हेनरी मरे

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हेनरी मरे

हैनरी मरे (Henry Alexander Murray ; (13 मई 1893 – 23 जून 1988) अमेरिका के मनोवैज्ञानिक थे। उन्होने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में ३० वर्ष से भी अधिक समय तक अध्यापन किया।

अनुक्रम

परिचय[संपादित करें]

हेनरी मरे का जन्म 13 मई 1893 में न्यूयार्क नगर में हुआ। उन्होंने 1915 में हारवर्ड कॉलेज से स्नातक उपाधि प्राप्त की। प्रारम्भ में उनकी रुचि इतिहास में थी, इसलिए उन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन किया। तत्पश्चात् मरे ने चिकित्सा शास्त्र में भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने चिकित्सा शास्त्र एवं जीव विज्ञान से सम्बंधित विषयों का बारह वर्षों तक गहन अध्ययन किया। इसी काल में उनकी रुचि मनोविज्ञान में हुई। उनको इस क्षेत्र में अध्ययन करने की प्रेरणा युंग से प्राप्त हुई। युंग से प्रेरित होकर मरे ने मनोविज्ञान के क्षेत्र में अवचेतन मनोविज्ञान (Depth Psychology) का गहन अध्ययन किया। उन्होंने व्यक्ति विज्ञान (Personalogy) नाम से व्यक्ति के व्यक्तित्व की संकल्पना की। कालान्तर में व्यक्ति विज्ञान को आधुनिक मनोविज्ञान की एक शाखा मान लिया गया और व्यक्तित्व विकास से संबंधित मनोवैज्ञानिक तथ्यों का गहन अध्ययन इसी शाखा के अन्तर्गत किया जाने लगा।

कृतियाँ[संपादित करें]

मरे की व्यक्त्वि की परिभाषा[संपादित करें]

मरे के व्यक्तित्व सिद्धान्त का मूल आधार यह है कि व्यक्ति 'अभिप्रेरित पशु' है। मरे ने व्यक्तित्व की अवधारणा में जैविक निर्धारकों पर बल दिया है। नवफ्रायडवादियों ने जैविक पक्ष की कदाचित् अवहेलना की थी परन्तु मरे के अनुसार व्यक्तित्व की कल्पना बिना मस्तिष्क के असंभव है।

मरे के अनुसार-

व्यक्तित्व उन प्रकार्यात्मक रूपों और शक्तियों की निरन्तरता है जो संगठित प्रबल प्रक्रियाओं और व्यस्त व्यवहारों के माध्यम से जीवन और मृत्युपर्यन्त अभिव्यक्त होता रहता है।

इस परिभाषा में व्यक्तित्व को निरन्तर गत्यिल माना गया है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के कुछ प्रकार्यों का उल्लेख भी परिभाषा में किया गया है। मरे ने व्यक्तित्व के निम्न प्रकार्य माने हैं-

  • 1. ऊर्जाओं के कालिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था निद्रा के माध्यम से करना,
  • 2. विभिन्न प्रक्रियाओं का संचालन करना,
  • 3. विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं मूल्यांकनों का प्रकटीकरण,
  • 4. आवश्यकता संबंधी तनावों की निरन्तरता को कम करना,
  • 5. लक्ष्य प्राप्ति हेतु आवश्यक कार्यक्रम बनाना,
  • 6. समरस जीवन-शैली को प्राप्त करने हेतु विभिन्न आवश्यकताओं के मध्य द्वन्द्वों को कम करने के लिए कार्यक्रम बनाना,
  • 7. तनावों की सततता को कम करना या लक्ष्यों का स्तर कम करना,
  • 8. व्यक्तिगत रूझानों और समाज के द्वारा मान्य कार्यों के बीच द्वन्द्व का न्यूनीकरण,
  • 9. असामाजिक आवेगों और परमाहम् के बीच द्वन्द्व का न्यूनीकरण।

व्यक्तित्व के प्रकार्य[संपादित करें]

हेनरी मरे ने व्यक्तित्व के इन प्रकार्यों के लिए कुछ विशिष्ट संकल्पनात्मक शब्दों का प्रयोग किया और इनकी व्याख्या भी की। जो इस प्रकार है-

  • 1. आवश्यकता संबंधी तनाव को कम करना।
  • 2. तनावों की उत्पत्ति
  • 3. लक्ष्यों के क्रम का निर्धारण
  • 4. आत्माभिव्यक्ति
  • 5. लक्ष्यों का क्रम सूचन
  • 6. आकांक्षा स्तर का समायोजन करना
  • 7. सामाजिक अपेक्षाएँ

आवश्यकता संबंधी तनाव को कम करना[संपादित करें]

मरे का यह मानना है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व आवश्यकताओं से उत्पन्न तनावों से प्रभावित होता है। ये आवश्यकताएं जैविक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक होती हैं। अतः व्यक्ति का यह प्रयास रहता है कि उसके इस प्रकार से उत्पन्न हुए तनाव में कमी हो। इन आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति व्यक्ति व्यक्तिगत सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर करता है। क्योंकि इस प्रकार की इच्छाओं में कुंठाएं और अभिप्साएं निहित होती है। चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए यह संभव नहीं कि वह समाज से अलग रहकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।

तनावों की उत्पत्ति[संपादित करें]

इस संबंध में हेनरी मरे का मत है कि तनाव का अभाव उतना सन्तोषप्रद नहीं होता जितना कि उत्पन्न हुए तनाव में कमी करने की प्रक्रिया से होता है। वे फ्रायड की इस बात से सहमत नहीं थे कि तनाव का अभाव व्यक्ति को सन्तोष प्रदान करता है बल्कि उनके अनुसार तनाव में कमी के कारण जो सन्तोष मिलता है वह तनाव के अभाव में नहीं। अतः मरे के अनुसार आवश्यकतानुसार तनाव की उत्पत्ति और फिर उसमें कमी व्यक्तित्व के प्रकार्यों में समाहित है।

लक्ष्यों के क्रम का निर्धारण[संपादित करें]

मरे के अनुसार व्यक्तित्व की संरचना में उन उपायों का भी बहुत महत्त्व है जो विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं एवं लक्ष्यों को क्रम में निर्धारित करते हैं। इन उपायों से व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं में क्रम निर्धारण करता है। अर्थात् जो आवश्यकता जितनी महत्त्वपूर्ण होगी, उसे उतने ही महत्त्वपूर्ण क्रम निर्धारण में रखा जाएगा। व्यक्तित्व की संरचना में लक्ष्यों का क्रम निर्धारण की यह प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। हेनरी मरे का यह मानना है कि आवश्यकताओं का क्रम निर्धारण करके व्यक्ति कम समय में अधिक कार्य कर पाता है। व्यक्ति अपनी उन आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जो अत्यन्त आवश्यक है और इसी प्रकार उन लक्ष्यों के प्राप्ति की ओर पहले ध्यान देता है जो देश और काल की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मरे के अनुसार जिस व्यक्ति में क्रम निर्धारण की क्षमता जितनी अधिक होगी, वह व्यक्ति उतनी ही अधिक सीमा तक द्वन्द्वों एवं तनावों से मुक्त रहेगा।

आत्माभिव्यक्ति[संपादित करें]

मरे के अनुसार आवश्यकताओं से संबन्धित तनावों में कमी के अतिरिक्त व्यक्तित्व के लिए आत्माभिव्यक्ति भी बहुत जरूरी है। जैसे कोई व्यक्ति संगीत द्वारा आत्माभिव्यक्ति की इच्छा करे तो उसे इस बात का ध्यान रखना होता है कि वह ऐसे स्थान, समय और गाने का चुनाव करे जो दूसरों के लिए दुःखकर न हो। इस संबंध में मरे ने प्रक्रिया-कार्य (process-activity)) शब्द का प्रयोग किया। प्रक्रिया कार्य का स्वरूप स्पष्ट करते हुए मरे यह मानते हैं कि मन कभी-कभी ऐसी क्रियाओं में लीन हो जाता है जो थोड़े समय की होती है परन्तु इनके माध्यम से मन को आनन्द मिलता है। इसी संदर्भ में मरे का यह मानना है कि शरीर और मन सबन्धी जितनी क्रियाएं हैं वे ऐसी कल्पनाओं से संबन्धित हो जाती है जो व्यक्ति को आनन्द प्रदान करती हैं और वे आत्म-अभिव्यक्ति का एक माध्यम बन जाती हैं। कालान्तर में कुछ क्रियाएं एक निश्चित रूप ले लेती हैं। जैसे, नाटक, नृत्य, संगीत आदि सम्बंधी क्रियाएं व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति में सहायक होती है।

लक्ष्यों का क्रम-सूचन[संपादित करें]

मरे के अनुसार क्रम-सूचन में व्यक्ति मानसिक शक्ति की सहायता से कुछ योजनाएं बनाता है और वह यह देखता है कि उसकी पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है और उसके परिणाम का स्वरूप क्या होगा। व्यक्ति अपनी योजनाओं या लक्ष्यों का निर्माण करता है, फिर उनकी पूर्ति या उनको मूर्त्त रूप देने के लिए उनका क्रम-सूचन करता है। जिस लक्ष्य को पहले प्राप्त करना है उसे प्राथमिकता देकर प्रथम क्रम में रखेगा। इस तरह व्यक्ति लक्ष्यों की वरीयता एवं उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनका क्रम-सूचन करता है।

आकांक्षा स्तर का समायोजन करना[संपादित करें]

इस अवधारणा में मरे यह मानते हैं कि व्यक्तियों में योग्यता, क्षमता, शैक्षणिक उपलब्धि और आकांक्षा की दृष्टि से समरूपता नहीं पायी जाती है। जैसे, आकांक्षा का स्तर तो बहुत ऊंचा है परन्तु योग्यता में कमी होती है। कभी आकांक्षा के स्तर नीचे हैं तो कभी चरित्र दोष होता है। अतः व्यक्ति में आकांक्षा की पूर्ति उस समय ही हो पाती है जब व्यक्ति उसका निर्धारण अपनी क्षमता, योग्यता तथा बौद्धिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर करता है। व्यक्ति को अपनी मानसिक, भावात्मक, सामाजिक, नैतिक एवं शारीरिक क्षमताओं को ध्यान में रखकर अपने आकांक्षा स्तर का निर्धारण करना चाहिए।

सामाजिक अपेक्षाएं[संपादित करें]

इस संकल्पना के अनुसार व्यक्तित्व के विकास में समाज, आनुवांशिकता तथा पर्यावरण को महत्त्वपूर्ण माना है। इनके विचार में व्यक्ति का अतीत तथा उसका इतिहास दोनों उसके व्यक्तित्व में महत्त्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति से समाज क्या अपेक्षा रखता है और व्यक्ति समाज से क्या अपेक्षा रखता है, इसका ज्ञान, फिर उसके अनुसार कार्य करना सरल नहीं होता। व्यक्ति के व्यक्तित्व का सामाजिक पक्ष प्रबल होता है। सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार जो लोग कार्य करते हैं, उन्हें समाज की प्र्यंसा प्राप्त होती है। परन्तु कभी-कभी ऐसी स्थितियां भी बनती हैं कि व्यक्ति अपने समाज की मान्यताओं के अनुसार कार्य करने में असमर्थ हो जाता है। उसके कई कारण हो सकते हैं और समाज का रूढ़िबद्ध हो जाना भी एक कारण हो सकता है। सामान्यतः व्यक्ति के व्यक्तित्व में जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक निर्धारण हैं, वे इस बात की ओर संकेत करते हैं कि व्यक्ति को कौन सा व्यवहार करना चाहिए और कौन सा नहीं, कौन से कार्य नैतिक हैं और किन कार्यों को समाज में अनैतिक माना है। व्यक्ति को सामाजिक अपेक्षाओं का अनुसरण करते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार चलना होता है और ऐसा करने से उसे सन्तोष मिलता है।

मरे का आवश्यकता सिद्धान्त[संपादित करें]

हेनरी मरे ने व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में आवश्यकताओं को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। उनके अनुसार व्यक्ति की जैविक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएं अनेक प्रकार की होती हैं, अपनी पुस्तक एक्सप्लोरेशन इन पर्सनलिटी में मरे ने जैविक और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की एक सूची भी दी है। आवश्यकताओं की यह सूची बड़ी व्यापक है। फिर भी उसका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।

  • 1. उपलब्धि- इस प्रकार की आवश्यकताओं में उच्च स्तरीय कार्य करना, बाधाओं को पार करना, उपलब्धि प्राप्त करना, कठिन कार्यों को पूरा करना और अपनी योग्यताओं और गुणों का समुचित प्रयोग कर आत्म सम्मान में वृद्धि करना।
  • 2. आक्रामकता- विरोध प्रकट करना, विरोधी का डटकर मुकाबला करना, विरोधी पर विजय पाना, बदला लेना तथा दंड देना जैसी आक्रामक क्रियाओं की आवश्यकता होती है।
  • 3. स्वायत्तता- इस प्रकार की आवश्यकता में व्यक्ति अपने सभी प्रकार के बंधनों को तोड़ने की क्षमता रखता है। वह स्वतंत्र रहना चाहता है और अपनी इच्छानुसार कार्य करना चाहता है। सामाजिक बंधनों को भी वह तोड़ना चाहता है। सामाजिक रीतियों का पालन न करना और उत्तरदायित्वहीन होना चाहता है।
  • 4. अवनयन- इसमें व्यक्ति अपने को हीन समझता है। वह बाहरी दबावों के सामने झुक जाता है, अपनी आलोचना निन्दा और दण्ड को चुपचाप स्वीकार कर लेता है। हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना, किसी भी परिस्थिति में अपने को ही गलत मानना, दुःख, दर्द, रोग और दुर्भाग्य को आमंत्रित करना फिर इनसे सुख पाना ये अवनयन आवश्यकताओं की विशेषताएं हैं।
  • 5. संवर्द्धन- इस प्रकार की इच्छाओं में व्यक्ति अपनी पसंद के लोगों के साथ रहना चाहता है। अपने प्रिय साथी के निकट रहना और उसका प्रेम पाना, उसे प्रेम देना, सहयोग करना इत्यादि शामिल है।
  • 6. प्रभाव- मरे के अनुसार इस प्रकार की इच्छाओं में दूसरों पर प्रभाव डालना और अपने आदेश द्वारा प्रभावित करना, दूसरों को काम न करने देना और अपने पर्यावरण के मानवीय परिवेश पर नियंत्रण करना आदि शामिल हैं।
  • 7. अवलंबिता- इस प्रकार की इच्छाओं में व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति किसी सहयोगी की सहायता से पूरी करने की इच्छा रखता है। व्यक्ति अपनी स्वयं की देखभाल, रक्षा एवं अन्य सभी प्रकार की आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है।
  • 8. काम- इसमें व्यक्ति काम जनित संबंध स्थापित करने और उसे प्रगाढ़ बनाने की इच्छा करता है, काम बढ़ाने की तथा काम क्रीड़ा में भाग लेने की इच्छा रखता है।
  • 9. विनोद- मरे के अनुसार इस प्रकार की इच्छा में मनोरंजन के लिए कार्यक्रमों में भाग लेना, हास-परिहास करना, खेलकूद, नृत्य, संगीत, नाटक आदि आयोजनों में भाग लेना आदि शामिल हैं।
  • 10. प्रदर्शन- इस इच्छा में व्यक्ति यह प्रयत्न करता है कि लोग उसे देखें और सुनें। अपना प्रदर्शन, अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न, दूसरों को आश्चर्यचकित करना और कभी-कभी मानसिक आघात पहुंचाना इत्यादि इस इच्छा के अन्तर्गत आते हैं।
  • 11. अनुवर्तन- इस प्रकार की आवश्यकता में अपने से उच्च अथवा श्रेष्ठ व्यक्ति की प्रशंसा करना, उसका समर्थन करना, सामाजिक रीति-रिवाज के अनुसार चलना, अपने सहयोगियों के सुझावों को सहर्ष स्वीकार करना शामिल है।
  • 12. व्यवस्था- इसमें वस्तुओं को व्यवस्थित करना, स्वच्छता बनाए रखना, व्यवस्थीकरण तथा कार्यों को संतुलित और सही-सही ढंग से करना आदि आते हैं।
  • 13. प्रतिकर्म- असफल होने पर सफलता के लिए पुनः प्रयास करना, अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाना और भय को निकालना, आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करना, अपमानित होने पर पुनः अच्छा कार्य करके सम्मान प्राप्त करना।
  • 14. प्रतिरक्षण- इसमें व्यक्ति अपने अहम् की रक्षा करते हुए उसके अनुसार कार्य करता है। अपने कर्मों को उचित बताना तथा अपनी असफलताएं और अपमान को छिपाना, निन्दा, आलोचना और आक्रमण आदि से स्वयं की रक्षा करना आदि सम्मिलित हैं।
  • 15. परिपोषण- ऐसी आवश्यकताओं में व्यक्ति दूसरों की सेवा व सुरक्षा करने में रूचि लेता है। वह दीनहीन एवं दुर्बल व्यक्तियों एवं जीवों के प्रति सहानुभूति रखता है और उनकी सहायता करता है। यदि वे संकट में हों तो उन्हें संकट से उबारने के लिए भी सहायता करता है।
  • 16. क्षति परिवर्जन- घातक बीमारी, खतरनाक स्थिति, शारीरिक आघात, पीड़ा आदि स्थितियों में अपना बचाव करना या अपेक्षित सावधानी बरतना।
  • 17. अपकीर्ति परिवर्जन- अपमान एवं अवमानना से अपने आप को बचाना, ऐसी स्थितियों या परिस्थितियों से दूर हो जाना जो दुःखदायी हों, उन परिस्थितियों से अपने आप को बचाना, ये हीनता की भावना उत्पन्न करती हैं। जहां सम्मान, आदर न मिले और लोग छोटा समझें या ध्यान न दें वहां न जाना, असफलता के भय से काम न करना।

आवश्कताओं के प्रकार[संपादित करें]

उपरोक्त आवश्यकताओं की सूची जो हेनरी मरे ने दी है उनके अतिरिक्त उन्होंने आवश्यकताओं के प्रकारों पर भी व्याख्याएं की हैं। हेनरी मरे ने आवश्यकताओं के कुछ प्रकार बताए हैं वे इस प्रकार हैं-

  • (१ क) आन्तरिक आवश्यकताएं (Viscerogenic needs)
  • (१ ख) मनोजन्य आवश्यकताएं (Psychogenic needs)
  • (२ क) प्रकट आवश्यकताएं (Overt needs)
  • (२ ख) अप्रकट आवश्यकताएं (Covert needs)
  • (३ क) केंद्रिक आवश्यकताएं (Focal needs)
  • (३ ख) विकीर्ण आवश्यकताएं (Diffused needs)
  • (४ क) अग्रलक्षी आवश्यकताएं (Proactive needs)
  • (४ ख) प्रतिक्रियात्मक आवश्यकताएं (Deactivate needs)
  • (५ क) प्रक्रम क्रिया आवश्यकताएं (Process needs)
  • (५ ख) निश्चयात्मक आवश्यकताएं (Model needs)

आंतरिक आवश्यकताएं[संपादित करें]

ये आवश्यकताएं मूलतः शरीर सम्बंधी होती हैं। भूख, पशास, श्वास, मलमूत्र त्याग आदि आन्तरिक आवश्यकताएं मानी गई हैं। हेनरी मरे के अनुसार ये आवश्यकताएं प्राथमिक हैं।

मनोजन्य आवश्यकताएं[संपादित करें]

ये द्वितीयक आवश्यकताएं हैं। ये आवश्यकताएं आन्तरिक आवश्यकताओं से उत्पन्न होती हैं तथा मनोजन्य रूप धारण कर लेती हैं। जैसे=वस्तुओं के एकत्रीकरण की इच्छा, समाज में मानशता तथा प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छा आदि।

प्रकट आवश्यकताएं[संपादित करें]

हेनरी मरे के अनुसार कुछ आवश्यकताएं ऐसी हैं जो शारीरिक क्रियाओं अथवा गति सम्बंधी व्यवहारों द्वारा प्रकट होती हैं, ये आवश्यकताएं प्रकट हैं।

अप्रकट आवश्यकताएं[संपादित करें]

इन आवश्यकताओं की कोटि में दिवास्वप्न अथवा कल्पना जैसी मानसिक क्रियाएं होती हैं। हेनरी मरे के अनुसार इन आवश्यकताओं का सम्बंध व्यक्ति के पराहम् से होता है। जब व्यक्ति आदर्शों, मूल्यों आदि को जीवन का अंग बनाता है तो अप्रकट आवश्यकताएं सक्रिय होती हैं क्योंकि इसमें व्यक्ति अपनी सभी आवश्यकताओं को प्रकट नहीं कर पाता है।

केंद्रिक आवश्यकताएं[संपादित करें]

कुछ आवश्यकताएं सीमित होती है, ये केंद्रिक आवश्यकताएं हैं। कुछ आवश्यकताएं सभी वस्तुओं से सम्बंधित हैं। जब व्यक्ति या वस्तु से ये आवश्यकताएं अधिक सम्बंधित होती हैं तो ये बाद में मनोविकास का रूप ले लेती हैं।

विकीर्ण आवश्यकताएं[संपादित करें]

यदि आवश्यकताएं विकीर्ण रहती हैं या व्यक्ति या वस्तु से सम्बंध नहीं रखती हैं तो इससे भी मनोविकार उत्पन्न होता है।

अग्रलक्षी आवश्यकताएं[संपादित करें]

हेनरी मरे के अनुसार जो आवश्यकताएं व्यक्ति की आन्तरिक वृत्तियों से हैं या जो बिना किसी उद्दीपन के सहज रूप में होती हैं, वे अग्रलक्षी आवश्यकताएं हैं। सामाजिक संदर्भ में इन आवश्यकताओं का महत्व माना गया है। जब व्यक्ति अपने साथी से आगे बढ़कर वार्ता करता है या अनुक्रिया के लिए प्रेरित करता है तो वे आवश्यकताएं अग्रलक्षी हैं।

प्रतिक्रियात्मक आवश्यकताएं[संपादित करें]

हेनरी मरे के अनुसार एक व्यक्ति जब अपने साथी को अनुक्रिया के लिए प्रेरित करता है तब साथी की अनुक्रिया ही प्रतिक्रियात्मक आवश्यकताएं हैं।

प्रक्रम क्रिया आवश्यकताएं[संपादित करें]

कुछ क्रियाएं अनिश्चित रूप से बिना किसी लक्षश की होती हैं, जैसे कोई व्यक्ति बिना लक्षश की मानसिक क्रिया में लीन रहता है और काल्पनिक जगत् में विचरण करता है, हेनरी मरे के अनुसार ये क्रियाएं प्रक्रम क्रिया की देन हैं।

निश्चयात्मक आवश्यकताएं[संपादित करें]

जब व्यक्ति सृजन्यील कारश में लगता है तब निश्चयमात्रिक आवश्यकता की पूर्ति होती है। इसमें काल्पनिक जगत् में विचरण करने की विपरीत क्रिया होती है। व्यक्ति ऐसे कारश करता है जिनसे किसी क्षेत्र में उसकी श्रेष्ठता सिद्ध हो। हेनरी मरे ने आवश्यकताओं के विभिन्न प्रकार निर्धारित किये हैं फिर भी उनका विचार है कि सभी आवश्यकताएं एक दूसरे से सम्बंध रखती हैं। कुछ आवश्यकताएं तीव्र होती हैं तथा उनकी तुष्टि तुरन्त करना आवश्यक होता है। आवश्यकताओं की तीव्रता और महत्व के आधार पर व्यक्ति उनका क्रम निर्धारित करता है तथा उसके समाधान के लिए प्रयत्न करता है। कुछ आवश्यकताओं की तुष्टि अनेक प्रयास करने पर होती है। कुछ आवश्यकताएं पर्यावरण से सम्बंधित होती हैं। कुछ आवश्यकताएं आन्तरिक तथा बाहश जीवन से प्रेरित होती हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करने के लिए व्यक्ति और उसके पर्यावरण में एक सम्बंध होता है। इसके लिए हेनरी मरे ने दबाव या प्रेस की संकल्पना प्रस्तुत की। जिस प्रकार आवश्यकताएं व्यवहार से प्रभावित होती हैं उसी प्रकार पर्यावरण के प्रभावों द्वारा भी व्यवहार प्रभावित होते हैं। व्यक्ति को अपनी आवश्यकता के अनुसार कारश एवं व्यवहार करने के लिए सामाजिक नियमों का धशान रखना आवश्यक हो जाता है। ये सामाजिक नियम ही एक प्रकार के दबाव हैं जो व्यक्ति के व्यवहार को पूरी छूट नहीं देते हैं। समाज में व्यक्ति को दूसरों का धशान भी रखना पड़ता है। इस प्रकार सामाजिक संदर्भ में ही उनकी इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति होनी होती है।

मरे की दबाव सूची[संपादित करें]

हेनरी मरे ने विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की तरह ही दबाव सूची भी बनाई। इन दबावों को दो वर्गों में बांटा गया है-

  • अल्फा दबाव- मरे के अनुसार व्यक्ति अथवा वस्तु के स्वरूप एवं प्रकृति में पाए जाने वाले दबाव अल्फा दबाव हैं।
  • बीटा दबाव- मरे के अनुसार व्यक्ति का अपने पर्यावरण की वस्तुओं एवं समाज विषयक दबाव की धारणा बीटा दबाव है।

हेनरी मरे द्वारा प्रस्तुत दबाबों की सूची में परिवार, स्वास्थ्य, समाज के सम्बंधों पर आधारित हैं। इन दबावों का विवरण निम्न प्रकार से है-

  • (१) पारिवारिक सहायता का अभाव- व्यक्ति में इस दबाव के कारण सांस्कृतिक तथा पारिवारिक विसंगतियां पायी जाती हैं। जिनके माता-पिता का सम्बंध विच्छेद हो, चंचल अनुशासन हो, माता-पिता में एक की बीमारी अथवा मृत्यु, गरीबी तथा घर में अवशवस्था के कारण दबाब की स्थिति पायी जाती है।
  • (२) खतरा या दुर्भाग्य- व्यक्ति में भौतिक या शारीरिक संरक्षण का अभाव पाया जाता है या व्यक्ति को ऊंचाई से गिरने का डर, पानी में डूबने का भय, अकेलेपन, अंधेरे तथा खराब मौसम का भय, बिजली, आग का भय या अनश भयों के कारण व्यक्ति में दबाब की स्थिति पायी जाती है।
  • (३) अभाव अथवा हानि- व्यक्ति में पोषण की कमी, वस्तुओं का अभाव, संगी साथी तथा विभिन्नता के अभाव के कारण दबाव पाया जाता है।
  • (४) अस्वीकरण, उपेक्षा और तिरस्कार- जब व्यक्ति को किसी तरह का अस्वीकरण, उपेक्षा और तिरस्कार मिलता है तो उस कारण से दबाव की स्थिति बन जाती है।
  • (५) प्रतिद्वन्द्वी, प्रतियोगी सहकर्मी- व्यक्ति को प्रतिद्वन्द्विता या प्रतियोगी सहकर्मी के कारण भी दबाव की स्थिति बनती है।
  • (६) सहोदर भाई या बहन का जन्म- परिवार में सहोदर भाई या बहन के जन्म के बाद बच्चे को यह लगता है कि उसे कम पशार मिल रहा है या उसकी उपेक्षा हो रही है या अनश कई ऐसे कारण हैं जो उसकी मानसिकता को प्रभावति करते हैं। इससे उसकी स्थिति दबाव की बनती है।
  • (७) आक्रामकता- जब व्यक्ति को किसी वरिष्ठ पुरुष अथवा स्त्री का दुर्व्यवहार सहना पड़ता है या उसके साथियों का बुरा बर्ताव या झगड़ालू संगी-साथी हों तो व्यक्ति में दबाव की स्थिति पैदा होती है।
  • (८) प्रभुत्व परिपोषण- यदि बच्चे के माता-पिता में एक का अहम् ज्यादा हो और बच्चे पर उसका ही प्रभुत्व बना रहे या इस वातावरण में उसका पोषण हो, जाति, बुद्धि वशवसाय आदि सम्बंधी प्रभुत्व हो तो दबाव की स्थिति उत्पन्न होती है। माता-पिता में एक का आवश्यकता से अधिक उदार होना या बच्चे के परिपोषण में किसी प्रकार के भय, दुर्घटना, बीमारी आदि के प्रभावों की अधिकता होती है तो बच्चे के लिए ये परिस्थितियां दबाव उत्पन्न कर देती हैं। हेनरी मरे के अनुसार विभिन्न दबावों और आवश्यकताओं के बीच अन्तःक्रिया होती है तथा इसी के आधार पर व्यक्ति का व्यवहार निर्भर करता है। व्यवहार का जब वशापक रूप बनता है तो मरे ने इसे प्रसंग या सीमा कहा है। यह सीमा आवश्यकताओं और दबावों की अन्तःक्रिया के फलस्वरूप होती है। जब व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति के समय प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण के दबावों को अनुभव करता है तो इसी बीच प्रसंगों की उत्पत्ति होती है। इन प्रसंगों का व्यक्तित्व के अधशयन में बहुत योगदान है। इन प्रसंगों के विश्लेषण के आधार पर मरे ने प्रपेक्षी परीक्षण (टी. ए. टी.) तैयार किया जो व्यक्तित्व अध्ययन के लिए विखशात है। मरे के अनुसार प्रसंग अथवा सीमा एक प्रकार की विश्लेषण की यूनिट है या इकाई है जो व्यक्ति के परस्पर सम्बंधों को समझने में सहायक होती है। इसके साथ ही मरे ने परस्पर सम्बंधों में व्यवहार का विश्लेषण करते हुए द्वितीय इकाई का भी उल्लेख किया। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के व्यवहार का विश्लेषण करते समय उस व्यक्ति पर पूरा धशान देना होता है जिसके व्यवहार का हम अधशयन कर रहे हैं और दूसरी ओर उस व्यक्ति की प्रकृति और स्वभाव को भी धशान में रखना पड़ता है जो पहले व्यक्ति से परस्पर व्यवहार और विचारों का आदान-प्रदान करता है। अर्थात् इस प्रकार के अधशयन में विषयी और विषय पर समान रूप से धशान दिया जाता है।

मूल्य[संपादित करें]

हेनरी मरे ने व्यक्ति के मूल्यों पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने सात प्रकार के मूल्य निर्धारित किये हैं। ये मूल्य हैं-

१. शारीरिक मूल्य, २. सम्पत्ति मूल्य, ३. सत्ता मूल्य, ४. संवर्द्धन मूल्य, ५. ज्ञान मूल्य, ६. सौन्दर्य बोधीय मूल्य, ७. वैचारिक मूल्य
  • (१) शारीरिक मूल्य- हेनरी मरे के अनुसार शारीरिक मूल्य जैविक मूल्य हैं और ये मूल्य शारीरिक स्वास्थ्य, शारीरिक देखभाल और संरक्षण से सम्बंधित है।
  • (२) सम्पत्ति मूल्य- इन मूल्यों में मरे ने व्यक्ति की सम्पत्ति, धन, भवन आदि को सम्पत्ति मूल्य माना है। व्यक्ति के पास में उपलब्ध वस्तु को कितना मूल्यवान या उपयोगी मानता है।
  • (३) सत्ता मूल्य- इसमें सत्ता और अधिकार मूल्यों को महत्व दिया जाता है। अपनी सत्ता और अधिकार को उपयोग में लेते हुए व्यक्ति कशा निर्णय लेता है या उसके निर्णय की शक्ति कितनी है, ये सत्ता मूल्य के अन्तर्गत आते हैं।
  • (४) संवर्द्धन मूल्य- पारिवारिक सम्बंधों एवं परस्पर सामाजिक सम्बंधों तथा सांस्कृतिक सम्बंधों पर आधारित मूल्यों को ही हेनरी मरे ने संवर्द्धन मूल्य कहा है।
  • (५) ज्ञान मूल्य- ज्ञान-विज्ञान से सम्बंधित सम्बंधों, तथशों और संकल्पनाओं के ज्ञान को ज्ञान मूल्य माना हैं।
  • (६) सौन्दर्य-बोधीय मूल्य- इसके अन्तर्गत हेनरी मरे ने संगीत, नाटक एवं कलाओं से सम्बंधित मूल्यों को लिया है।
  • (७) वैचारिक मूल्य- इसके अन्तर्गत धर्म, दर्शन जीवन र्दशन पर आधारित व्यक्ति के विचारों के मूल्यों को वैचारिक मूल्य माना है।

व्यक्तित्व का विकास[संपादित करें]

हेनरी मरे का व्यक्तित्व विकास के बारे में यह मानना है कि जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त व्यक्ति के व्यक्तित्व का जो इतिहास है वही वास्तव में व्यक्तित्व है। उन्होंने व्यक्तित्व विकास पर तीन बातों का मुख्य रूप से उल्लेख किया-

1. मनोग्रंथियों का प्रभाव, 2. सांस्कृतिक प्रभाव, 3. सामाजीकरण।

मनोग्रंथियों का प्रभाव[संपादित करें]

हेनरी मरे ने व्यक्तित्व विकास में मनोग्रंथियों का विशेष प्रभाव माना है। इन मनोग्रंथियों को शैशविक मनोवृत्तियों के रूप में माना है। ये पांच प्रकार की हैं-

1. संवृत्त मनोग्रंथियां, 2. मुख मनोग्रंथियां, 3. गुदा मनोग्रंथियां, 4. मूत्रमार्गी मनोग्रंथियां, 5. बधियाकरण मनोग्रंथियां

संवृत्त मनोग्रंथियां[संपादित करें]

इस ग्रंथि के बारे में मरे की यह धारणा है कि मां के गर्भ में रहते हुए बच्चा अधिक सुरक्षित अनुभव करता है। जब उसका जन्म होता है तो गर्भ से बाहर आते ही उसको बाहश वातावरण से भय लगता है और अचानक उसमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो जाती है। फलस्वरूप नवजात शिशु पुनः गर्भ में जाना चाहता है और यहीं पर संवृत्त मनोग्रंथि का विकास होता है। हेनरी मरे के अनुसार संवृत्त मनोग्रंथि के मूल में गर्भ में पहले की स्थिति में जाने की इच्छा निहित होती है तथा दूसरी बात यह है कि उसमें असुरक्षा एवं असहायता से सम्बंधित दुश्चिन्ता हो जाती है। तीसरी बात यह है कि नवजात शिशु संवृत्ति मनोग्रंथि के द्वारा घुटन से मुक्त होना चाहता है।

हेनरी मरे ने जन्म से पूर्व की अवस्था में जाने वाली स्थिति को 'सरल संवृत्त मनोग्रंथि' माना है। इसका उल्लेख करते हुए मरे ने बताया कि नवजात शिशु की यह इच्छा होती है कि वह पुनः गर्भ जैसे स्थान में जाकर अपने को सुरक्षित कर ले। क्योंकि गर्भ के भीतर उसकी सारी आवश्यकताएं अपने आप पूरी होती रहती हैं तथा यह अनश वस्तु पर निर्भर नहीं रहता है। मरे के अनुसार संवृत्त मनोग्रंथि का दूसरा रूप भय पर आधारित है। नवजात शिशु जब जन्म लेता है तब खुली जगह चाहता है या गिरने के भय से त्रस्त रहता है और यह मनोग्रंथि भय मनोग्रंथि के रूप में विकसित होती है। मरे ने संवृत्त मनोग्रंथि का तीसरा रूप 'मुक्ति' माना है। इसमें शिशु स्वतंत्र होना चाहता है, बाहर निकलना चाहता है तथा खुली जगह में रहना चाहता है। मरे ने इस ग्रंथि का नाम निर्गमन मनोग्रंथि रखा।

मुख मनोग्रंथियां[संपादित करें]

फ्रायड की तरह हेनरी मरे ने भी शिशु के खाने-पीने और चूसने की क्रियाओं में जो सुख मिलता है उसे मुख मनोग्रंथि के अन्तर्गत रखा, हालांकि हेनरी मरे ने इसके काम वासना के पक्ष पर उतना जोर नहीं दिया जितना कि फ्रायड ने। हेनरी मरे ने मुख मनोग्रंथियों के तीन प्रकार माने हैं-

  • (१) मुख अवलंबिता मनोग्रंथि,
  • (२) मुख आक्रामकता,
  • (३) मुख अस्वीकरण मनोग्रंथि।

मुख अवलंबिता मनोग्रंथि के फलस्वरूप बच्चा मुख सम्बंधी क्रियाओं जैसे खाने-पीने और चूसने में लगा रहता है। जब वह मां का स्तनपान करता है अथवा अंगूठा चूसता है तो उसे अवलंबिता मनोग्रंथि की संतुष्टि मिलती रहती है। आक्रामकता मनोग्रंथि में बच्चा किसी वस्तु को मुंह से काटकर सुख की अनुभूति करता है। मां का स्तन काटना या अनश किसी को काटना आक्रामकता मनोग्रंथि की संतुष्टि है। यही क्रिया कालान्तर में आक्रामकता को जन्म देती है। बड़े होने पर भी मुंह से किसी चीज का काटना अथवा हकलाना इस बात का संकेत देती है कि व्यक्ति में मुख आक्रामकता मनोग्रंथि प्रबल है। मुख अस्वीकरण मनोग्रंथि में बच्चा अपनी असहमति व अप्रसन्नता वशक्त करने के लिए थूकता है और मुख सम्बंधी क्रियाओं और दोस्तों के प्रति अपनी अप्रसन्नता या दुर्भावनाओं को प्रकट करता है। जैसे बच्चे का दूध पीने से इंकार करना या कोई विशेष प्रकार के भोजन को न करना।

गुदा मनोग्रंथियां[संपादित करें]

हेनरी मरे के अनुसार जब बच्चा बार-बार मल त्यागता है तो उसे एक प्रकार की सुखानुभूति होती है। इसको मरे ने गुदा अस्वीकरण मनोग्रंथि कहा है। जब बच्चा मल त्याग को रोकता है और शीघ्र मल त्याग नहीं करता तो इस प्रवृत्ति को गुदा अवरोध मनोग्रंथि माना।

मूत्रमार्गीय मनोग्रंथि[संपादित करें]

इस मनोग्रंथि में बालक या व्यक्ति को मूत्र त्याग करते समय एक वशिड्ढ प्रकार के सुख की अनुभूति होती है। कुछ बच्चे बिस्तर पर ही मूत्र त्याग करते है। ऐसा करने से उसे सुख मिलता है। यह भी मूत्रमार्गीय मनोग्रंथि का एक रूप है।

बधियाकरण मनोग्रंथि[संपादित करें]

हेनरी मरे ने फ्रायडवादियों की तरह बधियाकरण मनोग्रंथि को महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया। उनका कहना है कि बधियाकरण मनोग्रंथि की व्याख्या उसके शाब्दिक अर्थों तक ही सीमित रखनी चाहिए। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चे की कल्पना में यह बात आती है कि उसका लिंग काट दिया जा सकता है तो उसके फलस्वरूप उसके मन में एक चिंता उत्पन्न होती है। परन्तु इस दुश्चिन्ता को सभी प्रकार के मनस्तंत्रिका तापी मनोविकार का कारण ही मान सकते है।

संस्कृति का प्रभाव[संपादित करें]

व्यक्तित्व के विकास पर हेनरी मरे ने इस बात को स्पष्ट किया कि इस पर जैविक निर्धारण के साथ-साथ सांस्कृतिक निर्धारकों का भी प्रभाव पड़ता है। डॉ. जायसवाल के अनुसार हेनरी मरे ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति-

  • (१) सभी व्यक्तियों के समान है।
  • (२) कुछ-कुछ व्यक्तियों के समान है।
  • (३) कुछ व्यक्तियों के समान है।
  • (४) किसी के समान नहीं है।

जब व्यक्ति में विभिन्न जैविक और सांस्कृतिक निर्धारकों में समानताएं पाई जाती है तो वह सभी व्यक्तियों के समान होता है। कई समाजों व संस्कृतियों में कुछ ऐसे तत्व अवश्य होते है जो सभी संस्कृतियों में उभयनिष्ट (कॉमन) होते हैं। इसी प्रकार जीवन विज्ञान की दृष्टि से मनुष्य में मनोशरीरीय रचना में अनेक तत्व समान पाए जाते हैं। मरे ने अपनी दूसरी बात में यह माना कि प्रत्येक व्यक्ति कुछ व्यक्तियों के समान है, इस तथश में उन्होंने व्यक्ति में पाए जाने वाले उन गुणों का जिक्र किया है जिनका सम्बंध एक संस्कृति से होता है। एक संस्कृति में रहने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व में कुछ समान गुण पाए जाते हैं। जैसे कि एक भारतीय के व्यक्तित्व में भारतीयता के कुछ उभयनिष्ठ गुण पाए जाएंगे जो भारतीय संस्कृति की देन है। इसी तरह दूसरे देशवासियों जैसे जर्मनी के लोगों में कुछ ऐसे उभयनिष्ठ लक्षण पाए जाएंगे जो जर्मन संस्कृति की देन है। अपनी तीसरी बात में मरे ये कहते हैं कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के समान नहीं होता। इसका तात्पर्य व्यक्तित्व की अनन्यता (यूनिकनेस) से है। व्यक्तित्व की अनन्यता जैविक व सांस्कृतिक दोनों कारणों से, लिंग और आयु, शरीर की बनावट, वर्ण आदि के कारण से होती है। इसके अतिरिक्त शारीरिक शक्ति की सीमा अधिगम की क्षमता, निराशा और कुंठाओं को बर्दाश्त करने की सीमा प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न होती है। ये कारण भी व्यक्ति की अनन्यता निर्धारित करने में सहायक होते है।

समाजीकरण[संपादित करें]

हेनरी मरे के अनुसार मनुष्य की समाजीकरण की प्रक्रिया अपने परिवार में शैशव काल से ही प्रारम्भ हो जाती है। नवजात शिशु को परिवार के सदस्य सिखाना प्रारम्भ कर देते हैं। अतः समाजीकरण में परिवार और उसके सदस्यों की एक अहम भूमिका होती है। इस स्तर पर व्यक्ति अपने पर नियंत्रण, अपने व्यवहार में संशोधन, बांछनीय व अवांछनीय आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति पर नियंत्रण, अवांछनीय वस्तुओं अथवा व्यक्ति से संबंध न रखना, सभी काम समय पर करना सीख जाता है। इनके अतिरिक्त समाज के प्रचलित नियमों, विधियों एवं रिवाजों के अनुसार भी चलना सीख जाता हैं। बच्चा जब बड़ा होता है तब परिवार से निकलकर पास-पड़ोस तथा विद्यालय में जाता है, वहां पर भी उसका समाजीकरण होता रहता है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति का शारीरिक विकास एवं आयु वृद्धि होती है, त्यों-त्यों वह अपनी जैविक एवं सांस्कृतिक निर्धारकों से समाजीकरण सीखता रहता है।