सर्कस

'सर्कस एक चलती-फिरती कलाकारों की कम्पनी होती है जिसमें नट, विदूषक , अनेक प्रकार के जानवर (जैसे बाघ आदि) एवं अन्य प्रकार के भयानक करतब दिखाने वाले कलाकार होते हैं। सर्क्स एक वृत्तिय या अण्डाकार घेरे में दिखाया जाता है जिसके चारो तरफ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था होती है। अधिकांशत: यह सब कुछ एक विशाल तम्बू के नीचे व्यवस्थित होता है।
करतब
[संपादित करें]भले ही आज के दौर में मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होने से सर्कस देखने में लोगों की रूचि कम हुई हो. मगर आज भी बच्चों के बीच इसकी बड़ी लोकप्रियता हैं. सर्कस एक तरह का प्रशिक्षित खेल हैं. जिसमें मार्शल आर्ट, नृत्य, जिम्नास्टिक, संवाद आदि में प्रोफेसनल लोग ही हिस्सा लेते हैं. किसी मेले में मुख्य रूप से सर्कस का आयोजन अवश्य ही होता हैं. इसमें काम करने वाले कलाकार अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों का मनोरंजन करते हैं. सर्कस देखने के लिए हमें एक टिकट खरीदनी पडती हैं. उसी पैसे से इन कलाकारों का गुजर बसर चलता हैं. पतली सी रस्सी या धागे के सहारे उछल कूद, बाइक को गहरी खाई में कूदना, जलती हुई तश्तरी में कूदना आदि प्रकार के खेल दिखाए जाते हैं.
पशु अधिकार
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पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम, 1960 सभी आधुनिक भारत में पशु कल्याण और अधिकार का आधार है। अधिनियम की धारा 22 किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी प्रदर्शनकारी पशु का प्रदर्शन या प्रशिक्षण करने पर प्रतिबंध लगाती है, जब तक कि वह व्यक्ति उचित रूप से पंजीकृत न हो और केंद्र सरकार ने भारत का राजपत्र में उस पशु को विशेष रूप से इस प्रतिबंध से बाहर न किया हो।[1][2] इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 द्वारा मजबूत किया गया, जिसने सैद्धांतिक रूप से मनोरंजन के उद्देश्य से जंगली जानवरों के अधिग्रहण पर प्रतिबंध लगा दिया।[3] भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 'सेंटर फॉर एनवायरनमेंट लॉ, WWF-I बनाम भारत संघ' (2013) में पुष्टि की कि 1972 के अधिनियम का आशय यह है कि कोई भी राज्य संगठन या व्यक्ति जंगल में पाए जाने वाले जंगली जानवरों पर स्वामित्व या कब्जे का दावा नहीं कर सकता; बल्कि जंगली जानवर 'राष्ट्र की संपत्ति' हैं, जिनकी रक्षा करना राज्य का दायित्व है।[2] प्रदर्शन पशु नियम, 1973 भारत में प्रदर्शन पशुओं के प्रशिक्षण और प्रदर्शन को विनियमित करते हैं, और उन व्यवसायों से यह आवश्यक करते हैं जो पशुओं के साथ प्रदर्शन करना चाहते हैं कि वे 1960 अधिनियम में निर्धारित सामान्य नियमों का पालन करें। 1991 में, पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) ने एक अधिसूचना जारी की जिसमें 1960 अधिनियम की धारा 22 के तहत "भालू, बंदर, बाघ, तेंदुआ और कुत्तों" के प्रशिक्षण और प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया गया।[2] 1991–2001 के बीच कई चुनौतियों और स्पष्टीकरणों के बाद, कुत्तों को प्रतिबंध से बाहर रखा गया, लेकिन शेरों को इसमें शामिल किया गया।[2][4]
बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]संदर्भ
[संपादित करें]- ↑ "India Code: Section Details". indiacode.nic.in. अभिगमन तिथि: 24 April 2026.
- 1 2 3 4 Mitra, Partha Pratim; Sharma, Prakash (2020). "Role of the Supreme Court in Developing 'Animal Rights' Jurisprudence in India: A Study". Journal of the Indian Law Institute. 62 (3). Indian Law Institute: 239–262. आईएसएसएन 0019-5731. जेस्टोर 27296713. अभिगमन तिथि: 24 April 2026.
- ↑ "Circuses: Cruelty On Show And How To Act Against Them". People For Animals India. 2 March 1991. अभिगमन तिथि: 24 April 2026.
- ↑ Nisha 2017, pp. 240–241.
ग्रंथसूची
[संपादित करें]- Mitra, Partha Pratim; Sharma, Prakash (2020). "Role of the Supreme Court in Developing 'Animal Rights' Jurisprudence in India: A Study". Journal of the Indian Law Institute. 62 (3). Indian Law Institute: 239–262. आईएसएसएन 0019-5731. जेस्टोर 27296713. अभिगमन तिथि: 24 April 2026.
- Nisha, P.R. (2017). "Ban and benevolence: Circus, animals and Indian state". The Indian Economic & Social History Review. 54 (2): 239–266. डीओआई:10.1177/0019464617695676. आईएसएसएन 0019-4646. अभिगमन तिथि: 24 April 2026.