मातृभाषा
जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है।
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[संपादित करें] मैकाले की शिक्षा नीति : मातृभाषाओं पर आघात
2 फरवरी, 1835 ई. को मैकाले ने बहुमत के अभाव में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर अपनी शिक्षा नीति की घोषणा की थी। इसका चारों ओर तीव्र विरोध हुआ था। फरवरी मास में ही दस हजार व्यक्तियों ने इस प्रस्ताव के विरुद्ध एक ज्ञापन भी दिया। पर भारत के तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने इसे बलपूर्वक लागू कर दिया। यह घोषणा भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक परिवर्तनकारी मोड़ थी। इस घोषणा ने न केवल अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया बल्कि इसमें धार्मिक विघटन, सांस्कृतिक ह्मास, आर्थिक शोषण तथा साम्राज्यवादी विस्तार के तत्व भी मौजूद थे। इसका उद्देश्य भारतीयों की देशभक्ति की भावना पर चोट करना तथा अपने इतिहास के प्रति आत्मविस्मृति पैदा करना था, ताकि वे अतीत के गौरव को भूल जाएं। मैकाले ने अपनी घोषणा में स्पष्ट रूप से लिखा था, "हमें व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग बनाना चाहिए जो रक्त तथा रंग से भारतीय हो परन्तु स्वभाव, नैतिकता एवं बुद्धि से अंग्रेज हो।" इस माध्यम से उसका भारत के ईसाईकरण का भी उद्देश्य था। मैकाले के बहनाई जी.एम. ट्रेविलियन ने उसके विचारों को व्यक्त करते लिखा, "मेरा विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा की यह नीति सफल हो जाती है तो 30 वर्षों के अन्दर बंगाल के उच्च घरानों में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा।" मैकाले की इस घोषणा के पीछे सामाजिक मनमुटाव व विभेद पैदा करना था। उसका उद्देश्य हिन्दू समाज-व्यवस्था को विखण्डित करना भी था।
[संपादित करें] गांधी जी के विचार
गांधी जी ने मैकाले की इस धूर्ततापूर्ण योजना का अपने कई लेखों में वर्णन किया है (देखें मैकालेज ड्रीम्स, यंग इंडिया, 19 मार्च 1928, पृ. 103) तथा इस घोषणा को "शरारतपूर्ण" कहा है। यह सत्य है कि गांधी जी स्वयं अंग्रेजी के प्रभावी ज्ञाता तथा वक्ता थे। एक बार एक अंग्रेज विद्वान ने कहा था कि भारत में केवल डेढ़ व्यक्ति ही अंग्रेजी जानते हैं- एक गांधी जी और आधे मि. जिन्ना। अत: भाषा के सम्बंध में गांधी जी के विचार राजनीतिक अथवा भावुक न होकर अत्यन्त संतुलित तथा गंभीर हैं।
गांधी जी के विचार शिक्षा के माध्यम के संदर्भ में स्पष्ट थे। वे अंग्रेजी भाषा को लादने को विद्यार्थी समाज के प्रति "कपटपूर्ण कृति" समझते थे। उनका मानना था कि भारत में 90 प्रतिशत व्यक्ति चौदह वर्ष की आयु तक ही पढ़ते हैं, अत: मातृभाषा में ही अधिक से अधिक ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने 1909 ई. में "स्वराज्य" में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार "हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सिखलाना उन्हें गुलाम बनाना है।" गांधी जी विदेशी माध्यम के कटु विरोधी थे। उनका मानना था कि विदेशी माध्यम बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने, रटने और नकल करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है तथा उनमें मौलिकता का अभाव पैदा करता है। यह देश के बच्चों को अपने ही घर में विदेशी बना देता है। उनका कथन था कि "यदि मुझे कुछ समय के लिए निरकुंश बना दिया जाए तो मैं विदेशी माध्यम को तुरन्त बन्द कर दूंगा।" गांधी जी के अनुसार विदेशी माध्यम का रोग बिना किसी देरी के तुरन्त रोक देना चाहिए। उनका मत था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। उनके अनुसार, "गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।"
[संपादित करें] मातृभाषा का महत्व
गांधीजी देश की एकता के लिए यह आवश्यक मानते थे कि अंग्रेजी का प्रभुत्व शीघ्र समाप्त होना चाहिए। वे अंग्रेजी के प्रयोग से देश की एकता के तर्क को बेहूदा मानते थे। सच्ची बात तो यही है कि भारत विभाजन का कार्य अंग्रेजी पढ़-लिखे लोगों की ही देन है। गांधी जी ने कहा था- "यह समस्या 1938 ई. में हल हो जानी चाहिए थी, अथवा 1947 ई. में तो अवश्य ही हो जानी चाहिए थी।" गांधी जी ने न केवल माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा का मुखर विरोध किया बल्कि राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर भी राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता को प्रकट करने वाले विचार प्रकट किए। उन्होंने कहा था, "यदि स्वराज्य अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों को और उन्हीं के लिए होने वाला हो तो नि:संदेह अंग्रेजी ही राष्ट्रभाषा होगी। लेकिन अगर स्वराज्य करोड़ों भूखों मरने वालों, करोड़ों निरक्षरों, निरक्षर बहनों और पिछड़ों व अत्यंजों का हो, और इन सबके लिए होने वाला हो, तो हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है।
[संपादित करें] इन्हें भी देखें
[संपादित करें] अन्य पठनीय सामग्री
- मातृभाषा (हिंदीकुंज में )
- मातृभाषा विकास परिषद
- मातृभाषा में शिक्षा का महत्व
- Educating Learners in Their Home Languages
- Mother Tongue-based Literacy Programmes : Case Studies of Good Practice in Asia (यूनेस्को द्वारा अध्ययन)
- Education through the Medium of the Mother-Tongue
- Ten (Socio-) Linguistic Axioms
- शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए मातृभाषा आधारिक शिक्षा की महत्ता।
- भाषाई अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा।
- मातृभाषा या विदेशी भाषा (अंग्रेज़ी)?
- मातृभाषा - कुछ कड़ियाँ
- Cognitive advantages to bilingualism