दोहरी सूचिगत कंपनी

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दोहरा सूचिकरण (अंग्रेज़ी:डुअल लिस्टिंग) उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसके तहत कोई कंपनी दो अलग-अलग देशों के स्टॉक एक्सचेंजों में स्वयं को सूचीबद्ध कराती है। जब दो देशों की दो कंपनियों के बीच कारोबार को लेकर कोई समझौता होता है तो डुअल लिस्टिंग के द्वारा दोनों ही देशों में इन कंपनियों के शेयर सूचीबद्ध बने रहते हैं। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही देशों के स्टॉक एक्सचेंजों में दोनों ही कंपनियों के शेयरों की खरीद-बिक्री की जा सकती है।[1] उदाहरण के साथ यदि भारती एयरटेल और एमटीएन के बीच होने वाले सौदे में दोहरे सूचिकरण की शर्त सम्मिलित होती है तो भारती के शेयरों की बिक्री जोहानसबर्ग स्टॉक एक्सचेंज में भी की जा सकेगी, जबकि एमटीएन के शेयर ट्रेडिंग के लिए घरेलू स्टॉक एक्सचेंज में उपलब्ध रहेंगे। दोहरे सूचिकरण में कई जटिलताएं होती हैं, जिसके चलते यह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया है। हालांकि, दोहरे सूचिकरण के कई उदाहरण हैं। रॉयल डच शेल के शेयरों में इंग्लैंड और नीदरलैंड के शेयर बाजारों में ट्रेडिंग होती है। बीएचपी बिलिटॉन के शेयरों में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में ट्रेडिंग होती है। इसी तरह रियो टिंटो ग्रुप के शेयरों की ट्रेडिंग भी ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बाजरों में होती है। यूनिलीवर के शेयरों की ट्रेडिंग इंग्लैंड और नीदरलैंड के बाजारों में होती है।[1]

भारत[संपादित करें]

अभी तक भारत में दोहरे सूचिकरण की अनुमति नहीं है। इसके लिए यहां के कंपनी कानून में संशोधन करने होंगे। इसके अलावा रुपए को पूर्ण परिवर्तनीय बनाना होगा। दोहरे सूचिकरण में कोई निवेशक एक देश में शेयरों को खरीदकर दूसरे देश में बेच सकता है। इसके लिए रूप को पूर्ण परिवर्तनीय बनाना आवश्यक है।[1] इसके लिये यहां के विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम (फेमा) में भी संशोधन वांछित होगा, साथ ही रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना विदेशी मुद्रा में व्यापार करने वाले शेयरों का लेन-देन घरेलू बाजार में नहीं किया जा सकता है।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. क्या है डुअल लिस्टिंग? क्या भारत में है इसकी इजाजत?|इकोनॉमिक टाइम्स।१६ सितंबर, २००९

बाहरी सूत्र[संपादित करें]