स्टॉकहोम सिंड्रोम
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स्टॉकहोम सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति होती है जब अगुवा होने वाले व्यक्ति को अपने अपहर्ता के साथ सहानुभूति हो जाती है।[1] ये कैद के दौरान अस्तित्व के लिये एक रणनीति का रूप माना जात हैं।
निल्स बेजरोट ने इस शब्द को गढ़ा जो की एक स्वीडिश अपराधविज्ञानी और मनोचिकित्सक थे। अगस्त १९७३ में यान-एरिक ऑल्सन ने स्टॉकहोम की एक बैंक क्रेडिटबैंकन के चार कर्मचारियों को बंधक के रूप में लिया। स्टॉकहोम पुलिस से समझौता वार्ता के दौरान उन्होंने अपने दोस्त क्लार्क ओलोफसन की जेल से रिहाई मांगी ताकी वो उसकी मदद कर सके। उन्होंने बंधकों को बैंक की तिजोरी में छः दिनों (अगस्त २३-२८) तक कैद कर रखा था। जब बंधकों को रिहा कर दिया गया, तो उनमें से किसी ने भी अदालत में बंदी बनानेवालों के खिलाफ गवाही नहीं दी; और असल में बाद में वे उन्हे मिलने जेल भी जाते रहे।[2]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "कोठरी में हिम्मत की मिसाल". बीबीसी. २५ अगस्त २००६. 18 जुलाई 2015 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: १ सितंबर २०१७.
- ↑ क्रिस्टोफर क्लेन (२३ अगस्त २०१३). "The Birth of "Stockholm Syndrome," 40 Years Ago" ["स्टॉकहोम सिंड्रोम" का जन्म, ४० साल पहले] (अंग्रेज़ी भाषा में). 15 सितंबर 2017 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: १ सितंबर २०१७.
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