अल-बय्यिना

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सूरा अल-बय्यिना (अरबी: سورة البينة) (स्पष्ट साक्ष्य) कुरान का 98वां सूरा है। इसमें 8 आयतें हैं।

प्रकटीकरण काल[संपादित करें]

इस सूरा का प्रकटीकरण स्थान विवादित है, जिसे अधिकांश मदीना मानते हैं। फ़िर भी, क्योंकि इसमें बताया गया है, कि ईश्वर ने एक पैगम्बर भेजा है, इसलिये इसे मक्का से पहले प्रकट मानते हैं, ऐसी कई लोगों की दलील रही है। इब्न अज़ जु़बैर एवं अता बिन यासर इसे मदीनी बताते हैं। इब्न अब्बास और कतादाह ने प्रथम इसे मक्की फ़िर बाद में मदीनी बताया, ऐसा बताया गया है। हजरत ऐशाह ने इसे मक्की सूरा बताया है। इसके अलावा भी बहुत दलीलें रही हैं।

सार वाक्य 1-8[संपादित करें]

आरम्भ में सूरा अरबिया के बहु ईश्वर्वादियों को दोष देता है, साथ ही वे अह्ल अल किताब (أهل الكتاب) लोग भी, जो विश्वास से हट गये हैं, यानि यहूदी एवं ईसाई लोग। However, they may be restored only by a "clear sign" from God who speaks holy and untainted words - the Prophet Muhammad bringing the Qur'an, which lays down proper laws and morality. The fifth ayat explains that all God asks of mankind is,

"To praise God by offering Him devotion being true, to pray the salat, and to give charity. And that is the Religion of Truth."

Those to cling to these simple truths will be offered the Gardens of Paradise, "underneath which rivers flow" as their prize; for God is pleased with them for being the best of possible creations. Those who turn away, however, shall meet the fires of Hell.

टिप्पणी[संपादित करें]

^ हद्दद, Journal of the American Oriental Society, Vol. 97, No. 4. (Oct. - Dec., 1977), pp. 519–530.

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