विक्रमादित्य

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गुप्त राजा के लिए, चंद्रगुप्त II विक्रमादित्य देखें

विक्रमादित्य संस्कृत: विक्रमादित्य (ई.पू.102 से 15 ईस्वी तक) उज्जैन, भारत के अनुश्रुत राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे. "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें उल्लेखनीय हैं गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे). राजा विक्रमादित्य नाम, विक्रमvikrama यानी "शौर्य" और आदित्य[[|Āditya]] , यानी अदिति के पुत्र के अर्थ सहित संस्कृत का तत्पुरुष है. अदिति अथवा आदित्या के सबसे प्रसिद्ध पुत्रों में से एक हैं देवता सूर्य, अतः विक्रमादित्य का अर्थ है सूर्य, यानी "सूर्य के बराबर वीरता (वाला)". उन्हें विक्रम या विक्रमार्क भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है).

विक्रमादित्य ईसा पूर्व पहली सदी के हैं. कथा सरित्सागर के अनुसार वे उज्जैन परमार वंश के राजा महेंद्रादित्य के पुत्र थे. हालांकि इसका उल्लेख लगभग 12 शताब्दियों के बाद किया गया था. इसके अलावा, अन्य स्रोतों के अनुसार विक्रमादित्य को दिल्ली के तुअर राजवंश का पूर्वज माना जाता है.[1][2][3][4][5]

हिन्दू शिशुओं में विक्रम नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाओं की दो श्रृंखलाओं को दिया जा सकता है.

अनुक्रम

जैन मुनि की कथा [संपादित करें]

कालकाचर्या और शक राजा (कालकाचर्या कथा-पांडुलिपि), छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय, मुंबई.

अभिलखित रूप में ऐसे किसी राजा की संभावना को कालकाचार्य कथानक में देखा जा सकता है, जो महेसर सूरी नामक जैन मुनि की कृति है (संभवतः लगभग बारहवीं सदी के आस-पास - कहानी काफ़ी बाद की और कालक्रमानुसार ग़लत है). कथानक (यानी, "वृत्तांत") एक प्रसिद्ध जैन मुनि कालकाचार्य की कहानी है. उसमें उल्लेख है कि तत्कालीन उज्जैन के शक्तिशाली राजा गर्धभिल्ला ने सरस्वती नामक एक योगिनी का अपहरण किया, जो मुनि की बहन थी. नाराज़ मुनि ने शकस्थान के एक शाही शक शासक से मदद मांगी. अनेक बाधाओं के बावजूद (लेकिन चमत्कारों की मदद से) शक राजा ने गर्धभिल्ला को पराजित किया और उसे बंदी बना लिया. सरस्वती को स्वदेश भेज दिया गया. हालांकि स्वयं गर्धभिल्ला को माफ़ किया गया. पराजित राजा जंगल चले गए, जहां एक बाघ ने उन्हें मार दिया. उनके पुत्र विक्रमादित्य को, जंगल में पालन-पोषण होने के कारण, प्रतिष्ठान (आधुनिक महाराष्ट्र) से शासन करना पड़ा. बाद में विक्रमादित्य ने उज्जैन पर आक्रमण किया और शकों को हरा दिया और इस अवसर के स्मरणार्थ उन्होंने एक नए युग की शुरूआत की, जिसे विक्रम संवत् कहा गया.

विक्रमादित्य की पौराणिक कथा [संपादित करें]

अनुश्रुत विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है. उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है, जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों, हालांकि उनके इर्द-गिर्द कहानियों का पूरा चक्र फला-फूला है. संस्कृत की सर्वाधिक लोकप्रिय दो कथा-श्रृंखलाएं हैं वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाच की 25 कहानियां") और सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासन की 32 कहानियां" जो सिहांसन बत्तीसी के नाम से भी विख्यात हैं). इन दोनों के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में कई रूपांतरण मिलते हैं.

पिशाच (बेताल) की कहानियों में बेताल, पच्चीस कहानियां सुनाता है, जिसमें राजा बेताल को बंदी बनाना चाहता है, और वह राजा को उलझन पैदा करने वाली कहानियां सुनाता है और उनका अंत राजा के समक्ष एक प्रश्न रखते हुए करता है. वस्तुतः पहले एक साधु, राजा से विनती करते हैं कि वे बेताल से बिना कोई शब्द बोले उसे उनके पास ले आएं, नहीं तो बेताल उड़ कर वापस अपनी जगह चला जाएगा. राजा केवल उस स्थिति में ही चुप रह सकते थे, जब वे उत्तर न जानते हों, अन्यथा राजा का सिर फट जाता. दुर्भाग्यवश, राजा को पता चलता है कि वे उसके सारे सवालों का जवाब जानते हैं; इसीलिए विक्रमादित्य को उलझन में डालने वाले अंतिम सवाल तक, बेताल को पकड़ने और फिर उसके छूट जाने का सिलसिला चौबीस बार चलता है. इन कहानियों का एक रूपांतरण कथा-सरित्सागर में देखा जा सकता है.

सिंहासन के क़िस्से, विक्रमादित्य के उस सिंहासन से जुड़े हुए हैं जो खो गया था, और कई सदियों बाद धार के परमार राजा भोज द्वारा बरामद किया गया था. स्वयं राजा भोज भी काफ़ी प्रसिद्ध थे और कहानियों की यह श्रृंखला उनके सिंहासन पर बैठने के प्रयासों के बारे में है. इस सिंहासन में 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो बोल सकती थीं, और राजा को चुनौती देती हैं कि राजा केवल उस स्थिति में ही सिंहासन पर बैठ सकते हैं, यदि वे उनके द्वारा सुनाई जाने वाली कहानी में विक्रमादित्य की तरह उदार हैं. इससे विक्रमादित्य की 32 कोशिशें (और 32 कहानियां) सामने आती हैं और हर बार भोज अपनी हीनता स्वीकार करते हैं. अंत में पुतलियां उनकी विनम्रता से प्रसन्न होकर उन्हें सिंहासन पर बैठने देती हैं.

विक्रम और शनि [संपादित करें]

शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है. कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था. अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी. ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की. समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है. लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था. इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं. विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था. जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधिक हो गए. उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे. जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है. विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं.

एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है. घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था. इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है. विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया. दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया. विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे. जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया. उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं. चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे. ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.

किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए. जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी. जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई. लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है, और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया. बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी. धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी. उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया. वह सो गई. जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है. जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं. उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है.

विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया. राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया. उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं. वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं. उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं. वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं.

एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है. वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं. इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा. वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है. राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है. वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं. उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है. अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं. वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था. शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं. विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें. वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे. शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे. राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं. उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं. वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है. विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं.

नौ रत्न और उज्जैन में विक्रमादित्य का दरबार [संपादित करें]

भारतीय परंपरा के अनुसार धनवंतरी, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि, और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे. कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे.

कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे. वरामिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी. वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे. माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति -प्रदीप" (Niti-pradīpa सचमुच "आचरण का दीया") का श्रेय दिया है.

विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि

धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः। ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।

विक्रम संवत् (विक्रम युग) [संपादित करें]

भारत और नेपाल की हिंदू परंपरा में व्यापक रूप से प्रयुक्त प्राचीन पंचाग हैं विक्रम संवत् या विक्रम युग. कहा जाता है कि ईसा पूर्व 56 में शकों पर अपनी जीत के बाद राजा ने इसकी शुरूआत की थी.

संदर्भ [संपादित करें]

  • द कथा सरित सागर, या ओशन ऑफ़ द स्ट्रीम्स ऑफ़ स्टोरी , सी.एच टॉने द्वारा अनूदित, 1880
  • विक्रम एंड द वैम्पायर रिचर्ड आर. बर्टन द्वारा अनूदित, 1870
  • द इनरोड्स ऑफ़ द स्काइथियंस इनटू इंडिया, एंड द स्टोरी ऑ कलकाचार्य , रॉयल एशियाटिक सोसायटी की मुंबई शाखा की पत्रिका, VVol. IX, 1872
  • विक्रमाज़ एडवेंचर्स ऑर द थर्टी-टू टेल्स ऑफ़ द थ्रोन , संस्कृत मूल के चार अलग संपादित पाठ संशोधन (विक्रम-चरित या सिंहासन-द्वात्रिंशिका), फ्रेंकलिन एजरटॉन द्वारा अनूदित, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1926.

इन्हें भी देखें [संपादित करें]

नोट [संपादित करें]

  1. एस्सेस ऑन इंडियन एंटिक्वीटीज़ , जेम्स प्रिंसेप, एडवर्ड थॉमस, हेनरी थोबे प्रिंसेप, जे. मरे द्वारा, 1858, पृ.250
  2. प्री- मुसलमान इंडिया , एम. एस. नटेसन, एशियन एज्युकेशनल सर्विसज़ 2000, पृ.131
  3. द साइक्लोपीडिया ऑफ इंडिया एंड सदर्न एशिया , एडवर्ड बाल्फ़ोर, बी. क्वारिच द्वारा, 1885, पृ.502
  4. एनल्स एंड एंटिक्वीटीज़ , जेम्स टॉड, विलियम क्रूक द्वारा, 1920, पृ.912
  5. एस्सेस ऑन इंडियन एंटिक्वीटीज़, हिस्टोरिक, न्युमिसमेटिक, एंड पेलियोग्राफ़िक, ऑफ द लेट जेम्स प्रिंसेप , जेम्स प्रिंसेप, एडवर्ड थॉमस, हेनरी थोबे प्रिंसेप, प्रका. जे. मरे द्वारा, 1858, पृ.157