संस्कृतीकरण

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संस्कृतीकरण भारत में देखा जाने वाला विशेष तरह का सामाजिक परिवर्तन है। इसका मतलब है वह प्रक्रिया जिसमें जातिव्यवस्था में निचले पायदान पर स्थित जातियाँ ऊँचा उठने का प्रयास करती हैं। ऐसा करने के लिए वे उच्च या प्रभावी जातियों के रीति-रिवाज़ या प्रचलनों को अपनाती हैं। यह समाजशास्त्र की पासिंग् नामक प्रक्रिया के जैसा ही है। इस शब्द के प्रयोग को भारतीय समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने १९५० के दशक में लोकप्रिय बनाया।[1] हालाँकि इसके इससे पुराने उल्लेख भीमराव अम्बेडकर कृत कास्ट्स् इन् इन्डिया: देअर् मेकैनिज़म, जेनेसिस् एन्ड् डेवलप्मेन्ट् में मिल सकते हैं।[2] "सामाजिक सीढ़ी में ऊपर से नीचे की ओर अनुकरण के चलने" की इस प्रक्रिया के सबसे पुराने उल्लेख, एक अन्य सन्दर्भ में गैब्रियल टार्डे लिखित "द लॉज़् ऑफ़् इमिटेशन्" में मिलते हैं।[3]

परिभाषा[संपादित करें]

श्रीनिवास ने संस्कृतीकरण की परिभाषा देते हुए कहा कि "इस प्रक्रिया में निचली या मध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च या प्रायः द्विज जातियों की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो....।"[4]

संस्कृतीकरण का एक स्पष्ट उदाहरण कथित "निम्न जातियों" के लोगों द्वारा द्विज जातियों के अनुकरण में शुद्ध शाकाहार को अपनाना है, जो कि परम्परागत रूप से अशाकाहारी भोजन के विरोधी नहीं होते।

एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, संस्कृतीकरण केवल नयी प्रथाओं और आदतों का अंगीकार करना ही नहीं है, बल्कि संस्कृत वाङ्मय में विद्यमान नये विचारों और मूल्यों के साथ साक्षात्कार करना भी इसमें आ जाता है। वे कहते हैं कि कर्म, धर्म, पाप, माया, संसार, मोक्ष आदि ऐसे संस्कृत साहित्य में उपस्थित विचार हैं जो कि संस्कृतीकृत लोगों के बोलचाल में आम हो जाते हैं।[5]

यह परिघटना नेपाल में भी खास, मगर, नेवार, थारू लोगों में देखी गयी है।[6]

सिद्धान्त[संपादित करें]

श्रीनिवास ने सबसे पहले यह सिद्धान्त ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपने डी-फ़िल्. के शोधप्रबन्ध में दिया। बाद में यह सिद्धान्त एक पुस्तक के रूप में लाया गया जिसका शीर्षक था- "रिलीजन् ऍन्ड् सोसाय्टी अमङ्ग् द कूर्ग्स् ऑफ़् साउथ् इन्डिया" (१९५२ में प्रकाशित)। यह पुस्तक कर्नाटक के कोडावा समुदाय का नृतत्त्वशास्त्रीय अध्ययन थी। श्रीनिवास ने पुस्तक में लिखा:

"The caste system is far from a rigid system in which the position of each component caste is fixed for all time. Movement has always been possible, and especially in the middle regions of the hierarchy. A caste was able, in a generation or two, to rise to a higher position in the hierarchy by adopting vegetarianism and teetotalism, and by Sanskritizing its ritual and pantheon. In short, it took over, as far as possible, the customs, rites, and beliefs of the Brahmins, and adoption of the Brahminic way of life by a low caste seems to have been frequent, though theoretically forbidden. This process has been called 'Sanskritization' in this book, in preference to 'Brahminization', as certain Vedic rites are confined to the Brahmins and the two other 'twice-born' castes."[7]

इस पुस्तक ने तब चल रहे इस विचार को चुनौती दी कि जाति एक दृढ़ और अपरिवर्तनशील संस्था है। संस्कृतीकरण की अवधारणा ने जातियों की जटिलता आदि विषयों में मदद की। साथ ही इसने भारत में विभिन्न जातियों और समुदायों द्वारा अपने दर्जे पर पुनर्विचार करवाने की गतिकी को भी अकादमिक प्रकाश में ला दिया।

वर्तनी[संपादित करें]

हिन्दी में कई स्थानों पर इस अवधारणा के लिए संस्कृतिकरण शब्द का प्रयोग भी किया जाता है, जो कि संस्कृत नियमों की दृष्टि से अशुद्ध रूप है। संस्कृतीकरण ही व्याकरणसम्मत रूप है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]


टीका-टिप्पणियाँ[संपादित करें]

  1. Charsley, S. (1998) "Sanskritization: The Career of an Anthropological Theory" Contributions to Indian Sociology 32(2): p. 527 citing Srinivas, M.N. (1952) Religion and Society Amongst the Coorgs of South India Clarendon Press, Oxford. See also, Srinivas, M. N.; Shah, A. M.; Baviskar, B. S.; and Ramaswamy, E. A. (1996) Theory and method: Evaluation of the work of M.N. Srinivas Sage, New Delhi, ISBN 81-7036-494-9
  2. Jaffrelot (2005), pp. 33, notes that "Ambedkar advanced the basis of one of the most heuristic of concepts in modern Indian Studies—the Sanskritization process—that M. N. Srinivas was to introduce 40 years later."
  3. Tarde 1899
  4. N. Jayapalan (2001). Indian society and social institutions. Atlantic Publishers & Distri. प॰ 428. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7156-925-0. http://books.google.com/books?id=AumuJ2jtRZIC&pg=PA428. अभिगमन तिथि: 17 January 2013. 
  5. Srinivas, Mysore Narasimhachar (1962) Caste in Modern India: And other essays Asia Publishing House, Bombay, page 48, OCLC 5206379
  6. Guneratne, Arjun (2002). Many tongues, one people: the making of Tharu identity in Nepal. Ithaca, New York: Cornell University Press. http://books.google.com/books?id=T7FWQ6dzYZQC&lpg=PP1&dq=guneratne%20arjun&pg=PP1#v=onepage&q&f=false. अभिगमन तिथि: April 11, 2011. 
  7. Srinivas, M.N. (1952) Religion and Society Amongst the Coorgs of South India Clarendon Press, Oxford, page 32, OCLC 15999474

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]