हलासन

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इस आसन में शरीर का आकार हल जैसा बनता है। इससे इसे हलासन कहते हैं। हलासन हमारे शरीर को लचीला बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे हमारी रीढ़ सदा जवान बनी रहती है।

सावधा‍नी[संपादित करें]

रीढ़ संबंधी गंभीर रोग अथवा गले में कोई गंभीर रोग होने की स्थिति में यह आसन न करें। आसन करते वक्त ध्यान रहे कि पैर तने हुए तथा घुटने सीधे रहें।

लाभ[संपादित करें]

रीढ़ में कठोरता होना वृद्धावस्था की निशानी है। हलासन से रीढ़ लचीली बनती है। मेरुदंड संबंधी ना‍ड़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा होकर वृद्धावस्था के लक्षण जल्दी नहीं आते। हलासन के नियमित अभ्यास से अजीर्ण, कब्ज, अर्श, थायराइड का अल्प विकास, अंगविकार, असमय वृद्धत्व, दमा, कफ, रक्तविकार आदि दूर होते हैं। सिरदर्द दूर होता है। नाड़ीतंत्र शुद्ध बनता है। शरीर बलवान और तेजस्वी बनता है। लीवर और प्लीहा बढ़ गए हो तो हलासन से सामान्यावस्था में आ जाते हैं। अपानवायु का उत्थानन होकर उदान रूपी अग्नि का योग होने से कुंडल‍िनी उर्ध्वगामी बनती है। विशुद्धचक्र सक्रिय होता है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]