बावड़ी

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फतेहपुर, शेखावाटी की एक बावड़ी का दृश्य।
चित्र:Rani Ki Vav, Above View.jpg
विश्व धरोहर स्थल, रानी की वाव, पाटण, गुजरात

बावड़ी या बावली सीढ़ीदार कुँए या तालाबों को कहते हैं। इनके जल तक सीढ़ियों के सहारे आसानी से पहुँचा जा सकता है। भारत में बावड़ियों के निर्माण और उपयोग का लम्बा इतिहास है। कन्नड में बावड़ियों को 'कल्याणी' या पुष्करणी, मराठी में 'बारव' तथा गुजराती में 'वाव' कहते हैं। संस्कृत के प्राचीन साहित्य में इसके कई नाम हैं, एक नाम है-वापी| इनका एक नाम 'दीर्घा' भी था- जो बाद में 'गेलेरी' के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। दूर से देखने पर ये तलघर के रूप में बनी किसी बहुमंजिला हवेली जैसी दृष्टिगत होती हैं।

इतिहास[संपादित करें]

बावड़ियों को सर्वप्रथम हिन्दुओं द्वारा (जनोपयोगी शिल्पकला के रूप में) विकसित किया गया और उसके पश्चात मुस्लिम शासकों ने भी इसे अपनाया।[1] बावड़ी-निर्माण की परम्परा कम से कम छठी शताब्दी में गुजरात के दक्षिण-पश्चिमी भाग में आरम्भ हो चुकी थी। धीरे-धीरे ऐसे कई निर्माण-कार्य उत्तर की ओर विस्तार करते हुए राजस्थान में बढ़े । अपनी पुस्तक 'राजस्थान की रजत बूँदें' (प्रकाशक: गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली) में अनुपम मिश्र ने राजस्थान की बावड़ियों के इतिहास, शिल्प-पक्ष और इनकी सामाजिक-उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला है| बावड़ी-निर्माण का यह कार्य ११वीं से १६वीं शताब्दी में अपने पूर्ण चरम पर रहा।[1]

स्थापत्य कला[संपादित करें]

बावड़ियाँ सुरक्षा के लिए ढकी हुई भी हो सकती हैं खुली भी पर स्थापत्य और उपयोगिता की दृष्टि से दोनों ही तरह की बावड़ियाँ महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान की चाँद बावड़ी और गुजरात में अडालज की बावड़ी इसके महत्वपूर्ण उदाहरणों में से हैं। चाँद बावड़ी का निर्माण ९वीं शताब्दी में आभानेरी के संस्थापक राजा चंद्र ने कराया था। यह दौसा जिले की बाँदीकुई तहसील के आभानेरी नामक ग्राम में स्थित है। बावड़ी १०० फीट गहरी है। इस बाव़डी के तीन तरफ सोपान और विश्राम घाट बने हुए हैं। इस बावड़ी की स्थापत्य कला अद्भुत है। यह भारत की सबसे बड़ी और गहरी बावड़ियों में से एक है। इसमें ३५०० सीढ़ियां हैं। [2] टोंक जिले में टोडारायसिंह की 'रानी जी की बावडी' और बूंदी में 'हाडी रानी की बावडी' राजस्थान की विशालतर बावडियों में से हैं।

राजस्थान के टोंक जिले के कस्बे टोडारायसिंह में स्थित 'रानी जी की बावड़ी' जिसका निर्माण, नमक का अंतर्राज्यीय व्यापार करने वाले धनाढ्य बंजारों ने करवाया था!

विश्व धरोहर[संपादित करें]

जून 2014 में गुजरात के पाटण में स्थित रानी की वाव को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया।[3] यूनेस्को ने इसे तकनीकी विकास का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण मानते हुए मान्यता प्रदान की है जिसमें जल-प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था और भूमिगत जल का इस्तेमाल इस खूबी के साथ किया गया है कि व्यवस्था के साथ इसमें एक सौंदर्य भी झलकता है। रानी की वाव समस्त विश्व में ऐसी इकलौती बावली है जो विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई है जो इस बात का सबूत है कि प्राचीन भारत में जल-प्रबंधन की व्यवस्था कितनी बेहतरीन थी।[3]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

. Basham, A.L. 1967. 'The Wonder that Was India', Fontana, London, and Rupa & Co., Calcutta.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. डेविस, फिलिप (1989). The Penguin guide to the monuments of India. लंदन: विकिंग (Viking). आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-14-008425-8. 
  2. "फोटो: चाँद बावड़ी स्टेपवेल, राजस्थान।". बीबीसी. 2010. http://www.bbc.co.uk/programmes/b00qhqr8. अभिगमन तिथि: 27 जून 2013. 
  3. http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=28416