अरब का इतिहास

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अरबी प्रायद्वीप की सबसे बड़ी घटना है इस्लाम का जन्म। यह सातवीं सदी के पूर्वार्ध में हुआ था जिसके पहले का इतिहास तथाज्ञात नहीं है।

प्रगैतिहासिक काल[संपादित करें]

प्राचीन काल में दिल्मन सभ्यता सुमेर तथा मिस्र की प्राचीन सभ्यता के समकालीन थी। सन् ३५००-२५०० ईसापूर्व के मध्य में कुछ अरबों का बेबीलोनिया-असीरिया के इलाके में आगमन अरबों के इतिहास की पहली महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। सातवीं सदी तक अरबों का इतिहास कबीलों के झगड़ों और छिटपुट रूप से विदेशी प्रभुत्व की कहानी लगती है।

मुहम्मद साहेब आणि इस्लाम धर्म[संपादित करें]

सन् ६१३ इस्वी के आसपास एक अरबी दफ़ातर ने लोगों में एक दिव्य ज्ञान का प्रचार किया। उनका कहना था कि उसे इसका ज्ञान परमेश्वर (अल्लाह) के दूत जिब्राईल ने दिया और प्रत्येक इन्सान को उन्हीं तरीकों को अपनाना चाहिए। उनका नाम मुहम्मद स अ व स था और वो खादीजा नाम की विधवा के व्यापार में मदद करते थे। लोगों को उनकी बात पर या तो यकीन नहीं आया या साधारण सी लगी। पर गरीबों को ये बात बहुत पसन्द आई कि किसी का शोषण नहीं करना चाहिए जो यह करेगा उसे कयामत के दिन नरक का प्राप्ति होगी। लोगों के बीच समानता के भाव की बात दलितों और निचले तबकों में लोकप्रियता मिलने लगी। फिर धीरे धीरे और लोग भी उनके अनुयायी बनने लगे। उनकी बढ़ती ख्याति देखकर मक्का के कबीलों को अपनी लोकप्रियता और सत्ता खो देने का भय हुआ और उन्होंने मुहम्मद को सन् ६२२ (हिजरी) में मक्का छोड़ने को विवश कर दिया। वो मदीना चले गये जहाँ लोगों, खासकर संभ्रांत कुल के लोगं और यहूदियों से उन्हे समर्थन मिला। इसके बाद उनके अनुचरों की संख्या और शक्ति बढती गई। मुहम्मद ने मक्का पर चढ़ाई कर दी और वहाँ के प्रधान को हरा दिया। उसके 'संदेश' से और लोग प्रभावित होने लगे और उसकी प्रभुसत्ता में विश्वास करने लगे। उसके बाद मुहम्मद ने अपने नेतृत्व में कई ऐसे सैनिक अभियान भी चलाए जिनमें उनका विरोध करने वालों को हरा दिया गया। सन् ६३२ में मुहम्मद साहब की मृत्यु तक लगभग सारा अरब प्रायद्वीप मुहम्मद साबह के संदेश को कुबूल कर चुका था। इन लोगों को मुस्लिम कहा जाने लगा।

मुहम्मद साहब के बाद[संपादित करें]

मुहमम्द साहब की मृत्यु के बाद अरबों की राजनैतिक शक्ति में बहुत वृद्धि हुई। सन् ७०० इस्वी तक ईरान, मिस्र, ईराक तथा मध्यपूर्व में इस्लाम की सामरिक विजय स्थापित हो गई थी। अरब इन इलाकों में छिटपुट रूप से बस भी गए थे। इस्लाम की राजनैतिक सत्ता खिलाफ़त के हाथ रही। आरंभ में तो इस्लाम का केन्द्र दमिश्क रहा और फिर मक्का पर आठवीं सदी के मध्य तक बग़दाद इस्लाम की राजनैतिक राजधानी बना। इस्लाम के राजनैतिक वारिस अरब ही रहे पर कई और नस्ल/जाति के लोग भी धीरे धीरे इसमें मिलने लगे। सोलहवीं सदी में उस्मानों ने मक्का पर अधिकार कर लिया और इस्लाम की राजनैतिक शक्ति तुर्कों के हाथ चली गई और सन् १९२२ तक उन्हीं के हाथों रही।