सैंथवार

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सैंथवार जाति क्षत्रिय कुलो/वंशो का समूह हैं जो भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वी जनपदों कुशीनगर, गोरखपुर, महराजगंज, मऊ, बस्ती, देवरिया व पूर्वी उत्तरप्रदेश से लगे जिलों में पाया जाता हैं। सैंथवार शब्द मूलतः संथगार से बना हैं , जो एक प्राचीन क्षत्रिय संघ था। ये लोग मूलत: खेतीहर जमींदार वर्ग से संबंधित है। यह सिंह ,मल्ल, राय, राव आदि पदनाम का प्रयोग करते हैं। इसी संघ की प्राचीन वंश मल्ल था जो प्राचीन भारत के महाजनपदों में से एक मल्ल महाजनपद था। इस वंश की निवासस्थली कुशीनारापावा थी, जो वर्तमान में कुशीनगर व फाजिलनगर के नाम से जाना जाता है।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण स्थान भी कुशीनगर में स्थित है,जिसे प्राचीन काल में कुशीनारा नाम से संबोधित किया जाता था। यहां पर मल्लों का शासन था।

मल्ल जाति के लोग द्वंद्वयुद्ध में निपुण होते थे; इसीलिये द्वंद्वयुद्ध का नाम 'मल्लयुद्ध' और कुश्ती लड़नेवाले का नाम 'मल्ल' पड़ गया है। महाभारत में मल्ल जाति, उनके राजा और उनके देश का उल्लेख हैं। प्राचीन भारतवर्ष के अनेक स्थान जैस मुलतान (मल्लस्थान), मालभूमि आदि में 'मल्ल' शब्द विकृत रूप में मिलता है। त्रिपिटक से कुशीनगर में मल्लों के छोटे राज्य का होना पाया जाता है। मनुस्मृति में मल्लों को लिछिबी (लिच्छाव) आदि के साथ संस्कारच्युत या 'व्रात्य क्षत्री' लिखा है। पर मल्ल आदि क्षत्री जातियाँ बौद्ध मतावलंबी हो गईं थीं। इसका उल्लेख स्थान-स्थान पर त्रिपटक में मिलता है जिससे ब्राह्मणों के अधिकार से उनका निकल जाना और ब्रात्य होना ठीक जान पड़ता है और कदाचित् इललिये स्मृतियों मे वे 'व्रात्य' कह गए है।

वैदिक साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण समाज में सर्वाधिक महत्वशाली थे। वैदिक परंपरा में ब्राह्मण का स्थान क्षत्रिय से उच्चतर है किंतु ब्राह्मण, उपनिषद्, (शतपथ ब्रा. १४,४,१,२३, तैत्तरीय, ३,१,१४) और पाली साहित्य में कुछ ऐसे उल्लेख हैं जिनसे ज्ञात होता है कि अवसरविशेष पर क्षत्रियों ने ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर पद प्राप्त करने की चेष्टा की। यह भी सत्य है कि क्षत्रियों में जनक, प्रवाहण जैवलि (बृहदा. उप. ६,११), अश्वपति कैकेय (श. ब्रा.१०,६,१), अजातशत्रु (बृहद. उप. २,१,१) के समान ब्रह्मविद्या के ज्ञाता और उपदेष्टा थे। गार्वे (डायसन कृत फ़िलासफ़ी ऑव उपनिषद्, पृ. १७), ग्रियर्सन (एंसाइक्लोपीडिया ऑव रिलीजन ऐंड एथिक्स में भक्ति पर निबंध), रा. गो. भांडारकर (वैष्णविज्म ऐंड शैविज्म, पृ. ९) आदि विद्वानों का मत है कि ब्राह्मणों द्वारा अनुसासित वैदिक कर्मकांड की परंपरा के विरूद्ध क्षत्रियों ने ज्ञानपरक औपनिषद धारा का प्रवर्तन किया। ब्राह्मण क्षत्रीय के परस्पर संघर्ष का उल्लेख प्राचीन परंपरा में भी हुआ है :

धिग्वलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।
बलाबले विनिश्चित्य तप एव परं बलम्।।

प्राचीन एतिहासिक साहित्य में पग पग पर इस संघर्ष के प्रमाण मिलते हैं। बौद्ध साहित्य और जैन आगमों में बराबर यह कहा गया है कि धर्म प्रणेता सदैव क्षत्रीय परिवार में ही जन्म लेते हैं। फिर भी वैदिक परंपरा में ब्राह्मण वर्ण से सदैव निम्न माने जाते थे किंतु वैश्य शूद्रों के ऊपर उनकी प्रमुखता समाज में स्वीकृत थी (काठक सं. ३,३,१०,२२,१ ; ऐतरेय ब्राह्मण. ११-३-३)। ईसापूर्व छठी सदी में अवंति के राजा प्रद्योत ने कौशाम्बी के राजा तथा प्रद्योत के दामाद उदयन के साथ लड़ाई हुई थी। उससे पहले उदयन ने मगध की राजधानी राजगृह पर हमला किया था। कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी को अपने अधीन कर लिया और बाद में उसके पुत्र ने कपिलवस्तु के शाक्य राज्य को जीत लिया। मगध के राजा बिंबिसार ने अंग को अपने में मिला लिया तथा उसके पुत्र अजातशत्रु ने वैशाली क लिच्छवियों को जीत लिया। ईसापूर्व पाँचवी सदी में पैरव और प्रद्योत सत्तालोलुप नही रहे और हर्यंको तथा इक्ष्वांकुओं ने राजनीतिक मंच पर मोर्चा सम्हाल लिया। प्रसेनजित तथा अजातशत्रु के बीच संघर्ष चलता रहा। इसका हंलांकि कोई परिणाम नहीं निकला और अंततोगत्वा मगध के हर्यंकों को जात मिली। इसके बाद मगध उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया। उदयिन तथा उसके उत्तराधिकारी प्रशासन तथा राजकाज में निकम्मे रहे तथा इसके बाद शिशुनाग वंश का उदय हुआ। शिशुनाग के पुत्र कालाशोक के बाद महापद्म नंद नाम का व्यक्ति सत्ता पर काबिज हुआ। उसने मगध की श्रेष्ठता को और उँचा बना दिया। महाजनपद काल का सबसे बड़ा साम्राज्य मगध का था।

मल्ल वंश के शासकों ने १२वीं शताब्दी से १८वीं शताब्दी तक नेपाल में शासन किया। मल्ल राजाओं का सम्बन्ध मल्ल महाजनपद से था। संस्कृत में 'मल्ल' शब्द का अर्थ 'पहलवान' होता है। मल्ल वंश का शासन लगभग १२०० ई के आसपास काठमाण्डू उपत्यका में आरम्भ हुआ। उन्होने लगभग ५५० वर्षों तक नेपाल में शासन किया। उनका शासन नेपाल का स्वर्णयुग माना जाता है। १७६९ ई में गोरखा शासक पृथ्वी नारायण शाह के आक्रमण के फलस्वरूप मल्ल वंश का अन्त हो गया।

सैंथवार संघ में सम्म्लित वंशो के नाम-
1. मल्ल विशेन 4. गौड़ (अमेठिया) 6. बरवार
11. दुर्गवंशी 14. पलवार/परिहार 15. उज्जैनी 16. नागवंश 17. गहरवार 18. वैस 20. कछवाहा
21. चौहान 22. बघेल 24. हयोवंशी 25. निकुम्भ 26. चन्दवंशी 27. वच्छेल 28. बरवार 29. कलहंस 30. रैकवार
31. पवाँर/परमार 32. राजकुमार 33. गहलौद 36. पाल/राजपाली 37. दिक्षित 38. बरहजपारी सैथवार 39. दास 40. खुटहनि

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]