बाकू आतेशगाह

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बाकू आतेशगाह की दीवारों में जड़ा एक शिलालेख, जिसकी पहली पंक्ति 'श्री गणेसाय नमः' से शुरू होती है और दूसरी ज्वालाजी (जवालाजी) को स्मरण करती है। इसपर विक्रम संवत १८०२ की तिथि है जो १७४५-४६ ईसवी के बराबर है और इस्लामी हिजरी कैलंडर में ११५८ (١١٥٨) की तिथि भी १७४५ ईसवी से मेल खाती है। इसपर लिखी फ़ारसी में कुछ ग़लतियाँ हैं लेकिन यह भी 'आतिश' (آتش) यानि अग्नि का ज़िक्र करती है।
बाकू आतेशगाह का मंदिर और उसके इर्द-गिर्द का क्षेत्र
बाकू आतेशगाह पर छपा सन् १९१९ का एक अज़रबैजानी डाक टिकट

बाकू आतेशगाह या ज्वाला मंदिर अज़रबेजान की राजधानी बाकू के पास के सुराख़ानी शहर में स्थित एक मध्यकालीन हिन्दू धार्मिक स्थल है। इसमें एक पंचभुजा (पेंटागोन) अकार के अहाते के बीच में एक मंदिर है। बाहरी दीवारों के साथ कमरे बने हुए हैं जिनमें कभी उपासक रहा करते थे। बाकू आतेशगाह का निर्माण १७वीं और १८वीं शताब्दियों में हुआ था और १८८३ के बाद इसका इस्तेमाल तब बंद हो गया जब इसके इर्द-गिर्द ज़मीन से पेट्रोल और प्राकृतिक गैस निकालने का काम शुरू किया गया। १९७५ में इसे एक संग्राहलय बना दिया गया और अब इसे देखने हर वर्ष १५,००० सैलानी आते हैं। २००७ में अज़रबेजान के राष्ट्रपति के आदेश से इसे एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक-वास्तुशिल्पीय आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।[1]

शब्दोत्पत्ति[संपादित करें]

फ़ारसी में 'आतिश' (آتش) का अर्थ 'आग' होता है और इसे ईरानी लहजे में 'आतेश' उच्चारित करते हैं। यह हिन्दी में भी 'आतिशबाज़ी' जैसे शब्दों में मिलता है। 'गाह' (گاه) शब्द का अर्थ 'सिंहासन', 'बिस्तर' या 'घर' होता है, जैसे की 'ईदगाह', 'ख़्वाबगाह' (सोने का कमरा), 'बंदरगाह', इत्यादि। 'आतिशगाह' का मतलब 'आग का घर या सिंहासन' है।

विवरण[संपादित करें]

सुराख़ानी शहर अज़रबेजान के आबशेरोन प्रायद्वीप पर स्थित है जो कैस्पियन सागर से लगता है। यहाँ की ज़मीन से तेल रिसता रहता है और स्वयं ही कुछ स्थानों पर स्वयं ही आग भड़क जाती है। इस कारण से यह आग को पवित्र मानने वाले पारसी धर्म के अनुयायियों के लिए सदियों से धर्म-भूमि रही है।

हिन्दू स्थल[संपादित करें]

कुछ विद्वानों का सोचना है कि यह सम्भव है कि ईरान पर इस्लामी क़ब्ज़े से पहले इस जगह पर एक पारसी मंदिर रहा हो। एक लेखक ने कहा है कि "ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार, १७वीं सदी के अंत में सुराख़ानी में भारतीय आतिशगाह बनने से पहले स्थानीय लोग भी इस 'सात छिद्रों कि जलती ज्वालाओं' के स्थान पर पूजा किया करते थे"। अग्नि को हिन्द-ईरानी की हिन्दू वैदिक धर्म और पारसी धर्म की दोनों शाखाओं में पवित्र माना जाता है - हिन्दू लोग इसे 'अग्नि' कहते हैं और पारसी लोग इसके लिए 'आतर' सजातीय शब्द प्रयोग करते हैं।[2][3] इस कारणवश विवाद रहा है कि आतेशगाह एक हिन्दू मंदिर है या पारसी आतिशकदा। मंदिर के ऊपर चढ़ा त्रिशूल वैसे तो हिन्दू धर्म कि निशानी होती है[4] और पारसी विद्वानों ने इसकी जांच करके इसे एक हिन्दू स्थल बताया है,[5][6] लेकिन एक अज़ेरी पेशकश के अनुसार यह संभवतः पारसी धर्म के तीन 'अच्छे विचार, अच्छे बोल, अच्छे कर्म' गुणों का प्रतीक भी हो सकता है।[7]

जोनस हैनवे (१७१२-१७८६) नामक एक १८वीं सदी के यूरोपीय समीक्षक ने पारसियों और हिन्दुओं को एक ही श्रेणी का बताते हुए कहा कि 'यह मत बहुत ही कम बदलाव के साथ प्राचीन भारतीयों और ईरानियों में, जिन्हें गेबेर या गौर कहते हैं, चले आ रहे हैं और वे अपने पूर्वजों के धर्म कि रक्षा में बहुत अग्रसर रहते हैं, विशेषकर अग्नि की मान्यता बनाए रखने में'। 'गेबेर' पारसियों के लिए एक फ़ारसी शब्द है जबकि गौड़ हिन्दू ब्राह्मणों की एक जाति होती है। उसके बाद आने वाले एक विख्यात विद्वान, ए॰ वी॰ विलयम्ज़ जैकसन ने इन दोनों समुदायों को भिन्न बताते हुए आतेशगाह के अनुयायियों की वेशभूषा, तिलकों, शाकाहारी भोजन और गौ पूजन के वर्णन के बारे में कहा कि 'हैनवे जिन चीज़ों की बात कर रहे थे वे स्पष्ट रूप से भारतीय हैं, पारसी नहीं'। फिर भी उन्होंने कहा कि सम्भव है कि हिन्दू उपासकों के बड़े समुदाय के बीच हो सकता है कि इक्के-दुक्के 'असली गेबेर (यानि ज़र्थुष्टी या पारसी)' भी उपस्थित रहें हों।[8][9]

भारतीय निवासी और तीर्थयात्री[संपादित करें]

मध्यकाल के अंत में पूरे मध्य एशिया में भारतीय समुदाय फैले हुए थे।[10][11] बाकू में पंजाब के मुल्तान क्षेत्र के लोग, आर्मेनियाई लोगों के साथ-साथ, व्यापार पर हावी थे।[12] कैस्पियन सागर पर चलने वाले समुद्री जहाज़ों पर लकड़ी का काम भी भारतीय कारीगर ही किया करते थे।[8] बहुत से इतिहासकारों की सोच है कि बाकू के इसी भारतीय समुदाय के लोगों ने आतेशगाह को बनवाया होगा या किसी पुराने ढाँचे कि मरम्मत कर के इसे मंदिर बना लिया होगा।[11][12]

जैसे-जैसे यूरोपीय विद्वान मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में आने लगे, उन्हें अक्सर इस मंदिर पर और उत्तर भारत और बाकू के बीच सफ़र करते हिन्दू भक्त मिल जाया करते थे।[8][9][12][13][14]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. (रूसी) Рас­пор­яже­ние Президента Азербайджанской Республики «Об объявлении территории Храма Атеш­гях в Сураханском районе города Баку Азер­бай­джанской Республики Государственным историко-архи­тек­турным заповедником „Храм Атешгях“»
  2. Religion in life, Minocher K. Spencer, Indian Publishers Distributors, 2002, ... Fire is held as a very sacred emblem both among the Hindus and Parsis ...
  3. Avestā: Vendidād and fragments, Maneck Fardunji Kanga, Nārāyanaśarmā Sonaṭakke, Vaidika Samśodhana Maṇḍala, 1978, ... For a very long time, the two groups (ancestors of Hindus and Parsis) were in close co-operation ... showing tenets and rites that were the same and also the later dissentions ... Yasna, rite = Yajna ... Atar = Agni, ever present at all rituals ...
  4. Sacred Sanskrit Words: For Yoga, Chant, And Meditation, Leza Lowitz, Reema Datta, Stone Bridge Press, 2004, ISBN 1-880656-87-6, ... His back left hand carries a purifying flame (agni) ... grasping a trident (trishul), and beating a drum from which all of the sounds of the universe emanate ...
  5. Parsi Lustre on Indian Soil, Hormusji Dhunjishaw Darukhanawala, G. Claridge, 1939, ... There is a 'trishula' (trident' the symbol of Shiva clearly visible on the cupola ...
  6. My Travels Outside Bombay: Iran, Azerbaijan, Baku, Ervad Shams-Ul-Ulama Dr. Sir Jivanji Jamshedji Modi, Translated by Soli Dastur, 1926, ... 'maybe, that before Moslem epoch it was Zoroastrian Fire Temple, which was destroyed by Arabs and later was restored by Hindu people for their purposes' ... Farroukh Isfandzadeh ... Not just me but any Parsee who is a little familiar with our Hindu brethren’s religion, their temples and their customs, after examining this building with its inscriptions, architecture, etc., would conclude that this is not a Parsee Atash Kadeh but is a Hindu Temple ... informed me that some 40 years ago, the Russian Czar, Alexander III, visited this place with a desire to witness the Hindu Brahmin Fire ritual ... gathered a few Brahmins still living here and they performed the fire ritual in this room in front of the Czar ... I asked for a tall ladder and with trepidation I climbed to the top of the building and examined the foundation stone which was inscribed in the Nagrik (or Nagari) script ... the installation date is mentioned as the Hindu Vikramaajeet calendar year 1866 (equivalent to 1810 A. D.) ...
  7. Observations from the Ancients, Summer 2003
  8. An Historical Account of the British Trade Over the Caspian Sea, Jonas Hanway, Sold by Mr. Dodsley, 1753, ... The Persians have very little maritime strength ... their ship carpenters on the Caspian were mostly Indians ... there is a little temple, in which the Indians now worship: near the altar about 3 feet high is a large hollow cane, from the end of which iffues a blue flame ... These Indians affirm, that this flame has continued ever since the flood, and they believe it will last to the end of the world ... Here are generally forty or fifty of these poor devotees, who come on a pilgrimage from their own country ... they mark their foreheads with saffron, and have a great veneration for a red cow ...
  9. From Constantinople to the home of Omar Khayyam: travels in Transcaucasia and northern Persia for historic and literary research, Abraham Valentine Williams Jackson, The Macmillan company, 1911, ... they are now wholly substantiated by the other inscriptions ... They are all Indian, with the exception of one written in Persian ... dated in the same year as the Hindu tablet over it ... if actual Gabrs (i.e. Zoroastrians, or Parsis) were among the number of worshipers at the shrine, they must have kept in the background, crowded out by Hindus, because the typical features Hanway mentions are distinctly Indian, not Zoroastrian ... met two Hindu Fakirs who announced themselves as 'on a pilgrimage to this Baku Jawala Ji' ...
  10. Indian Merchants and Eurasian Trade, 1600-1750, Stephen Frederic Dale, Cambridge University Press, 2002, ISBN 0-521-52597-7, ... The Russian merchant, F.A. Kotov, identified all the Mughal-Indian merchants whom he saw in Isfahan in 1623, both Hindus and Muslims, as Multanis ... the 1747 Russian census of the Astrakhan Indian community, which showed that nearly all of these merchants came from Multan or nearby villages ... many of them traded for or with relatives in Azerbaijan or Gilan provinces who were, therefore, almost certainly Multanis themselves ... many influential Hindu merchants and bankers then lived in Bukhara and Samarqand ...
  11. The Indian diaspora in Central Asia and its trade, 1550-1900, Scott Cameron Levi, BRILL, 2002, ISBN 90-04-12320-2, ... George Forster ... On the 31st of March, I visited the Atashghah, or place of fire; and on making myself known to the Hindoo mendicants, who resided there, I was received among these sons of Brihma as a brother; an appellation they used on perceiving that I had acquired some knowledge of their mythology, and had visited their most sacred places of worship ...
  12. A journey from Bengal to England: through the northern part of India, Kashmire, Afghanistan, and Persia, and into Russia, by the Caspian-Sea, George Forster (traveller), R. Faulder, 1798, ... A society of Moultan Hindoos, which has long been established in Baku, contributes largely to the circulation of its commerce; and with the Armenians they may be accounted the principal merchants of Shirwan ... this remark arose from a view of the Atashghah at Baku, where a Hindoo is found so deeply tinctured with the enthusiasm of religion, that though his nerves be constitutionally of a tender texture and his frame relaxed by age, he will journey through hostile regions from the Ganges to the Volga, to offer up prayer at the shrine of his God ...
  13. A Second Journey through Persia, Armenia, and Asia Minor, to Constantinople, between the Years 1810 and 1816, James Justinian Morier, A. Strahan, 1818, ... Travelling onwards, we met an Indian entirely alone, on foot, with no other weapon than a stick, who was on his road to Benares returning from his pilgrimage to Baku. He was walking with surprising alacrity, and saluted us with great good-humour, like one satisfied with himself for having done a good action. I believe that these religious feats are quite peculiar to the Indian character ...
  14. Reports from the consuls of the United States, 1887, United States Bureau of Foreign Commerce, United States Government, 1887, ... Six or 7 miles southeast is Surakhani, the location of a very ancient monastery of the fire-worshippers of India, a building now in ruins, but which is yet occasionally occupied by a few of these religious enthusiasts, who make a long and weary pilgrimage on foot from India to do homage at the shrine of everlasting fire, which is merely a small jet of natural gas, now almost extinct ...