सशक्तिकरण

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किसी व्यक्ति, समुदाय या संगठन की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, लैंगिक, या आध्यात्मिक शक्ति में सुधार को सशक्तिकरण कहा जाता है।

स्त्री पुरुष के मध्य समानता ।

वर्तमान मेें हम आधुुुुनिक हो गयेे हैै सिरफ कपड़ों सेे ना कि अपनेे विचारो ।

सशक्तिकरण की अवधारणाएं शक्ति से लिया गया है सशक्तिकरण अवधारणा का केंद्र बिंदु शक्ति है! मानव एक सामाजिक प्राणी हैं जो समाज में रहकर अपना जीवन यापन करता है उसे अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है मनुष्य के जीवन में ऐसी कई परिस्थितियां आती हैं जिनमें उनके अंदर निहित शक्तियों का ज्ञान भूल जाता है या शक्ति कम हो जाती है जिससे वह अपनी समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ हो जाता है या समस्याएं आर्थिक स्वास्थ्य राजनीतिक सामाजिक आदि कई तरह की हो सकती हैं इन समस्याओं को दूर करने के लिए सशक्तिकरण अत्यंत आवश्यक है सशक्तिकरण के अंतर्गत मनुष्य में नहीं क्षमताओं ज्ञान शक्ति का पुनर्वास करवा क्या जाता है इससे वह अपनी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम होता है और सामाजिक जीवन यापन करने में तथा सामाजिक समायोजन करने में समर्थ होता है एवं सामाजिक शिक्षिकाओं से अपना जीवन यापन करने में समर्थ होता है सशक्तिकरण से मानव का आर्थिक राजनीतिक सामाजिक मौलिक परिवारिक आदि क्षेत्रों में विकास किया जा सकता है शक्ति एक परिवर्तनशील है यदि शक्ति का परिवर्तन व्यक्ति में नहीं होता है!!

इस सशक्तिकरण सिद्धांत को सर्वप्रथम भारतीय शिक्षाविद् राजा दुबे जो डीएलएस पीजी कॉलेज मैं समाज सेवा विभाग में अध्ययनरत थे उन्होंने सन 1947 को पारित किया था इनके अनुसार सशक्तिकरण से व्यक्ति में मानसिक सामाजिक आर्थिक राजनीतिक तथा जीवन में कई प्रकार के विकासात्मक प्रयास किया जा सकते हैं सशक्तिकरण व्यक्तित्व के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है