0.999...

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अनंत रूप से जारी दशमलव आवृत्ति

0.999... गणित में यह निरूपित करता है कि दशमलव बिंदु (और इसके पहले एक 0) के बाद दशमलव आवृत्ति में अनंत रूप से कई 9 होते हैं। यह दशमलव आवृत्ति दर्शाती है कि अनुक्रम (0.9, 0.99, 0.999, ...) में सबसे छोटी संख्या प्रत्येक दशमलव संख्या से कम नहीं होती।[1]

यह संख्या 1 के बराबर है। दूसरे शब्दों में, "0.999..." और "1" समान संख्या को दर्शाते हैं। सहज युक्ति से गणितीय कठोर प्रमाणों तक इस समानता को दिखाने के कई तरीके हैं। उपयोग की जाने वाली तकनीक लक्षित दर्शकों, पृष्ठभूमि मान्यताओं, ऐतिहासिक संदर्भ और वास्तविक संख्याओं के वरीयताकृत विकास पर निर्भर करती है। आमतौर पर 0.999... को इसी तकनीक वाली प्रणाली में परिभाषित किया गया है। (दूसरी प्रणालियों में 0.999... का समान अर्थ, भिन्न अर्थ या अपरिभाषित भी हो सकता है।)

आमतौर पर, दशमलव को विस्थापित करने वाले गैरशून्य के दो समान प्रतिनिधित्व (उदाहरण के लिए-8.32 और 8.31999...) होते हैं। उपयोगितावादी प्राथमिकता दशमलव विस्थापन प्रतिनिधित्व इस गलत धारणा को बढ़ावा देता है कि वही एकमात्र प्रतिनिधित्व है। इस तथा अन्य कारणों से-मसलन दृढ़ प्रमाण गैर प्राथमिक तकनीकों, गुणों या अनुशासनों पर भरोसा करते हैं-कुछ लोग को समानता को सहज प्रतिवाद लग सकता है जिसपर वे सवाल उठाएँ या खारिज करें। यह गणित शिक्षा में कई अध्ययनों का विषय रहा है।

प्राथमिक प्रमाण[संपादित करें]

आर्किमिडियन गुण: समाप्ति रेखा से पूर्व कोई भी बिंदु 'x' दो बिंदुओं (समावेशी) के मध्य स्थित है।

समीकरण का एक प्राथमिक प्रमाण 0.999...= 1 है, जो कि अधिक परिमित विषयों जैसे कि श्रृंखला, सीमा, वास्तविक संख्या के औपचारिक निर्माण के संदर्भ के बिना (परिमित) दशमलव संख्याओं की तुलना और इसके अलावा गणितीय उपकरणों आदि का उपयोग करता है। स्टिलवेल द्वारा दिए गए प्रमाण तथा अभ्यास इस सहज तथ्य का सीधा नियमन हैं, यदि कोई संख्या रेखा पर 0.9, 0.99, 0.999 आदि को अंकित करता है तो उनके और 1 के बीच संख्या रखने के लिए कोई जगह नहीं बचती। 0.999... अंकन का तात्पर्य-संख्या रेखा पर सभी अंकों 0.9, 0.99, 0.999 आदि के दाहिने सबसे छोटा बिंदु है, क्योंकि अंततः 1 और इन संख्याओं के बीच कोई जगह नहीं है, बिंदु 1 को अनिवार्यतः सबसे छोटा बिंदु होना चाहिए और इसलिए 0.999...=1 है।

विश्लेषणात्मक प्रमाण[संपादित करें]

चूंकि 0.999 का प्रश्न गणित के औपचारिक विकास को प्रभावित नहीं करता है, इसीलिए इसे तब तक स्थगित किया जा सकता है जब तक कि वास्तविक विश्लेषण के मानक सिद्धांत साबित नहीं हो जाते। एक आवश्यकता वास्तविक संख्याओं को चिह्नित करने के लिए है, जिसे दशमलव संकेतन में लिखा जा सकता है, जिसमें एक वैकल्पिक चिन्ह, एक पूर्णांक का एक पूर्ण अनुक्रम, एक पूर्णांक भाग, एक दशमलव विभाजक और एक भिन्नात्मक भाग बनाने वाले अंकों का एक क्रम होता है। 0.999... पर चर्चा करने के उद्देश्य से पूर्णांक भाग को b0 के रूप में संक्षेपित किया जा सकता है और नकारात्मक को अनदेखा किया जा सकता है, जिससे कि एक दशमलव विस्तृत रूप ले सके।

पूर्णांक भाग के विपरीत अंश भाग, बहुत से अंकों तक सीमित नहीं है। यह एक स्थितिगत संकेतन है, इसलिए उदाहरण के लिए 500 में अंक 5, 50 में 5 के रूप में दस गुना अधिक योगदान देता है, और 0.05 में 5 दसवें भाग के रूप में उतना योगदान देता है जितना 0.5 में 5।

अनंत श्रृंखला और क्रम[संपादित करें]

शायद दशमलव विस्तार का सबसे आम विकास उन्हें अनंत शृंखला के रूप में परिभाषित करना है। सामान्यतः

0.999... के लिए एक ज्यामितीय श्रृंखला से संबंधित अभिसरण प्रमेय को लागू किया जा सकता है:[2]

If then

टिप्पणी[संपादित करें]

  1. यह परिभाषा दशमलव संख्याओं की परिभाषा के बराबर है, जो उनके संयुक्त घटकों की सीमा है, जो कि 0.999... के मामले में अनुक्रम (0.9, 0.99, 0.999, ...) की सीमा है। यह समतुल्यता परिबद्ध बढ़ती शृंखलाओं के कारण होती है जिसकी सीमा हमेशा उनके ऊपरी न्यूनतम बंध के बराबर होती है।
  2. Rudin p. 61, Theorem 3.26; J. Stewart p. 706

संदर्भ[संपादित करें]

  • Alligood, K. T.; Sauer, T. D.; Yorke, J. A. (1996). "4.1 Cantor Sets". Chaos: An introduction to dynamical systems. Springer. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-387-94677-1.
    This introductory textbook on dynamical systems is aimed at undergraduate and beginning graduate students. (p. ix)
  • Apostol, Tom M. (1974). Mathematical analysis (2e संस्करण). Addison-Wesley. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-201-00288-1.
    A transition from calculus to advanced analysis, Mathematical analysis is intended to be "honest, rigorous, up to date, and, at the same time, not too pedantic." (pref.) Apostol's development of the real numbers uses the least upper bound axiom and introduces infinite decimals two pages later. (pp. 9–11)