बावड़ी

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फतेहपुर, शेखावाटी की एक बावड़ी का दृश्य। इस बावड़ी को 2005 में प्रदर्शित फ़िल्म पहेली में दिखाया गया है।

बावड़ी या बावली सीढ़ीदार कुँए या तालाबों को कहते हैं। इनके जल तक सीढ़ियों के सहारे आसानी से पहुँचा जा सकता है। भारत में बावड़ियों के निर्माण और उपयोग का लम्बा इतिहास है। कन्नड में बावड़ियों को 'कल्याणी' या पुष्करणी, मराठी में 'बारव' तथा गुजराती में 'वाव' कहते हैं। दूर से देखने पर ये तलघर के रूप में बनी हवेली जैसी दृष्टिगत होती हैं।

इतिहास[संपादित करें]

बावड़ियों को सर्वप्रथम हिन्दुओं द्वारा कला के रूप में काम में लिया गया और उसके पश्चात मुस्लिम शासको ने भी इसे अपनया।[1] बावड़ी निर्माण का कार्य कम से कम छटी शताब्दी में आरम्भ हो चुका था गुजरात के दक्षिण-पश्चिमी भाग में हुआ। धीरे-धीरे कार्य उत्तर की ओर विस्तार करते हुए राजस्थान में बढ़ा। यह कार्य ११वीं से १६वीं शताब्दी में अपने पूर्ण चरम पर रहा।[1]

स्थापत्य कला[संपादित करें]

बावड़ियाँ सुरक्षा के लिए ढकी हुई भी हो सकती हैं और स्थापत्य की दृष्टि से भी बावड़ियाँ महत्वपूर्ण हैं। चाँद बावड़ी और अडालज की बावड़ी इसके महत्वपूर्ण उदाहरणों में से हैं। चाँद बावड़ी का निर्माण ९वीं शताब्दी में आभानेरी के संस्थापक राजा चंद्र ने कराया था। यह दौसा जिले की बाँदीकुई तहसिल के आभानेरी नामक ग्राम में स्थित इस यह बावड़ी १०० फीट गहरी है। इस बाव़डी के तीन तरफ सोपान और विश्राम घाट बने हुए हैं। इस बावड़ी की स्थापत्य कला अद्भूत है। यह भारत की सबसे बड़ी और गहरी बावड़ियो में से एक है। इसमें ३५०० सिढ़ियाँ हैं।[2]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. डेविस, फिलिप (1989). The Penguin guide to the monuments of India. लंदन: विकिंग (Viking). आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-14-008425-8. 
  2. "फोटो: चाँद बावड़ी स्टेपवेल, राजस्थान।". बीबीसी. 2010. http://www.bbc.co.uk/programmes/b00qhqr8. अभिगमन तिथि: 27 जून 2013. 

इन्हें भी देखें[संपादित करें]