स्त्री शिक्षा

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

स्त्री शिक्षा स्त्री और शिक्षा को अनिवार्य रूप से जोड़ने वाली अवधारणा है। इसका एक रूप शिक्षा में स्त्री को पुरुषों की ही तरह शामिल करने से संबंधित है। दूसरे रूप में यह स्त्री के लिए बनाई गई विशेष शिक्षा पद्धति को संदर्भित करता है। भारत में मध्य और पुनर्जागरण काल के दौराण स्त्री को पुरुषों से अलग तरह की शिक्षा देने की धारणा विकसित हुई थी। वर्तमान दौर में यह बात सर्व मान्य है की स्त्री को भी उतना शिक्षित होना चाहिये जितना पुरुष हो। यह सिद्ध सत्य है कि यदि माता शिक्षित न होगी तो देश की सन्तानो का कदापि कल्याण नही हो सकता।

स्वरूप और महत्व[संपादित करें]

शिक्षा वयस्क जीवन के प्रति स्त्रियों के विकास के लिए एक आधार के रूप में विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षा अन्य अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए लड़कियों और महिलाओं को सक्षम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बहुत सी समस्याओं को पुरुषों से नहीं कह सकने के कारण महिलाएं कठिनाई का सामना करती रहती हैं। अगर् महिलाए शिक्षित है तो वे अपने घरों की सभी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं। स्त्री शिक्षा राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय विकास में मदद करता है ।आर्थिक विकास और एक राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में मदद करता है। महिला शिक्षा एक अच्छे समाज के निर्माण में मदद करता है।

समस्याएं[संपादित करें]

रूढ़िवादी सांस्कृतिक नज़रिए के कारण लड़कियों को अक्सर पाठशाला जाने कि अनुमति नहीं दिया जाता है ।

भारत में स्त्री शिक्षा[संपादित करें]

भारत मे वैदिककाल से ही स्त्रियों के लिए शिक्षा का व्यापक प्रचार था। भारत मे ऐसा समय भी आया जबकी स्त्री और शूद्र जाति के लिये वेदो को पढ़ना निषिद कर दिया गया था। परन्तु यह धारणा बहुत दिनो तक स्थिर न रह सकी। मुगलकाल में भी अनेक महिला विदुषियों का उल्लेख मिलता है। पुनर्जागरण के दौर में भारत में स्त्री शिक्षा को नए सिरे से महत्व मिलने लगा। ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वार सन १८५४ में स्त्री शिक्षा को स्वीकार किया गया था। विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों के कारण साक्षरत के दर 0.२% से बदकर ६% तक पहुँच गया था । कलकता के विश्वविद्यालय महिला को शिक्षा के लिए स्वीकार करने वाला पहला विश्वविद्यालय था। १९८६ में शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय नीति प्रत्येक राज्य को सामाजिक रूपरेखा के साथ शिक्षा का पुनर्गठन करने का निर्णय लिया था। शिक्षा लोकतंत्र के लिए जरूरी हो गया था और महिलाओं के हालात में बदलाव लाने के लिये ज़रूरि था। जोन इलियोट जी ने पेहला महिला विश्वविद्यालय खोला था सन् १८४९ में और उस विश्वविद्यालय क नाम बीथुने कालेज था।सन १९४७ से लेकर भारत सरकार पाठशाला में अधिक लड़कियों को पड़ने कि मोखा देने के लिये , अधिक लड़कियों को पाठशाला में दाखिला करने के लिये और उनका स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने कि कोशिश में अनेक योजनाएं बनाये हैं जैसे नि: शुल्क पुस्तकें, दोपहर की भोजन।सन् १९८६ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पुनर्गठन देने को सरकार ने फैसला किया । सरकार ने राज्य कि उन्नती की लिये ,लोकतंत्र की लिये और महिलाओं का स्थिति को सुधारने की लिये महिलाओं को शिक्षा देना ज़रूरी सम्ज था। भारत की स्वतंत्र की बाद सन् १९४७ में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग को बनाया गया सिफारिश करने की महिला कि शिक्षा में गुणवता में सुधार लिया जाए । भारत सरकार ने नूतन में ही महिला साक्षारता की लिये साक्षर भारत मिशन की शुरूआत की है इस मिशन में महिला कि अशिक्षा की दर को नीचे लाने कि कोशिश किया जाता है । बुनियादि शिक्षा उन्हें पसंद है और अपने स्वयं के जीवन और शरीर पर फैसला करने का अधिकार देने, बुनियादी स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन की समझ के साथ लड़कियों और महिलाओं को प्रदान करता है। लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा गरीबी पर काबू पाने में एक महत्वपूर्ण कदम है। कुछ परिवारों का काम कर रहे पुरुषों दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटनाओं में विकलांग हो जाते हैं। उस स्थिति में, परिवार का पूरा बोझ परिवारों की महिलाओं पर टिकी रह्ते हैं। इस ज़रूरती महिलाओं को पूरा करने के लिए उन्हे शिक्षित किया जाना चाहिए। वे विभिन्न क्षेत्रों में नियोजित किया जाना चाहिए। महिला शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों और प्रशासक के रूप में काम कर सकते हैं। शिक्षित महिलाओं अच्छी मां हैं। महिलाओं की शिक्षा से दहेज समस्या, बेरोजगारी की समस्या, आदि सामाजिक शांति को आसानी से स्थापित किया जा सकता है।

स्त्री शिक्षा की भूमिका[संपादित करें]

संस्कृत में यह उक्ति प्रसिद्ध है- ‘नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति मातृ समोगुरु:’. इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में विद्या के समान नेत्र नहीं है और माता के समान गुरु नहीं है.’ यह बात पूरी तरह सच है. बालक के विकास पर प्रथम और सबसे अधिक प्रभाव उसकी माता का ही पड़ता है.माता ही अपने बच्चे को पाठ पढ़ाती है. बालक का यह प्रारंभिक ज्ञान पत्थर पर बनी अमिट लकीर के समान जीवन का स्थायी आधार बन जाता है. लेकिन आज पूरे भारतवर्ष में इतने दरिंदे उभर आये हैं, जिन्होंने मां-बहनों का रिश्ता खत्म कर दिया है और जो भोग-विलास की जिंदगी जीना अधिक उपयोगी समझने लगे हैं. यही कारण है कि कस्बों से लेकर शहरों की मां-बहनें असुरक्षित हैं.

असुरक्षा के कारण ही बलात्कार, गैंग रेप जैसी अनेक घटनाओं के जाल में फांस कर उन्हें मछली की तरह तवे पर भूना जा रहा है. मेरा मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण है स्त्रियों में शिक्षा की कमी.हाल ही में हजारीबाग में घटी दुष्कर्म जैसी अनेक घटनाओं में आज हमें बुराई नजर आती है, तो उसके लिए अधिकांशत: जिम्मेदार मां को ही ठहराया जाता है. एक मां दुलार में छिपी अपनी अज्ञानता के कारण ही बेटे-बेटी को नये फैशन का कपड़ा, कम उम्र में मोबाइल, खर्च से अधिक पैसा देना आदि जैसे लापरवाही पर ध्यान नहीं दे पाती हैं. परिणामस्वरूप वे गलत रास्ते पर चले जाते हैं.वास्तव में कहा जाता है कि महिलाओं की शिक्षा, किसी भी पुरुष की शिक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है. उस नयी समाज की रूपरेखा तैयार करने में महिलाओं की शिक्षा-पुरुषों से सौ गुना अधिक उपयोगी है. इसलिए स्त्री शिक्षा के लिए सरकार को प्रयासरत होना चाहिए, तभी अत्याचार जैसी घटनाओं पर काबू पाया या सकता है।

लाभ[संपादित करें]

शिक्षा प्राप्त करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का अर्थ यह नहीं है कि नारी शिक्षित होकर पुरुष को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानते हुए उसके सामने ही मोर्चा लेकर खड़ी हो जाए। बल्कि वह आर्थिक क्षेत्र में भी पुरुष के बराबर समानता का अधिकार प्राप्त करके उसके साथ मैत्राीपूर्ण सम्बन्ध बनाए। जिस प्रकार शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मानसिक विकास के लिए शिक्षा आवश्यक है। अगर नारी ही शिक्षित नहीं होगी तो वह न तो सफल गृहिणी बन सकेगी और न कुशल माता। समाज में बाल-अपराध बढ़ने का कारण बालक का मानसिक रूप से विकसित न होना है। अगर एक माँ ही अशिक्षित होगी तो वह अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करके उनका मानसिक विकास कैसे कर पाएगी और एक स्वस्थ समाज का निर्माण एवं विकास सम्भव नहीं हो सकेगा। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षित नारी ही भविष्य में निराशा एवं शोषण के अन्धकार से निकलकर परिवार, समाज व राष्ट्र के विकास एवं उत्थान में अपना दायित्व सही अर्थों में स्थापित कर पाऐगी।