तुळु

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भाषा का नाम
बोली जाती है
क्षेत्र
कुल बोलने वाले
भाषा परिवार
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भाषा कूट
ISO 639-1 None
ISO 639-2
ISO 639-3

तुळु भारत के कर्नाटक राज्य के पश्चिमी किनारे में स्थित दक्षिण कन्नड़ और उडुपि जिलों में तथा उत्तरी केरल के कुछ भागों में प्रचलित भाषा है। पहले तुळु की अपनी ही लिपि थी। पर आज इस लिपि को जाननेवाले बहुत कम हैं। पुराना तुळु लिपि मलयाळम लिपि से बहुत मिलती है। अब कन्नड भाषा को तुळु लिखने में आज़माया जाता है। यह पन्च द्राविड भाषाओं में एक है। दक्षिण कन्नड और उडुपी जिलों की ज्यादातर लोगों की मात्रभाषा तुळु है। इसलिए ये दोनो जिलों मिलके तुळुनाडु नाम से जानेजाते हैं। केरल के कासरगोड जिले में भी बहुत लोग इस भाषा को आज़माते हैं।

कृतियाँ[संपादित करें]

उडुपि जिले के एक ब्राह्मण ने तुळु लिपि को आज़माके 'भागवत' नाम का एक कृती लिखने की आधार है। कवि मन्दार केशव भट 'मन्दार रामायण' नाम का एक आधुनिक महाकाव्य लिखे हैं।

तुळु की शैलियाँ[संपादित करें]

भाषाविदों के अनुसार तुळु के चार प्रमुख रूप या शैलियाँ हैं :

शिवळ्ळि

तुळु ब्राह्मणों की बोलनेवाली शैली।

जैन

तुळुनाडु के अत्तरी भागों के जैनों की बोलनेवाली शैली।

सामान्य

तुळुनाडु के ज्यादातर लोगों की बोलनेवाली शैली। वाणिज्य, कला, मनोरंजन में इस शैली की उपयोग होती है।

आदिवासी

आदिवासी लोगों की बोलनेवाली शैली।

तुळुनाडु[संपादित करें]

कुछ पुरानी मलयाळम कृतियों के अनुसार जो क्षेत्र कासरगोड के चन्द्रगिरी नदी से लेकर उत्तर कन्नड के गोकर्ण तक व्यापित है वो तुळुनाडु नाम से जानाजाता था। पर आज का तुळुनाडु दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों तक ही सीमित है। फिर भी केरल के कासरगोड तथा महाराष्ट्र के मुम्बई और थाने में तुळु बोलनेवाले बहुत लोग पाये जाते हैं।

तुळु लिपी[संपादित करें]

प्राचीनकाल में तुळुभाषा की अपनी स्वत: की एक विशेष लिपी हुआ करती थी। परंतु आज इस लिपि को जाननेवाले लोग बहुत कम हैं। ऐसे कहते हैं, की प्राचीन तुळुलिपि से आज की मलयाळम लिपि का विकास हुआ हैं। प्राचीन तुळुलिपी और अर्वाचीन मलयाळम लिपी बहुत मिलतीजुलती है।

अर्वाचीन काल में तुळुभाषिक साहित्य लिखने के कार्य में कन्नड लिपी का उपयोग होता हैं।