साहिबजादा जोरावर सिंह
| साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਾ ਜ਼ੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ | |
|---|---|
| जन्म |
ज़ोरावर सिंह 28 नवम्बर 1695[1] आनंदपुर साहिब, भारत |
| मौत |
दिसम्बर 26, 1704 (उम्र 9 वर्ष) फतेहगढ साहिब, भारत |
| प्रसिद्धि का कारण | martyrdom in 1704 |
| माता-पिता | गुरु गोविन्द सिंह, माता जीतो |
| संबंधी |
साहिबजादा अजित सिंह साहिबजादा जुझार सिंह साहिबजादा फतेह सिंह |

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह' (पंजाबी: ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਾ ਜ਼ੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ, 28 नवम्बर 1695 – 26 दिसम्बर 1704)[1] गुरु गोविन्द सिंह के चार पुत्रों में से तीसरे पुत्र थे। साहिबजादा जोरावर सिंह और उनके छोटे भाई साहिबजादा फतेह सिंह की गिनती सिखों के सबसे पूज्य एवं श्रद्धेय शहीदों में होती है। 6 दिसंबर को गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह के बलिदान की स्मृति में वीर बाल दिवस मनाया जाता है।
आनंदपुर छोड़ते समय सरसा नदी पार करते हुए गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार बिछुड़ गया। माता गुजरी और दो छोटे पोते साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह के साथ गुरु गोबिंद सिंह जी एवं उनके दो बड़े भाइयों से अलग-अलग हो गए। सरसा नदी पार करते ही गुरु गोबिंद सिंह जी पर दुश्मनों की सेना ने हमला बोल दिया।
चमकौर के इस भयानक युद्ध में गुरुजी के दो बड़े साहिबजादों ने शहादतें प्राप्त कीं। साहिबजादा अजीत सिंह को 17 वर्ष एवं साहिबजादा जुझार सिंह को 15 वर्ष की आयु में गुरुजी ने अपने हाथों से शस्त्र सजाकर धर्मयुद्ध भूमि में भेजा था।
सरसा नदी पर बिछुड़े माता गुजरीजी एवं छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह जी 7 वर्ष एवं साहिबजादा फतेह सिंह जी 5 वर्ष की आयु में गिरफ्तार कर लिए गए।
उन्हें सरहंद के नवाब वजीर खाँ के सामने पेश कर माताजी के साथ ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया और फिर कई दिन तक नवाब और काजी उन्हें दरबार में बुलाकर धर्म परिवर्तन के लिए कई प्रकार के लालच एवं धमकियां देते रहे।
दोनों साहिबजादे गरज कर जवाब देते, 'हम अकाल पुर्ख (परमात्मा) और अपने गुरु पिताजी के आगे ही सिर झुकाते हैं, किसी ओर को सलाम नहीं करते। हमारी लड़ाई अन्याय, अधर्म एवं जुल्म के खिलाफ है। हम तुम्हारे इस जुल्म के खिलाफ प्राण दे देंगे लेकिन झुकेंगे नहीं।' अत: वजीर खां ने उन्हें जिंदा दीवारों में चिनवा दिया।
साहिबजादों की शहीदी के पश्चात बड़े धैर्य के साथ ईश्वर का धन्यवाद करते हुए माता गुजरी ने अरदास की एवं अपने प्राण त्याग दिए। तारीख 26 दिसंबर, पौष के माह में संवत् 1761 को गुरुजी के प्रेमी सिखों द्वारा माता गुजरी तथा दोनों छोटे साहिबजादों का सत्कारसहित अंतिम संस्कार कर दिया गया।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 Shamsher Singh Ashok. "ZORAWAR SINGH (1696-1704)". Encyclopaedia of Sikhism. Punjabi University Patiala. 29 जुलाई 2017 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 27 March 2016.