सामग्री पर जाएँ

आली मज्याडी, आदिबद्री तहसील, उत्तराखण्ड

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
आसौं आली
आसौं आली
उत्तराखण्ड राज्य का एक गाँव
आली बुग्याल, खैयुधार
आली बुग्याल, खैयुधार
उपनाम: आली आलीशान
तहसीलआदिबद्री
जिलाचमोली
राज्यउत्तराखण्ड
शासन
  ग्राम प्रधानलक्ष्मण सिंह रावत
  विधायकश्री अनिल नौटियाल
  सांसद अनिल बलूनीमुख्यमंत्री श्री [पुष्कर सिंह धामी]]
क्षेत्रफल
  कुल1.5 वर्गमील (4.0 किमी2)
ऊँचाई3,150 फीट (960 मी)
जनसंख्या (2011)
  कुल1.000 लगभग
पिनकोड246440
वेबसाइटwww.uttara.gov.in

आसौ आली उत्तराखण्ड के चमोली जिले के आदिबद्री तहसील का एक गाँव है।

आली, (पूर्व नाम आसौं आली) आदिबद्री तहसील में आदिबद्री एन एच 109 सड़क पर हनुमान मंदिर से नोटी नंदासैण वाली सड़क पर 22 कि.मी की दूरी पर बसा है। यह सड़क जंगलों के बीच से होकर जाती है यह गाँव चारों तरफ से जंगल और ऊपर से आली बुग्याल जिसको यहाँ के ग्रामवासी खैयुधार नाम से जानते हैं यह 1500 मीटर क्षेत्र मैं फैला बुग्याल प्राकृतिक अहसास दिलाता है, इस बुग्याल के बीच मैं एक छोटा सा तालाब (खैयी) है, जिस तालाब मैं यहाँ के ग्राम वासीयो के गाय और जंगली जानवर पानी पीते है, यह तालाब लगभग 50 मीटर लम्बा और 10 मीटर चौड़ा है, इस बुग्याल से 2,500 मीटर खड़ी चडाई पर शिव का मंदिर है।

आली शब्द का अर्थ

[संपादित करें]

कहा जाता है कि यहाँ आली नाम से सम्बधित जाति रहती थी जिस कारण इस छोटे से क्षेत्र को इन्ही के नाम से जाना जाता होगा और आधुनिक समय में यह शब्द अर्थ बदल चुका हैं आज के परिपेक्ष में आली शब्द के दो सुन्दर अर्थ सामने आते हैं 1 सखी अर्थात् मित्र 2 भवरा अर्थात् प्यार का प्रतिक। इस प्रकार आली के दो अर्थ स्पष्ट होते हैं

  1. दोस्ती ता प्रतीक
  2. प्यार का प्रतीक!

पुराने दस्तावेजो में गांव का असली नाम आसौं आली है जबकि कुछ सालो से लोग आली और मज्याडी गांव को एक ही समझा जाता हैं, जबकि यह अलग अलग गाँव है।

आसौं आली गांव का इतिहास

[संपादित करें]

आसौ या आली गांव उत्तराखंड के चमोली गढ़वाल आदिबद्री ( चांदपुर क्षेत्र ) में स्थित है । यह आसौ आली गांव इस क्षेत्र का बहुत पुराना गांव लगभग पांच/सात सौ सालो से भी इस गांव का पुराना इतिहास रहा है । इस गांव का पुराना नाम आसौ था कही सालो बाद इस गांव का नाम बदल कर आली पड़ गया । वर्तमान में आसौ गांव का नाम आली है । कहा जाता है आज से पांच /सात सौ साल पहले आसौ गांव में राशुकदारो के पास बहुत सारी जमीन हुआ करती थी । मान्यता के अनुसार आली गांव के खेतों में और गांव के काम काजों में काम करने के लिए डंडा माज्याडी से कुछ लोगो को आसौ गांव के लोगो ने अपने गांव के नीचे सरण दिया था । और इस गांव का नाम मज्याडी रखा था ये लोग रशुकदारो के खेतो में काम करते थे और बाद में चलकर आसौ आली गांव के लोगो ने इन्हे अपने खेत खलियान और कुछ जमीन दिया और ये लोग यहीं बस गए , वर्तमान में इस गांव का नाम मज्याडी तली है ।

आली की राजनीति

[संपादित करें]

आली गाँव का राजनीतिक इतिहास पूर्ण रूप से उपलब्ध ना होने के कारण लिखा नहीं जा सकता। वर्तमान में आली मज्याडी और देवलकोट एक ग्राम पंचायत है (कही -कही सरकारी दस्तावेज में आली और मज्याडी को एक ही गाँव बताया गया है लेकिन असल में आली और मज्याडी दो अलग-अलग गाँव है) आली मज्याडी और देवलकोट ग्राम पंचायत से वर्तमान प्रधान श्री लक्ष्मण सिंह रावत जी हैं।

"आली आलीशान हो" कुदरत ने आली को प्रकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण किया है आली हुनर बाजो का गाँव है जब यहाँ बर्फ गिरती है तो यह गाँव कुछ दिनो के लिये कश्मीर और मसूरी बन जाता है। चुनाव के दिनो में ये छोटा सा गाँव तीन-चार भागोँ में बट जाता है जैसे- भाजपायी, काग्रेसी, आप और क्षेत्रिया दल। यह गाँव कि राजनीतिक स्वतत्रता को दर्शाता हैं ! जीवन यापन के साधन में खेती, गाँय, भैस, बकरी और आदि सम्मलित हैं गाँव के कुछ युवा प्रशासनिक कार्यो व क्षेत्र से प्रेरित है तो कोई फौज कि भर्ती के प्रति अति उत्साहित होते हैं! अगर खेल सम्बधी बाते करे तो पूर्ण जानकारी ना देने के कारण हम क्षमा प्रार्थी हैं लेकिन आधुनिक समय में आली गाँव में क्रिकेट अत्यधिक खासा लोकप्रिया है इस बात का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे चाँदपुरपट्टी, नागपुरपट्टी, बदाणपट्टी, और पूरे क्षेत्रों में आली गाँव के खिलाड़ी जाने जाते हैं। आली गाँव हुनरबाजो का गाँव हैं सबके बारे में लिखना सम्भव नहीं हैं!

स्थानीय संस्कृति

[संपादित करें]

अब बात करते हैं गाँव कि रीति रिवाज कि सभ्यता कि जब यहाँ अष्टबली (अठवाड्) या राम लीला(रामजिला)]] का आयोजन होता है तो पूरा गाँव धार्मिक रंग में रंग जाता हैं आली गाँव कि होली पूरे क्षेत्र में जानी जाती थी लेकिन आज छोटे-छोटे त्योहार लुप्त होने के कगार पर हैं जैसे-अंगयारपूज्ये आदि! और बड़े-बड़े त्योहारो के प्रति भी लोगो का रवैया उदासी होता जा रहा है।

आर्थिक स्थिति

[संपादित करें]

विकास के मामले में आली गाँव अपनी रफ़्तार को धीमी गति से विकसित होने की और बड़ रहा है। "तुम्हारा लक तुम्हारा सडक" विकास वजनदार, लम्बा, चौडा और तेजस्वी होता हैं विकास के आने से गाँव चकाचौध हो जाता है विकास एक बार आता है तो आता ही रहता है लेकिन विकास का एक गुण होता है विकास गाँव में सडक के रास्ते आता है झाडियो और टुटे रास्तो द्वारा नहीं,

आली मित्र मंडली

हम चाहे कितने भी दूर रहे लेकिन एकता में रहें, एकता के लिए हमें ग्रुप बनाना चाहिये। जिसका नाम "आली मित्र मंडली" होगा।

इस मंडली में गाँव का प्रत्येक व्यक्ति जुड़ सकता है इस मंडली के माध्यम से गाँव कि प्रत्येक गतिविधि पर हम नज़र रख सकते हैं और कुछ सुधाव दे सकते हैं मिलकर काम कर सकते हैं और जरूरत के समय मदत भी कर सकते हैं जैसे -गाँव में रामलीला करानी हो, क्रिकेट कराना हो और कुछ काम होँ, हम सबका एक ही सपना आली आलीशान हो।

निकटवर्ती स्थान

[संपादित करें]

चाँदपुरगढ़ी

[संपादित करें]

चाँदपुरगढ़ी उत्तराखण्ड के 52 गढोँ में एक प्रसिद्ध गढ था, आली गाँव इसी गढ़ के अन्तर्गत आता है। आज चाँदपुरगढ़ी एक अलग स्थान है जो हमेशा से और आज भी प्राकृतिक सौन्दर्य तथा पर्यटक स्थल के लिये आकर्षण का केद्र बना हुआ हैं और नजाने कितने असुलझे रहस्य अपने गर्भ में समाये हुए हैं यह कर्णप्रयाग का निकटवर्ती आकर्षण है। यह उत्तराखंड राज्य में पड़ता है। गढ़वाल का प्रारंभिक इतिहास कत्यूरी राजाओं का है, जिन्होंने जोशीमठ से शासन किया और वहां से 11वीं सदी में अल्मोड़ा चले गये। गढ़वाल से उनके हटने से कई छोटे गढ़पतियों का उदय हुआ, जिनमें पंवार वंश सबसे अधिक शक्तिशाली था जिसने चाँदपुरगढ़ी (किला) से शासन किया। कनक पाल को इस वंश का संस्थापक माना जाता है। उसने चांदपुर भानु प्रताप की पुत्री से विवाह किया और स्वयं यहां का गढ़पती बन गया। इस विषय पर इतिहासकारों के बीच विवाद है कि वह कब और कहां से गढ़वाल आया।

कुछ लोगों के अनुसार वह वर्ष 688 में मालवा के धारा नगरी से यहां आया। कुछ अन्य मतानुसार वह गुज्जर देश से वर्ष 888 में आया जबकि कुछ अन्य बताते है कि उसने वर्ष 1159 में चांदपुर गढ़ी की स्थापना की। उनके एवं 37वें वंशज अजय पाल के शासन के बीच के समय का कोई अधिकृत रिकार्ड नहीं है। अजय पाल ने चांदपुरगढ़ी से राजधानी हटाकर 14वीं सदी में देवलगढ़ वर्ष 1506 से पहले ले गया और फिर श्रीनगर (वर्ष 1506 से 1519)।

यह एक तथ्य है कि पहाड़ी के ऊपर, किले के अवशेष गांव से एक किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पर हैं जो गढ़वाल में सबसे पुराने हैं तथा देखने योग्य भी हैं। अवशेष के आगे एक विष्णु मंदिर है, जहां से कुछ वर्ष पहले मूर्ति चुरा ली गयी। दीवारें मोटे पत्थरों से बनी है तथा कई में आलाएं या काटकर दिया रखने की जगह बनी है। फर्श पर कुछ चक्राकार छिद्र हैं जो संभवत: ओखलियों के अवशेष हो सकते हैं। एटकिंसन के अनुसार किले का क्षेत्र 1.5 एकड़ में है। वह यह भी बताता है कि किले से 500 फीट नीचे झरने पर उतरने के लिये जमीन के नीचे एक रास्ता है। इसी रास्ते से दैनिक उपयोग के लिये पानी लाया जाता होगा। एटकिंसन बताता है कि पत्थरों से कटे विशाल टुकड़ों का इस्तेमाल किले की दीवारों के निर्माण में हुआ जिसे कुछ दूर दूध-की-टोली की खुले खानों से निकाला गया होगा। कहा जाता है कि इन पत्थरों को पहाड़ी पर ले जाने के लिये दो विशाल बकरों का इस्तेमाल किया गया जो शिखर पर पहुंचकर मर गये।

यह स्मारक अभी भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की देख-रेख में है।

निकटम ग्रामवासियों का शिव मंदिर

[संपादित करें]

घंडियाल देवता महादेव मंदिर

[संपादित करें]

मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार यह शिव मंदिर यानी घंडियाल देवता एक प्राचीन शिव मंदिर है लगभग हजार सौ सालो से भी पुराना यह मंदिर है अली गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच में यह मंदिर स्थित है। यह धंडियाल देवता का मंदिर अली गांव वासियों का प्राचीन शिव मंदिर है ।इस मंदिर में आसौ आली गांव के लोग हर बार त्योहारों में इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं इस शिव मंदिर में हरियाली पूजे से लेकर घंडियाल पूजा तक किया जाता है , गांव के लोग आए दिन कभी न कभी इस शिव मंदिर में आते जाते रहते हैं श्रद्धा भक्ति करने के लिए ।

मंदिर का पुराना इतिहास

[संपादित करें]

मान्यताओं के अनुसार और बुजुर्गों के अनुसार माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना इस प्रकार से हुई थी एक ग्वाला था जो अपनी गायों को चराने उस जगह के आसपास आया करता था । एक बार उसकी गाय ब्याह गई उसका बछड़ा हुआ और गाय प्रत्येक दिन एक स्थान में जाकर अपना दूध स्तनपात करता था,

जब भी गाय घर में जाती थी गौशाले में और ग्वाला उसको दूध निकालने के लिए जाता था तो गाय दूध नहीं देती थी ऐसे करते-करते कहीं दिन बीत गए ग्वाला एक बार गाय के पीछे-पीछे गाय देखने गया और उसने देखा कि गए एक पत्थर पर अपना दूध दे रही है।
ग्वाला गुस्से में उस पत्थर के समीप गया और उसे पत्थर पर अपनी कुल्हाड़ी से मार दिया उस पत्थर के कहीं टुकड़े हो गए जहां जहां  वह पत्थर गिरे वहां वहां एक शिव लिंग स्थापित हो गया ।

और जब वह ग्वाला अपने घर गया तो उसे सपने हुआ कि जो वह पत्थर था वह को ही साधारण पत्थर नहीं था बल्कि वह एक शिवलिंग था और वहां पर जाकर उसे पूजा अर्चना करनी पड़ेगी और एक मंदिर की स्थापना करनी पड़ेगी जिस प्रकार से ग्वाला वहां पर अगले दिन गया और उसने एक मंदिर की स्थापना की और आज तक इस मंदिर की पूजा अर्चना की जाती है आली गांव के लोगों के द्वारा