प्रशीतन

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प्रशीतन करके भोजन को संरक्षित करने के लिये प्राय: बर्फ का प्रयोग किया जाता है।

किसी स्थान, या पदार्थ, को उसके वातावरण के ताप के नीचे तक ठंढा करने की क्रिया को प्रशीतन (Refrigeration) कहते हैं। विगत शती में इन यांत्रिक विधियों का विस्तार बर्फ बनाने से लेकर खाद्य एवं पेय पदार्थो को शीतल रखने तथा अधिक समय तक इन्हें संरक्षित (preserve) रखने के हेतु किया गया और अब तो इनका प्रयोग बहुत बड़े व्यावसायिक पैमाने पर किया जाने लगा है।

इतिहास[संपादित करें]

भारत एवं मिस्र देश में इसकी जानकारी अनादि काल से थी। मिट्टी के पात्रों में पानी ठंडा करने की रीति, इसका व्यावहारिक उपयोग कही जा सकती है। कालांतर में चीन, यूनान और रोम के लोगों ने प्राकृतिक हिम के द्वारा अपने खाद्य एवं पेय पदार्थो को ठंढा रखने की विधि अपनाई। इसके बाद कृत्रिम बर्फ बनाने के हेतु प्रशीतन की यांत्रिक विधियों का आविष्कार किया गया।

प्रशीतन की विधियाँ[संपादित करें]

एक चरण वाला एक वाष्प-संपीडक प्रशीतक

प्रशीतन व्यवस्था निम्नलिखित उपायों द्वारा प्राप्त की जा सकती है :

पानी या बर्फ में नमक के संयोग से प्राप्त प्रशीतन व्यवस्था[संपादित करें]

पानी या बर्फ में नमक के संयोग से बर्फ के टुकड़ों से सामान्यतया पानी चिपका रहता है। जब उनके साथ नमक मिलाया जाता है तब वह उस पानी में गल जाता है और बर्फ पिघलती है। विलयन ऊष्मा (heat of solution) और बर्फ गलने की गुप्त ऊष्मा उसी मिश्रण से प्राप्त होती हैं तथा फलस्वरूप मिश्रण का ताप का यह पतन एक निश्चित सीमा से अधिक नहीं हो सकता। जब मिश्रण का ताप लगभग -21.20 सें. तक पहुँच जाता है, तब उसका पतन रुक जाता है और अधिक नमक उस विलयन में डालने से कोई परिवर्तन नहीं होता। इस ताप को गलनक्रांतिक ताप (Eutectic temperature) कहते हैं। इस ताप पर विलयन के आ जाने के बाद उसमें अधिक नमक नहीं घुल सकता। नीचे कुछ लवणों के, जो पानी में घुल सकते हैं, नाम और उनके संगत गलन क्रांतिक ताप के मान दिए जा रहे हैं :

लवण                   मिश्रण के 100 ग्राम में मिश्रित       गलन क्रांतिक ताप 
                           अजल लवण की मात्रा           (डिग्री सेंटिग्रेड)

मैग्नीशियम सल्फेट               19.0                        -39
जिंक सल्फेट                     27.2                       -6.5
पोटासियम क्लोराइड                19.7                      -11.1
अमोनियम क्लोराइड                18.6                      15.8
अमोनियम नाइट्रेट                 41.2                      -17.4
सोडियम नाइट्रेट                  37.0                      -18.5
सोडियम क्लोराइड                 22.4                      -21.2
मैग्नीशियम क्लोराइड               21.6                      -33.6
कैल्सियम क्लोराइड                29.8                      -55
पोटासियम हाइड्रॉक्साइड             31.5                      -65

कम दाब पर द्रव के क्वथन द्वारा प्रशीतन[संपादित करें]

जब कोई द्रव उबलता है तब उसके वाष्पीकरण, अर्थात् द्रव से वाष्प में परिवर्तन के लिये, ऊष्मा की आवश्यकता पड़ती है, जिसे वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। यदि कोई द्रव किसी विधि से अत्यंत द्रुत गति से वाष्पित कराया जाय और उसे अन्य किसी स्रोत से ऊष्मा न मिल सके तो वह अपने अंदर की ऊष्मा के व्यय से ही वाष्पित होता है। फलत: वह शीतल होने लगता है।

इस सिद्धांत का प्रयोग विशाल पैमाने पर आधुनिक यांत्रिक प्रशीतन उपकरणों में किया जाता है। इसमें पानी का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि यद्यपि इसके वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा का मान काफी ऊँचा होता है, फिर भी निम्न तापों पर उसकी वाष्प दाब अल्प होती है। इस कार्य के लिये अमोनिया, सल्फर डाइऑक्साइड इत्यादि का प्रयोग होता है।

यांत्रिक प्रशीतन व्यवस्था ऊष्मागतिकी (thermodynamics) का एक व्यावहारिक प्रयोग है, जिसमें प्रशीतक द्रव्य (refrigerant) को एक उत्क्रमिक ऊष्माचक्र (reverse heat cycle) में होकर गुजरना पड़ता है। यह चक्र एक इंजन या विद्युत मोटर द्वारा चलता है और इस चक्र में निम्न ताप पर ऊष्मा का निस्सरण होता है। इस उद्देश्य से उत्क्रम कानों-चक्र (reversed Carnot's cycle) उपादेय हो सकता है, किंतु कुछ दृष्टियों से प्रचलित प्रशीतन चक्र कानों चक्र से भिन्न होते हैं, जिसका मुख्य कारण वाष्पीकरण कुंडलों में घुसने के पूर्व वाष्परोधी कपाट (throttle valve) द्वारा द्रव का दाब घटा देने की क्रिया है। इससे कानों के चक्र के लिये अभीष्ट स्थिरोष्म प्रसार की क्रिया होना संभव नहीं रह जाता। साधारणतया व्यवहृत होनेवाले प्रशीतन चक्रों में वाष्प संपीडन (vapour compresssion), अवशोषण, भाप-जेट एवं वायुचक्र उल्लेखनीय हैं। इन चक्रों को समझने से पूर्व ऊष्मा चक्र समझ लेना आवश्यक है।

गैसों के स्थिरोष्म प्रसार द्वारा प्रशीतन[संपादित करें]

जब किसी संपीडित का अचानक स्थिरोष्म विधि से प्रसरित होने का अवसर दिया जाता हैं तब वह ठंडी हो जाती है, क्योंकि प्रसरण में किए गए कार्य हेतु आवश्यक ऊर्जा वह बाहरी वातावरण से नहीं ले पाती अपितु से ही अंदर से प्राप्त करती है। इससे उसका ताप इस सीमा तक हो सकता हैं कि वह ठोस के रूप में जम जाय। इसी सिद्धांत पर कुछ संपीडन प्रशीताकें का निर्माण किया गया है, जिनमें प्रशीतक गैस के रूप में वायु का प्रयोग होता है। इसमें वायु को पहले खूब किया जाता है और इस क्रिया में उत्पन्न ऊष्मा से गैस को निवृत्त होने के हेतु वायु का प्रयोग होता है। इसमें वायु को पहले खूब - जाता है और इस क्रिया और इस क्रिया में उत्पन्न ऊष्मा से गैस को निवृत्त होने के हेतु वायु का प्रयोग होता है। इसमें वायु को प्रसारबेलन के स्थिरोष्म ढंग से प्रसरित कराया जाता है, जिससे बेलन तथा वायु को ही ठंडे हो जाते हैं। यह ठंडे वायु और संपीडित वायु प्रसार खबर में प्रवेश करती है, जहाँ इसका स्थिरोष्म प्रसार होता है। यह पर्याप्त ठंडी हो जाती है और प्रशीतक के शीत संचायक कोष्ठ या शीतागार (Cold Storage) में पहुँचकर उसे शीतल करती है। इससे यह पुन: गरम होकर संपीडक में पहुँचती है और यह पुन: आरंभ होता है। इस प्रकार के संपीडक में पहुँचती है और यह पुन: आरंभ होता है। इस प्रकार के संपीडक का व्यावहारिक रूप कीलमैन प्रशीतित्र (Bell-Coleman Retrigerator) है, जो घरों के शीत संचायक प्रकोष्ठों में व्यवहृत होता है।

जूल-टॉमसन विधि द्वारा प्रशीतन[संपादित करें]

जूल-टामसन-शीतलन का मात्रा बहुत कम होती है, किंतु पुनरुत्पादन प्रक्रिया द्वारा उसे बढ़ाया जा सकता है। जूल-टामसन-विधि द्वारा शीतल हुए गैस का एक भाग आगत गैस की टोंटी (nozzle) तक पहुँचने से पूर्व शीतल करने के हेतु प्रयुक्त किया जाता है। इससे आगत गैस टोंटी पार करने के बाद और भी ठंडी हो जाती है। इस क्रिया को कई बार दुहराने से गैस काफी ठंडी हो जाती है। इस विधि का उपयोग गैसों के द्रवीकरण के लिये विशेष रूप से किया जाता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]