सदस्य:Vivek Sutra

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दिनांक : १८ फरवरी २००८ विवेक – सूत्र

मैं अभिषेक मिश्र, पिता श्री आचार्य अमरेन्द्र मिश्र (ज्योतिषी) तारानगर, मासीपीढ़ी, हजारीबाग – झारखण्ड कई दिनों से डायरी लिखने की सोच रहा था, लेकीन संमझ में नहीं आ रहा था की आखिर क्या लिखूं , सोचा आत्मकथा लिखूं लेकीन मैं डर गया की आत्मकथा में क्या लिखूं, मैं जो हूँ सो लिखूं या वो लिखूं जो लोग मेरे बारे में सोचते या जानते हैं ।

अब ये सोचने वाली बात है की मैं क्या हूँ, और लोग मेरे बारे में क्या और क्यों कुछ और जानते हैं ।

मैं क्या हूँ ये सिर्फ मैं जानता हूँ और लोग मेरे बारे क्या और क्यों कुछ और जानते है ये भी सिर्फ मैं जानता हूँ ।

मैं जो हूँ और लोग जो जानते हैं दो अलग पात्र हैं ये भी सिर्फ मैं जानता हूँ, बहुत दुःख होता है की मैं जो हूँ वो मैं नहीं हूँ ।

जब सुनता या सोचता हूँ की लोग मेरे बारे में क्या कहते या सोचते हैं तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने को मन करता है, अकेले में बहुत रोता हूँ, आत्महत्या करने को मन करता है, एक बार कोशिश भी कर चूका हूँ, लेकीन परिणाम गलत हुआ मैं मरा तो नहीं पर लोग मुझे और गलत समझने लगे, मुझे गलत समझने वालों में मुख्य मेरे परिवार के लोग थे अन्य शुभचिंतक भी शामिल हो गए, जब मैंने आत्म-हत्या का प्रयास किया था उसके पूर्व मैंने अपने विचार कुछ पन्नों में लिखा था, की शायद मेरी मृत्यु के पश्चात यह विचार लोगों तक पहुचे, जो हो ना सका, मैंने अपनी मृत्यु के लिए अपनी माँ श्रीमती किरण मिश्र के जन्म दिन को चुना ।

मेरी माँ का जन्म दिन १ मई को था, इसके एक दिन पूर्व ३० अप्रैल को मेरी शादी की सालगिरह थी, मैंने सोचा मृत्यु के पूर्व अपने मित्रों से एक बार मिल लूँ, मैंने अपने मित्रों को अपनी शादी की (बारहवीं) सालगिरह पर घर आने का निमंत्रण दिया, ३० अप्रैल २००८ को मेरे सभी मित्र मेरे घर आये, सभी लोगों ने मुझे बधाइयाँ दी, मैंने हंसकर कहा यह मेरा बारहवां है, आप भी बारह लोग आये हैं, क्या संयोग है, प्रत्येक दिन के हिसाब से एक लोग, यह सुन सभी चुप हो गए, फिर हम सभी जोर से हंस पड़े, हम सभी ने काफी मनोरंजन किया, मैं मन हीं मन मुस्कुरा रहा था, मैं जानता था ये १२ लोग मेरे किस बारहवें में आये हैं, शायद ये मेरे असली बारहवें में ना आयें ।

सबके जाने के बाद मैंने अपनी पत्नी सुचिता से काफी देर बात की, जब वो सो गयी मैं उसे देखता रहा की कितनी निश्चिंत हो कर ये सो रही है बेचारी, कल से इसका जीवन अन्धकारमय हो जायेगा, फिर मैं भी सो गया, दूसरे दिन मैं ७ बजे सोकर उठा अपनी माँ को जन्म दिन की बधाई दी, माँ को पावं छुकर प्रणाम किया, क्योकि आज मेरे पास पावँ छुने का कारण था, माँ से बिदाई लेना जरुरी था, कोई और दिन होता तो मैं दिनचर्या के अनुसार पावँ नहीं छु सकता था, सोचा एक धरती माँ के लिए अपनी माँ के जन्म दिन से शुभ दिन तो कोई हो हीं नहीं सकता, अपनी मृत्यु अपनी माँ एवं धरती माँ को समर्पित कर मैं नींद की गोली खाकर सो गया ।

मैंने ८५ (कम्पोज १०) नींद की गोली खा ली थी, लेकिन मेरे-माता-पिता के पुण्य एवं अथक प्रयास से मैं बच गया, तीन दिन हजारीबाग सदर हॉस्पिटल में रहा इसके बाद मुझे रांची रेफर कर दिया गया, सेवा-सदन रांची में मैं दस दिन तक आई.सी.यू में रहा, वहाँ के डॉक्टर दारुका ने मुझे पागल घोषित कर पागलखाने भेज दिया, मैं इस दुनिया को पागलखाना घोषित कर सच्चे लोगों के पास चला गया, सोचा मरने दो इन्हें जहन्नुम में, लेकिन मैं दिल से पागल था दिमाग से नहीं सो मैंने प्रयास जारी रखा, पागलखाने से हीं सभी प्रेस को मैंने पत्र लिखा, अपने विचार लिखे, लेकिन सब व्यर्थ, सभ्य समाज के लोग एक पागल की बात कैसे समझते, उन्होंने मुझे पूर्ण पागल घोषित कर दिया, लोग मेरी बातों पर हँसते थे, जिसकी मुझे तनिक भी परवाह नहीं थी, मैंने सोचा कोई फायदा नहीं व्यर्थ प्रयास कर रहा हूँ, यहाँ के लोग सभ्य हैं एवं मद-मस्त है, इस दुनिया को जहन्नुम बना रखा है...।

मैं जहाँ गया था वो बहुत पवित्र जगह थी वो, मैं पागल था नहीं पागल करार कर दिया गया था, वहाँ कोई भेद-भाव नहीं था, सभी अपने में मस्त थे, वहाँ न कोई हिन्दू था न कोई मुस्लिम, न किसी अन्य धर्म के लोग थे उन्हें तो धर्म क्या होता है इसका भी ज्ञान नहीं था । कुछ दिन वहाँ मैंने शान्ति से गुजारे, पागल था नहीं अतः वहाँ नहीं रह सका अब अफ़सोस होता है वहाँ से वापस क्यों चला आया, पागलखाने के बाहर कुछ गिनती के धर्म हैं परन्तु पागलखाने में मुझे बहुत सारे धर्म नजर आये, कारण हर सच्चे अथवा पागल लोगों का कोई धर्म नहीं होता है वो खुद एक धर्म होते हैं बड़े पवित्र होते हैं, वे परमात्मा के बहुत करीब होते हैं, खैर मैं वहाँ रहने के लायक नहीं था सो वापस आ गया, वापस आकार सोचा खुद को बदल लूँ परन्तु न मैं खुद को बदल पा रहा था ना लोगों को बदल पा रहा था ।

ऐसा लगा जैसे बहुत देर हो चुकी है, ऐसा लगता है किसी और दुनिया में आ गया हूँ, यहाँ के लोग अलग हैं, यहाँ का धर्म अलग है, यहाँ की संस्कृति अलग है, यहाँ की भाषा अलग है, यहाँ न लोग मुझे समझ पा रहे हैं ना मैं लोगों को समझ पा रहा हूँ, लगने लगा खुद को भूलता जा रहा हूँ, बहुत दूर होता जा रहा हूँ, मैं खुद के लिए एक पहेली बन गया हूँ, अब न हँसने का मन करता है न रोने का ।

चुप रहने की कोशिश करता हूँ शायद अब मैं वो अभिषेक नहीं रह गया हूँ जो पहले था, ये परिवर्तन कब हो गया पता ही नहीं चला घर द्वार छोड़कर कहीं चले जाने को मन करता है पर डरता हूँ लोग कहीं गलत न समझ लें..।

आखिर परेशानी क्या है, क्यों लोगों से मेरे विचार नहीं मिलते हैं ? क्या वजह है की मुझे चुल्लू भर पानी में डूब मरने को मन करता है, क्यों मैंने आत्महत्या का प्रयास किया था, क्यों मैं पागलखाने तक पहुंचा था ।

क्या मैंने कोई अपराध या पाप किया है की अपराध बोध से मरा जा रहा हूँ ? ।

बहुत सोचा की लोग सच्चाई सुनना जा जानना क्यों नहीं चाहते है, बहुत सोचा लेकिन समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन जब समझ में आया तो बहुत अच्छा लगा, मन को बहुत सकून मिला, अब चुल्लू भर पानी में डूब मरने को मन नहीं करता है, आत्महत्या करने को भी मन नहीं करता है, अब मैं बहुत खुश हूँ, अब लोग मुझे अच्छे लगने लगे हैं भले ही लोगों का नजरिया मेरे प्रति अब भी वही है ।

कुछ-कुछ तो मैं तभी समझ गया था जब मैंने आत्महत्या का प्रयास किया था, लेकिन वह ज्ञान अधूरा था, अधकचरा ज्ञान का परिणाम बहुत भयावह होता है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों के अनुसार मैं बेतुकी बातें करने लगा था, लोगों को भी लगने लगा था की मैं पागल हो चला हूँ, मेरे द्वारा किये गए आत्महत्या के प्रयास से उनकी सोच को बल मिला और मुझे पागलखाने में भर्ती करवा दिया गया ।

पागलखाने में मैं अक्सर अकेला बैठा सोचता रहता था, आखिर क्यों, क्या गलती है मेरी, क्यों मुझे लोगों ने यहाँ तक पहुँचाया, दिल से एक आवाज आती थी, यह स्वाभाविक है यहाँ तो लाना और आना ही था, मन ही मन मुस्कुराकर रह जाता था, जगह विशेष का असर भी था, कभी कभी तो बहुत हँसता था और हँसते हँसते रोने लगता था, पागल विशेष होने का गुण मुझमे आने लगा था ।

खैर बहुत कुछ समझ में आ गया है, क्या समझा हूँ ये मैं जानता हूँ, बहुत कुछ खोकर समझ में आया है, क्या खोया क्या पाया ये सिर्फ मैं जानता हूँ सिर्फ मैं ।

थोडा दुःख तो अब भी है, पहले अपने दुःख से दुखी था अब दूसरों के दुःख से दुखी हूँ, समस्या वहीँ की वहीँ है ।

आपको बता देना चाहता हूँ की मेरी परेशानी का मूल कारण मेरे द्वारा देखे गए दो स्वप्न थे, जिसके कारण मैं इतना कठोर निर्णय लेने को मजबूर हो गया था ।

एक रात मैंने एक सपना देखा और उस सपने के वजह से मैं काफी दिनों तक परेशान रहा था, मैंने सपने में देखा की घर पर एक साधु बाबा आये हैं, मैंने उन्हें खाने के लिए कुछ दिया, खाकर वे बहुत प्रसन्न हुए, उन्होंने पूछा दुनिया का सबसे बड़ा सत्य क्या है, मैंने कहा मौत, जो सुना था कह दिया, उन्होंने कहा नहीं, मौत सत्य नहीं है, सबसे बड़ा सत्य वजह है, मौत की भी कोई न कोई वजह होती है ।

जब सोकर उठा तो सपने को याद किया तो समझ में नहीं आया की आखिर इस सपने का मतलब क्या है ।

अपने पिता से इस सपने के विषय में पूछा, उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा ढूंढों वजह, कई दिनों तक इस सपने के विषय में सोचा परन्तु समझ में नहीं आया ।

यही स्वप्न मेरी समस्या का समाधान था जो उस वक्त नहीं समझ सका था, कुछ दिनों बाद पुनः एक और रहस्यमय सपना देखा, सपना देख कुछ समझ में आया, परन्तु रहस्य अब भी बरक़रार था ।

मैं उलझता जा रहा था, अपने भविष्य को लेकर भी परेशान रहने लगा था, समझ तो मुझे आ जाना चाहिए था इस सपने के द्वारा ।

सपने में मैंने देखा की मैं मर गया हूँ मेरी लाश मेरे घर के बाहर पिता जी के ऑफिस के दरवाजे के बाहर पड़ी हुई है और मैं दूसरे दरवाजे के पास खड़ा अपनी लाश को देख रहा हूँ ।

लेकिन एक आश्चर्य देखता हूँ की एक बादल नुमा परछाई मेरे मृत शरीर में प्रवेश करने की कोशिश कर रही है ।

मेरा भाई एवं मेरे पिता रो रहे हैं, माँ बेहोश है, कुछ लोग मेरी पत्नी सुचिता को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं ।

सभी लोग आ चुके हैं, राम नाम सत्य है के साथ मेरी अर्थी उठाई गयी, सभी लोग घाट को जा रहे हैं, मैं भी इन लोगों के साथ-साथ घाट पर जा रहा हूँ, मेरा ध्यान उस परछाई से हट नहीं रहा है, वो बार बार मृत शरीर में प्रवेश करना चाह रही है, शायद वो आत्मा थी ।

लोग रास्ते में मेरी चर्चा करते जा रहे हैं, साथ में कह रहे थे घाट से आकार काम पर भी जाना है, जो होना था सो हो गया है, होनी को कौन टाल सकता है ।

मैंने भी सोचा बेचारे सही कह रहे हैं, लेकिन समाज में रहना है ना तो घाट तो जाना हीं पड़ेगा एक दिन इन्हें भी तो मरना है, समय निकलना हीं पड़ता है ।

हमलोग घाट पहुँच गए, मेरा भाई बबलु रो रहा है, पिताजी अकेले खड़े हैं कुछ बोल नहीं रहे हैं, उनका बेटा मरा है, वे बेचारे क्या बोलेंगे, एक बार भी उन्होंने राम नाम सत्य है नहीं कहा ।

वे सोच रहे होंगे पप्पू क्यों मरा, आखिर क्या वजह थी, सुचिता एवं बच्चों का क्या होगा ?

जैसा भी था जीवित ही ठीक था ।

सभी लोग सोच रहे थे आखिर वजह क्या है, क्यों मरा ?

सबकी अपनी ही राय थी, कोई कह रहा था हर काम में असफल था, कोई कह रहा था लड़की का मामला होगा, कोई कह रहा था कर्ज होगा, कोई कुछ तो कोई कुछ कह रहा था ।

खैर आग देने का वक्त आ गया, जब मेरा भाई बबलु मेरे मृत शरीर को आग देने बढ़ा तो वो परछाई बबलु को रोकने लगी, वो परछाई रो रही थी, वो कह रही थी इसे मत जलाओ, यह मेरा घर है, अब मैं कहाँ जावूँ, इस घर में मेरा परिवार है, इसी घर में तुम भी हो, इसी घर में मेरा धर्म मेरा भगवान है, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, क्यों मुझे बर्बाद कर रहे हो ।

लेकिन उस परछाई का चेहरा किसी को दिखाई नहीं पड़ रहा था ना ही आवाज सुनाई पड़ रही थी, वो परछाई थक चुकी थी लेकिन कोशिश कर रही थी ।

खैर मेरे मृत शरीर को आग दे दिया गया, मैंने देखा मेरे पिताजी के आँखों से आँसू की बूंदें गिर रहे हैं, सभी लोग जा चुके थे पिताजी काफी देर तक रहे बाद में वो भी चले गए ।

घाट पे जली हुई चिता, वो परछाई और मैं रह गए ।

चिता से धुवाँ उठ रहा था, चिता के पास मैं और परछाई बैठे थे, ना जाने क्यों वह परछाई मुझे नफरत भरी नजरों से देख रही थी ।

कुछ देर बाद एक साधु आये, वही साधु जिन्होंने मुझसे मेरे पहले सपने में दुनिया का सबसे बड़ा सत्य पूछा था, मैंने उत्तर में सबसे बड़ा सत्य मौत कहा था उन्होंने कहा था मौत सत्य नहीं है सबसे बड़ा सत्य वजह है ।

मैंने उठकर साधु बाबा को प्रणाम किया और बाबा से पूछा बाबा ये क्या चक्कर है शरीर जल गया, आत्मा वहाँ खड़ी है तो मैं कौन हूँ ।

बाबा ने मुस्कुराकर कहा तुम कर्म हो, शरीर समाप्त हो जाता है, आत्मा परमात्मा के पास चली जाती है या नए शरीर प्राप्त करती है यहाँ कर्म रह जाता है ।

यह कह कर बाबा चले गए, मैं रोने लगता हूँ की आज तक मैंने कोई ऐसा कर्म नहीं किया की लोग मुझे अच्छी नजरों से देखें ।

हे भगवान ये क्या हो गया मैं मर कर भी नहीं मरा ।

अब समझ में आ गया की वो परछाई क्यों मुझे नफरत भरी नजरों से देख रही थी, वो आत्मा थी और मैं कर्म, मेरे द्वारा किये गए कर्म के कारण उसका लोक-परलोक बर्बाद हो चूका था ।

सपना खत्म हो चुका था, मैं उठकर डर से कॉप रहा था, समझ में नहीं आया की ऐसा सपना मैंने क्यों देखा, क्या वजह है, लोग कहते हैं सपने दिमाग की उपज होती है, जो हम सोचते हैं उसे सपने के रूप में देखते हैं, पहले मैं भी वही सोचता था, परन्तु अब नहीं, सपने में भी वजह रहती है जरुरत है इसे समझने की, इस सपने की वजह से मैं और परेशान रहने लगा था, परेशानी के कारण कई थे ।

• पहला तो ये की इस सपने का क्या मतलब है, क्यों देखा मैंने, जबकि कभी इस तरह का विचार मेरे मन में आया ही नहीं था आखिर क्या वजह है ।

• दूसरा क्या मेरा अन्त नजदीक है, सुना था मृत्यु पूर्व कई प्रकार से मृत्यु का अहसास हो जाता है, क्या मैं मरने वाला हूँ, अगर हाँ तो कब तक ।

• तीसरा कारण मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया की जो सपने में देखा वो तो सत्य हीं है, अगर आत्मा का वजूद है तो कितनी तकलीफ होती है आत्मा को शरीर त्यागने पर यह मैंने देखा है..।

एक बात तो समझ में आ गयी की मृत्यु का भय तो सिर्फ आत्मा को हीं है, वही इस शरीर से जाना नहीं चाहती है, शरीर तो मात्र एक घर एक मंदिर होता है, जिसमे परमात्मा का अंश आत्मा का निवास होता है ।

जितना ज्यादा सोचता उतनी हीं परेशानी बढती जा रही थी, एक परेशानी से निकलता तो दूसरी सामने आ जाती थी ।

मैंने सोचा हमारा शरीर तो निर्जीव है, शरीर आत्मा के प्रभाव में रहता है, अच्छे या बुरे कर्म तो आत्मा के प्रभाव के कारण होता है, फिर आत्मा के शुभ-अशुभ कर्मों के प्रभाव का परिणाम हमारे शरीर को क्यों भुगतना पड़ता है, लोग एक-दूसरे को शरीर के द्वारा पहचानते है, आत्मा के द्वारा नहीं ।

कर्म आत्मा करे भुगतना शरीर को पड़े यह समझ में नहीं आ रहा था, मैंने सोचा इसमें भी कोई न कोई रहस्य जरुर है, आखिर क्या ?

बहुत सोचा रहस्य से पर्दा उठ गया, मन हीं मन मैं ईश्वर की महानता का गुणगान कर उठा ।

मैंने आत्मा, शरीर और कर्म को समझने का प्रयास किया, ध्यान दिया किसका क्या कर्म है ।

क्यों आत्मा द्वारा किये गए कर्म को लोग शरीर के द्वारा किये गए कर्म समझ कर सम्मान या सजा का पात्र समझते हैं ।

जहाँ तक मेरी समझ में आया की हमारे अंदर विवेक होता है जिसे ईश्वर ने अपने प्रभाव से मुक्त रखा है, ईश्वर ने हमें शरीर और अपना अंश (आत्मा) दिया है, परमात्मा का अंश आत्मा जो कभी अशुभ हो ही नहीं सकता है, और शरीर तो निर्जीव होता है, तो हम गलत कर्म करते हीं क्यों हैं ?

कौन हमसे गलत कर्म कराता है, क्या ईश्वर ? (परमात्मा का अंश आत्मा)

नहीं

गलत कर्म हमारा विवेक करवाता है, सारे फसाद की जड़ हमारा विवेक है...। • अब ये विवेक है क्या ?

• क्यों ईश्वर का इसपर प्रभाव नहीं चलता है ?

• इसका कर्म कब आरम्भ होता है ?

• क्या हर अच्छे या बुरे इंसान के शरीर में एक हीं प्रकार का विवेक होता है ?

मैं कुछ और गहराई में गया, एक-एक रहस्य से पर्दा उठता चला गया..।

ईश्वर का अगर विवेक पर प्रभाव रहता तो यह संसार हीं नहीं होता, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क का वजूद हीं नहीं होता ।

अधर्म है तभी धर्म है, पाप है तभी पुण्य है, नर्क है तभी स्वर्ग है, अधर्म बिना धर्म का, पाप बिना पुण्य का, नर्क बिना स्वर्ग का कोई वजूद हो ही नहीं सकता ।

अगर सबकुछ ईश्वर के प्रभाव में होता तो इस संसार का कोई मतलब हीं नहीं था, सिर्फ धर्म, पुण्य, स्वर्ग होना असंभव है ।

हर इंसान धर्म से जुड जाये तो धर्म हीं मिट जायेगा, धर्म क्या उसका वजूद हीं मिट जायेगा, इस संसार की व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी, संसार का अन्त हो जायेगा, लोगों का सुख समाप्त हो जायेगा, जीवन नीरस हो जायेगा, इस संसार का वजूद बनाये रखने के लिए अधर्म आवश्यक है.।

इंसान को यह पता होना हीं चाहिए की धर्म क्या है, पुण्य क्या है, स्वर्ग क्या है ।

क्या हम अधर्म, पाप, नर्क के बिना धर्म, पुण्य, स्वर्ग को जान सकते हैं । कभी नहीं ।

ईश्वर ने सोचा शरीर तो कुछ है ही नहीं, आत्मा तो मेरा अंश होने के कारण पवित्र हीं रहेगी तो फिर अधर्म आएगा कहाँ से ?

ईश्वर को भी परेशानी जरुर हुई होगी, फिर ईश्वर ने सोचा होगा क्यों न इंसान के अंदर विवेक डाल दूँ , जिसपर मेरा प्रभाव न रहे, और इंसान अपने विवेक द्वारा कर्म करे, और उस कर्म का उत्तरदायी वह स्वयं हो और आत्मा के रूप में मेरा अंश उसे हर अच्छे-बुरे कर्म करने के पहले एक बार सलाह दे, अब उस इंसान के विवेक पर निर्भर है की वह शुभ कर्म करता है या अशुभ..।

कोई भी इंसान कोई भी अच्छे या बुरे कर्म करता है तो उसकी अंतर-आत्मा एक बार उसे सलाह अवश्य देती है, की यह कार्य करो या न करो, अगर हमारा मन कुछ गलत करने की सोचता है तो हमारे अंदर से एक बार आवाज आती है नहीं यह ठीक नहीं है, इसे मत करो । यह कौन कहता है ?

यह परमात्मा का अंश आत्मा कहती है की बुरे कर्म मत करो ।

तो क्या हमारा मन आत्मा के अधीन नहीं है ?

हाँ हमारा मन पूर्णतः आत्मा के अधीन नहीं है. हमारा मन हमारे विवेक के अधीन है…।

विवेक एवं आत्मा के प्रभाव वश हमारा शरीर कार्य करता है, ये दो अलग पात्र हैं, जिनका हमारे शरीर पर नियंत्रण है ।

क्या विवेक हमेशा गलत हीं सोचता है ?

नहीं

हमारे विवेक को नदी के धार के जैसा व्यवस्था, संस्कार, माहौल मिलेगा वह वैसा हीं सोचेगा, नदी का प्रारब्ध एक हो सकता है, मंजिल एक हो सकती है परन्तु रास्ते एक हो यह जरुरी नहीं, वो प्रकृति के अनुसार चलकर अपनी मंजिल को पहुंचेगी ।

हमें अपने विवेक को आत्मा के अनुरूप बनाना होगा, यह तभी संभव है जब हम अपनी व्यवस्था, संस्कार, माहौल को सुधारेंगे, हमें एक-दूसरे का पूरक बनना होगा ।

यह सुधार कैसे संभव है, यह तो असम्भव दिखता है ।

दुनिया के हर जीव में एक हीं परमात्मा का अंश है जो अत्यंत शुभ है, चाहे वह इंसान हो, पक्षी हो या जानवर हो अथवा पेड़-पोधे हो ।

लेकिन विवेक किसी में एक सा नहीं है वह हमारी व्यवस्था, संस्कार, माहौल की देन है, जो हमें एक-दूसरे से अलग करता है, जिसने हमें अलग धर्म बनाना सिखाया, उच्च-नीच का भेद सिखाया, अलग-अलग ईश्वर बनाना सिखाया, अपना-पराया का ज्ञान सिखाया ।

मेरी नजर में इस विवेक ने हमें बर्बाद कर दिया है, जिस व्यवस्था को हम जी रहे हैं वो इसी विवेक की देन है, यह विवेक हीं आधारहीन है तो इसके द्वारा बनी व्यवस्था का क्या वजूद ।

क्या हमारा शरीर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या ज्ञात-अज्ञात कोई धर्म है ।

अगर विवेक के आधार पर देखा जाये तो हाँ हमारा शरीर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या ज्ञात-अज्ञात धर्म है, लेकिन परमात्मा के आधार पर देखा जाये तो हम सभी एक हैं, हम सभी ब्रह्म हैं ।

कोई भेद नहीं हममे, ना इंसान में ना पशु पक्षी में ।

ईश्वर को देखने के लिए हम मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च जाते हैं, वहाँ अपने ईश्वर के प्रतिक को देखकर अपने ईश्वर के लिए बनाये मंत्र का उच्चारण करते हैं, और संतुष्ट हो कर चले आते हैं की आज मैंने अपने ईश्वर को जाकर देखा, कुछ न कुछ पुण्य जरुर प्राप्त हुआ होगा, लेकिन उस अन्धे इंसान का जन्म तो शायद व्यर्थ हो गया जो देख नहीं सकता, उसकी आँखे नहीं हैं, वो मंदिर -मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च तो जा सकता है लेकिन अपने ईश्वर को नहीं देख सकता है, वो पूछेगा ईश्वर कैसे होते है अगर हम कहें ईश्वर की दो आँखें हैं, हाँथ, पावं हैं, बड़ी पवित्र मुस्कान है ईश्वर के चेहरे पर, तो उसे क्या समझ में आएगा आखें कैसी होती है ये भी वो अंधा इंसान नहीं जानता है, हाँ ईश्वर का गुणगान सुनकर उस अंधे इंसान के चेहरे पर जरुर पवित्र मुस्कान आएगी..।

अन्धे इंसान की पवित्र-मुस्कान में ईश्वर है, हमें ईश्वर को देखने के लिए आँखे की आवश्कता नहीं है, हम आखें बंद कर ईश्वर को देख सकते हैं । लेकिन शायद अब बहुत देर हो चुकी है, हमने परमात्मा को भी अलग कर दिया है जो हमारे मन की उपज है, हमने उनका अलग-अलग नाम रख दिया है, अलग-अलग व्यवस्था कर दी है, उनके लिए अलग-अलग नियम बना दिए है हमने ।

ऐसा प्रतीत हो रहा है ईश्वर ने हमें नहीं हमने ईश्वर को बनाया है ।

क्या बात है ।

ध्यान देने से प्रतीत होता है की हम इंसानों ने क्या-क्या बना रखा है, सिर्फ इंसानों ने बनाया है पशु पक्षियों ने नहीं बनाया, लेकिन हमने अपने बनाये व्यवस्था में इन निर्दोष पशु पक्षियों को भी शामिल कर लिया है, हे ईश्वर हमें क्षमा करना ।

यह हमारा पवित्र शरीर जिसमे परमात्मा का वास है, यह अपवित्र हो गया है, जब मंदिर की व्यवस्था हीं अपवित्र हो जाये तो उसमें बसे परमात्मा के अंश कैसे बच सकते हैं, उन्हें भी तो शुद्धि की आवश्कता होगी, शुद्धि क्या मन्त्रों द्वारा ।

नहीं ।

जिस प्रकार सोने को शुद्ध करने हेतु अग्नि में जलाया जाता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा के अंश आत्मा की शुद्धि होती है, परमात्मा अपने अंश की शुद्धि हेतु उसे सजा देती है, पश्चाताप हेतु पुनः-जन्म होता है उस आत्मा को नया शरीर प्राप्त होता है…।

किसी भी जीव को पूर्व-जन्मों में किये गए कर्मों के आधार पर नया-शरीर प्राप्त होता है, कर्मों के आधार पर सुख-दुःख प्राप्त होता है, इंसान अथवा पशु-पक्षी के रूप में जन्म होता है ।

और हम अपने सुख-दुःख के आधार पर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं अथवा ईश्वर पर दोषारोपण करते हैं, की आपने हमें क्या दिया और अगले को क्या दिया, हमारा क्या कसूर था जो आपने हमें इतने सारे दुःख दिए हैं ।

लेकिन हम इंसान सिर्फ अपने इस जन्म के वजूद को मानते हैं, और ईश्वर पर दोषारोपण करते हैं, जो सत्य नहीं है, अगर हमें कोई दुःख है तो निश्चित रूप से कोई न कोई वजह अवश्य है, एक घर में चार भाई है, एक की किस्मत अच्छी है तीन की खराब, क्या वजह है, मेहनत तो सभी लगभग एक सा करते हैं, एक मिटटी छुता है तो सोना, बाकी सोने को छुते हैं तो मिटटी हो जाती है, आखिर वजह क्या है, क्या इसके लिए ईश्वर जिम्मेदार है ।

नहीं ।

इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं, यह जो सुविधा, सुख-दुःख हमें प्राप्त है वो हमारे पूर्व जन्मों का परिणाम है, हमारा जन्म पहले भी हुआ था, हम आज भी है, और पुनः हमारा जन्म होगा, हम तबतक जन्म लेते रहेंगे जबतक हम शुद्ध नहीं हो जाते, हमारा अन्त नहीं है, इस जन्म में किये गए कर्म का फल हमें अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होगा, यह क्रम चलता रहेगा, मंत्र शुद्धि द्वारा हम शुद्ध नहीं हो सकते है, मंत्र तो एक आधार है हमारे कर्म शुद्धि के लिए, मुख्य रूप से हमें अपने कर्म की शुद्धि करनी होगी, तभी मोक्ष संभव है ।

हमने भिन्न-भिन्न मंत्र बना रखे हैं, अगर हम बिना मंत्र पढ़े भी एकाग्र मन से अपने विवेक को किनारे रखकर अपनी अंतरात्मा में ध्यान लगाएंगे तो हमें ईश्वर के दर्शन अवश्य हो जायेंगे, ईश्वर के दर्शन के लिए किसी भी मंत्र की कोई आवश्कता नहीं है, कहीं भी जाने की जरुरत नहीं है, वो हमारे ही अंदर है, ईश्वर का कोई रूप नहीं है, ईश्वर एक उर्जा है, हम सबमे ईश्वर का वास है, एक-दूसरे को दुखी कर हम मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च जाते हैं और अपने खुद के बनाये ईश्वर की आराधना करते है, जब हम तकलीफ में होते हैं तो अपने बनाये ईश्वर पर दोषारोपण करते हैं ।

हम इंसान चतुर हैं या महा-मुर्ख समझ में नहीं आता है ।

इंसान के द्वारा बनाई हुई हर चीज बेकार है, कोई आधार हीं नहीं है, इंसानों द्वारा बनाई हर चीज का परिणाम सिर्फ नफरत, घृणा, अधर्म है..।

पशु पक्षी जन्म को मैं श्रेष्ठ मानता हूँ, कम से कम वे परमात्मा के बनाये व्यवस्था को दूषित नहीं करते हैं, मेरी नजरों में इनका अंतिम जन्म होता है, मृत्यु के पश्चात इन्हें मोक्ष प्राप्त होता होगा, अगर ये इंसान के रूप में जन्म लेते तो अपना कई जन्म बर्बाद कर लेते, पशु-पक्षी के रूप में इन्हें जो भी दुःख तकलीफ प्राप्त होता है वो इनके पूर्व-जन्मों के किये गए पाप का अंतिम पाप का फल प्राप्त होता है, ये ईश्वर के ज्यादा करीब होते हैं, इन्हें तकलीफ देकर हम कितना बड़ा पाप करते हैं ये कल्पना के बाहर है..।

हम अपनी जरुरत के अनुसार अपने बल का प्रयोग कर निर्दोष जीवों की बलि देते हैं एवं उसे अपने बनाये धर्म की आवश्कता बताते हुए खुद को पाप मुक्त रखने की कामना करते हैं, और खुद को धार्मिक कहते हैं, जो सर्वथा अनुचित है ।

ये दोनों सपना मेरी समस्या का समाधान था, जो उस वक्त मैं समझ नहीं सका था ।

मैं एकांत में रहने लगा था, मेरी परेशानी बढती जा रही थी, किसी से कुछ कह भी नहीं सकता था ।

मैं प्रतिदिन शाम को नदी जाता था, नदी जाना मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया था, मैं वहीँ जाता था जहाँ मेरे मृत शरीर का अन्त हुआ था, घंटों जाकर वहाँ बैठता था, लोग पूछते थे हर दिन नदी क्यों जाते हो, क्या कहता उनसे, कुछ भी कह कर टाल देता ।

एक दिन प्रतिदिन की भांति में नदी गया वहाँ बभनबे के एक व्यक्ति का शव जल रहा था, मैं एक-एक प्रक्रिया देख रहा था जब लोग जाने लगे तो मैं भी चला गया, करीब घंटे भर बाद मैं फिर वहाँ गया, वहाँ पहुँच कर उस व्यक्ति के चिता को अपनी चिता समझ कर कल्पना करने लगा की ये मैं मरा हूँ, मेरी चिता जली है यहाँ, पहले भी मेरी ही चिता जली थी हर चिता मुझे अपनी ही चिता लगती थी, यह पागलपन था, लेकिन शायद मेरी नजरों में नहीं ।

मैं कल्पना करने लगा की मैं मरा हूँ, होली का त्यौहार आया, मेरे घर में कोई त्यौहार नहीं मनाया गया, इसी साल मेरी मौत हुई थी, लोग रो रहे थे, तीन-चार वर्षों तक कोई त्यौहार नहीं मनाया गया, धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो गया आखिर कब तक लोग मेरी मौत का मातम मानते ।

माँ-पिताजी के काफी दबाव पर सुचिता मेरी पत्नी की शादी कर दी गयी, मेरे माँ-पिता से उसका दुःख नहीं देखा जा रहा था, वो अपने पति के साथ रहती है, बच्चे होस्टल में पढते हैं, बबलु रांची में अपनी पत्नी एवं बच्चे के साथ रहता है, हमेशा हजारीबाग आता रहता है ।

माँ-पिताजी यहीं रहते है, हर दिन मुझे याद करते है ।

ये सब सोचते-सोचते मैं घाट पर रोने लगता हूँ, जो सोच रहा था सत्य भी तो यही था, हर दिन दुनिया में यही तो हो रहा है, रिश्ते नाते मुझे सब व्यर्थ लगने लगे, रिश्तेदार तो शरीर के रिश्तेदार होते हैं, जब शरीर हीं सत्य नहीं तो रिश्तेदार का क्या वजूद ।

अगर किसी इंसान के परिवार के सभी लोगों की मौत हो जाये तो उसका जीवन एकदम नीरस हो जायेगा, वैराग्य की भावना लेकर घर द्वार छोडकर कहीं चला जायेगा, लेकिन अगर वह पूरी दुनिया को अपना परिवार मानेगा तो उसे कहीं जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी, सभी तो अपने हैं, बस इसी की हमें जरुरत है, हमारे सारे दुखों का समाधान हो जायेगा, हमें अपना-पराया भूलना होगा, जब ईश्वर हमारे हैं तो सभी हमारे हैं ।

लेकिन हम इंसानों से शायद यह संभव नहीं हैं, हम बहुत दुखी हैं, हमारे दुःख का कोई अन्त नहीं है, हमारे परिवार में ८-१० लोग हैं ये ही हमारी दुनिया हैं, इसके बाहर सभी लुटेरे हैं ।

कितना दुःख है दुनिया में, मैं भी तो इसी दुनिया में रहता हूँ, मैं भी एक इंसान हूँ, ये दुनिया मुझे बहुत भयानक लगने लगी, मैं काफी डर गया था ऐसा लग रहा था जैसे मैंने भूत देख लिया हो, सोचा कहीं भाग जावूँ ।

लेकिन कहाँ, जहाँ भी जाऊंगा वहाँ खुद को पाउँगा ।

खुद को यानी अपनी परेशानी को पाउँगा, भागते - भागते यह पूरी धरती छोटी पड़ जायेगी और मेरी परेशानी इस धरती से बड़ी हो जायेगी ।

सो मैंने यहीं रहने का फैसला कर लिया, ना जाने क्या-क्या सोचते-सोचते घाट से घर चला आया, घर आने के रास्ते में मंदिर है, जिसे मेरे पिता जी ने बनवाया है, जब मैं मंदिर के पास से गुजर रहा था तो सोचा मंदिर जाकर दर्शन कर लूँ, शायद कुछ शांति लगे, लेकिन जब मैं तारा देवी की प्रतिमा के पास पहुंचा तो ऐसा लगा माँ मुझपर हंस रहीं है, आज मंदिर के सभी देव-देवी की प्रतिमा मुझपर हँसती हुई प्रतीत हुई, मैं उनका रूप देखकर डर गया, वहां से डरकर भाग गया, मैं और अशांत हो गया…।

अपना दुःख किसी से नहीं कह सकता था, जिन्दगी से डर लगने लगा था मौत में ही सुख-शांति दिखाई दे रही थी, लेकिन मौत अंतिम समाधान नहीं है कारण मौत सत्य है ही नहीं ।

लोग कहते हैं मौत एक कटु सत्य है लकिन मैं कहता हूँ ना जीवन सत्य है ना मृत्यु सत्य है, ना ही मैं सत्य हूँ, मैं तो एक शरीर हूँ ।

सत्य का मतलब है अमर होना ।

ना जीवन सत्य है ना मृत्यु सत्य है तो फिर सत्य क्या है ?

मेरी नजर में परमात्मा, आत्मा, सूर्य, चाँद, तारें सत्य हैं अन्य कुछ भी सत्य नहीं इस ब्रह्माण्ड में ।

जिस प्रकार समुद्र का जल समुद्र से निकल कर कई प्रक्रिया के बाद गंगा यमुना जैसे पवित्र नदियों अथवा गन्दी नदी नालों के रूप में पुनः समुद्र में मिल जाता है ठीक उसी प्रकार आत्मा परमात्मा से निकल कर कई जन्मो के बाद पुनः परमात्मा से मिल जाता है ।

गंगा यमुना एवं गन्दी नदी नालों की तरह ही मनुष्य जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है यह क्रम चलता रहता है इसका कोई अंत नहीं, मोक्ष पाना है तो गंगा यमुना नदी की तरह हमारे कर्म पवित्र होने चाहिए ।

परमात्मा (समुद्र) बहुत महान है वह हमें गंगा यमुना नदी की तरह एवं गन्दी नदी नालों की तरह भी स्वीकार करता है ।

शरीर की मृत्यु तो परमात्मा से आत्मा के मिलन का वकत होता है अतः शरीर की मृत्यु के पश्चात स्वर्ग ही प्राप्त होता है नर्क का नहीं, हाँ पवित्र शरीर में रहने वाले आत्मा को मनुष्य के विवेक के द्वारा किये गए कर्मों के अनुसार पुनः जन्म लेना पड़ता है, कई जन्मों तक आत्मा को अपनी शुद्धि हेतु कई शरीर धारण करना पड़ता है…।

नर्क तो हमारा जीवन होता है जो कई प्रकार के कष्टों को सहता हुआ मृत्यु (स्वर्ग) को प्राप्त करता है ।

अतः मृत्यु के पश्चात स्वर्ग नर्क को प्राप्त होना बकवास है मृत्यु के पश्चात नर्क का कोई वजूद है ही नहीं, हमारा कर्म हमारा जीवन ही नर्क है इस नर्क नुमा जीवन में सत्यकर्म करते हुए अपने आस पास के माहोल को पवित्र करना ही मनुष्य जीवन का धर्म एवं कर्म होना चाहिए ।

जिस प्रकार समुद्र का कुछ जल समुद्र में मिलने के पूर्व ही सूर्य द्वारा सोखित होकर पुनः नदी नालों के रूप को प्राप्त होकर जीवन यात्रा आरम्भ करता है ठीक उसी प्रकार अकाल मृत्यु को प्राप्त जीव परमात्मा से नहीं मिल पाता है, एवं पुनः शरीर प्राप्त कर नर्क नुमा जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है अतः अकाल मृत्यु वो भी आत्म हत्या करना कायरता ही नहीं मूर्खता पूर्ण कार्य है, जीवन का अंत कहाँ हुआ सामान्य जीवन जीते हुए तो जीवन मृत्यु के चक्र को तोडा जा सकता है पर अकाल मृत्यु द्वारा इस चक्र को तोडना असंभव है ।

अतः हमें सामान्य जीवन जीते हुए जन्म मृत्यु के चक्र को तोड़ते हुए मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए ।

हम मोक्ष तभी प्राप्त कर सकते है जब हम नदी के गहरे जल की तरह अपना जीवन यापन करें गहरे जल में इतनी शीतलता होती है की सूर्य की प्रचंड गर्मी भी इसे नहीं सोख पाती है और वह बिना किसी परेशानी की समुद्र (परमात्मा) से मिल जाती है ।

और जो जल उपरी सतह पर बहती है वह गर्मी और गंदगी का सामना करती हुई समय पूर्व मृत्यु को (अकाल मृत्यु) को प्राप्त करती हुई परमात्मा (समुद्र) में नहीं मिल पाती है ।

मनुष्य जीवन भी ठीक इसी प्रकार है, अगर हम नदी के गहरे जल अथार्थ शीतलता के साथ बिना गंदगी के जीवन जीते हैं, तो मोक्ष को प्राप्त होंगे, अथार्थ समुद्र (परमात्मा) में मिल जायेंगे ।

अगर हम नदी-नाले के उपरी सतह के जल की तरह जीते हैं अथार्थ अगर हम दुनिया को अपनी उपस्थिति का अहसास करते हैं की देखो हमारी लहरों को देखो कितनी तेज हैं तो हम जन्म-जन्मांतर तक मोक्ष प्राप्त नहीं करेंगे ।

एक हीं जन्म काफी है मोक्ष प्राप्त करने को, हमें गहराई में जाना होगा, मोक्ष का आयु से कोई सम्बन्ध नहीं है, कम आयु में भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, शुद्धता एवं शीतलता के साथ जीवन जीते हुए मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है, जीवन के इस रहस्य को हमें समझना होगा, यह रहस्य उतना गहरा नहीं है जितना हम समझते हैं..।

१००-१२० वर्ष का जीवन जीने से हीं मोक्ष नहीं प्राप्त होता है, गटर का जल भी गहराई में बहता हुआ समुद्र में मिल जाता है, सूर्य की किरणे उसे सोख नहीं पाती है, परन्तु वह जल गंदगी के साथ बहते हुए पूर्ण आयु प्राप्त करती है ।

मोक्ष किसका शरीर का या आत्मा का ? शरीर तो कुछ है ही नहीं, यह तो एक निर्जीव वस्तु है, अतः शरीर के मोक्ष की बात तो मूर्खतापूर्ण है, और अगर आत्मा की मोक्ष की बात करते हैं तो यह और भी बड़ी मूर्खतापूर्ण बात है, कारण आत्मा तो अजर अमर है किसी आत्मा को मोक्ष दिलाना उसकी अमरता पर प्रश्न चिन्ह लगाना हुआ ।

मेरे विचार से मोक्ष किसी जीव के अशुभ कर्मों को प्राप्त होता है, शरीर एवं आत्मा (शुभ कर्मों) का नहीं, मेरे विचार से शुद्ध चेतना/विवेक/ज्ञान/कर्म में ही आत्मा का वास है अतः मनुष्य के शुभ कर्मों का भी मोक्ष संभव नहीं, हमारे अशुभ कर्मों/विचार को ही मोक्ष प्राप्त होता है, मोक्ष प्राप्त करने के लिए हमें अधर्म/असत्य/अन्याय का साथ छोडना पड़ेगा, मंत्र जाप एवं अनुष्ठान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना असंभव है, हमारे शरीर के अंतिम क्रिया के वक्त जितने लोग हमारी मृत्यु संस्कार में सरीक होते हैं वे हमारे अपराध/कर्मों को क्षमा कर देते हैं, ताकि हम अपने द्वारा किये गए ज्ञात-अज्ञात अपराध/कर्मों से ऋण-मुक्त हो सकें, लोगों द्वारा प्राप्त क्षमा से हमारे अपराध/अशुभ कर्मों को मोक्ष प्राप्त होता है, यही सत्य है, मृत्यु के पश्चात क्षमा के द्वारा मोक्ष प्राप्त हो जब यह ज्ञान हमें प्राप्त हो जाये तो हम आज से ही क्यों न अपने कर्मों में शुभ परिवर्तन लाकर अपना लोक-परलोक सुधार लें ।

समुद्र (परमात्मा) कभी नहीं सोचा होगा की मेरे जिस जल को सूर्य सोख रहा है वह कल गंगा-यमुना अथवा गन्दी नदी-नालों के रूप में जीवन जीते हुए वापस आएगा, सूर्य जब जल सोखता है तो उसमे कोई भेद नहीं करता है परन्तु पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार बादल (बारिश) द्वारा कुछ बूंद गंगा-यमुना में तो कुछ जल गन्दी नदी-नालों में मिल जाते हैं, ठीक इसी प्रकार आत्मा परमात्मा से निकल कर अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार का जीवन प्राप्त करता है ।

अतः हमें ऐसे कर्म करने चाहिए की समुद्र का जल हमें सोख ही न पाए, की हमें पुनः जन्म लेना पड़े ।

कहीं ऐसा न हो जाये की सूर्य द्वारा षोखित जल की की एक भी बूंद गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों में न गिरे एवं सारा जल गन्दी नदी-नाले में हीं मिल जाये, अगर ऐसा हो गया तो परमात्मा (समुद्र) में सिर्फ गन्दा जल हीं जाकर मिलेगा और समुद्र (परमात्मा) अशुध्द हो जायेगा, जिसे फिर शुद्ध करना असम्भव हो जायेगा, जब परमात्मा हीं अशुद्ध हो जायेगा तो फिर हम कहाँ से शुद्ध रह पाएंगे, सूर्य द्वारा वाष्पित हुए जल से हीं जीवन का निर्माण होता है, अतः हमारे शरीर में शुद्ध एवं अशुद्ध दोनों प्रकार के जल तत्व के गुण पाए जाते हैं, नयी-नयी बीमारियाँ का शुद्ध कारण मात्र यही है की हम अपने परमात्मा को अशुद्ध कर दिए हैं, हमारे द्वारा छोड़े गए अशुद्ध जल (विष) जब समुद्र में आकार मिलते हैं तो ईश्वर को भी विष पीना पड़ता है वो भी सिर्फ हम इंसानों के कारण, हे ईश्वर हमें क्षमा करना, हमें विष निकालने के लिए समुद्र मंथन की आवश्कता नहीं है, स्व-मंथन की आवश्कता है, हमने इस पवित्र धरती में इतने प्रकार के विष घोल दिए हैं की अब इस धरती का स्वस्थ होना असम्भव प्रतीत होता है, अब इसकी मृत्यु निश्चित है ।

हम इंसान यही कर रहे है, खुद तो अशुद्ध हो ही रहे है अपने ईश्वर को भी अशुद्ध हीं कर रहे हैं ।

ईश्वर ने हमें सोचने के लिए विवेक प्रदान किया है साथ में वे खुद अपने अंश के रूप में हमारे साथ मार्गदर्शन के लिए रहते है फिर हम क्यों ऐसे कर्म करें की ईश्वर अथवा खुद की नजरों से हीं गिर जाएँ ।

जल के रूप में ईश्वर हीं हमारे भीतर है, पूरे शरीर में ईश्वर का वास है, उसका कोई आकार नहीं है, किसी विशेष जगह पर ईश्वर का वास नहीं है, वह तो अनंत है, अगर हम देखना चाहें तो इस सृष्टि के हर सजीव-निर्जीव वस्तु में ईश्वर के दर्शन हो जायेंगे, स्वयं में भी ईश्वर के दर्शन हो जायेंगे ।

परमात्मा के अंश की उपस्थिति में अपने विवेक का सही उपयोग कर कर्म करने से निसंदेह स्वयं को और इस दुनिया को हम बदल सकते हैं ।

जिस प्रकार जीवन का रहस्य समुद्र (परमात्मा) एवं सूर्य (विवेक) के मध्य है, ठीक उसी प्रकार पूरा ब्रह्माण्ड हमारे शरीर में जल एवं विवेक के रूप में समाया हुआ है, अतः जहाँ जल है वहीँ जीवन है, वहीँ स्वर्ग है वहीँ नर्क है, जहाँ जल नहीं वहाँ परम शुन्य ना स्वर्ग ना नर्क, अतः जहाँ जीवन है वहीँ ईश्वर है, जहाँ हम हैं वहीँ ईश्वर है, अतः ईश्वर हमारे अंदर हीं है, आकाश में नहीं ।

मेरे विचार में समुद्र में हीं परमात्मा का वास है, जीवन मृत्यु का रहस्य समुद्र में हीं है…।

समुद्र का जल जबतक समुद्र में रहता है तभी तक खारा रहता है, सूर्य द्वारा शोखित हो कर जब जल बारिश द्वारा नदी के रूप को प्राप्त होता है तो वो जल खारा नहीं होता है वह जल मीठा हो जाता है, उसी मीठे जल को हम प्रयोग में लाते है लेकिन उस मीठे जल से हमारा जीवन नहीं चल सकता हमें ईश्वर के उस गुण (खारा) की जरुरत पड़ती है जिसे हम नमक के रूप में पूर्ण करते हैं, नमक के रूप में ईश्वर हर घर में निवास करते हैं, बस इसी विचार की हमें आवश्कता है, हर वस्तु में ईश्वर के दर्शन हो जायेंगे ।

समुद्र (परमात्मा) से निकल कर समुद्र का जल (आत्मा) सूर्य द्वारा सोखित होकर (अपने कर्मों के अनुसार) अपने मूल गुण (खारा पण) को भूल जाता है, पुनः जब परमात्मा (समुद्र) में मिलता है तो अपने मूल गुण को प्राप्त करता है, ईश्वर बहुत महान है, क्षमादान देकर हमें हर रूप में अपना लेते हैं, क्षमा में भी ईश्वर हैं, आप भी मुझे क्षमा कर ईश्वरत्व के गुण प्राप्त करें..।

हे ईश्वर आपको कोटि-कोटि नमः ।

एक दिन साधू बाबा पुनः मेरे सपने में आये मैंने उन्हें प्रणाम किया उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया मैंने पूछा मैंने पूछा बाबा आप कौन हैं ? उन्होंने बताया में ज्ञान हूँ ।

आपका निवास स्थान कहाँ है ? उन्होंने कहा मैं तुम्हारी चेतना में निवास करता हूँ

मैंने कहा बाबा यह तो आपने अपना सुक्ष्म रूप बतलाया, अपने स्थूल रूप का परिचय दें एवं हमारे शरीर में परमात्मा का अंश आत्मा निवास करती है, लेकिन वो शरीर के किस हिस्से में रहती है ?

बाबा ने कहा मेरा स्थूल रूप तो खुद तुम ही हो, तुम्हारा स्थूल रूप ही मेरा स्थूल रूप है, हम दोनों का सूक्ष्म रूप तुम्हारी चेतना में है, यह चेतना प्राणवायु के प्रभाव से जागृत होती है, और प्राणवायु सूर्य एवं पृथ्वी के मध्य स्थित गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से उत्पन्न होती है, स्थूल रूप जड़ (शरीर) है, एवं सूक्ष्म रूप चेतना (आत्मा) है, हमारी चेतना ही हमारी आत्मा है, आत्मा का कोई रूप नहीं है, वह अनंत है, प्राणवायु में आत्मा का निवास है, अतः जहाँ प्राणवायु है वहीँ आत्मा है, जबतक शरीर में प्राणवायु है तभी तक शरीर में जलतत्व स्थित है, एवं जबतक जलतत्व स्थित है आत्मा स्थित है, प्राणवायु एवं चेतना के प्रभाव से विवेक का निर्माण होता है, विवेक से ज्ञान का, ज्ञान से विज्ञान का निर्माण होता है ।

बाबा ने कहा अहम् ब्रह्म, मैं ही ज्ञान हूँ, मैं ही आत्मा हूँ, मैं ही चेतना हूँ, मैं को पहचानो, आज स्वप्न में बाबा के दर्शन कर मैं धन्य हो गया, खुद का वजूद समझ मै आ गया की मेरा अंत तो हो ही नहीं सकता, मैं कौन हूँ, शरीर हूँ अथवा चेतना हूँ या कर्म हूँ, जल हूँ अथवा वायु हूँ, आज मेरे अंदर से मृत्यु का भय पूर्णतः समाप्त हो गया है, बस अब उस पल का इंतजार है जब मैं यह निर्जीव शरीर त्याग कर जीवित हो उठूँ, जब प्रथम बार मैंने अपनी मृत्यु (शरीर का अंत होते हुए) देखा था और ईश्वर से कहा था हे ईश्वर ये क्या हो गया मैं मर कर भी नहीं मरा, आज तक मैंने ऐसा कोई कर्म ही नहीं किया की लोग मुझे अच्छी नजरों से देखे ।

आज कम से कम यह दुःख नहीं है, संभव है मेरे विचार कुछ लोगों के ह्रदय को परिवर्तित कर सके, बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, किसी को तो आगे आना ही पड़ेगा, मुझे बहुत बड़ा ज्ञान प्राप्त हुआ है की मैं एक कर्म हूँ, जो कभी नहीं मरता है, कर्म के भी अनेक रूप होते हैं, विचार भी एक कर्म है, अतः मैं समस्त विवेकशील प्राणियों से मरने के पूर्व एक आग्रह करना चाहूँगा की शुद्ध विवेक एवं ज्ञान का प्रयोग कर कर्म करें, आप कर्म भी हैं एवं कर्ता भी हैं, आत्मा भी हैं एवं परमात्मा भी है ।

डरना है तो स्वयं से डरें, अपने कर्म से डरें, शुद्ध ज्ञान, विवेक, चेतना का प्रयोग कर स्वयं को ऊँचा उठाएँ, एवं स्वार्थ भाव का त्याग करें, हमारी चेतना में आत्मा का वास है तथा आत्मा में ज्ञान एवं विवेक का वास है ।

शरीर जड़ है एवं आत्मा चेतना, इन दोनों के मिश्रण से परमात्मा ने शरीर अथवा संसार की रचना की है ।

परमात्मा एक शक्ति है जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से उत्पन्न हुई है, एवं उसी शक्ति से वायुतत्त्व की उत्पत्ति होती है, वायुतत्त्व से जलतत्व की उत्पत्ति होती है, एवं वायुतत्त्व एवं जलतत्व के मिश्रण से जीव की उत्पत्ति होती है, अतः वायुतत्त्व/जलतत्व (आत्मा) उस शक्ति का अत्यंत सूक्ष्म रूप है जो परमात्मा (गुरुत्वाकर्षण) के प्रभाव से उत्पन्न हुई है, अतः गुरुत्वाकर्षण की शक्ति ही परमात्मा है एवं उस शक्ति के प्रभाव से उत्पन्न वायु/जल एवं चेतना का मिश्रण ही आत्मा है, अतः आत्मा एवं परमात्मा का कोई रूप नहीं है, वह तो अनंत है, वायुतत्व के रूप में संपूर्ण सृष्टि में आत्मा का निवास है, इस वायु तत्त्व को किसी शरीर की आवश्कता होती है जिसे प्रकृति पूर्ण करती है, मृत्यु के पश्चात वही वायु अनंत में विलीन हो जाती है, आत्मा अनंत है, (आत्मा का ठोस रूप कर्म है एवं सुक्ष्म रूप वायु है) लेकिन जब वायु तत्त्व को शरीर प्राप्त होता है तो शरीर की सभी नाड़ीयां जागृत हो जाती है, परिणाम स्वरुप मन एवं विवेक का कार्य आरम्भ हो जाता है, आत्मा का रहस्य उतना गहरा नहीं है जितना किसी जीव के शरीर का है, आत्मा (सूक्ष्म रूप) वायु तो एक करंट के रूप में कार्य करती है, वायु एवं गुरुत्वाकर्षण की शक्ति शरीर को गति प्रदान करती है, आत्मा एवं परमात्मा का रहस्य हमारे सामने है, हमें यह भी समझना होगा शरीर का निर्माण कैसे हुआ, शरीर की संरचना अतुलनीय है, इसकी रचना किसी परम शक्ति के द्वारा ही संभव है, कोई ऐसी शक्ति जिसके विषय में हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, ऐसी शक्ति जो पृथ्वी एवं सूर्य की भी उत्पत्ति करने में सक्षम हो, जो परमात्मा की भी उत्पत्ति कर सकता हो, मेरे विचार से परमात्मा से भी ऊपर कोई शक्ति है, संपूर्ण ब्रह्माण्ड इसी परम शक्ति के प्रभाव से उत्पन्न हुई है..।,


परमशक्ति

परमात्मा

आत्मा


• परमशक्ति : सम्पूर्ण सृष्टि, परमात्मा, आत्मा के निर्माण कर्ता • परमात्मा : सभी प्रकार के धर्म एवं उनकी शक्ति परमात्मा के अंतर्गत आते हैं, गुरुत्वाकर्षण की शक्ति भी परमात्मा के अंतर्गत आती है, मेरे विचार से गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का प्रतिक स्वास्तिक है, किसी भी शक्ति को हम उनके प्रतिक से जानते हैं, यह स्वास्तिक ही वो शक्ति है, जिसके प्रभाव वश जल एवं वायु तत्त्व की उत्पत्ति हुई है..।

• आत्मा : आत्मा के दो रूप होते हैं, एक उच्च कोटि की आत्मा एक निम्न कोटि की आत्मा होती है ।

• उच्च कोटि की आत्मा के अंतर्गत हमारे अवतारी पुरुष, ऋषि-मुनि, संत-महात्मा, पैगम्बर आते हैं एवं निम्न कोटि की आत्मा के अंतर्गत अन्य जीव आते हैं, श्री राम/कृष्ण, पैगम्बर, संत-महात्मा ये उच्च कोटि की आत्मा के अंतर्गत आते हैं, एवं ये जिस धर्म को मानते हैं वह धर्म परमात्मा के अंतर्गत आते हैं, अवतारी पुरुष (आत्मा) से ऊपर उनका धर्म होता है, वह धर्म जिसमें करोडो लोगों की आस्था जुडी रहती है, जैसे सनातन धर्म परमात्मा के अंतर्गत आते हैं एवं इसे मानने वाले श्री राम/कृष्ण या अन्य ये सभी उच्च कोटि की आत्मा के अंतर्गत आते हैं, कहीं न कहीं हम सभी आत्मा/परमात्मा का मालिक एक है ।

हमें यह समझना पड़ेगा, एक-दूसरे से नफरत का भाव त्यागना पड़ेगा, हम सभी एक हैं, हमारा प्रारब्ध भी एक है, प्रकृति का नियम भी हमारे लिए एक है, शरीर की संरचना भी हमारी एक है ।

अलग-अलग धर्म के अनुसार देखा जाये तो हमारे परमात्मा अलग-अलग है, क्योंकि धर्म मूल रूप में परमात्मा के ही रूप हैं, अतः इसे स्वीकार करने में कोई दोष नहीं की हमारे परमात्मा अलग-अलग हैं परन्तु हर धर्म/परमात्मा का उद्येश्य एक (दया, प्रेम, क्षमा, समर्पण) ही है, अलग-अलग धर्म/परमात्मा को मानते हुए भी अगर हम उनके उद्येश्य को नहीं मानते हैं तो हमें कोई अधिकार ही नहीं है है खुद को उस धर्म/परमात्मा से जुड़ा जीव कहलाने का ।

शुद्ध रूप की चेतना एवं विवेक के प्रभाव वश इस धरती पर संत-महात्मा/पैगम्बर जन्म लेते हैं एवं हमें सही मार्गदर्शन देते हैं ।

हमारे संत-महात्मा/पैगम्बर ने मनुष्य को गलत राह पर भटकने से रोकने के लिए हमारे तीर्थ-स्थलों, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य का निर्माण करवाया, ताकि हम अधर्म करने से डरें, सारे तीर्थ-स्थल हमारे शरीर में ही हैं, शुद्ध मन से दर्शन करना है तो स्वयं का दर्शन करें, लोगों के शुद्ध विचार का दर्शन करें, धर्म/आस्था के प्रतिक (मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारा/चर्च या अन्य किसी प्रतिक), सभी सजीव-निर्जीव वस्तुवों में, शुद्ध विचारों में, गुरु में, बालक में, पशु-पक्षी में, पेड़-पोधों में दर्शन करें, इन सभी में ईश्वर का वास है, इनमें हमें ईश्वर तभी दिखाई देंगे जब हम सही विवेक के अनुरूप कार्य करेंगे, हमें ईश्वर (स्वयं) के दर्शन अवश्य हो जायेंगे, ईश्वर स्वयं हमारे अंदर हैं, हमारे विश्वास में हैं, हमारे शुद्ध विवेक में हैं । अहम् ब्रह्म ।

किसी भी सजीव अथवा निर्जीव आकार में हमारे विश्वास अथवा श्रद्धा के द्वारा शक्ति आ जाती है, वह शक्ति उसके मूल आकार में नहीं होती है, हमारे विश्वास अथवा श्रद्धा के द्वारा उसमे शक्ति प्रवाहित होती रहती है, किसी भी धर्म/धार्मिक प्रतिक अथवा व्यक्ति को हमारा विश्वाश हीं शक्ति देता है जिसके द्वारा समूचे विश्व का कल्याण हो सकता है, अतः हर धर्म या हर वो व्यक्ति कल्याणकारी है जिसपर लोगों की आस्था है, अतः हमें किसी भी धर्म अथवा व्यक्ति के विषय में अपशब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए, उस धर्म या व्यक्ति से अनंत लोगों की आस्थाये जुडी होती है, और आस्था सच्चे दिल में होती है, आस्था ही धर्म है, धर्म ही परमात्मा है ।

एक पत्थल तब तक सिर्फ पत्थल है जब तक हम उसे शिवलिंग न मान लें, पत्थल के रूप में उसमें सिर्फ एक शक्ति है वो ये की उसके द्वारा किसी को भी घायल किया जा सकता है, और जब हम उसे शिवलिंग मान लेते हैं तो उसमे भगवान की शक्ति आ जाती है, वह शक्ति कहाँ से आई, वह शक्ति हमारे विश्वाश से आई है, उस भगवान में सिर्फ कल्याण करने की शक्ति है, किसी के विनाश की शक्ति नहीं है और अगर हम विनाश की कामना से किसी पत्थल को शिवलिंग के रूप में पूजते हैं तो उसमें सिर्फ विनाश की शक्ति हीं आएगी कल्याण की नहीं, हमारा विश्वाश सिर्फ हमारा हीं कल्याण अथवा विनाश कर सकता है किसी दूसरे का हरगिज नहीं, कल्याण और विनाश की शक्ति उसमे सिर्फ हमारे विश्वाश के द्वारा आती है..।

कारण हम उसे सच्चे एवं शुद्ध मन से भगवान मान लेते हैं, शायद इसी कारण किसी दूसरे धर्म के भगवान हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाते है भले उनके प्रति हमारा कुछ भी विचार हो, यह अंतर कहाँ से आया क्या अलग-अलग धर्म के ईश्वर का अपना अलग-अलग क्षेत्र है वे अपने धर्म के लोगों का कल्याण कर सकते हैं एवं दूसरे धर्म के लोगों के किसी भी प्रतिक्रिया पर कोई जवाब नहीं दे सकते हैं । हाँ यही है ।

घर्म यानी आस्था जो सच्चे मन से होती है जिसमे सिर्फ कल्याण की शक्ति होती है विनाश की नहीं ।

आस्था में बड़ी शक्ति होती है, आस्था का कोई आकार नहीं होता है, ईश्वर का भी कोई आकार नहीं होता है ।

इतने धर्म बन चुके हैं की उनको एक करना संभव नहीं, सारी व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी, लोग इसे स्वीकार नहीं कर सकेंगे ।

हाँ हम एक काम तो अवश्य कर सकते हैं वो ये की जिस प्रकार अपने धर्म के प्रति आस्था रखते हैं ठीक उसी प्रकार दूसरे धर्मों को भी आस्था एवं आदर भाव के साथ देखे, तब एक नया धर्म का उदय होगा प्रेम जिसमे सभी धर्मों के लोग होंगे ।

धर्म में प्रेम अब भी है, लेकिन सिर्फ अपने-अपने धर्मों से, दो धर्मों के मध्य सिर्फ नफरत है इसे हम इंसान एक दूसरे के प्रति सम्मान भाव रख कर दूर कर सकते हैं, परमात्मा हमसे यही चाहता है ।

लोगों के बनाये धर्म को कुछ देर के लिए अलग-अलग धर्म मान भी लिया जाये और लोगों को धार्मिक इंसान तो भी धर्म या धार्मिक इंसान की परिभाषा समझ नहीं आती है ।

हर धर्म के धार्मिक इंसान दूसरे धर्म को नफरत एवं घृणा से देखते हैं यह सभी जानते हैं, लोग अपने धर्म को सर्व-श्रेष्ठ मानते हैं, क्या एक धार्मिक इंसान दूसरे धर्म को नफरत से देख सकता है, अगर दूसरे धर्म में उसे नफरत दिखती है तो क्या वो खुद धार्मिक है ।

हरगिज नहीं ।

धर्म नफरत सिखा हीं नहीं सकता, अगर हम अलग-अलग धर्म से नफरत करते हैं तो हम धार्मिक हैं हीं नहीं हम पाखंडी हैं, दूसरे धर्म से नफरत करने वालों के लिए नफरत नामक एक अलग धर्म बनाना चाहिए ।

धार्मिक इंसान का कोई धर्म नहीं होता है वे हर धर्म के होते हैं, मेरी नजरों में वे खुद एक धर्म होते है, हम जिस धर्म से भी सम्बन्ध रखते हैं उसके अलावा दुनिया के सभी धर्म के प्रति हममे सम्मान एवं आदर भाव होनी चाहिए, तभी हम धार्मिक कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं, यह तभी संभव है जब हर जीव के प्रति हममे आदर एवं दया भाव हो, जो शायद संभव नहीं है, हम इंसान बाटना जानते हैं, धर्म के नाम पर नफरत करना जानते हैं, हम इंसानों ने धर्म को अलग कर दिया, देश को अलग कर दिया, राज्य को अलग कर दिया, हमने आज तक सिर्फ अलग हीं किया है, कोई एक भी ऐसी चीज नहीं है इस पूरी दुनिया में जिसे इंसानों ने जोड़ा हो ।

खुद को इंसान कहते हुए मुझे खुद से घृणा हो रही है, काश मैंने किसी पशु/पक्षी के रूप में जन्म लिया होता ।

कई बार लोगों से सुनने को मिलता है मैं धर्म को नहीं मानता, यह सब बकवास है ।

उनसे मैं सिर्फ एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, धर्म की परिभाषा क्या है ?

उनके नजरों में (हिंदू/मुस्लिम/सिख/ईसाई) के प्रतीकों को मानना ही धर्म है, जैसे शिव को मानोगे तो हिंदू कहलाओगे, अल्लाह को मानोगे तो मुस्लिम कहलाओगे ।

क्या सिर्फ यही धर्म है ? धर्म के प्रति इतना संकुचित विचार ?

मेरी नजरों में हर वो जीव जो जिस किसी भी धर्म से जुड़े लोगों के परिवार में पलता है वह उस धर्म से जुड़ा धार्मिक होता है, क्योकि पालन-पोषण एवं मृत्यु के पश्चात उसकी अंतिम क्रिया उसी परिवार के धार्मिक क्रिया-कलापों के द्वारा की जाती है, अतः वह पारिवारिक रूप का धार्मिक इंसान हुआ, मान लिया जाये कोई बच्चा हिंदू अथवा मुस्लिम परिवार में जन्म तो ले लिया परन्तु किसी घटना वश उसका पालन-पोषण हिंदू की जगह मुस्लिम अथवा मुस्लिम के जगह हिंदू परिवार में हुआ हो, गोद लेने वाले को भी इस बात की कोई जानकारी नहीं की बच्चा किस धर्म का है, बच्चा का पालन पोषण उन्होंने अपने धर्म के हिसाब से किया, बच्चा भी इसी को मानेगा, वह दूसरा धर्म में जन्म लेकर भी किसी दूसरे धर्म को मानेगा एवं हमारी व्यवस्था के कारण वह उस धर्म से नफरत करना सीख जाएगा जिस धर्म के परिवार में उसका जन्म हुआ था ।

(हिंदू/मुस्लिम/सिख/ईसाई) धर्म की धार्मिकता तो उसे हमारा परिवार/समाज सिखलाएगा की बच्चे तुम्हें इस धर्म को मानना है एवं उस धर्म से नफरत करना है, हमलोग अच्छे एवं पवित्र हैं एवं वे लोग अपवित्र हैं, बच्चा जो सीखेगा उसी को मानेगा, जब वह विचार करने के लायक होगा तबतक बहुत देर हो चुकी रहेगी, धर्म के प्रति ऐसा सोचने वाला अकेला नहीं रहेगा, उस जैसा करोड़ों लोग उसके साथ उस विचार के साथ रहेंगे, जब उसे सदबुद्धि प्राप्त होगी तब वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पायेगा ।

सिर्फ लोगों की मूर्खता एवं अपनी विवशता पर आंसूं बहायेगा, हमलोग धर्म की इसी धार्मिकता को जी रहे हैं ।

हम जिस धर्म की धार्मिकता को जी रहे हैं उसका मार्गदर्शन हमें हमारा परिवार/समाज करा रहा है ।

हमें परिवार के धर्म की धार्मिकता से बाहर निकल कर धार्मिक बनना होगा, सबके साथ-साथ चलना सही मायने में धार्मिकता है ।

धार्मिक प्रतीकों के सामने अगरबत्ती/दीप जलना ही धार्मिकता नहीं है, अगरबत्ती/दीप जलाना हो उनकी सुगंध बिखेरनी हो तो सबके दिलों में अपने व्यवहार का दीप जलाओ…।

यही काम हर उन लोगों ने किया है जिनके प्रति हम श्रद्धा के दीप जलाते हैं, उन्हें हम अलग अलग नामों से पुकारते हैं, चाहे हम जिस धर्म (हिंदू/मुस्लिम/सिख/ईसाई) को मानते हैं ।

धर्म एक विचार होता है जिसे हम किसी न किसी प्रतीक के रूप में समझते हैं ।

जैसे की बच्चे को बतलाना हो की देखो यह गोल नुमा फल सेव है, इसमें विटामिन की मात्रा इतनी है, इसे खावोगे तो स्वस्थ रहोगे ।

धर्म के विषय में हमारी जानकारी बस इतनी ही है, यही हमारे परिवार/समाज के लोगों को भी बतलाया गया, धर्म के विषय में हमारा ज्ञान बच्चा था बच्चा है और जब तक यह सृष्टि रहेगी बच्चा ही रहेगा, कारण हम समझना चाहते ही नहीं हैं, क्योकिं हम वही मानेंगे जिसे हमने बनाया/देखा है ।

गोल नुमा फल एवं सेव तो हमें ज्ञात है की यह फल लाभदायक है, परन्तु इसके गुण विटामिन को न समझ सके, सेव हमें दिख रहा है इसलिए इसे मानेंगे लेकिन विटामिन किधर है, यह तो पूरा का पूरा सेव है ।

विटामिन नामक गुण (विचार) ही धर्म है जो किसी प्रतिक में समाया हुआ है, हम प्रतिक को तो मानते हैं परन्तु उनके गुण (विचारों) को मानना ही नहीं चाहते हैं ।

समझ में नहीं आता की हम महामूर्ख है या महा-चालाक, खैर जो भी हैं मैं भी इसी व्यवस्था की देन हूँ ।

मेरी नजर में शुद्ध एवं सबके प्रति समान विचार ही धर्म है, चाहे प्रतिक कोई भी हो ।

शुद्ध वातावरण सबके लिए लाभदायक होता है, चाहे किसी भी धर्म से जुड़ा जीव हो/पशु/पक्षी/पेड-पोधे हो ।

अतः शुद्ध वातावरण (धर्म) को हमें अपनाना चाहिए, तभी किसी धर्म के प्रतिक के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा व्यक्त होगी, तभी हम सही मायने में धार्मिक कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं ।

जो इंसान कहता है मैं धर्म को नहीं मानता वो मूर्खतापूर्ण बात करता है, कारण अगर उसका वजूद है तो वो धार्मिक है, अब ये उसके विवेक पर निर्भर है की उसकी धार्मिकता किस श्रेणी की है ।

कोई भी जीव चाहे वह इंसान हो अथवा पशु/पक्षी/पेड-पोधे सभी धार्मिक होते हैं, सभी अपनी व्यवस्था को जीते हैं, व्यवस्था में जीना ही धर्म है, जरुरत है शुद्धता में जीना ।

हर जीव किसी ना किसी रूप में जी रहा है ।

अतः यह कहना मैं धर्म/धार्मिकता को नहीं मानता कहना गलत है ।

लोग जिस धर्म/धार्मिकता को जी रहे हैं उसका मूल गुण (दया/प्रेम/क्षमा समाप्त) हो गया है, बस अब धर्म के प्रतिक रह गए हैं, हम इंसान इस प्रतिक को मिटने नहीं देंगे, सेव रूपी धर्म के पेड हो हम जहरीले खाद देकर और उन्नत बनायेंगे रूप में परिवर्तन कर देंगे की मेरे पेड के शेव को देखो कितना बड़ा है, कितना सुन्दर है, भले ही उस सेव का मुख्य गुण लुप्त होने की कगार पर खड़ा है, एक समय ऐसा भी आएगा जब सिर्फ सेव (धर्म) रह जायेंगे, परन्तु उनका मुख्य गुण लुप्त हो जाएगा ।

धर्म कभी लुप्त नहीं हो सकता है, भले ही उसका रूप गुण में परिवर्तन हो जाए ।

वर्तमान समय में धर्म की स्थिति के अनुसार धर्म के मूल रूप गुण में परिवर्तन के लिए हमें अपने घर/परिवार से शुरूआत करनी होगी, परिवर्तन अवश्य होगा, हमें पहल करनी चाहिए ।

हमने अपने धर्म/परमात्मा के बनाये व्यवस्था को तहस-नहस कर रखा है..।

परमात्मा को भी दुःख होता होगा हमारे कर्मों (हमें) को देख कर ।

हमें सर्व-शक्तिमान (परम-शक्ति) के बनाये आशियाने को बचाना चाहिए, शुरुआत कभी भी हो सकती है, यह काम हमें हीं करना होगा, यह कार्य धर्म/परमात्मा/ईश्वर नहीं कर सकता, हमसे ही धर्म की शक्ति है एवं धर्म से ही हमारी शक्ति है, अगर हमारी एकता ही खंडित हो जाये तो फिर धर्म का वजूद ही समाप्त हो जायेगा, हमसे ही धर्म है एवं धर्म से ही हम हैं, धर्म/परमात्मा का कोई बाहरी वजूद नहीं है, हम सबमे ईश्वर का वास है ।

संसार को अपना घर, इंसानों को अपने परिवार का सदस्य समझ कर देखें और सोचें किसी परिवार में यह अव्यवस्था होगी तो उस परिवार के मुखिया पर क्या गुजरेगी, क्या वह अपने परिवार का अन्त करना चाहेगा, किसे सजा देगा, सभी तो अपने हैं, अपने परिवार के मुखिया को दुःख देने का हमें कोई हक नहीं है ।

ईश्वर (परम-शक्ति) की विवशता देखकर मेरी आँखों में आंसू आ गए, हे ईश्वर हमें क्षमा करना...।

अब एक बात समझ में नहीं आ रही है की ये संसार चला कौन रहा है, ईश्वर या इंसान ?

ईश्वर ने प्रकृति की व्यवस्था कर दी है, एक नियम बना दिया है, जीवन-मृत्यु इसी नियम के अंदर है, ईश्वर नियम से बंधे हैं ।

हे ईश्वर आपको कोटि-कोटि धन्यवाद जो आपने सपने के द्वारा मुझे अमूल्य ज्ञान दिया…।

प्रकृति के रहस्य का ज्ञान ही तत्वज्ञान है, इसी ज्ञान में जीवन-मृत्यु का रहस्य छिपा है, अतः हमें प्रकृति के रहस्य को समझने के लिए सर्वप्रथम स्वयं को समझना होगा, जो खुद को समझ गया वह सृष्टि को समझ गया क्योंकि हम (जीव) या सृष्टि एक ही नियम से बने एवं बंधे हैं ।

अशुद्ध विवेक/अधर्म में ही शुद्ध विवेक/धर्म का वास होता है. धर्म में ज्ञान का, ज्ञान में विज्ञानं का वास होता है, इस ब्रह्मांड में कोई भी जीव अज्ञानी नहीं है, अतः हम जब चाहें अपने विचार में सम्पूर्ण परिवर्तन ला सकते हैं, अगर आपको किसी पशु के ज्ञान के विषय में ज्ञान प्राप्त करना हो तो आपको पशु के रूप में जन्म लेना होगा, तभी आप उसके ज्ञान, उसकी भाषा, उसका धर्म समझ सकते हैं ।

जब तक हम किसी जीव की भाषा नहीं समझ सकते तबतक उसके ज्ञान/धर्म के विषय में नहीं जान सकते है ।

मान लिया जाये अगर हम किसी दूसरे देश के किसी इंसान से मिलते हैं, लेकिन हम एक दूसरे की भाषा नहीं जानते हैं, हमें यह ज्ञात नहीं हो पायेगा वह ज्ञानी है या मुर्ख, किस धर्म को मानता है ।

सिर्फ इंसान के रूप में जन्म लेने के कारण हम कह सकते हैं की हो न हो यह (हिंदू/मुस्लिम/सिख/ईसाई) धर्म का होगा, इंसान है तो बुद्धिमान भी होगा ।

यह हमने अपनी व्यवस्था के अनुसार उसका ज्ञान/धर्म निर्धारण कर दिया एवं एक पशु को अज्ञानी/अधर्मी कह उसका तिरस्कार कर दिया, यह भेद हमने किया है, ईश्वर ने नहीं, क्योकि हमारा ज्ञान बस इतना ही है की जिसे हम जानते हैं उसे ही मानते हैं..।

अतः कोई भी जीव अधर्मी/अज्ञानी नहीं होता है, बस उसे सही मार्गदर्शन अथवा उसे समझने वाले की आवश्कता होती है, हम जब चाहें स्वयं को बदल सकते हैं, स्वयं को बदलने के लिए हमें धार्मिक प्रतीकों के मन्त्रों के सहारा लेने की आवश्कता नहीं है ।

लोग कहते हैं स्वयं को बदलना हो तो ईश्वर की आराधना करो, मंत्र जपो ।

अब ये ईश्वर कौन है, किस ईश्वर की आराधना करनी है, एवं मंत्र क्या है ?

ईश्वर स्वर (वायुतत्व) है मंत्र मन (चेतना) है, ईश्वर एवं मंत्र का रहस्य हमारे स्वर में है, स्वर रूपी ईश्वर को हम बिना गहराई में गए नहीं प्राप्त कर सकते हैं ।

यही ईश्वर है यही मंत्र है, हे ईश्वर तुम्हें कोटि-कोटि धन्यवाद ।

मन हीं मंत्र है अतः जो विचार हमारे मन में रहता है, वह मंत्र के रूप में कार्य करता है, मन को व्यक्त हम शब्दों के द्वारा करते है, अतः हर शब्द जो हमारे मन में रहता है वही मंत्र है ।

मंत्र के दो रूप हैं एक शुद्ध एक अशुद्ध, ओम शुद्ध रूप में मंत्र है तो एक गाली भी अशुद्ध रूप में मंत्र है, मन के द्वारा हम जो भी व्यक्त करते है वो ही मंत्र है ।

कोई भी व्यक्ति अपने ईश्वर की आराधना किसी न किसी मंत्र के रूप में करता है वह मंत्र उस ईश्वर का स्वरुप होता है, उस मंत्र के द्वारा हम उस ईश्वर को पहचानते हैं, सेव के नाम पर हमारी कल्पना में एक फल आता है, वह फल एक ईश्वर है और सेव रूपी नाम मंत्र है ।

यह मंत्र कहाँ से आया वह तो हमारे मन में हीं था बस उसपर ध्यान लगाने की आवश्कता है फल रूपी ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं ।

अतः मन हीं मंत्र है, मन से सोचे हुए विचार हम शब्दों द्वारा व्यक्त करते है, अब ध्यान देने वाली बात ये है की हम प्रतिदिन कितने शुद्ध अथवा अशुद्ध मन्त्रों को जपते हैं, हमें इसे समझने की आवश्कता है ।

हमने मंत्र और मंत्र में भेद कर उसे अपनी आवश्कता के अनुरूप बना लिया है, सिर्फ खुद को धोखा देने के लिए, लोग कहते है मंत्र में बहुत ताकत होती है पहाड को भी चूर-चूर कर सकती है, वे सही कहते हैं, मंत्र रूपी मन में हीं वो ताकत होती है, सजीव-निर्जीव वस्तुवों का रूप परिवर्तन हम मन रूपी मन्त्रों के द्वारा कर सकते हैं ।

मंत्र में कितनी शक्ति होती है यह किसी अनुसंधान में लगे लोगों से हमें समझनी चाहिए ।

मंत्र में शक्ति नहीं होती तो क्या हम इंसान चंद्रमा तक पहुच पाते, विज्ञानं मंत्र की हीं देन हैं ।

विज्ञ लोगों के ज्ञान हीं विज्ञानं है, मंत्र का रहस्य विज्ञानं में छिपा है, अतः मंत्र सिद्धि द्वारा हमें ज्ञान प्राप्त होता है जिसके परिणाम स्वरुप विज्ञानं प्राप्त होता है ।

समृद्ध देश मंत्र को समझ चुके हैं उन्हें सिद्धि प्राप्त हो रही है, और विकाशशील देश के लोग मन्त्रों के रहस्य को नहीं समझ पा रहे है, उलटे हम कहते हैं हमारा देश मन्त्रों की शक्ति प्राप्त करने वाले लोगों का देश है ।

फिर क्यों हमारे देश में आभाव है, जब हम मन्त्रों द्वारा इतने शक्ति संपन्न हैं तो क्यों हमारे यहाँ लोग भूखे मरते हैं ।

आखिर हम कौन सा मंत्र जपते हैं, क्यों हम खुद को एवं अपनी संतानों को धोखा दे रहे हैं, भटके हुए हम हैं, पाश्चात्य देशों के लोग नहीं, दुनिया का सबसे आसान कार्य है आलोचना करना, उसकी सिद्धि हमें प्राप्त है, अपनी कमजोरी को अपने नजरों में दूर करने के लिए हमने इस मंत्र को सिद्ध किया है, हम वाकई बहुत महान हैं, पूरी दुनिया में हमारी महानता के डंके बजते हैं ।

हमारे बड़े-बुजुर्ग हमें सही मार्गदर्शन देते हैं की अधर्म मत करो, शिक्षा पर ध्यान दो, शुद्ध रूप से जीवन यापन करो, उनका ज्ञान हमें सही मार्गदर्शन दे सकता है, हमें अपने बुजुर्गों के ज्ञान को सुर्यास्त के समय सूर्य की शीतलता के रूप में समझनी चाहिए ।

सूर्योदय एवं सुर्यास्त के समय सूर्य में शीतलता होती है, एक ठंडक होती है, पवित्रता होती है कारण उसके प्रभाव में एक नमी होती है, परन्तु ज्यों-ज्यों सूर्य मध्य में आता जाता है उसके नमी में कमी आती जाती है, उसमे सब-कुछ तहस-नहस करने की शक्ति आ जाती है, ठीक इसी प्रकार हमारा विवेक कार्य करता है, जब तक हमारे विवेक में शीतलता है उसमे पवित्रता है, ज्यों-ज्यों उसे अपने वजूद का अहसास होता जाता है उसमे अहं भरता जाता है, लेकिन कब तक, सुर्यास्त के समय उसकी गर्मी मंद पड़ती जाती है, यही मनुष्य जीवन में होता है, जब शरीर बालक रहता है उसमे पवित्रता रहती है, एक नमी रहती है परन्तु उम्र के साथ यह घटती जाती है, एवं जब अन्त समय प्रतीत होता है तो अहं चूर-चूर हो जाता है, लोग कहते है बच्चे एवं बूढ़े लोगों का दिल एक सा होता है मैं इसे नहीं मानता, बच्चे में प्राकृतिक शीतलता होती है एवं बूढ़े लोगों में अहं की गर्मी के चूर होने के बाद की शीतलता, दोनों शीतलता में आसमान-जमीन का फर्क होता है, सूर्यास्त के समय की शीतलता से हमें शिक्षा प्राप्त होती है की अहंकार मत करो, सूर्य में इतनी प्रचंड गर्मी थी जब उसका अहंकार टूट गया तो तुम क्या हो, शीतलता हमें सूर्योदय से लेनी चाहिए एवं शिक्षा सुर्यास्त से, ज्ञान हमें बालक से लेनी चाहिए एवं शिक्षा बड़े-बूढों से ।

मैंने एक बच्चे से पूछा तुम्हारा नाम क्या है उसने कहा बाबु मैंने पूछा पापा का नाम उसने कहा पापा मैंने पूछा माँ का नाम उसने कहा मम्मी मैंने पूछा कहाँ रहते हो उसने कहा मम्मी-पापा के घर में मैंने उस बच्चे से बहुत बड़ी सीख ली ।

ज्ञान एवं शिक्षा में यही भेद है, ज्ञान प्राकृतिक होता उसमे समर्पण होता है एवं शिक्षा प्राप्त किया जाता है, हम इंसान शिक्षा तो प्राप्त कर रहे हैं लेकिन मूल ज्ञान भूलते जा रहे हैं, मूल ज्ञान क्या है, मूल ज्ञान में शीतलता है, पवित्रता है, संस्कार है, क्षमा है, त्याग है, समर्पण है । एवं शिक्षा में क्या है ?

शिक्षा में गर्मी है, अहंकार है, क्रोध है ।

क्या मूल ज्ञान को भूले बिना शिक्षा प्राप्त किया जा सकता है । हाँ यह संभव है, इसके लिए हमें प्रकृति के रहस्य को समझना होगा ।

अगर हम प्रकृति के रहस्य को समझ गए तो ज्ञान एवं शिक्षा दोनों हमें प्राप्त हो जायेगे..।

शिक्षा प्राप्त होगा तो कुछ न कुछ अहंकार भी आएगा, गर्मी भी आएगी, क्रोध भी आएगा परन्तु ज्ञान के साथ जो शिक्षा आएगी उसमे अहंकार, गर्मी, क्रोध का स्वरुप बदला हुआ होगा...।

मैं इस प्रकृति के रहस्य को समझ चुका हूँ, मुझमे अहंकार आ गया है, गर्मी आ गयी है , क्रोध भी आता है, परन्तु मैं चाहता हूँ यह अहंकार सबमे आ जाये, गर्मी सबमे आ जाये की हम बुराई को अपनी गर्मी से जला दें, हम सभी को क्रोध आ जाये, क्रोध में हीं सही हम दूसरों को अनीतिपूर्ण कार्य करने से रोकें ।

इसी ज्ञान एवं शिक्षा की हमें अत्यंत आवश्यकता है ताकि हम इस पवित्र धरती को नष्ट होने से बचा सकें ।

सूर्यास्त (मृत्यु) के बाद अगले दिन (अगले जन्म) तक रात्रि रहती है जिसमे परम शान्ति एवं शीतलता होती है, सूर्योदय (जन्म) पुनः होता है वह एक दिन (एक-जन्म) पूर्व अपने जीवन यात्रा की स्मृति भूल चुका होता है, और पुनः यही गलती दुहराता है, यही मनुष्य जीवन है क्योकि हममे विवेक रूपी सूर्य है, पशु-पक्षियों में यह अहंकार नहीं आता है ।

हमें प्रकृति से सीख लेनी चाहिए ।

मैंने अक्सर देखा है परिवार के लोग या हमें जानने वाले क्रोध में मौन व्रत धारण कर लेते हैं, हर घर/परिवार में यह होता है, मौन व्रत के द्वारा लोग अपनी नैतिक/अनैतिक बातों को मनवा लेते हैं, इसमें बड़ी शक्ति होती है, बिना शब्दों को व्यक्त किये हुए हुए भी कार्य संभव हो जाता है, यह अंतिम हथियार के रूप में कार्य करता है, मौन में बड़ी शक्ति होती है, लेकिन कौन सा मौन, ना बोलने वाला मौन या न सोचने वाला मौन, ना बोलने वाला मौन खुद एवं परिवार के लिए बहुत घातक होता है देर-सबेर इसका अशुभ परिणाम अवश्य प्राप्त होता है, हम मौन व्रत धारण कर दूसरे की इक्छा के विरुद्ध कार्य करवा लेते हैं, एवं उसकी भावना को ठेस पहुंचाते हैं, लेकिन कब तक, कभी तो उसकी दबी हुई कुंठा बाहर निकलेगी जिसका परिणाम कल्पना के बाहर हो सकता है, एवं न सोचने वाला मौन स्वयं एवं दुनिया के लिए कल्याणकारी ।

अगर हम बिना बोले हुए मौन रखते हैं तो हमें पागल होने में या दूसरे को पागल करने में बहुत समय नहीं लगेगा, कारण हमारे अंदर विचारों का भूचाल भर गया है, हम क्रोध में अथवा दिखावे में मौन होते हैं तो यह मौन कितना हमारे खुद के लिए कितना अहितकर होता है इसे ध्यान देने की जरुरत है, एवं अगर हम विचारों द्वारा मौन होते हैं तो मन में एकाग्रता आती है, शान्ति आती है, मन शुद्ध होता है, आयु बढती है, अतः मन में कुछ भी रखना घातक होता है इसे व्यक्त करें, खुलकर जियें, परेशानी का समाधान खोजें, शान्ति प्राप्त होगी, मौन हीं होना है तो स्व-कल्याण के लिए अपने विचारों को मौन करें उसके बाद जो भी विचार प्राप्त होगा उसमे स्व-कल्याण एवं जन-कल्याण हीं होगा..।

प्रत्येक दिन लगभग एक ही बात मेरे दिल को बहुत ठेस पहुंचती है, किसी न किसी से यह सुनने को जरुर मिलता है की अमुक व्यक्ति किस जाति का है, वर्ण व्यवस्था के नाम पर हम हर दिन करोड़ों लोगों की भावनावों ठेस पहुंचाते हैं, मैं उन ऊँची जाति के लोगों से खुद को एक मिनट के लिए उनके स्थान पर खड़े होने को कहता हूँ और उस वक्त अगर आपको कोई जाति विशेष कहकर अपमानित करे या ठेस पहुंचाए तो आपके दिल पर क्या गुजरेगी, इसकी कल्पना करें, कितना बड़ा पाप करते हैं आप, विभिन्न प्रकार के वर्णों का निर्माण परमात्मा ने नहीं किया है, पूर्व में समाज ने वर्णों का विभाजन कर्मों के आधार पर किया था, लेकिन अब इनका स्वरुप देख कर ऐसा लगता है इसे परमात्मा ने निर्मित किया है, ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के पश्चात वह कुकर्म/हत्या/चोरी भी करता है तो भी उसे ऊँची जाति का माना जायेगा, एवं निम्न जाति विशेष का व्यक्ति कितना भी शुभ कर्म करे हम उसे उसके कर्मों के आधार पर स्वीकार नहीं कर सकते हैं, सत्य तो यह है की वर्ण एक नदी है व्यवस्था नदी की धारा है, जिस प्रकार नदी का प्रराब्ध एक स्थान पर होता है, परन्तु बहते बहते अपनी जरुरत के अनुसार कई भागों में बट जाता है, नदी के अलग अलग भागों को हम अलग अलग नाम से पुकारते हैं यही वर्ण-व्यस्था है, कोई भेद नहीं हमारा प्रारब्ध एक है कोई अलग नहीं, हमने अपने विवेक के आधार पर एक दूसरे से अलग कर लिया है, लेकिन हमें एक जगह पुनः मिलना है समुद्र (परमात्मा) के पास, क्यों न हम सभी शुद्ध मन से अलग-अलग बहते हुए मिलें, आज न कल मिलना हीं है, आज हीं क्यों नहीं, लेकिन यह हम कैसे कर सकते हैं, हमने तो अपने शरीर को भी वर्ण-व्यस्था के हिसाब से बाँट दिया है, बायां हाँथ अशुभ है, शरीर की गंदगी साफ़ करता है, अरे मुर्ख दाया हाँथ ईश्वर की आराधना क्या तुम अकेल करते हो उस समय तो बायां हाँथ भी तुम्हारे साथ बराबर खड़ा रहता है, तुम सिर्फ मंदिर में आते हो लेकिन शरीर की गंदगी मैं साफ़ करता हूँ एवं ईश्वर की आराधना मैं भी करता हूँ ।

मेरे बिना ईश्वर की आराधना हो हीं नहीं सकती ।

ईश्वर मेरे बिना तुम्हें स्वीकार हीं नहीं करेगा, कर्म रूपी ईश्वर की मैं आराधना करता हूँ, तुम सिर्फ सफाई पर ध्यान देते हो, मुझ से दूरी बनाते हो पर ईश्वर की आराधना करने वक्त तुम्हारा अहंकार कहाँ जाता जाता है, हर कार्य में मेरी जरुरत पड़ती है तुम्हें, इस विशाल शरीर के हम दो हाँथ हैं हमारा स्वामी एक है फिर हम क्यों दूर रहें..।

हम प्रतिदिन अपने विचारों के द्वारा लोगों की भावना को ठेस पहुंचाते हैं, जन कल्याण के विरुद्ध किया गया हर कार्य/विचार एक वासना है, जिसमे किसी का वास ना हो ।

क्रोध, लोभ, हत्या भी एक वासना है, हर वो कार्य वासना है जिससे किसी का अहित होता हो, किसी पशु/पक्षी की हत्या भी एक वासना है..।

अतः जन कल्याण के विरुद्ध जो स्वयं के लिए हो या किसी भी सजीव-निर्जीव को नुकसान पहुचने की क्रिया वासना है, नियम के विरुद्ध किया गया हर कार्य वासना है, शराब पीना शुद्ध रूप में एक वासना है, जिसमे न परिवार का वास है ना समाज का ।

एक व्यक्ति ने मुझ से पूछा शराब के विषय में आपका क्या विचार है, मैंने कहा शराब विवेक है एवं शराबी शरीर है, शराबी तो लाचार है, निर्जीव है, जब वो होश में होता है तो पूछो शराब क्या है, वो कहेगा बुरी चीज है, इसने मुझे बर्बाद कर दिया है ।

एक शराबी व्यक्ति से निर्धन मुझे इस संसार में कोई नहीं दिखता है, उसके पास ना शुद्ध विवेक है, ना इक्छा शक्ति है, ना पुरूषार्थ है, ना ज्ञान है ना धर्म है, ना धैर्य है, ना हीं उसके पास अपने पैरों पर खड़ा होने की शक्ति है, वो शरीर, मन ,कर्म, वचन, धर्म से गरीब है, उसका जीवन व्यर्थ है, उसे दवा नहीं दुआ की जरुरत है, हे ईश्वर इसे मुक्ति दो, यह लाचार है ।

कहावत के रूप में लोग कहते हैं अमुक व्यक्ति शर्म से पानी-पानी हो गया, मैं कहता हूँ वह शर्मिंदा नहीं हुआ, उसने ईश्वर के गुण को प्राप्त किया ।

कारण शर्म प्राप्त हुआ, अथार्थ पश्चाताप प्राप्त हुआ, पश्चाताप आया तो उसके भीतर एक नमी आई, शीतलता आई, अतः वह शर्म से पानी-पानी नहीं हुआ, उसने ईश्वर के गुण को को प्राप्त किया ।

अतः पश्चाताप करने वाला व्यक्ति महान होता है, वह शर्म से पानी-पानी होकर महान हो गया, जब व्यक्ति पश्चाताप करता है तो वो हम पर भी दया करता है, हमें भी ईश्वर के गुण प्राप्त करने का एक अवसर देता है जिसे हम उसे क्षमा कर प्राप्त कर सकते हैं, कारण क्षमा में शीतलता है, मेरे द्वारा किये गए अशुभ कार्य/पाप कर्म (आत्महत्या) को आप मुझे क्षमा कर ईश्वरत्व के गुण को प्राप्त करें ।

पश्चाताप कर वह हमें भी सही मार्गदर्शन देता है, अतः हे पश्चाताप करने वाले इंसान तुम महान हो तुमने मुझे सही राह दिखलाई है ।

मैं एक बार कलकता गया होटल में ठहरा, होटल के कर्मचारी ने पूछा आप कहाँ से आये हैं, मैंने कहा परमात्मा के पास से और आप, उन्होंने हँस कर कहा मैं भी परमात्मा के पास से आया हूँ, पल भर मैं हम एक हो गए एक दूसरे को पहचान लिया, बहुत अच्छा लगा, की कोई अपना मिल गया, हमें एक दूसरे को इसी नजरों से पहचाना चाहिए, भेद मिट जायेगा, राज्य-देश, जात-पात, धर्म की दूरियां मिट जायेगी…।


किसी भी धर्म के संत-महापुरुष सुखी जीवन नहीं जिए थे, सभी ने अपने जीवन में अनेक प्रकार की यातनाएं सही थी, आज वही संत-महापुरुष शान से हमारे भीतर जी रहे हैं, हम उन जैसा तो नहीं बन सकते हैं, परन्तु उनके जीवन एवं उनके उपदेश से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में अवश्य प्रयोग कर सकते हैं, एवं अपना लोक-परलोक सुधार सकते हैं ।

मैं अभिषेक मिश्र, तारानगर, मासीपीढ़ी, हजारीबाग – झारखण्ड सम्पर्क करे : ०७७-३९३९-५६५६