अर्जुन सिंह

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अर्जुन सिंह
Arjun Singh.jpg
अर्जुन सिंह in 1984

मानव संसाधन विकास मंत्री, भारत सरकार
कार्यकाल
2004–2009
पूर्वा धिकारी मुरली मनोहर जोशी
उत्तरा धिकारी कपिल सिब्बल

कार्यकाल
9 जून 1980 - 12 मार्च 1985
पूर्वा धिकारी राष्ट्रपति शासन
उत्तरा धिकारी मोतीलाल वोरा

जन्म 5 नवम्बर 1930
चुरहत, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 4 मार्च 2011(2011-03-04) (उम्र 80)
दिल्ली, भारत
जीवन संगी सरोज कुमारी
शैक्षिक सम्बद्धता इलाहाबाद विश्वविद्यालय
व्यवसाय राजनीतिज्ञ

अर्जुन सिंह एक भारतीय राजनेता थे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इन के समय में 1984 में भोपाल में मिथाइल इसिसैनैत (MIC GAS) हुई। अर्जुन सिंह जी का 5 नवम्बर 1930 को जन्म. जिस खानदान में पैदा हुए वो सामंती था. पिता राव शिव बहादुर सिंह, चुरहट गढ़ी के ठिकानेदार. कांग्रेस के नेता और आज़ादी के बाद विन्ध्य प्रदेश के पहले मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री. खानदानी सामंत बेगारी लेते, आदिवासियों की पीठ पर सामान ढोते. शिकार के लिए हांका लगवाते. लेकिन अर्जुन सामंती नहीं थे. सात साल के थे, इलाहाबाद में पढ़ते थे. महात्मा गांधी इलाहाबाद आये तो उन्हें देखने गए. गांधी उनके सामने से गुजरे तो अर्जुन सिंह की टाई पकड़ ली. अर्जुन सिंह को लगा महात्मा गांधी को उनका टाई पहनना पसंद नहीं है. अर्जुन सिंह ने उस दिन के बाद टाई नहीं पहनी. 10 साल के थे, दशहरे में जाना था. राजसी कपड़े पहनाये जाने लगे. अर्जुन ने मना कर दिया. कॉलेज में थे, इलाहाबाद में. पिता ने भाइयों में ज़ायदाद बांट दी थी, पता लगा कि उनके इलाके में अकाल पड़ा है, अर्जुन ने किसानों का लगान माफ़ कर दिया. पिता बहुत गुस्साए, लेकिन अर्जुन के सामने झुकना पड़ा।


ये कहानी कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे अर्जुन सिंह की नहीं है, न पंजाब के राज्यपाल की. न 3 बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री या 5 बार सेन्ट्रल मिनिस्टर रहे अर्जुन सिंह की. कहानी 22 साल के उस बेटे की है, जिसके पिता को कांग्रेस ने टिकिट दिया, और फिर पूरे शहर के सामने देश के प्रधानमंत्री से बेइज्जती करा दी. कहानी 24 साल के उस बेटे की, जिसके पिता जेल में बंद थे और उसने बाहर खड़े होकर कसम खाई-

‘एक दिन मैं खानदान के नाम से ये कलंक मिटा दूंगा.’

लेकिन राव शिव बहादुर जेल कैसे पहुंचे? इसकी भी कहानी है. रीवा के महाराजा गुलाब सिंह जूदेव हुआ करते थे, तब वो एक नया क़ानून बनाना चाहते थे. बेऔलाद इलाकेदारों और पवईदारों की जमीन अपने राज्य में मिलाना चाहते थे. उन्हें रोकने राव शिव बहादुर सिंह ने पवाईदार एसोसिएशन बनाया. इलाकेदारों की जमीन गुलाब सिंह नहीं ले सके. यहीं से गुलाब सिंह और उनके चाहने वाले शिव बहादुर सिंह से नाराज़ हो गए.बाद में अंग्रेज गए. समय बदला. रीवा के राजा बदले. मार्तंड सिंह आये. वही जिन्होंने दुनिया का पहला सफेद बाघ मोहन खोजा था. वो विन्ध्य प्रदेश के राज प्रमुख बने और शिक्षा मंत्री शिव बहादुर के हितैषी भी. लेकिन बीहर और बिछिया में पानी ही ऐसा ‘चांड़’ बहता है कि पीने वाले दुश्मनी नहीं भुला पाए. बताया जाता है, शिव बहादुर दरबारी राजनीति के शिकार हुए.

पन्ना में हीरा खदानें हैं, उनकी लीज़ का नवीनीकरण होना था. आरोप लगे कि इसी में शिवबहादुर सिंह ने करप्शन किया, 25 हज़ार की रिश्वत ली. इस दाग ने उनका सब छीन लिया. कांग्रेस से उन्हें टिकट मिला था. लेकिन जब नेहरु चुनाव प्रचार पर आये तो उनके कान भर दिए गए. नेहरु ने मंच से ही घोषणा कर दी. ‘चुरहट का प्रत्याशी कांग्रेस का नहीं है.’ वजह बताई कि जिस पर मुकदमा चल रहा है. उसे टिकट ही नहीं देना चाहिए था. उसी मंच के नीचे चुरहट के प्रत्याशी का बेटा खड़ा था, दरबार कॉलेज स्टूडेंट यूनियन का प्रेसिडेंट अर्जुन सिंह. 1952 शिव बहादुर सिंह चुनाव हारे. 1954 मुकदमा हारे. तीन साल की जेल हुई. हिंदुस्तान में पद पर रहते हुए करप्शन के मामले में जेल जाने वाले शायद पहले नेता. शिव बहादुर टूट गए. 1961 में मौत हो गई.5 साल बाद साल 1957, प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की सिफारिश पर अर्जुन सिंह को कांग्रेस से टिकट देने के लिए बुलाया जाता है. अर्जुन सिंह मना कर देते हैं. पार्टी को 1952 की याद दिलाते हैं. साथ ही एक वादा करते हैं. चुनाव जीतकर पार्टी में आ जाऊंगा. अर्जुन दिखाना चाहते थे कि जनता को उनके परिवार पर भरोसा है. निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं, मझौली से. जीतते हैं, कांग्रेस के प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो जाती है.

समय के साथ नेहरु की नज़रों में चढ़ते हैं. जिस अर्जुन सिंह के पिता को नेहरु ने भरी सभा में बेइज्जत कर दिया था. वही अर्जुन सिंह आनंद भवन जाते हैं. नेहरु से मिलते हैं. कांग्रेस के विधायक दल में आ जाते हैं, साल था 1960. कांग्रेस के टिकट से 1962 का चुनाव लड़ते हैं. जीतते हैं. 1963 में राज्यमंत्री बनते हैं. लेकिन 1967में चुनाव हार जाते हैं. वजह बनते हैं अर्जुन के कभी राजनैतिक गुरु रहे द्वारका प्रसाद मिश्र. डीपी को लगता था कि अर्जुन सिंह विजयराजे सिंधिया खेमे के हैं. इसलिए मुख्यमंत्री चुनाव से पहले ऐसा कलेक्टर भेजते हैं, जो अर्जुन के लिए सियासी मुश्किलें खड़ी कर दे. और कलेक्टर सफल होता है.लेकिन चुनाव नतीजों के कुछ ही महीने बाद डीपी ही असफल हो जाते हैं. उनकी सरकार गिर जाती है. गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस विधायक दल में हुई बगावत के पीछे. और इसके पीछे होती हैं विजयराजे सिंधिया. उधर अर्जुन भी बदले हालात में अपना खेल दिखाते हैं. वह रीवा के राजा मार्तंड सिंह संग मिलकर उमरिया के विधायक को इस्तीफा देने के लिए मना लेते हैं. फिर उपचुनाव जीतकर वापस विधानसभा पहुंच जाते हैं. 1972 में एक बार फिर से विधायक बनते हैं. और फिर पीसी सेठी की कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री.उनके करियर को बड़ा ब्रेक मिलता है, 1977 में. जब कांग्रेस और उसका सिटिंग सीएम श्यामाचरण, दोनों चुनाव हार जाते हैं. तब अर्जुन को कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष बनाती है. क्यों. क्योंकि वह संजय गांधी के दरबार में एंट्री पा चुके थे.समय बदला, अर्जुन सिंह इंदिरा और संजय के करीबी होने लगे. इंदिरा दतिया के मंदिर गईं तो भोपाल में अर्जुन सिंह के यहां रुकीं. संजय गांधी चुनाव प्रचार के लिए चुरहट तक गए. 1980 आया, कांग्रेस चुनाव जीती. विधायक दल का नेता चुनने के लिए बड़े-बड़े नाम आये. केपी सिंह, विद्याचरण शुक्ला, प्रकाशचंद सेठी, शिवभानु सिंह सोलंकी और अर्जुन सिंह. कमलनाथ का नाम भी था. उन्होंने अपने वोट और अपना साथ अर्जुन सिंह को दे दिया. सीएम चुनने का दूसरा दौर चला. पर्यवेक्षक के तौर पर आये प्रणव मुखर्जी. मतपेटी में वोट डाले गए. मतपेटी को दिल्ली मंगवा लिया गया. हाई कमान के आगे खोलने के लिए. सीन में एंटर हुए संजय गांधी. उन्होंने बिना गिनती ही अर्जुन सिंह को विधायक दल का नेता घोषित कर दिया. अर्जुन सिंह को हाईकमान की नजदीकी काम आई. वो मुख्यमंत्री बन गए. शिवभानु सिंह बस इतना कह सके “एक आदिवासी के सामने से परोसी हुई थाली हटा ली. मुख्यमंत्री बनने के बाद अर्जुन सिंह ने अपने लोगों को उपकृत करना शुरू किया. निगमों-मंडलों में नेता भरे जाने लगे. प्रशासन के स्तर पर छत्तीसगढ़ यानी तबके आदिवासी इलाके वाले मध्य प्रदेश में पैठ बनाने की कोशिश की. इसी के सहारे वह अपने राजनीतिक विरोधी शुक्ल बंधुओं के भी पर कतरना चाहते थे. इस सबसे खार खाए श्रीनिवास तिवारी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. तिवारी भी रीवा के उसी दरबार कॉलेज यानी अब के टी.आर.एस. कॉलेज से निकलकर आये थे, जहां से अर्जुन सिंह. कॉलेज के दिनों से ही अर्जुन सिंह दाऊ बुलाये जाते और श्रीनिवास तिवारी दादा. तो ये दाऊ और दादा की लड़ाई थी, जो दशकों चली.

असल में ये विन्ध्य में हमेशा से चली आ रही टिपिकल ठाकुर-ब्राह्मण वाली रार थी. जब 1985 के टिकट बंट रहे थे. तब अर्जुन ने बदला लिया. चुनाव समिति की मीटिंग में विद्याचरण शुक्ल ने श्रीनिवास का पक्ष रखा. उस वक्त अर्जुन सिंह ने मान लिया. लेकिन फाइनल लिस्ट आई तो श्रीनिवास तिवारी का नाम कहीं नहीं था. 2-3 दिसंबर की रात, साल 1984. भोपाल शहर का बैरसिया. काली परेड के यूनियन कार्बाइड से गैस रिसी. इस फैक्ट्री में कीड़े मारने का ज़हर सेविन बनता था. उस रात हवा ऐसी थी कि जहरीली गैस ने शहर का रुख कर लिया. लोग मरने लगे. फैक्ट्री हटाने की बात पहले भी हुई थी. आईएएस ए.एन. बुच ने जब ऐसा कहा था, तो उनका तबादला कर दिया गया था. ये वही बुच हैं, जिन्होंने भोपाल के एक चर्चित बाजार का नाम बिट्टन मार्केट रखा. बिट्टन कौन. कहा गया कि अर्जुन सिंह की पत्नी सरोज सिंह का घर नाम बिट्टन है इसलिए. लेकिन यूनियन कार्बाइड का विरोध कायम रहा. तब अर्जुन सरकार के श्रममंत्री ने टका सा जवाब दिया था-

‘यूनियन कार्बाइड 25 करोड़ की संपत्ति है, पत्थर का टुकड़ा नहीं जिसे इधर से उधर रख दूं.’

मगर 25 करोड़ की उस संपत्ति ने हज़ारों की जान लेली. गैस रिसने की अगली दोपहर फिर अफवाह फ़ैली कि फैक्ट्री की टंकी फूट गई है. सब जान बचाकर भागे. सरकारी लोग कहते रहे, अफवाह है. अफवाह है. भोपाल वाले कहते हैं, अर्जुन सिंह खुद अपने केरवा डैम वाले बंगले से भाग गये थे तब.

फिर शुरू हुआ कानून का दिखावा. अमेरिका से 7 दिसंबर को यूनियन कार्बाइड का मुखिया वॉरेन एंडरसन भारत आया. गिरफ्तारी हुई. गिरफ्तारी ऐसी कि एसपी स्वराज पुरी और डीएम मोती सिंह उसे रिसीव करने पहुंचे. एंबेसडर में बिठाकर यूनियन कार्बाइड के रेस्ट हाउस ले गए. शाम तक रिहाई भी हो गई. मात्र 25 हज़ार रूपये का बांड भरकर हजारों का हत्यारा, पहले दिल्ली और दिल्ली से अमेरिका उड़ गया. ये सब हुआ अर्जुन सिंह की शह पर. बाद के दिनों में वह कमजोर सफाई पेश करते रहे. कहते-

“हमें जनता के भड़कने का डर था. हमें राजीव ने नहीं नरसिंह राव ने छोड़ने को कहा था.”

लेकिन सच ये है कि भोपाल में अर्जुन सिंह पूरी तरह फेल रहे. एंडरसन आया, अफसर उसके पीछे डोले. पत्रकारों को एंडरसन से सवाल तक नहीं पूछने दिया गया. उसने पैसे फेंके, अफसर उसे हवाई अड्डे तक छोड़ आये. अर्जुन सिंह बाद में ‘ऑपरेशन फेथ’ चलाते रह गए. बात ये भी आई कि यही एंडरसन था. जिसका दान चुरहट लॉटरी काण्ड वाली सोसायटी तक पहुंचा था.फरवरी 1988 अर्जुन सिंह फिर मुख्यमंत्री बने. लेकिन एक साल भी पूरा न कर सके. इस बार बोतल से चुरहट लॉटरी काण्ड निकला था. 1982 में चुरहट चिल्ड्रेन वेलफेयर सोसायटी बनी थी. बनाने वाले अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह और करीबी थे. तय ये था कि बच्चों की भलाई और स्वास्थ के लिए काम होगा. चुरहट में बच्चों के अस्पताल की नींव रखी गई, मदर टेरेसा के हाथों. फंड रेजिंग के लिए राज्य सरकार की अनुमति से लॉटरी ड्रा निकला करते थे. चैरिटी का काम था तो टैक्स में छूट भी मिलती थी. फिर इसी में घपले के आरोप लगे. 17 करोड़ के ग़बन की बात कही गई. कहा गया कि उस पैसे से भोपाल के रातीबड़ में केरवा डैम पैलेस बनाया गया. बाद में कोर्ट में अर्जुन सिंह के करीबी बरी हो गये, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. लॉटरी काण्ड ने अर्जुन सिंह की मुख्यमंत्री की कुर्सी खा ली. और इस कुर्सी पर बैठ गए, कभी उनके शिष्य और फिर विरोधी बने मोतीलाल वोरा.इसके बाद अर्जुन कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए. 1991 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री की हसरत पाली. मगर नरसिम्हा राव के हाथों मात खाई. सतना के सांसद राव की कैबिनेट में मामूली मंत्री बनकर रह गए. हालांकि इस दौर में वह राव की भरसक मुखालफत करते रहे. जब बाबरी टूटी, तो उन्होंने प्रधानमंत्री की खुलकर आलोचना की. ये दौर चार साल चला. 1994 के आखिरी महीने में उनका मंत्री पद गया. फिर 1995 में उन्होंने शीला दीक्षित, माखल लाल फोतेदार, शीशराम ओला सरीखे नेताओं संग मिल कांग्रेस छोड़ दी. एक नई कांग्रेस बनाई. कांग्रेस तिवारी. तिवारी क्यों. क्योंकि इसके अध्यक्ष थे यूपी के सीएम रहे नारायण दत्त तिवारी. और कार्यकारी अध्यक्ष थे अर्जुन सिंह.तिवारी कांग्रेस की 1996 के चुनावों में गत हो गई. खुद एनडी और अर्जुन लोकसभा नहीं पहुंच पाए. लेकिन एक ही बरस में सब ठीक हो गया. सोनिया सियासी सक्रियता का मन बना चुकी थीं. और उनके दफ्तर के संकेत पर कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सब बागियों को वापस पार्टी में लिया. फिर सोनिया खुद अध्यक्ष बन गईं तो अर्जुन का महत्व बढ़ने लगा. लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी. 2001 में सोनिया ने उन्हें राज्यसभा बुला लिया. फिर 2004 वाली UPA सरकार में अर्जुन HRD मिनिस्टर बने. उच्च संस्थानों में ओबीसी वर्ग को आरक्षण को लेकर वह खूब विवादों में रहे. थोक के भाव डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा बांटने पर भी आपत्तियां उठीं.


इन सबसे क्या हुआ. 2009 में जब यूपीए गठबंधन ने केंद्र में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया तो अर्जुन का नाम मंत्रियों की सूची में नहीं था. इसके बारे में तीन थ्योरी दी गईं. पहली, उनका खराब स्वास्थ, दूसरी, बतौर शिक्षा मंत्री उनके विवादित फैसले, तीसरी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उन्हें कैबिनेट में शामिल करने को लेकर अनिच्छा.4 मार्च 2011 को अर्जुन सिंह की दिल्ली में मौत हो गई. अर्जुन की सियासत अभी जिंदा है. उनके राजनीतिक वारिस, उनके बेटे अजय सिंह उर्फ ‘राहुल भैया’ के जरिए. अजय मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष हैं. पोता अरुणोदय सिंह बॉलीवुड में नाम कमा रहा है. एक बेटी भी राजनीति में है. वीणा सिंह. भाई-बहन की बनती नहीं इसलिए विवाद बने रहते हैं। जय हिन्द जय विंध्य "हमारा रीवा"

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बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

रीवा के विख्यात नेताओ में शुमार अर्जुन सिंह सीधी से आते थे। पर उनके चाहने बाले रीवा में अनेको थे।

कुछ प्रमुख सहयोगियों की बात करे तो ६० से ७० के दशक के रीवा सिरमौर से आने बाले प्रमुख गाँधी वादी नेता और अपने मूल्यों और वसूलो के लिए सबकुछ कुर्बान करने बाले पंडित धनेन्द्र पाण्डेय का नाम प्रमुख रूप से चर्चित है।

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