सैनिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण

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चित्र:Prcinfantry.jpg
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवानों का प्रशिक्षण

सैनिक शिक्षण तथा प्रशिक्षण (Military education and training) वह प्रक्रिया है जिसका लक्ष्य सैन्यकर्मियों की क्षमता बनाना एवं उसे विकसित करना है ताकि वे अपनी भूमिका का प्रभावी रूप से निर्वहन कर सकें। सैनिक शिक्षा स्वैच्छिक हो सकती है, और अनिवार्य भी।

सैन्य सेवा हेतु चयन एवं वर्गीकरण के उपरान्त सैनिकों को प्रशिक्षित करना होता है। विभिन्न परिवेश, संस्कार व भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी एवं सोच के चयनित रंगरूटों को अनुशासित करना तथा उन्हें सैन्य प्रशिक्षण प्रदान करना निश्चित ही कठिन एवं चुनौती पूर्ण कार्य है, लेकिन मनोवैज्ञानिक अध्ययन एवं प्रयोगों ने इस कार्य को काफी सरल कर दिया है।

एक व्यक्ति स्वयं की प्रेरणा अथवा मूल प्रवृत्तियों से प्ररित होकर अनेक कार्य करता है। इसी के फलस्वरूप वह अपने स्वभाव के अनुसार किसी नवीन परिस्थिति के सम्पर्क में आता है। जब व्यक्ति अपनी मूल प्रवृत्तियों की संतुष्टि हेतु अपने पहले के अनुभव के आधार पर अथवा स्वाभाविक आधार पर नवीन परिस्थितियां निर्मित करने में स्वयं को असमर्थ सा पाता है तो वह इन परिस्थितियों के साथ अभियोजन करने के लिये प्रयत्न करने लगता है। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप वह क्रमानुसार त्रुटिपूर्ण व्यवहार छोड़ने लगता है एवं परिस्थिति के प्रति समायोजन करने में सफल होने वाले व्यवहार को अपनाता जाता है। इस प्रकार उसके स्वाभाविक व्यवहार अथवा अतीत को अनुभूतियों में क्रमानुसार उन्नतिशील परिवर्तन अथवा परिमार्जन को सीखना (learning) कहते है। इस प्रकार " सीखने से तात्पर्य उस मानसिक प्रक्रिया से है जिसमें व्यक्ति के स्वाभाविक व्यवहार या अतीत के अनुभवों एवं व्यवहार में उन्नतिशील परिवर्तन अथवा परिमार्जन होता है। "

सीखने की प्रक्रिया का विश्लेषण करने पर क्रमश: निम्नलिखित तथ्य प्राप्त होते हैं-

1. आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रक्रिया या प्रयास करना।

2. नई परिस्थितियों का उत्पन्न होना।

3. नई परिस्थितियों के प्रति अभियोजन की स्वाभाविक प्रक्रिया प्रारम्भ करना।

4. स्वाभाविक व्यवहार अथवा अतीत के अनुभवों के आधार पर नवीन परिस्थितियों के साथ अभियोजन करने में कठिनाई।

5. अभियोजन हेतु नवीन पथ का अन्वेषण करना।

6. नवीन पथान्वेषण के फलस्वरूप व्यक्ति की स्वाभाविक एवं अतीतकालीन अनुभूतियों एवं व्यवहार में उन्नतिशील, परिवर्तन अथवा परिमार्जन का होना।

7. समायोजन करने में सफलता प्राप्त करने के प्रयास की पुनरावृत्ति।

8. सफल होने के लिये प्रयत्न करने के परिणामस्वरूप उन्नतिशील, परिवर्तित व परिमार्जित अनुभवों एवं व्यवहार में स्थायित्व का आ जाना। इसी स्थायी स्वरूप को ही ' सीखने की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है। '

सीखने की प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने वाले तत्व[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया को सुदृढ बनाने वाले तत्वों से तात्पर्य उन परिस्थितियों एवं अवस्थाओं से है जो शिक्षण की प्रक्रिया को दृढ़ बनाती है एवं जिनके अभाव में शैक्षिक प्रक्रिया निर्बल या असम्भव हो जाती है। सीखने की प्रक्रिया को इस प्रकार से प्रभावित करने वाले तत्व निम्नलिखित हैं

प्रेरणा[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया पर सर्वाधिक प्रभाव प्रेरणा का पड़ता है। शिक्षण प्रक्रिया को सुदृढ़ या निर्बल करने में प्रेरणा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। शिक्षण की प्रक्रिया पर प्रेरणा का प्रभाव ज्ञात करने के लिये अनेक मनोवैज्ञानिकों ने भूख, प्यास, पुरस्कार, दण्ड, प्रशंसा, निन्दा एवं प्रतियोगिता आदि प्रेरणाओं के पड़ने वाले प्रभाव का परीक्षात्मक रूप से अध्ययन किया। इन अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि, इन प्रेरणाओं के परिणामस्वरूप प्रयोज्यों में सीखने की प्रक्रिया द्रुत गति से एवं प्रभावी रूप में हुई। दूसरी ओर इन प्रेरणाओं के अभाव में सीखने की रुचि में पर्याप्त कमी दृष्टिगोचर हुई। इसके फलस्वरूप, सीखने की प्रक्रिया या तो हुई ही नहीं या निर्बलता से हुई। यहाँ हम सैन्य-प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर कुछ प्रमुख प्रेरणाओं के प्रभाव पर विचार करेंगे। ये प्रेरणायें है-

( क ) पुरस्कार का प्रभाव।

( ख ) भूख का प्रभाव।

( ग ) प्रशंसा एवं निन्दा।

( घ ) स्पर्धा तथा सम्मान।

शिक्षा की प्रक्रिया पर पारितोषिक के प्रभाव का अध्ययन करने के लिये मनोवैज्ञानिकों ने समान आयु एवं बुद्धि के 16 बालकों पर परीक्षण किया। पहले उन्होंने इन बालकों को तीन समूहों में विभाजित कर दिया एवं भूल-भुलइया में पहुंचने की प्रक्रिया को सीखने के लिये पुरस्कार द्वारा प्रेरित किया। पहले समूह को भूल-भुलइया में ठीक मार्ग से जाने पर कोई भी पुरस्कार नहीं दिया गया। दूसरे समूह को ठीक मार्ग से जाने पर कुछ पैसे पुरस्कार स्वरूप दिये गये एवं तीसरे समूह को ठीक मार्ग से जाने पर ' शाबाश ' वाह-वाह ' आदि के द्वारा प्रोत्साहित किया गया। मनोवैज्ञानिकों ने इस परीक्षण द्वारा यह निष्कर्ष प्राप्त किया कि जिस समूह को पैसों का पुरस्कार दिया गया था, उसने भूल-भुलइया में जाना सर्वप्रथम अधिगमन कर लिया, जिस समूह को मनोवैज्ञानिक पुरस्कार दिया गया था, उसके सीखने की गति मन्द रही तथा जिस समूह को किसी भी प्रकार का पुरस्कार नहीं दिया गया था उसके सीखने की गति अत्यधिक मन्द रही। इस परीक्षण के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सीखने की प्रक्रिया पर पुरस्कार एवं पुरस्कार की प्रकृति दोनों का ही अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

सैन्य-संदर्भो में सैनिकों को पुरस्कार द्वारा प्रोत्साहित करने की परम्परा काफी पुरानी रही है। आचार्य शुक्र ने शुक्रनीति ( 2/343 ) में ' पारितोषिक ' को परिभाषित करते हुए लिखा है- “ सेना शौर्यादि संतुष्टैर्दन्तं तत्पारितोषिकम " अर्थात् सेवा और शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है उसे 'पारितोषिक ' कहते हैं। " आचार्य कौटिल्य ने भी अर्थशास्त्र " में शौर्य-प्रदर्शन पर पारितोषिक प्रदान किये जाने की चर्चा की है। वर्तमान काल में युद्ध कालीन शौर्य-प्रदर्शन पर परमवीर चक्र, महावीर चक्र व वीर चक्र से सम्भावित करके सैनिकों का उत्साहवर्धन किया जाता है। शान्तिकाल में भी उत्कृष्ट वीरता, अदम्य साहस अथवा आत्म त्याग के लिये ' अशोक-चक्र ' ' कीर्ति-चक्र ' व ' शौर्य-चक्र ' से सैनिकों को सम्मानित किया जाता है। इसी प्रकार असाधारण सेवा हेतु उन्हें ' परम विशिष्ट सेवा पदक ' ' अति विशिष्ट सेवा पदक ' व विशिष्ट सेवा पदक ' आदि से सम्मानित करने की प्रथा है। प्रशिक्षण-काल के दौरान उत्कृष्ठ प्रदर्शन हेतु भी विशिष्ट पुरस्कार, ट्राफी व डी ० जी ० केन आदि द्वारा सम्मानित करके सैनिकों में प्रशिक्षण के प्रति रुचि व लगन जागृत करने का प्रयास किया जाता है।

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने भूख की प्रेरणा के शैक्षिक प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिये एक परीक्षण किया। उन्होंने कुछ चूहों को तीन समूहों में बाट कर उन्हें भूल-भुलइया में जाने की प्रक्रिया को सीखने के लिये अवसर प्रदान किया। इनमें प्रथम समूह में भूखे चूहे रखे गये तथा भूल-भुलइया को पार करके उन्हें भोजन तक पहुंचने का अवसर दिया गया। इसमें देखा गया कि भूख की प्रेरणा के कारण चूहे भूल-भुलइया पार करके भोजन तक पहुंचने में सफल रहे। दूसरे समूह में भी भूखे चूहे रखे गये लेकिन भोजन का अभाव था। इन चूहों ने भूल-भुलइया पार करने का कोई भी प्रयास नहीं किया। तीसरे समूह में ऐसे चूहे रखे गये जिनमें भूख का अभाव था। इसमें भोजन उपस्थित होने पर भी वे भूल-भुलइया पार करने में असफल रहे। इस परीक्षण से यह निष्कर्ष निकाला गया कि सीखने की प्रक्रिया पर भूख की प्रेरणा का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

शिक्षा की प्रक्रिया पर प्रशंसा एवं निन्दा का प्रभाव ज्ञात करने के लिये जो परीक्षण किये गये उनसे यह ज्ञात होता है कि प्रयास के आरम्भ में प्रशंसा एवं निन्दा का व्यक्तियों के कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, परन्तु बाद के प्रयासों में यह पाया गया कि जिन व्यक्तियों के कार्यों के सीखने में प्रशंसा की गई उनके अधिगम के कार्यों में क्रमानुसार प्रगति हुई लेकिन जिन व्यक्तियों के कार्यों की निन्दा की गई उनके अधिगम करने की प्रक्रिया में अवनति हुई। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रशंसा का सीखने की प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, तथा निन्दा का सीखने की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सैन्य कर्मचारियों के मनोबल व उत्साह को बढ़ाने हेतु सैन्य अधिकारियों द्वारा “ शाबास " व मान-पत्र देने की प्रथा इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रचलित है।

स्पर्धा एवं सम्मान से व्यक्ति प्रोत्साहित होता है। अतः इसका सीखने की प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जब किसी कार्य को सम्पादित करने में दूसरे व्यक्तियों से स्पर्धा की जाती है अथवा सम्बन्धित कार्य के सम्पादित हो जाने के पश्चात समाज से सम्मान प्राप्त होने की आशा होती है तो व्यक्ति उस कार्य की पूर्ण करने में प्राण-प्रण से जुट जाता है। इस सम्बन्ध में मनोवज्ञानिकों के परीक्षा से अधोलिखित निष्कर्ष प्राप्त हुये हैं-

( अ ) प्रतिस्पर्धा से प्रेरित व्यक्तियों के सीखने की गति प्रतिस्पर्धा-रहित व्यक्तियों के सीखने की गति से अपेक्षाकृत तीव्र होती है।

( ब ) प्रतिस्पर्धा से प्रेरित व्यक्तियों के सीखने के कार्य, प्रतिस्पर्धा रहित व्यक्ति सीखने के कार्यों की अपेक्षा अधिक यथार्थ एवं निश्चित होते हैं।

( स ) प्रतिस्पर्धा से प्रेरित व्यक्ति, प्रतिस्पर्धा रहित व्यक्तियों की अपेक्षा निर्धारित समय के अन्तर्गत अधिक समस्याओं का समाधान करने में सफल हो जाते हैं।

स्पर्धा के इसी महत्व को ध्यान में रखते हुये प्रशिक्षण काल के दौरान व बाद में भी सैनिकों में अनेक प्रकार की शारीरिक एवं बौद्धिक स्पर्धायें सम्पन्न कराई जाती हैं व श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले सैनिक को सबके सामने सम्मानित किया जाता है ताकि अन्य सैनिकों की कार्यक्षमता पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सके।

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि सीखने की प्रक्रिया पर प्रेरणा का बहुत प्रभाव पड़ता है। प्रेरणा के अभाव में शैक्षिक प्रक्रिया निरर्थक औपचारिकता मात्र रह जाती है।

विषय-सामग्री का स्वरूप[संपादित करें]

सीखने वाली विषय-सामग्री का स्वरूप भी सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यदि सीखने वाली विषय-सामग्री का स्वरूप कठिन होता है तो सीखने की प्रक्रिया में कठिनाई होती है। थार्नडाइक ने अपने प्रयोज्यों के लिये जो विषय-सामग्री सीखने के लिये रखी थी उसे सीखने के लिये उन्हें अत्यधिक प्रयत्न करने पड़ते थे, जिससे वे विषय-सामग्री को देर से अधिगम कर पाते थे, क्योंकि उनका स्वरूप कठिन था। इसी प्रकार अर्थ-रहित विषय सामग्री की अपेक्षा अर्थ-युक्त विषय-सामग्री को अधिगम करने में कठिनाई होती है।

वर्तमान समय में वैज्ञानिक अनुसन्धानों के परिणामस्वरूप अनेक दृश्य-श्रव्य उपकरण विकसित किये गये हैं जिनके माध्यम से रुचिता के साथ प्रभावी सैन्य शिक्षण किया जा रहा है। इस हेतु स्लाइड प्रोजेक्टर, इपिडियोस्कोप, ओवर हेड प्रोजेक्टर, टी ० वी ०, टेप रिकार्डर व चलचित्र का प्रयोग काफी प्रचलित है। मानचित्रों, चाटों व डाइग्रामों का प्रयोग करके भी विषय को रोचक ढंग से बताया जा सकता है।

परिणाम का ज्ञान[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया पर परिणाम के ज्ञान का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। परिणाम का ज्ञान होने से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिये वह पूरे मनोयोग से सीखने का प्रयत्न करता है। इससे सीखने की प्रक्रिया दुतगति से बढ़ती है। परीक्षा में असफलता का भय जिस प्रकार परीक्षण को विषय-ज्ञान हेतु निरन्तर प्रेरित करता है उसी प्रकार विभिन्न कोर्सों में सफलता प्राप्त करने के लिये सैन्यकर्मी भी निरन्तर प्रयास करता है क्योंकि इसमें सफल होने पर उसका रैंक प्रमोशन सुनिश्चित होता है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उसके वेतन प्रभाव व यश पर पड़ता है लेकिन इसमें असफल होने पर उसे अपयश का भागी होना पड़ता है। अतः परिणाम का ज्ञान उसे निरन्तर सीखने की ओर प्रेरित करता रहता है।

अभ्यास[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया पर अभ्यास का निर्णायक प्रभाव पड़ता है। अभ्यास के द्वारा अर्थात किसी कार्य को बार-बार करने से कार्य की गति में क्रमशः उन्नति होती है। प्रत्येक प्रयास के बाद त्रुटियों की संख्या में कमी होती जाती है, कार्य की गति बढ़ती है एवं कार्य के समय की मात्रा में कमी होती जाती है। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया पर अभ्यास का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

कोई भी कार्य चाहे वह सैन्य संचरण का अभ्यास हो, हथियारों का खोलना जोड़ना हो, या लक्ष्य भेद का कार्य हो, प्रारम्भ में अभ्यास न होने के कारण सैनिक को कुछ कठिनाई का अनुभव होता है, लेकिन बार-बार अभ्यास करने पर सैनिक समस्त कार्यों में दक्षता प्राप्त कर लेता है।

रुचि[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया पर व्यक्ति की रुचि भी अत्यधिक प्रभाव डालती है। जिस वस्तु या विचार में व्यक्ति की रुचि होती है उसे वह अधिक अवधान केन्द्रित कर अधिगम करता है। फलस्वरूप वह उसे शीघ्र ही अधिगम कर लेता है लेकिन इसके विपरीत जिस विषय में व्यक्ति की रुचि नहीं होती, उस विषय-सामग्री को व्यक्ति अत्यधिक कठिनता से सीख पाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सीखने की प्रक्रिया की उन्नति पर व्यक्ति की रुचि का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

शिक्षण-विधि[संपादित करें]

सीखने की प्रक्रिया पर शिक्षण-विधि भी अत्यधिक प्रभाव डालती है। साधारणतया अंश-विधि की अपेक्षा पूर्ण-विधि, निरन्तर-विधि की अपेक्षा सावकाश-विधि एवं निष्क्रिय-विधि की अपेक्षा सक्रिय-विधि सीखने की प्रक्रिया पर अत्यधिक प्रभाव डालती है लेकिन सीखने की प्रक्रिया में कौन-सी विधि अधिक उचित होगी, यह थोड़ी-बहुत मात्रा में विषय-सामग्री पर भी निर्भर करता है। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में शिक्षण-विधि भी अत्यधिक महत्व रखती है।

परिपक्वता[संपादित करें]

परिपक्व व्यक्ति किसी भी विषय-सामग्री को अपरिपक्व व्यक्ति की अपेक्षा शीघ्र एवं अच्छी तरह से अधिगम कर लेता है। अतः सीखने की प्रक्रिया एवं परिपक्वता का गहन सम्बन्ध है।

बुद्धि[संपादित करें]

बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी विषय अथवा विचार को शीघ्र ही अधिगम कर लेते हैं क्योंकि बुद्धिमान व्यक्तियों को विषय-सामग्री के तथ्य तथा पारस्परिक सम्बन्ध शीघ्र ही समझ में आ जाते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें अधिगम करने अर्थात् सीखने में सरलता एवं सुविधा रहती है। इसके विपरीत जिन व्यक्तियों की बुद्धि कमजोर होती है, उन्हें कभी-कभी सरल विषय-सामग्री को अधिगम करने में भी अत्यधिक श्रम करना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि सीखने की प्रक्रिया पर बुद्धि अथवा बुद्धि-स्तर का भी प्रभाव पड़ता है।

सीखने के नियम[संपादित करें]

थार्नडाइक महोदय ने सीखने के अधोलिखित तीन नियमों का प्रतिपादन किया है -

( 1 ) प्रभाव का नियम ( ला ऑफ इफेक्ट )

( 2 ) तत्परता का नियम ( ला ऑफ रेडीनेस )

( 3 ) अभ्यास का नियम ( ला ऑफ इक्सरसाइज )

प्रभाव का नियम[संपादित करें]

इस नियम के अनुसार जिस प्रतिक्रिया के कार्यान्वित करने पर व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है अर्थात् उसे सुख, सन्तोष एवं आनन्द की प्राप्ति होती है, उसे वह शीघ्र अधिगम कर लेता है तथा जिन प्रतिक्रियाओं का व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अर्थात् जिनसे व्यक्ति को कष्ट एवं असन्तोष की प्राप्ति होती है, उसे वह करना छोड़ देता है। इसी नियम को प्रभाव के नियम के रूप में जाना जाता है। इस नियम का समर्थन करते हुए मार्गन तथा गिलीलैंड ने कहा है, " वे कार्य जो व्यक्ति को सन्तुष्ट करते हैं, नियत हो जाते हैं एवं वे कार्य जो व्यक्ति को असन्तोष का परिणाम देते हैं, इतनी सरलता से नियत नहीं किये जा सकते। "

तत्परता का नियम[संपादित करें]

तत्परता के नियम के अनुसार ऐसे कार्य, जिन्हें सीखने के लिये व्यक्ति तत्पर या तैयार रहता है, वह कार्य वह शीघ्र ही अधिगम कर लेता है लेकिन जिस कार्य को सीखने के लिये व्यक्ति तत्पर नहीं होता, वह कार्य वह कभी नहीं सीख पाता। वास्तविकता तो यह है कि तत्परता के अभाव में अभ्यास तथा प्रभाव का कुछ भी महत्व नहीं है। अतः प्रशिक्षण-काल में सैनिकों में तत्परता बनी रहे, इसका सदैव प्रयास किया जाना चाहिये।

अभ्यास का नियम[संपादित करें]

अभ्यास के नियमानुसार व्यक्ति जिस प्रतिक्रिया को बार-बार दुहराता है अर्थात् जिस प्रतिक्रिया की पुनरावृत्ति करता है, उस प्रतिक्रिया को वह शीघ्र ही अधिगम कर लेता है तथा जिस प्रतिक्रिया की वह पुनरावृत्ति नहीं करता, उसे वह शीघ्र ही भूल जाता है। पुनरावृत्ति से किसी कार्य को न केवल सीखा जा सकता है वरन् मस्तिष्क में उसे चिरस्थायी रूप में रखा भी जा सकता है। इसके लिये रुचि एवं प्रेरणा की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण होती है। सीखने के उपर्युक्त निमयों के अतिरिक्त नवीनता का नियम, आवृत्ति का नियम, अनभ्यास का नियम व प्राथमिकता के निमयों की भी चर्चा की जाती है।

सीखने के सिद्धान्त[संपादित करें]

सीखने के प्रमुख सिद्धान्त निम्नवत हैं-

प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त[संपादित करें]

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन थार्नडाइक महोदय ने किया है। उनके अनुसार, जब किसी व्यक्ति अथवा पशु के सम्मुख कोई नवीन परिस्थिति उत्पन्न होती है तो उससे समायोजन स्थापित करने के लिये वह स्वाभाविक प्रतिक्रियायें करना प्रारम्भ कर देता है। बहुधा प्रारम्भ में ये स्वाभाविक प्रतिक्रियायें त्रुटिपूर्ण होती हैं परन्तु प्रतिक्रियायें करते-करते एकाएक उसे सफलता प्राप्त हो जाती है। सफलता प्राप्त होने के पश्चात् उस प्रयास में व्यक्ति अथवा पशु सफलता का बार-बार पुनरावर्तन करने लगता है जिसके फलस्वरूप उसकी त्रुटियों का धीरे-धीरे निराकरण होने लगता है व कुछ ही समय में वह उस कार्य को करना सीख लेता है। इस प्रकार से सीखने की प्रक्रिया को ही प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने के सिद्धान्त की संज्ञा दी गयी है।

इस सिद्धान्त के परीक्षण हेतु थार्नडाइक महोदय ने एक उलझन बाक्स का निर्माण किया और उसके अन्दर एक भूखी बिल्ली को बन्द कर दिया। इस उलझन बाक्स का दरवाजा इसी के भीतर लगे हुए एक बटन को दबाने से खुल सकता था। उलझन बाक्स से बाहर उन्होंने मछली का एक टुकड़ा रख दिया। जैसे ही परीक्षण प्रारम्भ किया गया, बिल्ली मछली का टुकड़ा प्राप्त करने के लिये प्रयास करने लगी। उसने कई बार दरवाजा खोलने का भी प्रयास किया लेकिन असफल रही। इसी प्रयास के दौरान अचानक उसका पंजा बटन के ऊपर पड़ गया। परिणामतः बटन पर दबाव पढ़ते ही उलझन बाक्स का दरवाजा खुल गया, जिससे निकलकर भूखी बिल्ली मछली के टुकडे पर टूट पड़ी। इसी परीक्षण को जब दूसरी बार दुहराया गया, बिल्ली को पहली बार की अपेक्षा जल्दी सफलती मिली। लेकिन बार-बार इसी परीक्षण को जब दुहराया गया, बिल्ली ने एक बार में ही दरवाजा खोलना सीख लिया। इससे निष्कर्ष निकाला गया कि बार-बार प्रयास करने पर त्रुटियों का निराकरण होता जाता है और इसी क्रम में एक ऐसी भी स्थिति आती है जब व्यक्ति अथवा पशु बिना किसी त्रुटि के सम्बन्धित कार्य करना सीख जाता है। नियमित सैन्य अभ्यास द्वारा सैनिक भी अपनी त्रुटियों को दूर करके कार्य में सफलता प्राप्त करता है।

अनुकरण का सिद्धान्त[संपादित करें]

दूसरे का अनुकरण करके अभिगम करने अर्थात् सीखने को अनुकरण के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन होवार्टी महोदय ने किया। अपने सिद्धान्त को पुष्ट करने के लिये उन्होंने इसका एक बन्दर पर परीक्षण किया व निष्कर्ष निकाला कि यदि अनुकरण करने की शक्ति प्राणियों में न होती तो उन्हें प्रत्येक कार्य को सीखने के लिये प्रयोग करना पड़ता, जिससे उनका जीना दूभर हो जाता। शायद इसी कारण प्रकृति के प्राणियों को अनुकरण की शक्ति दी है।

प्रबल अनुकरण की क्षमता से युक्त होने के कारण ही व्यक्ति बताई गई बात या अनुभव जन्य बात को आसानी से सीख लेता है। आसपास का वातावरण भी उसे प्रभावित करता है और वह उसी माहौल में स्वयं को ढाल लेता है। अतः योजनानुसार अनुकूल वातावरण का सृजन करके सैनिकों के भीतर भी अनुकूल गुणों का विकास किया जा सकता है।

अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त[संपादित करें]

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कोहलर महोदय का मानना है कि पशु या व्यक्ति प्रयास या त्रुटि द्वारा अधिगम नहीं करता वरन वह अर्न्तदृष्टि अथवा सूझ के द्वारा अधिगम करता है। जब किसी व्यक्ति या पशु के सामने कोई नवीन परिस्थिति या समस्या आती है तो सर्वप्रथम वह उस परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करता है तथा परिस्थिति के स्वरूप को अच्छी तरह समझने का प्रयास करता है एवं उद्देश्य की पूर्ति को सम्मुख रखकर व्यवहार करता है। उसके सीखने की यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि वह अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं कर लेता। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया को अन्तर्दृष्टि द्वारा अधिगम करना कहा जाता है। कोहलर, सोक्कट, वर्दीमर, डंकर, अलपर्ट, बलिंडले आदि विद्वानों ने इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिये अनेक परीक्षण किये हैं।

कोहलर महोदय ने अपने सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिये एक वन मानुष चिम्पाजी पर परीक्षण किया। इस हेतु उन्होंने भूखे चिम्पाजी को एक ऐसे कमरे में बन्द कर दिया, जिसके छत से केले लटक रहे थे। कमरे में तीन-चार खाली बाक्स भी रख दिये गये। ज्योंही चिम्पाजी की दृष्टि केले पर जाती है वह उछलकर उसे पकड़ने का तीन-चार बार प्रयास करता है लेकिन ऊँचाई अधिक होने के कारण असफल रहता है। कुछ समय बाद वह फर्श पर रखे बक्सों का अच्छी तरह निरीक्षण करता है। इसके साथ ही साथ वह परिस्थिति के अनेक अंगों में सम्बन्ध स्थापित करता है। परिणामस्वरूप वह परिस्थिति की अच्छी तरह से समझ लेता है एवं बक्सों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर उस पर चढ़ जाता है व केले प्राप्त कर लेता है।

इस प्रकार अन्तर्दृष्टि एवं सूझ द्वारा व्यक्ति नवीन समस्याओं का समाधान करना सीख लेता है। विपरीत परिस्थिति उत्पन्न हो जाने पर उसका समाधान खोजना अथवा सक्रिया हेतु नवीन योजना-निर्धारण सैन्य अधिकारी की अन्तर्दृष्टि व उसकी सूझ पर ही निर्भर करता है। इस प्रक्रिया में वह अपनी बुद्धि, पूर्व-अनुभव, रुचि व मनोवृत्ति आदि मानसिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करता है व उचित समाधान निकालने में सफल होता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया में अन्तर्दृष्टि महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है।

सम्बन्ध-प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त[संपादित करें]

इस सिद्धान्त के प्रवर्तक पावलव तथा वाटसन आदि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, “ स्वाभाविक उत्तेजना का अस्वाभाविक उत्तेजना से सम्बन्ध स्थापित हो जाने के पश्चात् तथा अस्वाभाविक उत्तेजना के प्रति स्वाभाविक उत्तेजना की भाति प्रतिक्रिया करने लगने के फलस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन एवं परिमार्जन को सम्बन्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखना कहा जाता है। "

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पावलव ने सम्बन्ध प्रत्यावर्तन के सिद्धान्त पर अनेक प्रयोग किये हैं लेकिन उनके द्वारा कुत्ते पर किया गया प्रयोग काफी प्रसिद्ध है।

अपने परीक्षण में पावलय ने सर्वप्रथम कुत्ते को घण्टी बजाने ( अस्वाभाविक उत्तेजना ) के पश्चात् शीघ्र ही भोजन ( स्वाभाविक उत्तेजना ) दिया। परिणामस्वरूप घण्टी बजते ही कुत्ते के मुंह से लार टपकने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होने लगती थी। इसके बाद कई बार इसी ( घण्टी बजाने की ) क्रिया को दोहराने मात्र पर हर बार भोजन के अभाव में भी उसके मुंह से लार टपकने लगती थी। यहाँ पर घण्टी की आवाज से वह खाने का सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। वैसे तो खाना स्वाभाविक उत्तेजना है तथा लार टपकना कुत्ते के लिये स्वाभाविक प्रतिक्रिया है लेकिन इस परीक्षण में स्वाभाविक उत्तेजना ( लार टपकना ) का सम्बन्ध अस्वाभाविक उत्तेजना ( घण्टी की आवाज ) से स्थापित हो जाता है। इसे ही सम्बन्ध-प्रत्यावर्तन-शिक्षण कहा जाता है। घण्टी की आवाज सुनकर लार टपकाना सीखना सम्बन्ध प्रत्यावर्तन है एवं इस प्रकार से अधिगम करने को सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से सम्बन्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त कहा जाता है। इस परीक्षा को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है -

सम्बन्ध प्रत्यावर्तन के पूर्व की स्थिति

अस्वाभाविक उत्तेजना प्रतिक्रिया
V V
घण्टी की आवाज कान का उत्तेजित होना
( स्वाभाविक उत्तेजना ) ( स्वाभाविक प्रतिक्रिया )


सम्बन्ध-प्रत्यावर्तन स्थापित हो जाने के बाद की स्थिति

अस्वाभाविक उत्तेजना प्रतिक्रिया
V V
घण्टी की आवाज स्वाभाविक प्रतिक्रिया
V V
भोजन लार टपकना

इस सिद्धान्त को विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने आदत-निर्माण के सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया है। सम्बन्ध-प्रत्यावर्तन की क्रिया द्वारा खराब आदतों एवं अनावश्यक भय का निराकरण किया जा सकता है। सामाजिक तथा असामान्य मनोविज्ञान के विभिन्न विद्वानों ने इस सिद्धान्त के आधार पर विभिन्न विषयों की व्याख्या की है। सामाजिक मनोविज्ञान के विद्वानों का कहना है कि समूह-निर्माण में सम्बन्ध-प्रत्यावर्त का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। इसी प्रकार व्यक्ति के असामान्य व्यवहार की व्याख्या करने में इस सिद्धान्त से बहुत सहायता मिलती है। सैन्य जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के समाधान में भी यह सिद्धान्त काफी उपयोगी रहा है।

निरीक्षण एवं तर्क का सिद्धान्त[संपादित करें]

जब कोई व्यक्ति किसी चीज का निरीक्षण कर तर्क की कसौटी पर कसकर व विचार-विमर्श करके बुद्धिमानीपूर्वक उसका अधिगम करता है तो इस प्रकार से सीखने की प्रक्रिया को निरीक्षण एवं तर्क सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति न तो कोई कार्य अचानक सम्पादित कर लेता है और न ही प्रयास एवं त्रुटि सिद्धान्त द्वारा सम्पादित करता है वरन वह अन्य श्रेणी की चिन्तनात्मक प्रक्रिया अर्थात तर्क-वितर्क द्वारा सम्पादित करता है। वयस्क व्यक्तियों पर यह सिद्धान्त विशेष रूप से लागू होता है।

निषेधात्मक समायोजन का सिद्धान्त[संपादित करें]

इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति जब उत्तेजकों के प्रति अभ्यस्त हो जाता है, तो वह निरर्थक प्रतिक्रियाओं को दूर कर देता है एवं जो प्रतिक्रियायें उसके लिये लाभदायक होती है, वह उन्हें अपना लेता है।

निषेधात्मक समायोजन के सिद्धान्त के अनुसार सीखने पर पेखम महोदय तथा श्रीमती पेखम ने एक मकड़ी पर प्रयोग किया। उन्होंने अपने प्रयोग द्वारा यह पाया कि जब एक ध्वनि कारक काँटा बजाया जाता था तो वह भय के कारण जाल में गिर जाती थी लेकिन जब इसी प्रकार की प्रतिक्रिया बार-बार की गई तो कुछ समय बाद वह मकड़ी जाल में नहीं गिरी क्योंकि अब उसने यह सीख लिया था कि काँटे से उत्पन्न होने वाली आवाज से उसे किसी प्रकार का खतरा नहीं है। इस प्रकार मकड़ी आवाज से निषेधात्मक समायोजन स्थापित कर लेती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के युद्ध में लन्दनवासियों ने जर्मनी द्वारा प्रक्षेपित वी 1 और वी 2 राकेटों के विरुद्ध ऐसा ही निषेधात्मक समायोजन स्थापित कर लिया था।

सैन्य-प्रशिक्षण का स्वरूप[संपादित करें]

सैन्य-प्रशिक्षण को मूलतः दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- (१) व्यक्तिगत प्रशिक्षण ( Invidivual Training ) तथा (२) समूह प्रशिक्षण ( Group Training ) यह विभाजन प्रशिक्षार्थियों की प्रशिक्षण प्रकृति के आधार पर किया जाता है। जब प्रशिक्षार्थी को वैयक्तिक रूप में किसी विशेष तकनीक या विषय का प्रशिक्षण दिया जाता है तो उसे ' व्यक्तिगत-प्रशिक्षण ' की श्रेणी में माना जाता है और जब प्रशिक्षार्थियों को समूह में प्रशिक्षण दिया जाता है तो उसे ' समूह-प्रशिक्षण ' की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है।

व्यक्तिगत प्रशिक्षण[संपादित करें]

व्यक्तिगत प्रशिक्षण का लक्ष्य सैनिक-विशेष में ऐसी क्षमता का विकास करना होता है जिससे कि वह तकनीक-विशेष अथवा विषय विशेष में वांछित सफलता अर्जित कर सके या अगले प्रशिक्षण हेतु स्वयं को तैयार कर सके। अनेक ऐसे काम होते हैं जिसमें व्यक्तिगत रूप में उपस्कर-संचालन हेतु विशिष्ट ज्ञान एवं कौशल की आवश्यकता पड़ती है, जिसका प्रशिक्षण व्यक्तिगत रूप में ही दिया जा सकता है। वैयक्तिक प्रशिक्षकों ने व्यक्तिगत प्रशिक्षण को वैचारिक प्रशिक्षण, दक्षता प्रशिक्षण कार्य-प्रणाली प्रशिक्षण, निर्णय-क्षमता प्रशिक्षण तथा योजना निर्धारण क्षमता प्रशिक्षण के रूप में विकसित किया है।

किसी भी कार्य-प्रणाली के सैद्धान्तिक पक्ष का विधिवत् प्रशिक्षण देने हेतु वैचारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। कार्य प्रणाली प्रशिक्षण हेतु प्रशिक्षार्थी को कृत्रिम रूप में वास्तविक स्थिति में रखकर इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है कि वह वास्तविक परिस्थिति में कार्य सम्पन्न करने में सफल एवं दक्ष हो सके। उदाहरणार्थ लड़ाकू-यान के कृत्रिम काकपिट में बैठाकर पहले प्रशिक्षार्थी को सामान्य तथा आपातकालीन संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके साथ ही उसे सम्बन्धित यान की ईंधन-व्यवस्था, इंजिन-प्रणाली आदि का भी ज्ञान कराया जाता है। इसके बाद उसे उड़ान भरने, नीचे उतरने तथा चालक-स्थल से स्वयं को अलग करने आदि के प्रशिक्षण में दक्ष किया जाता है।

दक्षता-प्रशिक्षक प्रशिक्षार्थी को अभ्यास का अवसर प्रदान करते हैं ताकि प्रशिक्षार्थी अपने अनुभवों से सीख सके। यह अभ्यास तब तक चलता रहता है जब तक कि प्रशिक्षार्थी पूर्णरूपेण सम्बन्धित कार्य में दक्ष नहीं हो जाता।

निर्णय क्षमता-प्रशिक्षण तथा योजना-निर्धारण-क्षमता परीक्षण हेतु सैन्य सेवाओं में काफी पहले से ही युद्ध-क्रीड़ा ( वार गेम्स ) का प्रचलन है। इसी प्रकार संचालन क्षमता का विकास करने हेतु प्रबन्धन क्रीड़ाओं ( मैनेजमेन्ट गेम्स ) का विकास किया गया है।

इस प्रकार उपरोक्त विधियों द्वारा व्यक्तिगत प्रशिक्षण ' प्रदान कर सैन्य कर्मियों को कार्य विशेष में दक्ष किया जाता है।

महत्व

सैन्य सेवा में अनेक ऐसे कार्य होते हैं जिसमें व्यक्तिगत प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि इसमें साधन व समय अधिक लगता है लेकिन प्रशिक्षार्थी की समस्त शंकाओं का समाधान व्यक्तिगत रूप से हो जाता है, जिससे उसे विषय को आत्मसात् करने में आसानी होती है।

प्रयोगशाला में प्रयोगात्मक उपकरणों व रसायनों का प्रयोग करके सीखी जाने वाली शिक्षा अथवा विमान या नौसैनिक जहाजों के संचालन-कक्ष में बैठकर सामने लगे बोर्ड पर अनेकों उपकरणों के संचालन की शिक्षा सामूहिक रूप से नहीं दी जा सकती। इन कार्यों में प्रवीणता प्राप्त करने के लिये व्यक्तिगत प्रशिक्षण की ही आवश्यकता पड़ती है।

व्यक्तिगत प्रशिक्षण में प्रशिक्षक प्रशिक्षार्थी की प्रत्येक गतिविधि का सूक्ष्म निरीक्षण कर सकता है व उसकी क्षमताओं व कार्य-शैली में सुधार हेतु मनोवैज्ञानिक विधि का प्रयोग कर उसका सकारात्मक दिशा-निर्देश कर सकता है।

इन विधि में प्रशिक्षार्थी भी प्रशिक्षक के निकट सम्पर्क में होने के कारण उसके व्यक्तित्व व कार्य-शैली से प्रभावित होता है व प्रशिक्षक को आदर्श मानकर उसके पद-चिन्हों पर चलने का प्रयास करता है। अतः इस विधि के प्रशिक्षकों के लिये अनिवार्य होना चाहिये कि उनमें प्रशिक्षार्थी का आदर्श बनने के अधिकाधिक विद्यमान हों।

समूह प्रशिक्षण[संपादित करें]

साधारणतया समान लक्ष्य की प्राप्ति हेतु गतिशील लोगों के समुच्चय को समूह के नाम से सम्बोधित किया जाता है व इनके प्रशिक्षण को समूह-प्रशिक्षण कहा जाता है। इसके अन्तर्गत सैद्धान्तिक एवं प्रयोगात्मक प्रशिक्षण समाहित होते हैं।

प्रथम विश्व युद्ध एवं द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान लाखों सैनिकों की एक साथ भर्ती की गई, जिनका व्यक्तिगत प्रशिक्षण सम्भव न था, अतः उनके सामूहिक प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। वैसे भी अन्य गतिविधियों की दृष्टि से आपसी तालमेल, सहयोग व एक मशीन के रूप में एक साथ संक्रिया सम्पन्न करने के लिये भी उनका सामूहिक प्रशिक्षण आवश्यक होता है।

यद्यपि समूह के लोगों में वैचारिक एवं क्षमता-गत भिन्नता होती है लेकिन उनका प्रशिक्षण समान रूप में एक साथ किया जाता है। प्रशिक्षक का लक्ष्य सम्बन्धित समूह को निर्धारित विषय एवं कार्य में दक्ष करना होता है। समूह के समक्ष समभाव से वह विषय का निष्पादन करता है। समूह के सदस्यों में से कुछ तुरन्त विषय को आत्मसात् कर लेते हैं लेकिन कुछ को समझने व सीखने में समय लगता है। प्रशिक्षक धैर्य के साथ उनकी त्रुटियों का तब तक सुधार करता है जब तक कि वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता। इस लक्ष्य की प्राप्ति में वह विभिन्न रूप में दण्ड व पुरस्कार का भी प्रयोग करता है। अपनत्व, प्रोत्साहन, स्वयं का उदाहरण, कठिन अनुशासन, निष्पक्षता, निरन्तर अभ्यास व विनोद-प्रियता इस कार्य में उसके सहायक होते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रयोग से सामूहिक प्रशिक्षण को विशेष गति दी जा सकती है। इधर इनकी उपादेयता को ध्यान में रखते हुए सेना में इपिडियोस्कोप, ओवरहेड प्रोजेक्टर व स्लाइड प्रोजेक्टर आदि का प्रचलन तेजी के साथ बढ़ा है। विभिन्न चित्रों, चार्टों, मानचित्रों, माडलों व अन्य सहायक उपकरणों का प्रयोग करके सामूहिक प्रशिक्षण को सुबोध, ग्राह्य व रुचिकर बनाया जा सकता है।

सामूहिक प्रशिक्षण, पारस्परिक सहयोग प्रतिस्पर्धा एवं नेतृत्व के गुणों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसके द्वारा जटिल प्रश्नों एवं समस्याओं पर पारस्परिक विचार करके उन्हें हल करने की प्रवृत्ति का विकास एवं प्रतिस्पर्धा द्वारा प्रेरित करके प्रशिक्षार्थियों में विषय की ग्रहणीय क्षमता को निखारने का निरन्तर प्रयास किया जाता है। समूह में रहने के कारण उनको मेल मिलाप व एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है जिससे उनमें सामूहिकता तथा नेतृत्व के गुणों का भी विकास होता है। लेकिन ऐसे प्रशिक्षणों में प्रत्येक प्रशिक्षार्थी पर विशेष ध्यान केन्द्रित कर पाना सम्भव नहीं होता।

अभिगम ( सीखना ) और अभिप्रेरण[संपादित करें]

व्यक्ति के अन्तःकरण में अन्य अनेक विशेषताओं के साथ ही अभिप्रेरण (Motivation) भी विद्यमान रहता है। इसी कारण व्यक्ति को प्रेरणा मिलती रहती है। बिना किसी प्रेरणा से प्रेरित हुए व्यक्ति कोई कार्य नहीं करता। यदि कोई व्यक्ति अभिप्रेरित होकर किसी कार्य को कार्यान्चित करता है तो वह सदैव लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करता है। अभिप्रेरण के माध्यम से सैनिकों में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु लगन, समर्पण की भावना व दृढता पैदा की जा सकती है।

सीखने में अभिप्रेरण का महत्वपूर्ण स्थान है। शायद यही कारण है कि स्किनर महोदय अभिप्रेरण को " सीखने तक पहुंचने के लिये राजमार्ग " मानते हैं।

अभिप्रेरण के दो पहलू होते हैं। लक्ष्य तक पहुंचने के लिये साधनों की भी आवश्यकता पड़ती है। अतः लक्ष्य और साधन का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक की अनुपस्थिति में दूसरे का कोई भी महत्व नहीं है। साधन के प्राप्त होने पर लक्ष्य तक पहुंचना सरल हो जाता है। लेकिन साधन ही लक्ष्य तक पहुंचने का एक मात्र मार्ग नहीं है। इस हेतु अभिप्रेरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लक्ष्य व्यक्ति को अभिप्रेरित करता है। अनेक छोटे-छोटे लक्ष्य मिलकर बड़े लक्ष्य की पूर्ति हेतु व्यक्ति की अभिप्रेरित करते हैं। इस प्रकार एक “ साधन-प्रेरणा ' और एक ' लक्ष्य-प्रेरणा पैदा हो जाती है। ' साधन प्रेरणा के परिणामस्वरूप लक्ष्य प्रेरणा विकसित होती है। लक्ष्य अभिप्रेरण की अनुपस्थिति में साधन अभिप्रेरण महत्वहीन होता है।

अभिप्रेरण के प्रकार[संपादित करें]

प्रेरणा को हम दो रूपों में देखते हैं ( अ ) स्वाभाविक अभिप्रेरण ( ब ) कृत्रिम अभिप्रेरण।

स्वाभाविक अभिप्रेरण[संपादित करें]

इसके अन्तर्गत प्रकृति प्रदत्त अभिप्रेरण समाहित किये जाते हैं। ये अधोलिखित प्रकार के होते हैं-

( 1 ) मूल प्रवृत्ति।

( 2 ) सहज क्रियायें।

( 3 ) अनुकरण।

( 4 ) आदत।

( 5 ) आकांक्षा।

( 6 ) भूख एवं प्यास।

( 7 ) आत्म प्रतिष्ठा, तथा

( 8 ) रुचि।

( 1 ) मूल-प्रवृत्ति - कुछ अभिप्रेरण जन्मजात होते हैं। इस प्रकार के अभिप्रेरण व्यक्ति को वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार विशेष क्रियाओं को करने के लिये बाध्य करते हैं। इन अभिप्रेरणों का उददेश्य शारीरिक एवं मानसिक इच्छा की सन्तुष्टि होती है। सुख-दुःख, आनन्द-कष्ट अथवा रसानुभूतियाँ जैसे अभिप्रेरण व्यक्ति को प्रकृति-प्रदत्त होते हैं। इनके लिये व्यक्ति को अभिप्रेरित नहीं होना पड़ता। इस क्षेत्र में वे स्वयं अभिप्रेरित रहते हैं। जैसे एक व्यक्ति दूसरे को दुःखी देखकर स्वयं दुःख का अनुभव करने लगता है।

सैनिकों मे चरित्र-निर्माण का गुण विकसित करने में इस अभिप्रेरण का प्रयोग किया जा सकता है।

( 2 ) सहज क्रियायें - स्वचालित सहज क्रियायें भी प्रकृति-प्रदत्त होती हैं। ये क्रियायें सदैव चलती रहती हैं यथा श्वास लेना, पलक गिरना, नाड़ी संस्थान एवं स्नायु संस्थान आदि की क्रियायें। अभिप्रेरण से इनका बहुत सम्बन्ध है फिर भी इनकी आवश्यकता तब पड़ती है जबकि हमें व्यक्ति के व्यक्तित्व के विषय में भिन्न-भिन्न अंगों से ज्ञानार्जन की आवश्यकता होती है।

इस ज्ञानार्जन से यह लाभ होता है कि इसके अनुसार व्यक्ति को अभिप्रेरण प्रदत्त करने वाली युक्तियों का निर्माण किया जा सके। व्यक्ति के अन्दर स्थित ग्रन्थियों में आवश्यक परिवर्तन लाकर उन्हें अभिप्रेरण के निर्मित होने में सहायक बनाया जा सकता है। सैनिकों को प्रदत्त अन्धकार में देखने का प्रशिक्षण, दूरी अनुमापन का पशिक्षण, ध्वनियों को सुनने व समझने का प्रशिक्षण आदि की दृष्टि से इस अभिप्रेरण का प्रयोग किया जा सकता है।

( 3 ) अनुकरण - व्यक्ति में अनुकरण की प्राकृतिक क्षमता होती है। मूल प्रकृति और अनुकरण में यह अन्तर होता है कि मूल-प्रकृति मे कल्पना-शक्ति का समावेश नहीं होता जबकि अनुकरण में व्यक्ति अपनी कल्पना का भी प्रयोग करता है। अनुकरण द्वारा कार्य करने पर सफलता मिलने पर वह उसी कार्य को पुनः करने के लिये अभिप्रेरित होता है।

अनुकरण के लिये यदि उचित निर्देश मिले तो सैनिकों को कार्य-विशेष के लिये अभिप्रेरित किया जा सकता है। इस हेतु उचित उदाहरण की आवश्यकता होती है। परमवीर चक्र . महावीर चक्र व वीर चक्र से विभूषित रण बांकुरों का उदाहरण उनके सामने आदर्श के रूप में रखा जा सकता है। इन उदाहरणों का अनुकरण करके सैनिक उस ओर अभिप्रेरित हो जाते हैं। यही अभिप्रेरित कार्य बार-बार दुहराये जाने पर आदत से सम्बद्ध हो जाते हैं।

( 4 ) आदत - अनुकरण के सिद्धान्त में ग्रन्थि-परिवर्तन की अपेक्षा आदत का सिद्धान्त अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। प्रारम्भ में पड़ी आदतें व्यक्ति को जीवन भर प्रभावित करती रहती हैं। अतः प्रशिक्षण-अवधि में सैनिकों में इस प्रकार आदतें विकसित करने का प्रयास होना चाहिये, जिससे वे एक कुशल सैनिक के साथ ही साथ कुशल नागरिक भी बन सके।

( 5 ) आकांक्षा - व्यक्ति की अपनी अलग-अलग आकांक्षायें एवं अभिलाषायें होती हैं। इन अभिप्रेरणाओं को अभिप्रेरित करके इन्हें महान लक्ष्य तक पहुंचाया जा सकता है। जैसे खेल में रुचि रखने वाले सैनिक को अभिप्रेरित करके उसे एक सफल खिलाड़ी की कोटि तक पहुंचाया जा सकता है।

( 6 ) भूख एवं प्यास - व्यक्ति के भीतर से प्रेरणायें स्वयं जागृत होती हैं व भोजन तथा पानी मिलने पर इनका शमन हो जाता है। इसी प्रकार अभिप्रेरित करके उनके भीतर सत्कार्य व साहसिक कार्य की भूख भी पैदा की जा सकती है।

( 7 ) आत्म-प्रतिष्ठा- प्रत्येक व्यक्त्ति अथवा सैनिक अपनी आत्म-प्रतिष्ठा व आत्म-गौरव को उन्नत देखना चाहता है। आत्म-प्रतिष्ठा की भूख बहुत प्रबल होती है। इसे प्राप्त करने के लिये व्यक्ति कठिन से कठिन कार्य करने को उद्यत हो जाता है। आत्म-प्रतिष्ठा द्वारा अभिप्रेरित व्यक्ति कार्य को बहुत लगन के साथ पूरा करता है तथा सदैव उस पर लक्ष्य तक पहुंचने की धुन सवार रहती है। आत्म-सम्मान के लिये ही व्यक्ति सत्कार्य करता है। आत्म-प्रकाशन के अभाव में आत्महीनता का विकास होता है। अतः सैनिकों में आत्म-सम्मान की भावना जागृत करने का सतत प्रयास किया जाना चाहिये।

( 8 ) रुचि - विभिन्न व्यक्तियों की रुचियों में भिन्नता पायी जाती है। आवश्यकता पड़ने पर उद्देश्य-विशेष की प्राप्ति हेतु अभिप्रेरण द्वारा व्यक्ति में रुचि उत्पन्न भी करायी जानी चाहिये। क्योंकि एक बार रुचि उत्पन्न हो जाने के पश्चात्, सम्बन्धित व्यक्ति स्व-रुचि के कार्य को स्वयं ही करता चला जाता है।

कृत्रिम अभिप्रेरण[संपादित करें]

स्वाभाविक अभिप्रेरण, कृत्रिम अभिप्रेरण के साधन स्वरूप है। कृत्रिम अभिप्रेरण के द्वारा ही व्यक्ति / बालकों की अनुचित अभिप्रेरणाओं को बदलकर उन्हें सही आकार दिया जाता है लेकिन दोनों ही एक दूसरे पर आधारित है। स्वाभाविक अभिप्रेरण को चरम सीमा तक पहुंचाने के लिए कृत्रिम अभिप्रेरण की सहायता ली जाती है। ये कृत्रिम अभिप्रेरण निम्नवत् हैं-

1. पुरस्कार एवं दण्ड

2. प्रगति एवं फल का ज्ञान

3. प्रशंसा और भर्त्सना

4. अभिप्रेरण एवं परिपक्वता

5. लक्ष्य एवं लक्षित प्रयत्न

6. प्रभाव के नियम

7. लगन के साथ कार्यान्वयन

8. वैयक्तिक तथा सामूहिक अभिप्रेरण, तथा

9. अवसर प्राप्ति।

( 1 ) पुरस्कार एवं दण्ड अभिप्रेरण — यह अभिप्रेरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पुरस्कार अभिप्रेरण सदैव दण्ड-अभिप्रेरण की अपेक्षा श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह एक प्रत्यक्ष प्रेरणा के रूप में होता है। स्किनर महोदय ने पुरस्कार एवं दण्ड के गुण व दोषों पर अधोलिखित रूप में अपना विचार व्यक्त किया है

पुरस्कार के गुण -

-आनन्ददायक होने के कारण पुरस्कार सम्बन्धित कार्य को बार-बार करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

-पुरस्कार में व्यक्ति को प्रेरित करने की शक्ति होती है।

-आनन्ददायक होने के कारण पुरस्कार से रुचि एवं उत्साह मिलता है।

-पुरस्कार से व्यक्ति को उच्च मनोबल प्राप्त होता है, क्योंकि इससे व्यक्ति के आत्म-सम्मान एवं अहं की तुष्टि होती है।

दोष -

-पुरस्कार का स्वरूप बहिरंग होता है, क्योंकि वे व्यक्ति को वस्तु के प्रति रुचि पैदा करने के स्थान पर मात्र पुरस्कार जीतने के लिये उत्साह प्रदान करते हैं

-पुरस्कार से धोखा देने के लिये भी प्रोत्साहन मिलता है।

-पुरस्कार से एक अनुचित अभिवृत्ति को भी प्रोत्साहन मिलता है अर्थात् बिना मूल्य कुछ प्राप्त करने की आशा।

-जो लोग पुरस्कार जीतने की आशा कर सकते हैं उन्हें अभिप्रेरण की सबसे कम आवश्यकता पड़ती है।


दण्ड के गुण -

- दण्ड अक्सर व्यक्ति को अवांछित काम से मोड़ते हैं।

-दण्ड अनुशासन का एक रूप होता है।

-दण्ड उस समय विशेष उपयोगी होता है, जब-

( 1 ) वे अवांछित काम का स्वाभाविक परिणाम प्रतीत होते हैं।

( 2 ) पुरस्कार के साथ-साथ प्रयुक्त किये जाते हैं, तथा

( 3 ) जब दण्ड पाने वाले को यह विश्वास हो जाता है कि उसे नहीं वरन उसके अवांछित कार्यों को दण्डित किया जा रहा है।

दोष -

-दण्ड प्रायः भय पर आधारित होते हैं।

-यदि दण्ड का भय छोड़ दिया जाये या सम्बन्धित उसे झेलने के लिये तैयार हो जाये तो इसका अस्तित्व मिट जाता है।

-अवांछित काम की ओर बार-बार ध्यानाकर्षण के परिणामस्वरूप उस काम को और भी उत्साह मिल सकता है।

-दण्ड से सदैव अप्रिय एवं दुःखद अनुभूति होती है, जो नकारात्मक होती है और असफलता का कारण भी हो सकती है।

-दण्ड के परिणाम सदैव स्थायी नहीं होते।

-दण्ड के प्रयोग से समाज व दण्ड देने वाले के प्रति बुरी भावनायें पैदा हो सकती हैं।

-दण्ड की कठोरता का कोई माप नहीं है। एक ही दण्ड एक के लिये कठोर हो सकता है लेकिन दूसरे के लिये सरल।

इस प्रकार पुरस्कार और दण्ड अभिप्रेरण के अन्दर गुण व दोष दोनों ही समाहित होते है।

( 2 ) प्रगति एवं फल का ज्ञान - समय-समय पर प्रगति की सूचना मिलते रहने से व्यक्ति में अभिप्रेरण और तीव्र हो जाता है। इससे उत्साह और लगन में भी वृद्धि होती है जिसका प्रभाव व्यक्ति के मनोबल और सफलता की मनोवृत्ति पर पड़ता है।

( 3 ) प्रशंसा और भर्त्सना - व्यक्ति के ऊपर जो प्रभाव पुरस्कार और दण्ड का पड़ता है वही प्रभाव उस पर प्रशंसा एवं भर्त्सना का भी पड़ता है। लेकिन, अन्तर केवल इतना ही होता है कि पुरस्कार और दण्ड-जनित अभिप्रेरण अधिक तीव्र होता है, जबकि प्रशंसा और भर्त्सना-जनित अभिप्रेरण उतना तीव्र नहीं होता। प्रशंसा से भर्त्सना की अपेक्षा अधिक उचित अभिप्रेरण पैदा होता है।

( 4 ) अभिप्रेरण एवं परिपक्वता- अभिप्रेरण का कार्य उचित समय एवं स्थिति में किया जाना चाहिये। अभिप्रेरण का कार्य उसी अवस्था में किया जाना चाहिये जब सम्बन्धित व्यक्ति मानसिक, शारीरिक व वातावरणिक दृष्टि से अभिप्रेरण को स्वीकार करने के लिए तैयार हो।

( 5 ) लक्ष्य एवं लक्षित प्रयत्न - उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अभिप्रेरण किया जाना चाहिये। लक्ष्य यदि आकर्षक, स्पष्ट और आनन्ददायक है तो उत्पन्न की गई अभिप्रेरणा अधिक तीव्र होगी। व्यक्ति लक्ष्य की ओर जिस लगन से आकर्षित होता है, उसी के अनुपात में उसमें प्रेरणा भी जागृत होती है, अतः प्रेरणा लक्ष्य के समानुपाती होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिये यह भी आवश्यक होता है कि उसी के अनुसार कार्य अथवा प्रयत्न भी निरन्तर जारी रहे। बस निरन्तरता में व्यवधान न पैदा हो, इसका सदैव प्रयत्न किया जाना चाहिये।

( 6 ) प्रभाव के नियम - व्यक्ति का एक उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति भी होता है। इस सिद्धान्त पर आधारित प्रभाव का नियम प्रेरणा के क्षेत्र में सफल भूमिका या निर्वहन करता है। प्रत्येक कार्य सुख अथवा दुख का सृजक होता है। स्वभावतः व्यक्ति उन्हीं लक्ष्यों को चुनना पसन्द करता है जो आनन्ददायक होते हैं। प्रगति और फल ज्ञान के सिद्धान्त में इस नियम का प्रभाव पड़ता है। सन्तोषजनक प्रगति होने पर व्यक्ति उत्साहित और असन्तोषजनक प्रगति होने पर वह हतोत्साहित होता


( 7 ) लगन के साथ कार्यान्वयन - प्रेरणा के वशीभूत होकर किये जाने वाले कार्य से समूचे व्यक्तित्व को सन्तुष्टि प्राप्त होती है। कभी-कभी इससे प्रत्यक्ष निषेध का अभिप्रेरण भी व्यक्तित्व में प्रवेश कर जाता है जिससे व्यक्ति में असामाजिकता और स्वार्थपरता की भावना जन्म लेने लगती है। इन प्रेरणाओं के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता होती है।

व्यक्ति के भीतर कुछ ऐसी भी प्रेरणायें होती हैं जो उदासीन-सी पड़ी रहती है। इन अभिप्रेरणाओं को पहचान कर इन्हें प्रोत्साहित करना चाहिये। ऐसा करने से ये प्रेरणायें चैतन्यावस्था में आ जाती है और कार्य में पुनः प्रगति होने लगती है।

( 8 ) वैयक्तिक तथा सामूहिक अभिप्रेरण - इस सिद्धान्त का आधार पुरस्कार प्राप्ति की लालसा होती है। पुरस्कार के द्वारा प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता की उत्पत्ति होती है। प्रतियोगितायें अक्सर समूह में ही सम्पन्न होती है। यह बहुत उद्देश्यात्मक एवं अनुपूरक कामों को सहकारिता के स्तर पर करने के लिये प्रोत्साहन प्रदान करती है। ऐसे कार्यों से व्यक्ति का मनोबल विकसित होता है। प्रतियोगिता एवं प्रतिद्वन्द्विता की भावना उत्पन्न करके लोगों में सामाजिक मनोवृत्ति का विकास भी किया जा सकता है। लेकिन यदि थोड़ी-सी भी असावधानी बरती गई तो लोग एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या व घृणा भी करने लगेंगे। अतः इसके प्रयोग में सावधानी बरती जानी चाहिये।

सामूहिकता के महत्व पर बल देते हुए ए ० आई ० गेट्स महोदय ने कहा है “ पृथक रूप में सीखने के बजाय समूहों में सीखना अधिक श्रेष्ठ प्रतीत होता है-जब समूह के सभी सदस्य अध्ययन की गई समस्या में रुचि लेते हैं तब समूह की गतिशीलता अधिक प्रभावकारी होती है, जहाँ सदस्यों के प्रयोजनों में परस्पर बहुत अन्तर होता है वहाँ समूह की गतिशीलता पर प्रतिकूल असर पड़ता है, जब बच्चे किसी ऐसे समूह में काम करते हैं, जिसमें नेतृत्व लोकतन्त्रीय होता है तब वे अधिक सहयोग करते हैं, अधिक अभिक्रमशीलता प्रदर्शित करते हैं, कम झगड़ते हैं और आपस में कम संघर्ष और विद्वेष प्रकट करते हैं। समूह गतिशीलता सामाजिक कौशलों के विकास के लिये, जो कि लोकतन्त्रीय रहन-सहन, बेहतर सामाजिक सौहार्द और समूह के सदस्य को लोकतन्त्रीय नागरिकता के लिये तैयार करने हेतु अनिवार्य है, सर्वोत्तम उपलब्ध साधन है।

( 9 ) अवसर-प्राप्ति- व्यक्ति के भीतर निहित छोटी से छोटी अभिप्रेरणा को भी प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिये तथा उन्हें विकसित होने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाना चाहिये। क्योंकि यही छोटी-छोटी अभिप्रेरणायें आगे चलकर महत्वपूर्ण प्रेरणाओं का रूप धारण करती है।

सीखने में प्रेरणा की भूमिका को स्पष्ट करते हुए केली महोदय ने कहा है- " सीखने की प्रक्रिया की कुशल और सुचारू व्यवस्था में अभिप्रेरण केन्द्रीय कारक है। सभी सीखने में किसी न किसी प्रकार का अभिप्रेरण अवश्य होना चाहिये। "

शिक्षण का स्थानान्तरण[संपादित करें]

एक विषय के अध्ययन से प्राप्त संस्कार उसी विषय तक संकुचित नहीं रहते, वरन वे दूसरे विषयों एवं परिस्थितियों में भी उपयोगी प्रमाणित होते हैं। जैसे नागरिक क्षेत्र में ट्रक चलाने वाला ड्राइवर विशेष प्रशिक्षण के बाद सेना के ट्रक, कार, जीप आसानी से चला सकता है तथा अपने विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रीय कैडेट कोर के कैडेट के रूप में प्राप्त किये गये सैन्य-प्रशिक्षण का उपयोग सैनिक सेवा में जाने के बाद भी किया जा सकता है। इस प्रकार जब एक विषय अथवा परिस्थिति की शिक्षा का दूसरे विषय अथवा परिस्थिति में उपयोग किया जाये, तब शिक्षण का स्थानान्तरण ( Transfer of Training ) होता है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि एक विषय अथवा परिस्थिति के अध्ययन से प्राप्त ज्ञान का दूसरे विषयों या परिस्थितियों में उपयोगी प्रमाणित होना शिक्षण का स्थानान्तरण कहा जाता है।

प्रकार[संपादित करें]

इसके दो प्रकार हैं

( 1 ) स्वीकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण।

( 2 ) नकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण।

यदि एक विषय या परिस्थिति का अध्ययन अथवा ज्ञान दूसरे विषय या परिस्थिति में सहयोग पहुंचाता है तो ऐसे शिक्षण के स्थानान्तरण को स्वीकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण कहा जाता है। जैसे नागरिक शास्त्र के अध्ययन से भविष्य में व्यक्ति को नागरिक जीवन व्यतीत करने में सरलता रहती है। यह स्वीकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण है।

नकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण शिक्षण का ऐसा स्थानान्तरण है जिसमें एक विषय या परिस्थिति का अध्ययन अथवा ज्ञान दूसरे विषय अथवा परिस्थिति में बाधक सिद्ध होता है। उदाहरणार्थ जब शतरंज का खिलाड़ी हाकी या क्रिकेट खेलता है तो उसे कठिनाई का अनुभव होता है। इस प्रकार के स्थानान्तरण को नकारात्मक शिक्षण का स्थानान्तरण कहा जाता है।

शिक्षण के स्थानान्तरण की दशायें[संपादित करें]

शिक्षण के स्थानान्तरण के अधोलिखित हेतु हैं-

( 1 ) सामान्यीकरण।

( 2 ) प्रयत्नशीलता।

( 3 ) शिक्षण-पद्धति।

( 4 ) स्थानान्तरण होने वाले विषय के प्रति मनोवृत्ति।

( 5 ) विषय सामग्री पर अधिकार की मात्रा।

( 6 ) समझ।

( 1 ) सामान्यीकरण - जितना ही अधिक व्यक्ति में भूतकालीन अनुभवों से सामान्य सिद्धान्त निकालने की योग्यता होती है, उतना ही अधिक शिक्षण का स्थानान्तरण होता है।

( 2 ) प्रयत्नशीलता - यदि कोई व्यक्ति नवीन परिस्थितियों को भूतकालीन अनुभूतियों का ध्यान रखते हुए प्रयत्नपूर्वक समझने का तथा पहले सीखी हुई विधियों का प्रयोग करता है तब शिक्षण या संस्कारों का स्थानान्तरण होता है।

( 3 ) शिक्षण-पद्धति - यदि शिक्षण-पद्धति प्रभावी होती है तो शिक्षण का स्थानान्तरण अधिक होता है तथा इससे विपरीत स्थिति में यह स्थानान्तरण अधिक प्रभावी नहीं होता। यदि शिक्षण प्राप्त करने वाले को यह बताया जाये कि प्राप्त शिक्षा का वह दैनिक जीवन में अथवा दूसरी सेवा में किस प्रकार प्रयोग कर सकता है तो शिक्षण का स्थानान्तरण अवश्य होता है।

( 4 ) स्थानान्तरण होने वाले विषय के प्रति मनोवृत्ति - यदि स्थानान्तरित होने वाले विषय के प्रति अनुकूल मनोवृत्ति होती है तो वह शिक्षण के स्थानान्तरण में सहयोग पहुँचाती है।

( 5 ) विषय-सामग्री पर अधिकार की मात्रा- शिक्षण स्थानान्तरण हेतु सम्बन्धित विषय-सामग्री पर प्रभावी अधिकार करना आवश्यक होता है क्योंकि वास्तविक स्थानान्तरण सदैव पहले सीखी हुई सामग्री के संगठन के अनुसार होता है।

( 6 ) समझ - व्यक्ति जिन विषयों या विचारों को विधिवत् समझ लेता है उन विषयों अथवा विचारों को वह दूसरी परिस्थिति में शीघ्रता से स्थानान्तरित कर लेता है क्योंकि उन दोनों स्थितियों को समझ लेने पर उसे दोनों विषय या स्थितियों की समानता का ज्ञान हो जाता है।

शिक्षण-स्थानान्तरण के सिद्धान्त[संपादित करें]

शिक्षण-स्थानान्तण के अधोलिखित सिद्धान्त प्रचलित हैं-

( 1 ) समान अंशों का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ आइडेन्टिकल एलिमेन्ट्स )।

( 2 ) असामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ ' जी ' एण्ड ' एस ' फैक्टर )।

( 3 ) औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ कार्नल डिसिप्लिन )।

( 4 ) सामान्यीकरण का सिद्धान्त ( थ्यौरी ऑफ जेनरलाइजेशन )।

( 1 ) समान अंशों का सिद्धान्त -इस सिद्धान्त का प्रतिपादन थार्नडाइक महोदय ने किया था। उनका मानना था कि एक विषय का अध्ययन दूसरे विषय के अध्ययन में तभी सहायक प्रमाणित हो सकता है जब कुछ मात्रा में इन दोनों में पारस्परिक समानता हो। इसके विपरीत यदि विषयों या परिस्थितियों में कुछ समान अंश नहीं है तो एक विषय का अध्ययन दूसरे विषय के अध्ययन में कोई सहायता नहीं पहुंचा सकता। उदाहरणार्थ जिस व्यक्ति ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया है, वह यदि सैन्य मनोविज्ञान का अध्ययन करता है तो उसे सरलता होगी। इसी प्रकार यदि एक व्यक्ति कार चला लेता है तो उसे स्कूटर चलाने में सरलता होगी। क्योंकि इन कार्यों में कुछ अंशों में समानता है।

( 2 ) सामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त - सामान्य तथा विशिष्ट अंश का सिद्धान्त, जिसे द्वितालिक सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है, का प्रतिपादन स्पीयर मैन महोदय ने किया है। उनके अनुसार प्रत्येक विषय का अधिगम करने के लिये व्यक्ति को सामान्य योग्यता तथा विशेष योग्यता की आवश्यकता पड़ती है। विषय के अध्ययन के साथ-साथ व्यक्ति की सामान्य योग्यता एवं विशिष्ट योग्यता भी बढ़ती है। लेकिन स्पीयर मैन का मानना है कि स्थानान्तरण विशिष्ट योग्यता में नहीं होता वरन् सामान्य योग्यता में होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार गणित, इतिहास, विज्ञान इत्यादि विषयों में विशेष अंश की अपेक्षा सामान्य अंश की अधिक आवश्यकता पड़ती है, फलस्वरूप इन विषयों में स्थानान्तरण का अधिक महत्व है।

( 3 ) औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त - अभ्यास द्वारा मस्तिष्क की शक्तियों को घनिष्ठ बनाकर उन्हें किसी भी परिस्थिति में प्रयुक्त करना शक्ति मनोविज्ञान ( फैकल्टी सायकोलाजी ) का विषय क्षेत्र है तथा औपचारिक अनुशासन का सिद्धान्त शक्ति मनोविज्ञान पर ही आधारित है। शक्ति मनोविज्ञान के समर्थकों का मानना है कि व्यक्ति का मस्तिष्क अनेक शक्तियों यथा स्मृति, कल्पना, निरीक्षण, व तर्क आदि का योग मात्र है। औपचारिक अनुशासन के सिद्धान्त के अनुसार कोई भी व्यक्ति अभ्यास के द्वारा इन शक्तियों को इतना दृढ बना सकता है कि वह इनका किसी भी परिस्थिति में निपुणतापूर्वक प्रयोग कर सके। उदाहरणार्थ, यदि किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति की वृद्धि करनी है तो उसे स्मृति के स्वरूपों का अध्ययन करना चाहिये। यह सिद्धान्त स्वरूप पर अधिक बल देता है, विषय से सम्बन्धित सामग्री पर नहीं। मस्तिष्क की शक्तियों यथा ' रमृति ' नीति शास्त्र तथा विशिष्ट रूप से भाषा एवं इतिहास के अध्ययन से बलवती होती है, रुचि ' साहित्य के उच्च स्तर के अध्ययन से, ' कल्पना ' काव्य के शिक्षण से तथा निरीक्षण-शक्ति ' प्रयोगशाला में विज्ञान के प्रयोग से बलिष्ठ होती है।

सामान्यीकरण का सिद्धान्त - इस सिद्धान्त का प्रतिपादन जेड महोदय ने किया है। उनके अनुसार जिस सीमा तक कोई व्यक्ति अपनी अनुभूतियों के द्वारा कोई सामान्य सिद्धान्त निकाल लेता है, उसी सीमा तक शिक्षण विषय स्थानान्तरित होते हैं। सामान्यीकरण के सिद्धान्त के अनुसार कोई व्यक्ति यदि किसी परिस्थिति में अपने आराधन या अनुभूतियों के द्वारा किसी सामान्य सिद्धान्त का प्रतिपादन कर लेता है, जो किसी दूसरी परिस्थिति में उसे सहायता पहुँचा सकता है तो शिक्षण का स्थानान्तरण होता है। उदाहरणार्थ नेतृत्व की विशेषताओं से परिचित सैन्य अधिकारी अपने गुणों का प्रयोग सेना को कुशल नेतृत्व प्रदान करने में कर सकता है।

शिक्षण के स्थानान्तरण का प्रयोग विशेष रूप से पाठ्यक्रम-निर्धारण में किया जाता है। अत: सैनिकों में विशिष्ट गुणों का विकास करने की दृष्टि से उनके प्रशिक्षण हेतु पाठ्यक्रम तैयार करते समय शिक्षण के स्थानान्तरण के सिद्धान्तों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करना चाहिये।