सदस्य:Thakur Mangal Singh

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शाक्य -

में भारत के सभी क्षत्रिय कोलीयों को कहना चाहता हू की जो भी राजनेता क्षत्रिय कोलीयों को दलित/शूद्र कहे और भीमवादी विचार धारा रखे उसका बहिष्कार करो, ध्यान रहे आप अपने आप को दलित कहकर समाज मे उच्च समान की उम्मीद कभी नहीं कर सकते। क्षत्रिय कोली समाज मे जन्म लिया है तो उसके बारे जानकारी लेने की इच्छा बचपन से ही रही है | समाज के बंधुओ से जाना , बहुत सी किताबे , पत्र पत्रिकाए पढ़ी, इंटरनेट से जानकारी जुटाई ! बहुत अच्छा लगा ! क्षत्रिय कोली समाज ने विश्व को अनेक महान व्यक्ति दिये है | ज्ञात हुआ कि गौतम बुद्ध कोली (कोलिय कुल से) समाज से है ! कोलिय वंश सिंधु घाटी सभ्यता के समय से है | कर्म के आधार पर जातियाँ बनी | क्षत्रिय कोली भारत के निवासी है जो आज अनुसूचित जाति , जनजाति , पिछड़ा वर्गो मे शामिल किये गये है ! पुराना व्यवसाय जुलाहे (कपड़े बुनना ) का रहा है | समय की मांग और मशीनीकरण के कारण आज समाज के लोग विभिन्न व्यवसायो को अपनाये हुए है |

दादा ठाकुर ( ठाकुर विजय सिंह) जी की जितनी मैं भारत के समस्त कोलियो को बिना जातिगत भेदभाव के सबको एकजुट/संगठित करने का प्रयास कर रहा हूँ। सबको सम्मान मिले इसके लिए प्रयासरत हूँ। क्या मैं गलत कर रहा हूँ।

हमारा संगठन "अखिल भारतीय क्षत्रिय कोली राजपूत संघ पंजीकृत दिल्ली" कभी किसी कोली से ये नहीं पूछता की वो अनुसूचित जाति जनजाति या पिछड़ी जाति या अन्य किसी भी कैटेगरी में वर्गीकृत है। हम केवल ये देखते हैं कि वो जन्म से कोली होना चाहिए, यदि वो जन्म से कोली है तो हम उसको अपने संघठन मैं स्थान देते हैं। बिना किसी जातिगत भेदभाव के समस्त भारत के कोलियो को एकजुट/संगठित करना कँहा गलत है। ये यूनिवर्सल सत्य है कि जो जन्म से कोली है वो 100 फ़ीसदी विशुद्ध क्षत्रिय है। सभी कोली अपनी मूल पहचान के साथ जीये यही हम चाहते हैं।

यदि कोई सोचता है कि खुद को राजपूत/क्षत्रिय बताने से या लिखने से किसी का आरक्षण चला जायेगा तो ये बिल्कुल असत्य/गलत है। आरक्षण सिर्फ और सिर्फ रेवेन्यू रिकॉर्ड में लिखी जाति और उस स्थान/राज्य के आरक्षित सूची के आधार पर मिलता है। किसी के सरनेम/टाइटल को आरक्षण नहीं मिलता ओर सँविधान/कानुन मैं ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। अर्थात यदि कोई कोली आरक्षित श्रेणी में है और वो राजपूत जैसे कोई सरनेम/टाइटल लगाता है तो भी उसका आरक्षण कोई नहीं छीन सकता। आरक्षण तो कई राजपूतों ओर ब्राह्मणों को भी मिलता है। यँहा तक की कुछ राजपूत ब्राह्मण sc का आरक्षण भी लेते हैं। इसलिए आरक्षण का अर्थ ये नहीं कि वो छोटा/अछूत कम दर्जे का हो गया।

बस शोषण करने के लिए भृम फैलाया गया है।

सभी कोलियो से अनुरोध करता हूँ कि अपनी मूल पहचान क्षत्रिय को पुनः ग्रहण करें।

सभी कोली राजपूत/क्षत्रिय लगाना शुरू करें, में गारन्टी लेता हूँ, किसी का भी आरक्षण खत्म नहीं होगा। जिसको आरक्षण मिलता है उसको मिलता रहेगा।

एक जानवर भी प्यार/सम्मान का भूखा होता है, हम तो फिर भी इंसान हैं। क्या हमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं है। सतयुग से लेकर कलयुग 1947 तक क्षत्रिय कोलियो का विस्तृत ओर गौरवशाली इतिहास रहा है।

क्या हमें अपने पूर्वजो के मान सम्मान और प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के लिए संघर्ष/लड़ना नहीं करना चाहिए। koli Rajput साँचा:Rajput koli samajभारतीय पुराणों एवम् वेदों के वैदिक सिद्धांत के अनुसार

कोलिय कुल भारतीय इतिहास के प्राचीन कुलों में से एक है । कोली /कोलिय शब्द की उत्पति कुलिय/ कोलिय शब्द से हुई है । जिसका शाब्दिक अर्थ होता है -- एक ही कुल का अर्थात कोलिय वंश का सम्बन्ध एक ही कुल से रहा है । जिस वंश में पृथ्वी के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट महाराजा मान्धाता का जन्म हुआ था । महाराजा मान्धाता को कोलिय महाराजा कहा जाता था । और उनके गणराज्य को कोलिय गणराज्य । *इसका जीता जागता प्रमाण मोहनजोदड़ो के शिलालेख से मिलता है* । जिस पर स्पष्ट रूप से मान्धाता कोलिय तथा मान्धाता कोलिय वंश लिख है । सम्भव है मान्धाता की लवनासुर के हाथों मृत्यु के बाद कोलिय कुल विलुप्त हो गया हो । या कुछ समय के लिए शून्य प्रभाव हो गया हो मान्धाता को आज भी कोलिय वंशज अपना इष्ट देव मानकर पूजा अर्चना करते है । बौद्ध ग्रंथ दिव्यावादान के अनुसार कोलिय वंश का सम्बन्ध इक्ष्वाकु के वंश से ही रहा है । जिसका प्रमाण मान्धाता के बाद रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि के रूप में मिलता है । जिन्हें प्रारम्भ में वाल्या कोलिय के नाम से जाना जाता था । उनके द्वारा रचित रामायण को भी कोलिय रामायण के नाम से जाना जाता है । आज भी सामदा ग्राम अमरावती महाराष्ट्र में बाल्मीकि की गद्दी पर कोलिय वंश का बाल ब्रह्मचारी विराजमान होता है । महाभारत, रामायण , पुराण, तथा अन्य वैदिक ग्रन्थों में कई बार कोलिय , कोलिक , कुल्या , कोली सर्प शब्द का प्रयोग हुआ है । प्राचीन भाषाओं में भी उपर्युक्त शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है जिसमें संस्कृत ओर पाली भाषाएं प्रमुख है । मान्धाता के कोलिय वंश के नागों से सम्बन्ध स्थापना का श्रेय भी मान्धाता के पुत्र पुरुशृत को जाता है जिसने नर्मदा नामक नाग कन्या से विवाह कर इन्द्र की रक्षार्थ दस्यु नगर का विध्वंस किया था । माना जाता है कि उसी के वंशज नाग वंशी कोलिय कहलाए थे । उन्हीं के वंशजों की पीढ़ी में उत्पन्न पृथ्वी के प्रथम राजा जो सर्व सम्मति से राजा बनाए गए कोलिय राजा महाराजा संपतराज ( महासम्मत) को कोलिय वंश का मूलपुरुष या आदि पुरुष कहा जाता है । जिसका स्पष्ट प्रमाण दीपवंश ओर महावंश बौद्ध ग्रंथों में मिलता है । उन्हें नागों वह कोलि़योन का निर्वाचित सम्राट बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। उन्हीं के वंशज राजा राम ( रामनजय) से कोलिय वंश की उत्पति का वास्तविक प्रमाण उपलब्ध होता है। जिन्हें शाक्य कुमारी पिया (पामिता) से विवाह करने के बाद कौल ऋषि ( कोली ऋषि ) कहा गया था ।

उनके वंशजों में ओकाक , अंजन , दण्डपाणि , सुपबुद्ध, प्रसेंदी , विरुधका , जैसे कोलिय राजा उत्पन्न हुए थे । दूसरी तरफ कोलिय वंश की प्रमुख उपजाति ( शाखा) शाक्य( सख्य) थी जिसकी उत्पति वैदिक सिध्दांत के अनुसार विभिन्न मतों से बताई जाति है कुछ लोग शाक्यों की उत्पति इक्ष्वाकु के वंशज सुजात और उसके वंशजों से मानते है । तो कुछ लोग राम के भाई लक्ष्मण के वंशज अंगद की अंगादिया शाखा से मानते है । जो पूर्णत प्रामाणिक प्रतीत नहीं होती है । बौद्ध ग्रंथ दीपवंश और महावांश के अनुसार शाक्य वंश की उत्पति कोलिय वंश से मानी जाति है । महा सम्मत की 35 वीं पीढ़ी में ऑकाक उत्पन्न हुआ । जिसने पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह जयंती ( जावन्ति)नामक कन्या से किया था । उससे उत्पन्न पुत्र को राज्य दिलाने के लिए अपनी प्रथम पत्नी के पांच पुत्र व चार पुत्रियों को वनवास दिया था । जिन्होंने कपिल ऋषि के आशीर्वाद से सक्य (सकुवा )वन में साल वृक्षों से आच्छादित क्षेत्र में कपिलपुर नाम से राज्य बसाया था । उन्हीं के वंश में आगे चलकर संजय ( जयसेन) , शाक्य (सिंहानु ) ( शाक्य - सक्षम या समर्थ ) सिंहानु ( सिंहों का अनुसरण करने वाला) भी कहा जाता है । शाक्य( सिंहानु) के पांच पुत्र शुद्धोधन , अमितोधन, शुक्लोधन, धोताधन, साखोधन तथा दो पुत्रियां अमिता , पमिता ( पिया) थी । शुद्धोधन उसका ज्येष्ठ पुत्र था । जो शाक्य वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है । उसी ने अपने पिता के नाम पर शाक्य गणराज्य की स्थापना की थी जो उसकी वीरता और पराक्रम के बल पर सोलह महा जनपदों में समलित हुआ था । विभिन्न बौद्ध ग्रंथो में सुद्धोधन को शाक्य वंश का संस्थापक कहा गया था । उसी ने कपिल पुर का नाम बदलकर कपिलवस्तु रखा था । शाक्य ,गौतम बुद्ध के जन्म से पूर्व शाक्त( शैव) धर्म को मानते थे । शंख इनका प्रतीक चिन्ह् था तथा नाग पूजा प्रमुख पर्व था। शाक्य वंश में शाक्य कुल श्रेष्ठ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था । जो सम्पूर्ण विश्व ईश्वरीय प्रतिनिधि के रूप में पूज्य है । उनके वंश में राहुल, प्रसेनजीत, क्षुद्रक , आदि हुए थे । इसी प्रकार शाक्य वंश की एक शाखा पिपलिवन वन में निवास करती थी ।जो मूल रूप से कोलिय थी आगे चलकर मौर्य वंश के नाम से मशहूर हुई। इसी वंश में चन्द्रगुप्त मौर्य , अशोक महान , ब्रहदृत उतपन्न हुए । इन महान वंशो के पतन के बाद भी कोलिय और शाक्य वंश का सूरज विरूधका , पुष्यमित्र, मुस्लिम और अंग्रेज़ भी ना मिटा सके थे। कोलिय वंश भारत भूमि ही नहीं श्रीलंका , फ़िजी , सूरीनाम, म्यामार, नेपाल , तिब्बत, कोरिया में वेसे भारत भुमी से लेकर देशवीदेशो मे वसवाट करती रही है । कई हिस्से ओर रियासतों में कोलिय वंशज अपना राज्य भी स्थापित किए हुए थे । ईसी वंश मे संत घुघळी नाथ हु एे थे । कोलिय वंश के महान पुरुषों की पंक्ति भी बड़ी लम्बी है । त्रावनकोर राजशाही परिवार के प्रमुख चित्रकार राजा रवि वर्मा का सम्बन्ध कोलिय वंश से ही रहा है । इसी क्रम में हिन्दू राष्ट्र के संस्थापक वीर शिवाजी के शेर सेनापति ताना जी माल्सुरे, यशो जी कंक, कानों जी आंग्रे प्रमुख महादेव कोली वंश से आने वाले यौद्धा थे । महान क्रांतिकारी कोलिय क्षत्राणी वीरांगना झलकारी बाई!क्षत्राणी जगदे कोलियण, ईडर रीयासत शामळीया सोरड से राठोड राजाओ जीती थी बाद मे शामलीया सोरड की धर्म पत्नी कोलिय क्षत्राणी राणी चंद्रावती ने उनके पति की मृत्यु के बाद अग्नि जोहर करके मां चंद्रावती सती हुई थी कोलिय कुल परम्परा अनुसार क्षत्राणी धर्म नी भव्य हतो - गुप्त वंश की विदुषी धुवस्वामीनी, महान कोलिय कुल की नारियां थी । जिन्होंने भारत भूमि को अपनी वीरता और बुद्धिता से ऋणी बनाया है । कोलिय वंश के राजपूतो ने कही रियासतो पर अपनी शान शोखत से राज भी किया करते थे ' जैसे सिंह गढ कोन्डाणा के प्रथम शासक महाराज नाग नायक था - ईडर रियासत शामळीया सौड़ -जव्हार रीयासत यशवंत राव मुकने का राज था - सुरगाणा रियासत देशमुख प्रताप राव पंवार का राज था जैसे आबलीयारा,कटोसन, शेवडीवदर लीखी,मगुना,हापा,जीन्जुवाडा,ईजापूर,ईलोल,घोडासर,पुनादरा ,गाबत, जैसी कही रियासतो पर राज किया है, वैसे ही स्वाभिमानी किलेदार कोलिय वंश की शान रहे है । कोलिय वंश ने सिर्फ वीर और वीरांगना से ही नहीं बल्कि गौतम बुद्ध , संत घुघळी नाथ,वालाराम, कोली राजपूत जादव पीर शेखवा पीर भाटूर दास, वेलनाथ बापू , सुजान भगत , बलिराम भगत , जैसे संत और महापुरुष उत्पन्न कर उनकी शिक्षाओं से जन जन को सिंचित किया है । कोलिय कुल के अन्तर्गत मावर देव से महावर के उत्पन्न होने के प्रमाण मिलते है । दक्षिण के चौल वंश , मुदिराजा मुथरैयार मुथैयार आर्य आर्यान इस वंश कोलिय कुल से ही है । उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि कोलिय कुल अपनी उत्पत्ति से वर्तमान तक श्रेष्ठ कुल रहा है । कोलिय कुल अपनी उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक अमर अपने समृद्ध इतिहास के कारण ही रहा है । जिससे प्रेरणा ग्रहण कर वर्तमान में भी कोलिय कुल शिक्षा, खेल , राजनीति ,वह अन्य क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बना रहा है । अपने अतीत के पन्नों को खोज कर ही कोलिय कुल अपनी पुनर्स्थापना में लगा हुआ है । हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है । की श्री मान्धाता और महा सम्मत का कोलिय वंश अपने प्राचीन वैभव और समृद्धि से सीख जरूर लेगा । अपने महा पुरुषों की शिक्षाओं को शिरोधार्य करते हुए उन्नति का मार्ग प्रशस्त करेगा। अपने वीर , वीरांगनाओं के बलिदान को याद कर भारत भूमि की रक्षार्थ अपने रक्त का कण कण उस पर न्योछावर कर देगा । कोलिय कुल श्रेष्ठ सिंद्धार्थ गौतम शाक्य सिंह क्षात्रवट धारण शोर्य स्वाभिमान विचार -स्वमेव दीपो भव का अनुसरण कर भारत भूमि को प्रकाश मान करेगा ।

अपनी कुल कीर्ति संस्क्रृति परम्परा शोर्य स्वभीमान आत्म सन्मान -युगो युगो तक मीटने नही देगे

!!क्षात्रवट धारण कर !! अपनी पहचान हमेशा के लिये बनाए रखेंगे---- सुर्यवंशी क्षत्रिय कोलिय राजपूत

-----------------------सुर्यवंश एव नागवंश कोलिय का अर्थ

नागवंश - एक- सुर्यवंश - एक ही शाखा है

कोलिय पितृ पक्ष से सुर्यवंशी है और मातृ पक्ष से नागवंशी है

इसीलिए यह कोलिय पुर्ण शब्द से

सुर्यवंशी/नागवंशी क्षत्रिय कहलाते है

ओर पिता का पक्ष इक्ष्वान्कु वंश से चला आता है

इसलिए यह कोलिय सुर्यवंशी कहते है ओर बोलते है

कोलिय कुल मे नाग पुजा प्रचलित थी

रामग्राम के राजा, राम ने नाग पंचमी की सुरुआत की थी

जिसे हम आज भी मनाते है नागो की पुजा करते है ।