिसका उपयोग बौद्ध दर्शन में शून्यता, प्रतीत्यसमुत्पाद और अंतःप्रवेश की अवधारणाओं को चित्रित करने के लिए किया जाता है।[1][2] इसे इंद्ररत्न या इंद्रमुक्ता भी कहा जाता है।
इस रूपक का सबसे पहला ज्ञात संदर्भ अथर्ववेद में पाया जाता है। इसे तीसरी शताब्दी में रचित बुद्धवतांसक सूत्र में महायान सम्प्रदाय द्वारा और बाद में 6 वीं एवं 8 वीं शताब्दी के बीच हुआयन सम्प्रदाय द्वारा और विकसित किया गया।[1]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 Jones 2003, p. 16.
- ↑ Odin 1982