वीडियो कम्प्रेशन (वीडियो संपीडन)

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वीडियो कम्प्रेशन का अभिप्राय डिजिटल वीडियो छवियों को दर्शाने वाले डेटा (आंकड़े) की मात्रा कम किये जाने से है, और यह छवियों द्वारा लिए गए स्थान का संकुचन तथा सामयिक रूप से गति के प्रतिकरण का संयोजन है. वीडियो कम्प्रेशन सोर्स कोडिंग की अवधारणा तथा सूचना सिद्धांत का एक उदाहरण है. यह लेख वीडियो कम्प्रेशन के अनुप्रयोगों से सम्बंधित है: संकुचित वीडियो, वीडियो को प्रसारित करने में लगने वाली बैंडविथ को प्रभावी ढंग से कम कर सकता है, चाहे वह धरती पर होने वाले ब्रॉडकास्ट के ज़रिये हो, केबल टीवी अथवा उपग्रहीय टीवी सेवाओं से हो.

वीडियो की गुणवत्ता[संपादित करें]

अधिकांश वीडियो कम्प्रेशन हानिपूर्ण होते हैं - यह इस अवधारणा पर आधारित है कि यह आवश्यक नहीं है कि संकुचन से पहले उपलब्ध अधिकांश डेटा बोधात्मक रूप से अच्छी गुणवत्ता के लिए आवश्यक ही हो. उदाहरण के लिए, डीवीडी एक वीडियो कोडन मानक का उपयोग करता है जिसे एमपीईजी-2 कहा जाता है और जो 2 घंटों के वीडियो डेटा को 15 से 30 गुना संकुचित कर सकता है और इसके बाद भी जो छवि गुणवत्ता प्राप्त होती है वह साधारण व्याख्या के आधार पर उच्च गुणवत्ता की ही मानी जाती है. वीडियो कम्प्रेशन, डिस्क स्थान, वीडियो गुणवत्ता तथा वीडियो से उचित समय के भीतर कम्प्रेशन हटाने के लिए आवश्यक हार्डवेयर की कीमत के बीच की किया जाने वाला एक प्रकार का सौदा है. हालांकि, अगर वीडियो हानिपूर्ण ढंग से अति-संकुचित है, दृश्य (और कभी कभी ध्यान भंग करने वाले) विशिष्ट लक्षण प्रकट हो सकते हैं.

वीडियो संपीड़न विशिष्ट रूप से अगल-बगल के पिक्सलों के वर्गाकार समूहों पर संचालित होता है जिन्हें मेक्रोब्लॉक्स कहा जाता है. पिक्सलों के ये समूह या ब्लॉक की अगले फ्रेम से तुलना करके वीडियो संकुचन कॉडेक (कोडन/विकोडन पद्धति) द्वारा सिर्फ इन ब्लॉकों में परिवर्तित पिक्सेल ही भेजे जाते हैं. अगर वीडियो में गति न हो तो यह बहुत अच्छी तरह से काम करता है. उदाहरण के लिए टेक्स्ट का एक गतिहीन फ्रेम बहुत कम स्थानांतरित डेटा के साथ दोहराया जा सकता है. तथा अधिक गति वाले वीडियो में, एक फ्रेम से अगले फ्रेम में अधिक पिक्सेल परिवर्तित होते हैं. जब अधिक पिक्सल परिवर्तित होते हैं, वीडियो कम्प्रेशन योजना को बड़ी संख्या में परिवर्तनशील पिक्सलों को बनाये रखने के लिए अधिक मात्रा में डेटा भेजना पड़ता है. यदि वीडियो सामग्री में कोई विस्फोट, हजारों चिड़ियाओं का झुण्ड अथवा ऐसी ही कोई अन्य छवि, जिसमें उच्च-आवृत्ति का ब्यौरा आदि शामिल हो, तो या तो गुणवत्ता कम हो जाएगी अथवा गुणवत्ता बनाये रखने के लिए परिवर्तनशील बिटरेट को बढ़ा देना होगा जिससे इस बढ़ी हुई सूचना की आपूर्ति की जा सके, और ब्यौरे के स्तर को बनाये रखा जा सके.

इससे पहले कि उसे वितरण प्रणाली को भेजा जाये, प्रोग्रामिंग प्रदाता अपने वीडियो पर लागू होने वाले कम्प्रेशन की मात्रा पर नियंत्रण करता है. डीवीडी, ब्लू-रे डिस्क और एचडी डीवीडी की मास्टरिंग प्रक्रिया के दौरान उनपर वीडियो कम्प्रेशन किया जाता है, हालांकि ब्लू-रे व एचडी डीवीडी में स्थान काफी अधिक होने के कारण उनपर किये जाने वाले संकुचन को कम रखा जाता है, इसके विपरीत स्ट्रीम वीडियो जैसे इंटरनेट तथा सेलफोन पर संकुचन काफी अधिक होता है. हार्ड ड्राइव या ऑप्टिकल डिस्क पर वीडियो संचित करने वाले सॉफ्टवेयर द्वारा तैयार वीडियो की गुणवत्ता अधिकांशतः कम होती है, हालांकि सभी मामलों में ऐसा नहीं है. निर्माण उपरांत कार्य के लिए उच्च बिटरेट वाले वीडियो कॉडेक, जिनमें संकुचन का स्तर बहुत कम अथवा नहीं के बराबर होता है, उपलब्ध हैं, पर उनसे प्राप्त फाइलों का आकार बहुत बड़ा होता है अतः उनका प्रयोग वितरण के लिए तैयार वीडियो के रूप में नहीं किया जाता है. यदि एक बार अत्यधिक हानिपूर्ण कम्प्रेशन के साथ वीडियो तैयार हो जाये, जिसमें छवि की गुणवत्ता से समझौता किया गया हो, तो उससे मूल गुणवत्ता वाले वीडियो की छवि प्राप्त करना असंभव होता है.

सिद्धांत[संपादित करें]

वीडियो मूलतः रंगीन पिक्सलों की त्रि-आयामी सारणी है. दो आयाम चलचित्रों के स्थानिक (क्षैतिज तथा लम्बवत) निर्देशों की पूर्ती करते हैं, तथा तीसरा आयाम समय प्रक्षेत्र को निरूपित करता है. डेटा फ्रेम उन सभी पिक्सलों का समूह होता है जो समय की एक इकाई में प्रक्षेपित होते हैं. मूलतः, फ्रेम एक स्थिर छवि के ही सामान होता है.

वीडियो डेटा में स्थानिक और सामयिक अतिरिक्तता (रिडनडेंसी) शामिल होती है. इस प्रकार समानता कोडन करने के लिए फ्रेमों के बीच के अंतर (स्थानिक) तथा फ्रेमों के बीच के समयांतर (सामयिक) को पंजीबद्ध कर लिया जाता है. एक तथ्य यह है कि मानवीय आंख रंग में छोटे अंतरों को नहीं देख पाती, परन्तु चमक (ब्राइटनेस) में अंतर को देख लेती हैं, और इसी का फायदा उठाते हुए स्थानिक एन्कोडिंग की जाती है, इसमें मिलते-जुलते रंगों के क्षेत्रों को "औसत किया" जाता है (जेपीईजी छवि संपीड़न अकसर किये गए सवाल, भाग 1/2). जब फ्रेमों की श्रेणी में बड़ी संख्या में पिक्सेल समान ही होते हैं, तब स्थानिक कम्प्रेशन में सिर्फ परिवर्तित पिक्सलों का ही कोडन किया जाता है.

हानिरहित कम्प्रेशन[संपादित करें]

डेटा कम्प्रेशन के कुछ रूप हानिरहित होते हैं. इसका अर्थ यह है कि जब डेटा डिकम्प्रेस किया जाता है, तब परिणाम तथा मूलप्रति के बीच प्रत्येक बिट सामान होता है. यद्यपि विडियो का हानिहीन कम्प्रेशन संभव है, इसका प्रयोग विरले ही किया जाता है, क्योकि हानिपूर्ण कम्प्रेशन में स्वीकार्य गुणवत्ता कहीं अधिक संकुचन अनुपात के साथ प्राप्त हो जाती है.

इंट्राफ्रेम बनाम इंटरफ्रेम कम्प्रेशन[संपादित करें]

विडियो के संकुचन की सबसे शक्तिशाली तकनीकों में से एक इंटरफ्रेम कम्प्रेशन है. इंटरफ्रेम कम्प्रेशन एक या अधिक पिछले अथवा अगले फ्रेमों का प्रयोग वर्तमान फ्रेम के संकुचन के लिए करता है जबकि इंट्राफ्रेम कम्प्रेशन सिर्फ वर्तमान फ्रेम को ही संकुचित करता है, इस प्रकार यह एक प्रभावी छवि कम्प्रेशन है.

सबसे अधिक प्रचलित विधि प्रत्येक फ्रेम को विडियो के पिछले फ्रेम से तुलना कर संकुचित करने की है. यदि फ्रेम में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां कोई बदलाव नहीं आ रहा हो, तो कम्प्रेशन प्रणाली एक छोटा निर्देश देकर पिछले फ्रेम से उन्ही हिस्सों को बिट-वार ढंग से अगले में प्रयोग कर लेती है. यदि फ्रेम के हिस्से साधारण ढंग से चल रहे हों, तो कम्प्रेशर निर्देश (थोडा लम्बा) देकर प्रतिरूप को स्थानांतरण, घुमा कर, हल्का अथवा गहरा करके - लम्बे निर्देश के द्वारा समायोजित कर देता है, हालांकि यह फिर भी इंट्राफ्रेम से छोटा ही होता है. इंटरफ्रेम कम्प्रेशन उन प्रोग्रामों के लिए तो अच्छा कार्य करता है जो दर्शक द्वारा सिर्फ देखे जाते हैं, पर यदि विडियो के हिस्से सम्पादित किये जाने हों, तो यह कम्प्रेशन समस्या पैदा करता है.

चूंकि इंटरफ्रेम कम्प्रेशन में एक फ्रेम से दूसरे में डेटा कापी किया जाता है, इसलिए यदि मूल फ्रेम खो जाये (अथवा प्रसारण के दौरान ख़राब हो जाये), उसपर आधारित अन्य फ्रेमों को ठीक तरह से नहीं बनाया जा सकेगा. कुछ वीडिओ प्रारूप, जैसे कि डीवी (DV) इंट्राफ्रेम कम्प्रेशन का प्रयोग करते हुए प्रत्येक फ्रेम को स्वतंत्र रूप से संकुचित करते हैं. इंट्राफ्रेम द्वारा संकुचित वीडियो में 'कट' बनाना लगभग उतना ही आसान है जितना कि असंकुचित वीडियो का संपादन - इसके लिए सिर्फ प्रक्येक फ्रेम का प्रारंभ तथा अंत खोज कर, उन फ्रेमों को जिन्हें रखना चाहते हों, बिट-वार ढंग से कॉपी कर लिया जायेगा, तथा जिन्हें नहीं रखना हो, उन्हें त्याग दिया जायेगा. इंट्राफ्रेम और इंटरफ्रेम कम्प्रेशन के बीच एक और अंतर यह है कि इंट्राफ्रेम सिस्टम में, प्रत्येक फ्रेम के डेटा का आकार एक समान ही होता है. अधिकांश इंटरफ्रेम प्रणालियों में कुछ फ्रेम (उदाहरण के लिए एमपीईजी-2 का "आई फ्रेम") अन्य फ्रेमों से डेटा कॉपी नहीं कर पाते हैं अतः उन्हें अपने नज़दीक के अन्य फ्रेमों की तुलना में अधिक डेटा की आवश्यकता होती है.

यह संभव है कि ऐसा कप्यूटर आधारित वीडियो संपादन टूल बनाया जा सके जो इस परेशानी का पता लगा सके कि जब अन्य फ्रेमों को आई फ्रेम की आवश्यकता हो, तो उसे सम्पादित न किया जा रहा हो. इसकी वजह से ही संपादन के लिए प्रयोग किये जाने वाले अन्य नए फॉर्मेट्स जैसे एचडीवी (HDV) बन पाए हैं. हालांकि, सामान गुणवत्ता वाले इंट्राफ्रेम कम्प्रेस वीडियो के संपादन की तुलना में इस प्रक्रिया में कहीं अधिक कम्प्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है.

मौजूदा प्रकार[संपादित करें]

आजकल लगभग सभी सामान्य रूप से प्रयुक्त वीडियो कम्प्रेशन प्रक्रियाएं (उदाहरण के लिए वे मानक जो आईटीयू-टी अथवा आईएसओ द्वारा मान्य हैं) स्थानिक अतिरिक्तता को कम करने के लिए डिस्क्रीट कौन्साइन ट्रांसफॉर्म (डीसीटी) का प्रयोग करते हैं. अन्य तरीके, जैसे कि फ्रैक्टल कम्प्रेशन, मैचिंग परस्यू तथा डिस्क्रीट वेवलेट ट्रांसफॉर्म (डीडब्ल्यूटी) फ़िलहाल शोध का विषय हैं तथा व्यावहारिक उत्पादों में अभी शामिल नहीं किये गए हैं (वेवलेट कोडिंग को छोड़कर, जिसका प्रयोग स्थिर-छवि कोडकों में, गति सम्पूर्ति के बिना किया जाता है). फ्रैक्टल कम्प्रेशन (आंशिक संपीडन) में लोगों की रूचि कम होती जा रही है, ऐसा इसलिए है क्योंकि सैद्धांतिक विश्लेषण से ऐसे तरीकों में प्रभावहीनता का पता चला है.[तथ्य वांछित]

समय रेखा (टाइमलाइन)[संपादित करें]

निम्न तालिका अंतरराष्ट्रीय वीडियो दबाव मानकों का एक आंशिक इतिहास है.

वीडियो दबाव मानक का इतिहास
वर्ष मानक प्रकाशक लोकप्रिय कार्यान्वयन
1984 एच.120 आईटीयू (ITU)- टी
1990 एच.261 आईटीयू (ITU)- टी वीडियो सम्मेलन, वीडियो दूरभाषी
1993 एमपीईजी-1 (MPEG-1) भाग 2 आईएसओ (ISO), आईईसी (IEC) वीडियो-सीडी
1995 एच.262/एमपीईजी-2 (MPEG-2) भाग 2 आईएसओ (ISO), आईईसी (IEC) आईटीयू (ITU)- टी डीवीडी (DVD) वीडियो, ब्लू-रे, डिजिटल वीडियो प्रसारण, एसवीसीडी (SVCD)
1996 एच.263 आईटीयू (ITU)- टी वीडियो सम्मेलन, वीडियो दूरभाषी, मोबाइल फोन्स पर वीडियो (3 जीपी GP)
1999 एमपीईजी-4 (MPEG-4) भाग 2 आईएसओ (ISO), आईईसी (IEC) इंटरनेट पर वीडियो (डिवएक्स, एक्सविद ...)
2003 एच.264/एमपीईजी-4 (MPEG-4) एवीसी (AVC) आईएसओ (ISO), आईईसी (IEC) आईटीयू (ITU)- टी ब्लू-रे, डिजिटल वीडियो प्रसारण, आइपॉड वीडियो, एचडी (HD) डीवीडी (DVD)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • वीडियो की गुणवत्ता
  • व्यक्तिपरक वीडियो गुणवत्ता
  • वीडियो कोडिंग
  • वीडियो दबाव चित्र प्रकार
  • डी-फ्रेम
  • वीसी-1

बाहरी लिंक्स[संपादित करें]

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