सदस्य:Purendra singh

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
       Purendra Singh Pichanot                          

Pichanot Rajput

ठिकाना - कैरवाडा

(अलवर) राजस्थान

               

                  पुरेन्द्र सिंह

                       



कुछ शब्द लेखक के

मेरा इस इतिहास को लिखने के पीछे यह पता लगाना था की राजपूत कहा से आये और उनकी शाखाये कोन - कोन सी हैं और कैरवाडा भोमिया जी का उस रहस्य ओर इतिहास को सार्वजनिक करने का है जिस अर्ध देव की पुजा अनेको सालो से होती आ रही है। हजारो की सख्या में भक्त आते है, प्रसाद चढ़ाते है और जो भी कुछ मन्नत मागते है वो उनकी पूरी होजाती है, और हर साल इनका गर्मियों के मौसम (पीपल पुणु) मे  मेला लगता है और विशाल कुश्ती दगल का आयोजन करवाया जाता हैं। इसके साथ पुरे साल रामायण, सप्ताह, सत्संग, जागरण, दगल और प्रसादी प्रमुख हैं  श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज एवं पिचानोत राजपूतो  का सम्पूर्ण इतिहास जगाओ (पंडो) soroji me Narayandevtaji and anilji के पास आज भी रखा हुआ है.

पुरेन्द्र सिंह


राजपूत का मतलब

राजपूतों के लिये यह कहा जाता है कि वह केवल राजकुल में ही पैदा हुआ होगा,इसलिये ही राजपूत नाम चला,लेकिन राजा के कुल मे तो कितने ही लोग और जातियां पैदा हुई है सभी को राजपूत कहा जाता,यह राजपूत शब्द राजकुल मे पैदा होने से नही बल्कि राजा जैसा बाना रखने और राजा जैसा धर्म "सर्व जन हिताय,सर्व जन सुखाय" का रखने से राजपूत शब्द की उत्पत्ति हुयी। राजपूत को तीन शब्दों में प्रयोग किया जाता है,पहला "राजपूत",दूसरा "क्षत्रिय"और तीसरा "ठाकुर",आज इन शब्दों की भ्रान्तियों के कारण यह राजपूत समाज कभी कभी बहुत ही संकट में पड जाता है। राजपूत कहलाने से आज की सरकार और देश के लोग यह समझ बैठते है कि यह जाति बहुत ऊंची है और इसे जितना हो सके नीचा दिखाया जाना चाहिये,नीचा दिखाने के लिये लोग संविधान का सहारा ले बैठे है,संविधान भी उन लोगों के द्वारा लिखा गया है जिन्हे राजपूत जाति से कभी पाला नही पडा,राजपूताने के किसी आदमी से अगर संविधान बनवाया जाता तो शायद यह छीछालेदर नही होती।

खूंख्वार बनाने के लिये राजनीति और समाज जिम्मेदार है[संपादित करें]

राजपूत कभी खूंख्वार नही था,उसे केवल रक्षा करनी आती थी,लेकिन समाज के तानो से और समाज की गिरती व्यवस्था को देखने के बाद राजपूत खूंख्वार होना शुरु हुआ है,राजपूत को अपशब्द पसंद नही है। वह कभी किसी भी प्रकार की दुर्वव्यवस्था को पसंद नही करता है।


राजपूत उत्तर और मध्य भारत के क्षत्रिय कुल के अंश हैं। राजपूत शब्द का जन्म राजपुत्र शब्द से हुआ है, अंग्रेजी हुकूमत के समय में राजपूतों को राजपूताना भी कहा जाता था। विकिपीडिया के अनुसार ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म में केवल चार वर्ण होते हैं, लेकिन जैसे ही राजपूत काल की शुरुआत हुई यह वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदल गई और लोग अलग-अलग जातियो में विभाजित हो गए।

राजपूतों का इतिहास[संपादित करें]

राजपूत भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बाँग्लादेश और नेपाल) की बहुत ही प्रभावशाली जाति है, जो शासन और सत्ता के सदैव निकट रही है। अपनी युद्ध-कुशलता और शासन-क्षमता के कारण राजपूतों ने पर्याप्त ख्याति अर्जित की।

राजपूत  भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता है जो कि 'राजपुत्र' का अपभ्रंश है। राजस्थान को ब्रिटिशकाल में 'राजपुताना' भी कहा गया है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी। राजपूत काल में प्राचीन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गयी थी तथा वर्ण के स्थान पर कई जातियाँ व उप जातियाँ बन गईं थीं। कवि चंदबरदाई के कथनानुसार राजपूतों की 36 जातियाँ थी।

राजपूतों के लिये यह कहा जाता है कि वह केवल राजकुल में ही पैदा हुआ होगा,इसलिये ही राजपूत नाम चला, लेकिन राजा के कुल मे तो कितने ही लोग और जातियां पैदा हुई है सभी को राजपूत कहा जाता,यह राजपूत शब्द राजकुल मे पैदा होने से नही बल्कि राजा जैसा बाना रखने और राजा जैसा धर्म "सर्व जन हिताय,सर्व जन सुखाय" का रखने से राजपूत शब्द की उत्पत्ति हुयी। राजपूत कभी खूंख्वार नही था,उसे केवल रक्षा करनी आती थी,लेकिन समाज के तानो से और समाज की गिरती व्यवस्था को देखने के बाद राजपूत खूंख्वार होना शुरु हुआ है,राजपूत को अपशब्द पसंद नही है। वह कभी किसी भी प्रकार की दुर्वव्यवस्था को पसंद नही करता है।

राजपूतों की उत्पत्ति[संपादित करें]

इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति के विषय में विद्धानों के दो मत प्रचलित हैं- एक का मानना है कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी है, जबकि दूसरे का मानना है कि, राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय है। 12वीं शताब्दी के बाद् के उत्तर भारत के इतिहास को टोड ने 'राजपूत काल' भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीन काल एवं मध्य काल को 'संधि काल' भी कहा है। इस काल के महत्वपूर्ण राजपूत वंशों में राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश, चौहान वंश, चंदेल वंश, परमार वंश एवं गहड़वाल वंश आदि आते हैं।

विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्वपूर्ण स्थान 'कर्नल जेम्स टॉड' का है। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे।

भारतीय इतिहासकार एवं विद्वान 'गौरी शंकर हरिचंद ओझा' के अनुसार राजपूत विदेशी नहीं थे, वे पूर्ण रूप से भारतीय थे और प्राचीन क्षत्रियों की संतान थे।

विलियम क्रुक ने 'कर्नल जेम्स टॉड' के मत का समर्थन किया है। 'वी.ए. स्मिथ' के अनुसार शक तथा कुषाण जैसी विदेशी जातियां भारत आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई। भारतीय इतिहासकारों में 'ईश्वरी प्रसाद' एवं 'डी.आर. भंडारकर' ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर, कनिंघम आदि ने इन्हे विदेशी बताया है। । इन तमाम विद्वानों के तर्को के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि राजपूत क्षत्रियों के वंशज थे, फिर भी उनमें विदेशी रक्त का मिश्रण अवश्य था। अतः वे न तो पूर्णतः विदेशी थे, न तो पूर्णत भारतीय।

राजपूतोँ के वँश[संपादित करें]

"दस रवि से दस चन्द्र से बारह ऋषिज प्रमाण, चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण, भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान, चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।

सूर्य वंश की दस शाखायें:-

१.कछवाह २.राठौड ३.बडगूजर ४.सिकरवार ५.सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०.जुनने

चन्द्र वंश की दस शाखायें:-

१.जादौन, २.भाटी, ३.तोमर, ४.चन्देल, ५.छोंकर, ६.होंड, ७.पुण्डीर, ८.कटैरिया, ९.स्वांगवंश, १०.वैस

अग्निवंश की चार शाखायें:-

१.चौहान, २.सोलंकी, ३.परिहार, ४.पमार

ऋषिवंश की बारह शाखायें:-

१.सेंगर, २.दीक्षित३.दायमा४.गौतम५.अनवार (राजा जनक के वंशज)६.विसेन७.करछुल८.हय९.अबकू तबकू १०.कठोक्स ११.द्लेला १२.बुन्देला चौहान वंश की चौबीस शाखायें:-

१.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल८.भदौरिया ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा१९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर

राजपूत वीर थे। इस बात में कोई संदेह नहीं है, क्योंकि भारतीय इतिहास में आपको इनके गौरव की कहानियां पढ़ने और सुनने के लिए बखूब मिलती हैं। उत्तर भारत के स्थानीय लोगों का तो यहां तक कहना है कि "मुगल वंश के राजा भी राजपूत वीरों की मिसाल दिया करते थे"। इतने वीर होने के बावजूद भी, फिर आखिर ऐसा क्या था कि राजपूत एक के बाद एक युद्ध हारते चले गए और मुगल साम्राज्य बढ़ता चला गया, दरअसल राजपूतों के पतन की कुछ मुख्य वजह थी जो नीचे निम्नलिखित है


आपसी संगठन की कमी - राजपूतों के पतन की मुख्य वजह आपसी भाईचारा और संगठन की कमी थी। जहां एक तरफ मुगल युद्ध के समय एकजुट होकर युद्ध लड़ते थे, वहीं दूसरी तरफ राजपूत राजा एक दूसरे की सहायता करने के लिए आगे तक नहीं आते थे। अगर सच कहें तो हिंदू धर्म के कुछ राजा तो गद्दार भी थे जैसे : ग्वालियर के राजा 'जयाजीराव सिंधिया', इन्होंने 'रानी लक्ष्मीबाई साथ विश्वासघात किया, जिसे इतिहास कभी नहीं भुला सकता।


पुरानी युद्ध नीतियां -  राजपूतों की हार की दूसरी सबसे बड़ी वजह राजपूतों की पुरानी युद्ध नीतियां थी। राजपूत हमेशा पारंपरिक युद्ध नीति के साथ सीधी एक साथ दुश्मन सेना पर वार करते थे, वहीं दूसरी ओर मुगल लड़ाके जैसे दुश्मन कूटनीति एवं संभावनाओं का आकलन करके बैकअप प्लान के साथ युद्ध लड़ते थे। इसी वजह से अक्सर मुगल लड़ाके जीत जाया करते थे।


जरूरत से ज्यादा ईमानदारी  - चाणक्य ने कहा है! कि जरूरत से ज्यादा कुछ भी नुकसानदेह है। यह कहावत राजपूत राजाओं पर सटीक बैठती है। जहां एक तरफ मुगल और अंग्रेज युद्ध जीतने के लिए कूटनीति और छल कपट से युद्ध और षड्यंत्र किया करते थे, वहीं दूसरी तरफ राजपूत उसूलों के पक्के थे, और युद्ध पूर्ण निष्ठा के साथ लड़ते थे। अक्सर कहावतें में कहा जाता है कि "राजपूत निहत्थे पर वार नहीं किया करते थे"। यह भी एक कारण था कि राजपूत हार जाया करते थे।


राजपूताना

राजपूताना का अर्थ होता है की राजपूतो की धरती, आजादी से पहेले राजस्थान का नाम "राजपूताना" था, जिसे आजादी के बाद बदल कर राजस्थान कर दिया गया, राजपूताना पर राजपूतो ने हजारो सालो तक राज किया था जिसकी वजह से इस पूरे प्रदेश को राजपूताना कहा गया, 30 मार्च 1949 मे इस राजपूताना का नाम बदल कर राजस्थान कर दिया गया, क्योकी प्रदेश मे सभी 36 जातीया रहेती है और प्रदेश का नाम सिर्फ एक जाती पर से था, राजस्थान शब्द का अर्थ है: 'राजाओं का स्थान' क्योंकि ये राजपूत राजाओ से रक्षित भूमि थी इस कारण इसे राजस्थान कहा गया था।

राजस्थान भारत का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। यह 30 मार्च 1949 को भारत का एक ऐसा प्रांत बना, जिसमें तत्कालीन राजपूताना की ताकतवर रियासतें विलीन हुईं।

कुशवाहा (कछवाह) क्षत्रिय राजपूत राजवंश के प्राचीन इतिहास को अच्छी तरह से समझने के लिए इतिहास की गहराई में जाना होगा, जिसमें मुख्यतः इतिहास को हम सुविधा के लिये चार खण्डों में बांटकर कर अध्यन करेंगे।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) से लेकर, ब्रह्मा जी 59 पुत्रों का इतिहास।

ब्रह्माजी से लेकर भगवान श्री राम तक का इतिहास।

भगवान श्री राम से लेकर, दुल्हराय तक का इतिहास।

राजस्थान में कछवाहा वंश का इतिहास

1. ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) से लेकर, ब्रह्मा जी 59 पुत्रों का इतिहास।

हमें सबसे पहले मानव और उस मानव का अनेक जातियों में कैसे विभाजन हुवा इसका पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए त्रिमूर्ति अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) से लेकर मानव जाती की उत्पति का भी ज्ञान प्राप्त करना होगा ताकि जिससे की इतिहास को समझनें में आसानी रहेगी ।

क्योकिं ब्रह्मा की संतानों से ही मानव जाती का विकास हुवा है, जिसमें सूर्यवंश का निकास  ब्रह्मा के सत्रह मानस पुत्र पुत्रों में से सातवें पुत्र वैवस्वत मनु से हुवा है। सूर्यवंश वंश राजा इक्ष्वाकु से शु्रू हुआ। भागवत के अनुसार सूर्यवंश के आदिपुरुष इक्ष्वाकु थे। इसीलिए सूर्य वंश को इक्ष्वाकु वंश भी कहा जाता है। मनु ने ही अयोध्या को बसाया था। इससे पहले कश्यप थे। कश्यप के पुत्र सूर्य और सूर्य के पुत्र के पुत्र वैवश्वत मनु हुए। इन्हीं वैवश्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु थे। यानि वैवस्वत मनु के पुत्र  इक्ष्वाकु और उसके तीन पुत्रों विकुक्षि, निमि और दण्डक से सूर्यवंश आगे बढ़ा जिसमें अनेक महान राजपुरुषों का जन्म हुवा और समय कल में उन राजपुरुषों के वंसजों से अनेक जातियों का क्रमबद  विकास हुवा जिसमें  सूर्यवंश के अंतर्गत मुख्य रूप से सूर्य वंश की दस शाखायें चली

1 - राजपूत - सूर्य वंश – कछवाह, 2 - राजपूत - सूर्य वंश - राठौर (राठौड़), 3 - राजपूत - सूर्य वंश - बडगूजर (राघव), 4 - राजपूत - सूर्य वंश – सिकरवार, 5 - राजपूत - सूर्य वंश – सिसोदिया, 6 - राजपूत - सूर्य वंश – गहलोत, 7 - राजपूत - सूर्य वंश - गौर (गौड,गौड़), 8 - राजपूत - सूर्य वंश - गहलबार (गेहरवार), 9 - राजपूत - सूर्य वंश - रेकबार (रैकवार), 10 - राजपूत - सूर्य वंश – जुनने

इन दस मुख्य शाखाओं के बाद  अनेक उप शाखाएं भी हुई

सूर्यवंश का वंश वृक्ष
सूर्यवंश की शाखाएँ एवं उपशाखाएँ (सूर्यवंश का वंश वृक्ष)
01 गहलौत क्षत्रिय 23 पहाड़ी सूर्यवंशी क्षत्रिय 45 बम्बवार क्षत्रिय
02 कछवाहा क्षत्रिय 24 सिंधेल क्षत्रिय 46 चोलवंशी क्षत्रिय
03 राठौर (राठौड़) 25 लोहथम्भ क्षत्रिय 47 पुंडीर क्षत्रिय
04 निकुम्म क्षत्रिय 26 धाकर क्षत्रिय 48 कुलूवास क्षत्रिय
05 श्री नेत क्षत्रिय 27 उदमियता क्षत्रिय 49 किनवार क्षत्रिय
06 नागवंशी क्षत्रिय 28 काकतीय क्षत्रिय 50 कंडवार क्षत्रिय
07 बैस क्षत्रिय 29 सूरवार क्षत्रिय 51 रावत क्षत्रिय
08 विसेन क्षत्रिय 30 नेवतनी क्षत्रिय 52 नन्दबक क्षत्रिय
09 गौतम क्षत्रिय 31 मौर्य क्षत्रिय 53 निशान क्षत्रिय
10 बडगूजर क्षत्रिय 32 शुंग वंशी क्षत्रिय 54 जायस क्षत्रिय
11 गौड क्षत्रिय 33 कटहरिया क्षत्रिय 55 चंदौसिया क्षत्रिय
12 नरौनी क्षत्रिय 34 अमेठिया क्षत्रिय 56 मौनस क्षत्रिय
13 रैकवार क्षत्रिय 35 कछलियां क्षत्रिय 57 दोनवार क्षत्रिय
14 सिकरवार क्षत्रिय 36 कुशभवनियां क्षत्रिय 58 निमुडी क्षत्रिय
15 दुर्गवंश क्षत्रिय 37 मडियार क्षत्रिय 59 झोतियाना क्षत्रिय
16 दीक्षित क्षत्रिय 38 कैलवाड क्षत्रिय 60 ठकुराई क्षत्रिय
17 कानन क्षत्रिय 39 अन्टैया क्षत्रिय 61 मराठा या भोंसला क्षत्रिय
18 गोहिल क्षत्रिय 40 भतिहाल क्षत्रिय 62 परमार क्षत्रिय
19 निमी वंशीय क्षत्रिय 41 महथान क्षत्रिय 63 चौहान क्षत्रिय
20 लिच्छवी क्षत्रिय 42 चमिपाल क्षत्रिय
21 गर्गवंशी क्षत्रिय 43 सिहोगिया क्षत्रिय
22 दघुवंशी क्षत्रिय 44 बमटेला क्षत्रिय


1. सूर्यवंशी 2. निमि वंश 3.निकुम्भ वंश 4. नाग वंश 5. गोहिल वंश, 6. गहलोत वंश 7. राठौड वंश 8. गौतम वंश 9. मौर्य वंश 10. परमार वंश, 11. चावड़ा वंश 12. डोड वंश 13. कुशवाहा वंश 14. परिहार वंश 15. बड़गूजर वंश, 16. सिकरवार 17. गौड़ वंश 18. चैहान वंश 19. बैस वंश 20. दाहिमा वंश, 21. दाहिया वंश 22. दीक्षित वंश।

परमेश्वर वह सर्वोच्च परालौकिक शक्ति है जिसे इस संसार का स्रष्टा और शासक माना जाता है। हिन्दी में परमेश्वर को भगवान, परमात्मा या परमेश्वर भी कहते हैं। अधिकतर धर्मों में परमेश्वर की परिकल्पना ब्रह्माण्ड की संरचना से जुडी हुई है। परमेश्वर के तीन (त्रिमूर्ति) मुख्य रूप हैं।

01 - ब्रह्मा

02 – विष्णु

03 - शिव

पुराणों में त्रिमूर्ति के भगवान विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो भगवान शिव और ब्रह्मा को माना जाता है। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है वहीं शिव को संहारक माना गया है।

विष्णु - विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। विष्णु का निवास क्षीर सागर है। उनका शयन सांप के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित है।

शिव - शिव को देवों के देव कहते हैं, इन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है | हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है।

शिव के पुत्र कार्तिकेय और गणेश दो हैं तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। अशोक सुंदरी का विवाह नहूष से हुआ था। तथा अशोक सुंदरी ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं। इंद्र के अभाव में नहूष को ही आस्थायी रूप से इंद्र बनाया गया, उसके घमंड के कारण उसे श्राप मिला तथा इसीसे उसका पतन हुआ। बादमें इंद्र नें अपनी गद्दी पुन: ग्रहण की।

ब्रह्मा जी ने अपने मानसिक संकल्प से दस प्रजापतियों को उत्पन्न करके उनके द्वारा सम्पूर्ण प्रजा और सृष्टि की रचना है। इसलिये ब्रह्मा जी प्रजापतियों के भी पति कहे जाते हैं। ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न 17 मानस पुत्रों में से ये दस मुख्य प्रजापति कहे जाते हैं उनका विवरण इस प्रकार हैं :-

01 - मरीचि - मन से मारिचि, 02 – अत्रि - नेत्र से अत्रि, 03 – अंगिरा - मुख से अंगिरस, 04 - पुलस्त्य - कान से पुलस्त्य, 05 - पुलह - नाभि से पुलह, 06 – क्रतु (यज्ञ) - हाथ से कृतु, 07 – भृगु - त्वचा से भृगु, 08 – वसिष्ठ, 09 - दक्ष - अंगुष्ठ से दक्ष, 10 – कर्दम - छाया से कंदर्भ

ब्रह्मा के प्रमुख 17 मानस पुत्र :-

11 - गोद से नारद, 12 – सनक, 13 – सनन्दन, 14 – सनातन, 15 – सनतकुमार - इच्छा से चार पुत्र – 01 - सनक, 02 - सनन्दन, 03 - सनातन 04 - सनतकुमार, - ब्रह्मा ने सर्वप्रथम जिन चार-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार पुत्रों का सृजन किया। उनकी सृष्टि रचना के कार्य में कोई रुचि नहीं थी। वे ब्रह्मचर्य रहकर ब्रह्म तत्व को जानने में ही मगन रहते थे। इन वीतराग पुत्रों के इस निरपेक्ष व्यवहार पर ब्रह्मा को महान क्रोध उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा के उस क्रोध से एक प्रचंड ज्योति ने जन्म लिया। उस समय क्रोध से जलते ब्रह्मा के मस्तक से अर्धनारीश्वर रुद्र उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने उस अर्धनारीश्वर रुद्र को स्त्री और पुरुष दो भागों में विभक्त कर दिया। पुरुष का नाम 'का' और स्त्री का नाम 'या' रखा। प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वयंभु मनु और स्त्री रूप में शतरूपा को प्रकट किया।

16 - शरीर से - स्वायंभुव मनु तथा शतरुपा, 17 - ध्यान से चित्रगुप्त।

मरीचि के पुत्र हुए - कश्यप

अंगिरा के पुत्र हुए - बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त।

पुलस्त्य के पुत्र हुए - राक्षस, बानर, किन्नर तथा यक्ष हैं।

पुलह के पुत्र हुए - शरभ, सिंह, किम्पुरूष, व्याघ्र, रीछ और ईहामृग (भेडि़या)।

क्रतु (यज्ञ) - भगवान सूर्य के आगे चलने वाले साठ हजार वालखिल्य ऋषि हुए।

ब्रह्मा जी के पुत्र - ब्रह्मा जी के पुत्रों की संख्‍या पुराणों में निश्चित नहीं है। ब्रह्मा जी के कुल मिलाकर कुल 59 पुत्र बताये गये हैं, जिनको हम अध्ययन व यादास्त के लिए पांच भागो में श्रेणीवार इस प्रकार जानेंगे, उनका विवरण इस प्रकार हैं :-

    01 - सत्रह मानस पुत्र

   02 - चौदह मनु

   03 - ग्यारह रुद्र

   04 - आठ वसु

    05 - ब्रह्मा जी के अन्य पुत्र

{*** चार कुमार (सनतकुमार) – ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में सामिल [01 - सनक 02 - सनन्दन 03 - सनातन  04 - सनतकुमार ये चार पुत्र  चार कुमार कहलाते हैं*** ब्रह्मा ने सर्वप्रथम जिन चार-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार पुत्रों का सृजन किया। उनकी सृष्टि रचना के कार्य में कोई रुचि नहीं थी। वे ब्रह्मचर्य रहकर ब्रह्म तत्व को जानने में ही मगन रहते थे। इन वीतराग पुत्रों के इस निरपेक्ष व्यवहार पर ब्रह्मा को महान क्रोध उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा के उस क्रोध से एक प्रचंड ज्योति ने जन्म लिया। उस समय क्रोध से जलते ब्रह्मा के मस्तक से अर्धनारीश्वर रुद्र उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने उस अर्धनारीश्वर रुद्र को स्त्री और पुरुष दो भागों में विभक्त कर दिया। पुरुष का नाम 'का' और स्त्री का नाम 'या' रखा। प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वयंभु मनु और स्त्री रूप में शतरूपा को प्रकट किया। }

{*** छः महर्षि - के मानस पुत्रों में सामिल [01 - मरीचि 02 - अंगिरा, 03 - अत्रि 04 - पुलत्स्य  

05- पुलह 06 – क्रतु ] ये छः महर्षि कहलाते हैं***}

भगवान् रुद्र भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए।

1 सत्रह मानस पुत्र –

ब्रह्मा जी 59 पुत्रों में सामिल मानस पुत्रों की कुल संख्या सत्रह थी, ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न इन सत्रह मानस पुत्रों में से ये दस पुत्रों को मुख्य प्रजापति कहाजाता है, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा कर्दम- के ये दस पुत्र मुख्य प्रजापति हैं। इन सत्रह मानस पुत्रों के नाम ईस प्रकार है -:

01 – मरीचि, 02 – अत्रि,  03 – अंगिरा, 04 – पुलस्त्य, 05 – पुलह, 06 – क्रतु (यज्ञ), 07 – भृगु, 08 – वसिष्ठ, 09 – दक्ष, 10 – कर्दम, 11 – नारद, 12 – सनक, 13 – सनन्दन, 14 – सनातन, 15 – इच्छा, 16 - स्वायंभुव मनु तथा शतरुपा,17 - चित्रगुप्त

2 चौदह मनु - ब्रह्मा जी 59 पुत्रों में सामिल मनु पुत्रों की कुल संख्या चौदह थी, इन चौदह मनुओं के नाम ईस प्रकार है :-

01 - स्वायम्भु मनु, 02 - स्वरोचिष मनु, 03 - औत्तमी मनु, 04 - तामस मनु, 05 - रैवत मनु, 06 - चाक्षुष मनु, 07 - वैवस्वत मनु या श्राद्धदेव मनु, 08 - सावर्णि मनु, 09 - दक्ष सावर्णि मनु, 10 - ब्रह्म सावर्णि मनु, 11 - धर्म सावर्णि मनु, 12 - रुद्र सावर्णि मनु, 13 - देव सावर्णि मनु या रौच्य मनु, 14 - इन्द्र सावर्णि मनु या भौत मनु

3 ग्यारह रुद्र - ब्रह्मा जी 59 पुत्रों में सामिल रुद्र पुत्रों की कुल संख्या ग्यारह थी, इन ग्यारह रुद्र पुत्रों के नाम ईस प्रकार है -:

01 – मृगव्याध, 02 – सर्प, 03 - महायशस्वी निर्ऋृति, 04 – अजैकपाद, 05 – अहिर्बुघ्न्य, 06 - शत्रुसंतापन पिनाकी, 07 – दहन, 08 – ईश्‍वर, 09 - परम कान्तिमान् कपाली, 10 – स्थाणु, 11- भगवान भव

4 वसु - ब्रह्मा जी 59 पुत्रों में सामिल वसु पुत्रों की कुल संख्या आठ थी, इन आठ वसु पुत्रों के नाम ईस प्रकार है -:

01 – धर, 02 – ध्रुव, 03 – सोम, 04 – अह, 05 – अनिल, 06 – अनल, 07 – प्रत्यूष, 08 – प्रभास

5 ब्रह्मा जी के अन्य पुत्र – ब्रह्मा जी 59 पुत्रों में सामिल अन्य पुत्रों की कुल संख्या नौ थी, इन नौ पुत्रों के नाम ईस प्रकार है -:

01 – अधर्म, 02 – अलक्ष्मी, 03 – रुचि, 04 – पंचशिखा, 05 – वोढु, 06 – अपान्तरतमा, 07 – प्रचेता, 08 – हंस, 09 - यति

2. ब्रह्माजी से लेकर भगवान श्री राम तक का इतिहास।[संपादित करें]

01 - ब्रह्माजी से मरीचि हुए।,  02 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। , 03 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे। विवस्वान् को सूर्यदेव (प्रत्यक्ष सूर्य नहीं) भी कहा जाता था। विवस्वान से ही सूर्यवंश चला।  

04 - विवस्वान के के पुत्र वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के दस पुत्र हुए -:  

01 – इल (‘‘इला’), 02 – इक्ष्वाकु, 03 - कुशनाम (नाभाग), 04 – अरिष्ट05 – धृष्ट06 – नरिष्यन्त07 – करुष08 – महाबली, 09 – शर्याति, 10 - पृषध

वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से दूसरे पुत्र का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु से ही आगे वंश व्रद्धि हुई।

05 – इक्ष्वाकु, 06 – विकुक्षि (शशाद), 07 – कुकुत्स्थ, 08 – अनेनस्, 09 – पृथु, 10 – विष्टराश्व, 11 – आर्द्र, 12 – युवनाश्व, 13 – श्रावस्त, 14 – बृहदश्व, 15 – कुवलाश्व , 16 – दृढाश्व ,17 – प्रमोद ,18 – हरयश्व,  19 – निकुम्भ,  20 – संहताश्व , 21 – अकृशाश्व,  22 – प्रसेनजित्23 - युवनाश्व २,  24 – मान्धातृ,  25 – पुरुकुत्स,  26 – त्रसदस्यु,  27 – सम्भूत,  28 – अनरण्य,  29 – त्रसदश्व,  30 - हरयाश्व २,  31 – वसुमत,  32 – त्रिधनवन्,  33 – त्रय्यारुण,  34 - सत्यव्रत - सत्यव्रत कौशल देश के ब्राह्मण देवदत्त का पुत्र था।

35 - हरिश्चन्द्र -राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे जो सत्यव्रत के पुत्र थे। ये अपनी सत्यनिष्ठा के लिए अद्वितीय हैंऔर इसके लिए इन्हें उनकी रानी तारा (शैव्या) अनेक कष्ट सहने पड़े। रोहिताश्व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र थे।

36 - रोहित (रोहिताश्व), 37 – हरित, 38 – विजय, 39 – रुरुक, 40 – वृक, 41 – बाहु, 42 – सगर, 43 – असमञ्जस्, 44 – अंशुमन्त, 45 – दिलीप, १ 46 – भगीरथ, 47 – श्रुत, 48 – नाभाग, 49 – अम्बरीश, 50 – सिन्धुद्वीप, 51 – अयुतायुस्, 52 – ऋतुपर्ण, 53 – सर्वकाम, 54 – सुदास, 55 – मित्रसह, 56 – अश्मक, 57 – मूलक, 58 – शतरथ, 59 – ऐडविड, 60 - विश्वसह १, 61 - दिलीप २, 62 – दीर्घबाहु, 63 – रघु.

64 - अज - अज ने विदर्भ की राजकुमारी इंदुमति के स्वयंवर में जाकर उन्हें अपनी पत्नी बनाया । अज अपनी पत्नी इन्दुमति से बहुत प्रेम करते थे। एक बार नारदजी प्रसन्नचित्त अपनी वीणा लिए आकाश में विचर रहे थे। संयोगवश उनकी विणा का एक फूल टूटा और बगीचे में सैर कर रही रानी इंदुमति के सिर पर गिरा जिससे उनकी मृत्यु हो गई। राजा अज इंदुमति के वियोग में विह्वल हो गए और अन्त में जल-समाधि ले ली।

65 - अज के पुत्र दशरथ हुये।

66 - दशरथ के चार पुत्र हुये - इस प्रकार भगवान श्री राम, भरत, लक्ष्मण,शत्रुघ्न, इन चारोँ भाइयों का का जन्म ब्रह्माजी की 67वीँ पिढी मेँ हुआ था।

   01 - भगवान श्री राम

   02 - भरत

   03 - लक्ष्मण

   04 – शत्रुघ्न

भरत के दो पुत्र थे -

01 – तार्क्ष, 02 - पुष्कर।

लक्ष्मण के दो पुत्र थे –

01 – चित्रांगद, 02 - चन्द्रकेतु

शत्रुघ्न के क दो पुत्र थे –

01 – सुबाहु, 02 - शूरसेन  

(मथुरा का नाम पहले शूरसेन था)

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं।

इस संबंध में तीन कथाएं हैं:

1 - पहली:- वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

2 - दूसरी:- लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्याप नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

3.तीसरी कथा:- कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्योंफकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्त राधिकारी नहीं बन सकती थीं।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्यापन नहीं दिया। अपने भक्तए की बेइज्जलती पर गुस्साफए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्नग का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ मंद दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन...

दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्होंतने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ।

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे। जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्या  की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्यक में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से। ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।

ऋंग ऋषि - ऋंग ऋषि  विभण्डक ऋषि तथा अप्सरा उर्वशी के पुत्र व कश्यप ऋषि के पौत्र बताये जाते हैं। । तथा महर्षि कश्यप, ब्रम्हा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे, महर्षि कश्यप ने ब्रम्हा के पुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया। ऋंग ऋषि  का विवाह अंगदेश के राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री शान्ता से सम्पन्न हुआ जो कि वास्तव में दशरथ की पुत्री थीं।

अप्सरा उर्वशी  - साहित्य और पुराण में उर्वशी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति रही है। स्वर्ग की इस अप्सरा की उत्पत्ति नारायण की जंघा से मानी जाती है। पद्मपुराण के अनुसार इनका जन्म कामदेव के उरु से हुआ था। श्रीमद्भागवत के अनुसार यह स्वर्ग की सर्वसुंदर अप्सरा थी।



67 - भगवान श्री राम - भगवान श्री राम के बाद कुशवाह (कछवाह) क्षत्रिय राजपूत राजवंश का इतिहास


श्रीराम का जीवनकाल एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में वर्णित हुआ है। लेकिन अभी तक उत्खनन सेे कोई भी साक्ष्य पुरातत्व विभाग को नहीं मिला है। किन्तु रामायण में सीता के खोज में श्रीलंका जाने के लिए 25 किलोमीटर पत्थर के सेतु का निर्माण करने का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसको रामसेतु कहते हैं, वह आज भी स्थित है, जिसकी कार्बन डेंटिंग में पांच हजार वर्ष पूर्व का अनुमान लगा गया है।

मान्यता अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने भी उनके जीवन पर केन्द्रित भक्तिभावपूर्ण सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की है। इन दोनों के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी रामायण की रचनाएं हुई हैं, जो काफी प्रसिद्ध भी हैं। खास तौर पर उत्तर भारत में राम अत्यंत पूज्यनीय हैं और आदर्श पुरुष हैं। इन्हें पुरुषोत्तम शब्द से भी अलंकृत किया जाता है। मर्यादा-पुरुषोत्तम राम, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। राम की पत्नी का नाम सीता था इनके तीन भाई थे- लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नहनुमान, राम के, सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। राम ने लंका के राजा रावण (जो अधर्म का पथ अपना लिया था) का वध किया। राम की प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में है। राम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहाँ तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। राम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई की थी। राम के पिता दशरथ ने उनकी सौतेली माता कैकेयी को उनकी किन्हीं दो इच्छाओं को पूरा करने का वचन (वर) दिया था। कैकेयी ने दासी मन्थरा के बहकावे में आकर इन वरों के रूप में राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए पति के साथ वन जाना उचित समझा। भाई लक्ष्मण ने भी राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरणपादुका (खड़ाऊँ) ले आए। फिर इसे ही राज गद्दी पर रख कर राजकाज किया। जब राम वनवासी थे तभी उनकी पत्नी सीता को रावण हरण (चुरा) कर ले गया। जंगल में राम को हनुमान जैसा मित्र और भक्त मिला जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम ने हनुमान,सुग्रीव आदि वानर जाति के महापुरुषो की मदद से सीता को ढूँढ़ा। समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे तथा रावण के साथ युद्ध किया। उसे मार कर सीता को वापस लाये। राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने राज्य उनको ही सौंप दिया। राम न्यायप्रिय थे। उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया इसलिए लोग आज भी अच्छे शासन को रामराज्य की उपमा देते हैं। इनके दो पुत्रों कुशलव ने इनके राज्यों को सँभाला। वैदिक धर्म के कई त्योहार, जैसे दशहरा, राम नवमी और दीपावली, राम की वन-कथा से जुड़े हुए हैं।

नाम-व्युत्पत्ति एवं अर्थ[संपादित करें]

'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है। 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास) करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें 'रमण' करते (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं। 'विष्णुसहस्रनाम' पर लिखित अपने भाष्य में आद्य शंकराचार्य ने पद्मपुराण का हवाला देते हुए कहा है कि नित्यानन्दस्वरूप भगवान् में योगिजन रमण करते हैं, इसलिए वे 'राम' हैं।

अवतार रूप में प्राचीनता[संपादित करें]

वैदिक साहित्य में 'राम' का उल्लेख प्रचलित रूप में नहीं मिलता है। ऋग्वेद में केवल दो स्थलों पर ही 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (१०-३-३ तथा १०-९३-१४)। उनमें से भी एक जगह काले रंग (रात के अंधकार) के अर्थ में तथा शेष एक जगह ही व्यक्ति के अर्थ में प्रयोग हुआ है; लेकिन वहाँ भी उनके अवतारी पुरुष या दशरथ के पुत्र होने का कोई संकेत नहीं है। यद्यपि नीलकण्ठ चतुर्धर ने ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों को स्वविवेक से चुनकर उनके रामकथापरक अर्थ किये हैं, परन्तु यह उनकी निजी मान्यता है। स्वयं ऋग्वेद के उन प्रकरणों में प्राप्त किसी संकेत या किसी अन्य भाष्यकार के द्वारा उन मंत्रों का रामकथापरक अर्थ सिद्ध नहीं हो पाया है। ऋग्वेद में एक स्थल पर 'इक्ष्वाकुः' (१०-६०-४) का तथा एक स्थल पर 'दशरथ' (१-१२६-४) शब्द का भी प्रयोग हुआ है। परन्तु उनके राम से सम्बद्ध होने का कोई संकेत नहीं मिल पाता है।

ब्राह्मण साहित्य में 'राम' शब्द का प्रयोग ऐतरेय ब्राह्मण में दो स्थलों पर (७-५-१{=७-२७} तथा ७-५-८{=७-३४})हुआ है; परन्तु वहाँ उन्हें 'रामो मार्गवेयः' कहा गया है, जिसका अर्थ आचार्य सायण के अनुसार 'मृगवु' नामक स्त्री का पुत्र है। शतपथ ब्राह्मण में एक स्थल पर 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (४-६-१-७)। यहाँ 'राम' यज्ञ के आचार्य के रूप में है तथा उन्हें 'राम औपतपस्विनि' कहा गया है। तात्पर्य यह कि प्रचलित राम का अवतारी रूप वाल्मीकीय रामायण एवं पुराणों की ही देन है।

जन्म[संपादित करें]

राम-जन्म, अकबर की रामायण से

रामजी के कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में रामजी के-जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:-

...................... चैत्रे नावमिके तिथौ।।

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।

अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (रामजी का जन्म हुआ)।

यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य के उच्च (मेष में) होने पर बुद्ध का उच्च (कन्या में) होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह -- मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने रामजी के-जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है।

भगवान राम के जन्म-समय पर आधुनिक शोध[संपादित करें]

परम्परागत रूप से राम का जन्म त्रेता युग में माना जाता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में, विशेषतः पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष होते हैं, जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष तथा द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेता युग में अर्थात द्वापर से पहले हुआ था। चूँकि कलियुग का अभी प्रारंभ ही हुआ है (लगभग 5,500 वर्ष ही बीते हैं) और राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ तथा अवतार लेकर धरती पर उनके वर्तमान रहने का समय परंपरागत रूप से 11,000 वर्ष माना गया है। अतः द्वापर युग के 8,64,000 वर्ष + राम की वर्तमानता के 11,000 वर्ष + द्वापर युग के अंत से अबतक बीते 5,100 वर्ष = कुल 8,80,100 वर्ष। अतएव परंपरागत रूप से राम का जन्म आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पहले माना जाता है।

प्रख्यात मराठी शोधकर्ता विद्वान डॉ॰ पद्माकर विष्णु वर्तक ने एक दृष्टि से इस समय को संभाव्य माना है। उनका कहना है कि वाल्मीकीय रामायण में एक स्थल पर विन्ध्याचल तथा हिमालय की ऊँचाई को समान बताया गया है। विन्ध्याचल की ऊँचाई 5,000 फीट है तथा यह प्रायः स्थिर है, जबकि हिमालय की ऊँचाई वर्तमान में 29,029 फीट है तथा यह निरंतर वर्धनशील है। दोनों की ऊँचाई का अंतर 24,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार हिमालय 100 वर्षो में 3 फीट बढ़ता है। अतः 24,029 फीट बढ़ने में हिमालय को करीब 8,01,000 वर्ष लगे होंगे। अतः अभी से करीब 8,01,000 वर्ष पहले हिमालय की ऊँचाई विन्ध्याचल के समान रही होगी, जिसका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण में वर्तमानकालिक रूप में हुआ है। इस तरह डाॅ॰ वर्तक को एक दृष्टि से यह समय संभव लगता है, परंतु उनका स्वयं मानना है कि वे किसी अन्य स्रोत से इस समय की पुष्टि नहीं कर सकते हैं। अपने सुविख्यात ग्रंथ 'वास्तव रामायण' में डॉ॰ वर्तक ने मुख्यतः ग्रहगतियों के आधार पर गणित करके वाल्मीकीय रामायण में उल्लिखित ग्रहस्थिति के अनुसार राम की वास्तविक जन्म-तिथि 4 दिसंबर 7323 ईसापूर्व को सुनिश्चित किया है। उनके अनुसार इसी तिथि को दिन में 1:30 से 3:00 बजे के बीच राम का जन्म हुआ होगा।

डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक के शोध के अनेक वर्षों के बाद (2004 ईस्वी से) 'आई-सर्व' के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके रामजी का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व में सिद्ध किया। उनका मानना था कि इस तिथि को ग्रहों की वही स्थिति थी जिसका वर्णन वाल्मीकीय रामायण में है। परंतु यह समय काफी संदेहास्पद हो गया है। 'आई-सर्व' के शोध दल ने जिस 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया वह वास्तव में ईसा पूर्व 3000 से पहले का सही ग्रह-गणित करने में सक्षम नहीं है। वस्तुतः 2013 ईस्वी से पहले इतने पहले का ग्रह-गणित करने हेतु सक्षम सॉफ्टवेयर उपलब्ध ही नहीं था। इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न होकर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था तथा तिथि भी अष्टमी ही थी। बाद में अन्य विशेषज्ञ द्वारा ejplde431 सॉफ्टवेयर द्वारा की गयी सही गणना में तिथि तो नवमी हो जाती है परन्तु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में। अतः 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व की तिथि वस्तुतः राम की जन्म-तिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। ऐसी स्थिति में अब यदि डॉ० पी० वी० वर्तक द्वारा पहले ही परिशोधित तिथि सॉफ्टवेयर द्वारा प्रमाणित हो जाए तभी रामजी का वास्तविक समय प्रायः सर्वमान्य हो पाएगा अथवा प्रमाणित न हो पाने की स्थिति में नवीन तिथि के शोध का रास्ता खुलेगा।

राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ[संपादित करें]

बालपन और सीता-स्वयंवर[संपादित करें]

पुराणों में राम के जन्म के बारे में स्पष्ट प्रमाण मिलते कि राम का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के अयोध्या नामक नगर में हुआ था। अयोध्या जो कि भगवान राम के पूर्वजों की ही राजधानी थी। रामचन्द्र के पूर्वज रघु थे।

भगवान राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्‍हें मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्‍यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था। इसलिए भारत में जब भी सुराज (अच्छे राज) की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरू वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु विश्वामित्र उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गये। राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ थे। ताड़का नामक राक्षसी बक्सर (बिहार) में रहती थी। वहीं पर उसका वध हुआ। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारीच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही गुरु विश्‍वामित्र उन्हें मिथिला ले गये। वहाँ के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए एक स्वयंवर समारोह आयोजित किया था। जहाँ भगवान शिव का एक धनुष था जिसकी प्रत्‍यंचा चढ़ाने वाले शूरवीर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे। जब बहुत से राजा प्रयत्न करने के बाद भी धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ाना तो दूर उसे उठा तक नहीं सके, तब विश्‍वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्‍यंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्‍यंचा चढाने के प्रयत्न में वह महान धनुष घोर ध्‍‍वनि करते हुए टूट गया। महर्षि परशुराम ने जब इस घोर ध्‍वनि को सुना तो वे वहाँ आ गये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्‍यक्‍त करने लगे। लक्ष्‍मण उग्र स्‍वभाव के थे। उनका विवाद परशुराम से हुआ। (वाल्मिकी रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं मिलता है।) तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्‍त लोगों ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे। लोग राम को बहुत चाहते थे। उनकी मृदुल, जनसेवायुक्‍त भावना और न्‍यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्‍थ की ओर अग्रसर हो रहे थे। अत: उन्‍होंने राज्‍यभार राम को सौंपनें का सोचा। जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्‍त करनेवाले हैं। उस समय राम के अन्‍य दो भाई भरत और शत्रुघ्‍न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी मन्थरा ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्‍हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्‍हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चा‍हते हैं। भगवान राम के बचपन की विस्तार-पूर्वक विवरण स्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस के बालकाण्ड से मिलती है।

वनवास[संपादित करें]

राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं: कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। भगवान राम कौशल्या के पुत्र थे, सुमित्रा के दो पुत्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पुत्र भरत थे। राज्य नियमो से राजा का ज्येष्ठ लड़का ही राजा बनने का पात्र होता है अत: राम को अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होने दो बार दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो वन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती है। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी उसका पुत्र भरत ही राजा बनें, इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंदे राजा दशरथ को मजबूरन यह स्वीकार करना पड़ा। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।

सीता का हरण[संपादित करें]

राम एवं सुग्रीव का मिलन।

वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था। रामायण के अनुसार, जब राम , सीता और लक्ष्मण कुटिया में थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीता व्याकुल हो गयी। वह हिरण रावण का मामा मारीच था। उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता उसे देख कर मोहित हो गई और राम से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया। राम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा| मारीच राम को बहुत दूर ले गया। मौका मिलते ही राम ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! हे लक्ष्मण!" की आवाज़ लगायी| उस आवाज़ को सुन सीता चिन्तित हो गयीं और उन्होंने लक्ष्मण को राम के पास जाने को कहा| लक्ष्मण जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची, जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है।

भगवान राम, अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में दर-दर भटक रहे थे। तब वे हनुमान और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बड़े भक्त बने।

रावण का वध[संपादित करें]

भवानराव बाळासाहेब पंतप्रतिनिधी कृत रावण-वध

सीता को को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान,विभीषण और वानर सेना की मदद से रावन के सभी बंधु-बांधवों और उसके वंशजों को पराजित किया तथा लौटते समय विभीषण को लंका का राजा बनाकर अच्छे शासक के लिए मार्गदर्शन किया।

अयोध्या वापसी[संपादित करें]

अयोध्या-वापसी

राम का राज्याभिषेक

राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। राम, सीता, लक्षमण और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। वहां सबसे मिलने के बाद राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ। पूरा राज्य कुशल समय व्यतीत करने लगा।


श्रीराम सभा

दैहिक त्याग[संपादित करें]

ब्रह्मा द्वारा राम का स्वर्ग मे स्वागत

सीता की सती प्रमाणिकता सिद्ध होने के पश्चात सीता अपने दोनों पुत्रों कुश और लव को राम के गोद में सौंप कर धरती माता के साथ भूगर्भ में चली गई। ततपश्चात रामजन्म की जीवन भी पूर्ण हो गई थी। अतः उन्होंने यमराज की सहमति से सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग कर पुनः बैकुंठ धाम में विष्णु रूप में विराजमान हो गये।

सन्दर्भ[संपादित करें]

1.   रामचरितमानस (सटीक)-2-28-2; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999ई०।

2.   संस्कृत-हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे।

3.   श्रीविष्णुसहस्रनाम, सानुवाद शांकर भाष्य सहित, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1999, पृष्ठ-143.

4.   ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-348.

5.   ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्य कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-3892.

6.   ऋग्वेदसंहिता (श्रीसायणाचार्यजी कृत भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) भाग-5, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी, संस्करण-2013, पृष्ठ-4406.

7.   ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-79.

8.   वैदिक-पदानुक्रम-कोषः, संहिता विभाग, तृतीय खण्ड, संपादक- विश्वबन्धुजी शास्त्री, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशिआरपुर, संस्करण-1956, पृष्ठ-1550; एवं ऋग्वेद पदानां अकारादि वर्णक्रमानुक्रमणिका, संपादक- स्वामी विश्वेश्वरानंद एवं नित्यानंद, निर्णय सागर प्रेस, मुंबई, संस्करण-1908, पृ०-195.

9.   हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, संपादक- डॉ० धीरेंद्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-2011, पृष्ठ-497.

10. ↑ इस तक ऊपर जायें:अ वैदिक-पदानुक्रमकोषः, ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, द्वितीय खण्ड, विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर, संस्करण-1936, पृष्ठ-852.

11. ऐतरेयब्राह्मणम् (सायण भाष्य एवं हिन्दी अनुवाद सहित) भाग-2, संपादक एवं अनुवादक- डॉ० सुधाकर मालवीय, तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी, संस्करण-1983, पृष्ठ-1201.

12. शतपथब्राह्मण (सटीक), भाग-1, विजयकुमार गोविंदराम हासानंद, दिल्ली, संस्करण-2010, पृष्ठ-657.

13. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सटीक), प्रथम भाग, बालकाण्ड-18-8,9; गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996 ई०, पृष्ठ-69.

14. श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, पूर्ववत्,1.15.29; पृ०-64.

15. A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA (Translation of the Original Book ‘VASTAVA RAMAYANA’ in Marathi), Dr. Padmakar Vishnu Vartak, English Translation by Vidyakar Vasudev Bhide, Blue Bird (India) Limited, Pune, First Edition-2008, p.282.

16. A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.290-300.

17. A REALISTIC APPROACH TO THE VALMIKI RAMAYANA, ibid, p.300.

18. डॉ॰ पी॰ वी॰ वर्तक की पुस्तक 'वास्तव रामायण' (मराठी) का चतुर्थ संस्करण 1993 में निकल चुका था

19. इतिहास का उपहास (राम की जन्मतिथि एवं जन्मकुण्डली की भ्रामक व्याख्या का निराकरण), विनय झा, अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्, वाराणसी, संस्करण-2015, पृष्ठ-10-11.

20. इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-10 तथा 30.

21. इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-29.

22. इतिहास का उपहास, पूर्ववत्, पृ०-37.


भगवान श्री राम के बाद कुशवाह (कछवाह) क्षत्रिय राजपूत राजवंश का इतिहास

इस प्रकार भगवान श्री राम का जन्म ब्रह्माजी की 67वीँ पिढी मेँ और ब्रह्माजी की 68वीँ पिढी मेँ लव व कुश का जन्म हुआ। भगवान श्री राम के दो पुत्र थे –

01 – लव

02 - कुश

रामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्म स्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया है।

- लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।

- राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि माना जाता है।


- रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने - की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई - देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं। राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा ।

3. भगवान श्री राम से लेकर, दुल्हराय जी (दुल्हेराय जी) तक का इतिहास।[संपादित करें]

66 - दशरथ के चार पुत्र हुये - इस प्रकार भगवान श्री राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, इन चारोँ भाइयों का का जन्म ब्रह्माजी की 67वीँ पिढी मेँ हुआ था।

01 - भगवान श्री राम, 02 – भरत, 03 – लक्ष्मण,  04 -  शत्रुघ्न  

भरत के दो पुत्र थे -: 01 – तार्क्ष, 02 - पुष्कर

लक्ष्मण के दो पुत्र थे 01 – चित्रांगद, 02 - चन्द्रकेतु

शत्रुघ्न के क दो पुत्र थे –: 01 – सुबाहु, 02 - शूरसेन (मथुरा का नाम पहले शूरसेन था)

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

       भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं। इस संबंध में तीन कथाएं हैं

1 - पहली कथा :- वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।

2 - दूसरी कथा :- लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्याप नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

3.तीसरी कथा :- कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्योंफकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्त राधिकारी नहीं बन सकती थीं।

एक बार एक ब्राह्मण अपने क्षेत्र में फसल की पैदावार के लिए मदद करने के लिए राजा रोमपद के पास गया, तो राजा ने उसकी बात पर ध्यापन नहीं दिया। अपने भक्तए की बेइज्जलती पर गुस्साफए इंद्रदेव ने बारिश नहीं होने दी, जिस वजह से सूखा पड़ गया। तब राजा ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करने के लिए बुलाया। यज्ञ के बाद भारी वर्षा हुई। जनता इतनी खुश हुई कि अंगदेश में जश्नग का माहौल बन गया। तभी वर्षिणी और रोमपद ने अपनी गोद ली हुई बेटी शां‍ता का हाथ ऋंग ऋषि को देने का फैसला किया।

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ मंद दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया।

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन............दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्होंतने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि 'हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।' जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि 'वो उनकी पुत्री शांता है।' दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ।

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे। जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्या  की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्यक में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से। ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।

ऋंग ऋषि - ऋंग ऋषि  विभण्डक ऋषि तथा अप्सरा उर्वशी के पुत्र व कश्यप ऋषि के पौत्र बताये जाते हैं। । तथा महर्षि कश्यप, ब्रम्हा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे, महर्षि कश्यप ने ब्रम्हा के पुत्र प्रजापति दक्ष की 17 कन्याओं से विवाह किया। ऋंग ऋषि  का विवाह अंगदेश के राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री शान्ता से सम्पन्न हुआ जो कि वास्तव में दशरथ की पुत्री थीं।

अप्सरा उर्वशी - साहित्य और पुराण में उर्वशी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति रही है। स्वर्ग की इस अप्सरा की उत्पत्ति नारायण की जंघा से मानी जाती है। पद्मपुराण के अनुसार इनका जन्म कामदेव के उरु से हुआ था। श्रीमद्भागवत के अनुसार यह स्वर्ग की सर्वसुंदर अप्सरा थी।

67 - भगवान श्री राम - भगवान श्री राम के बाद कछवाहा (कछवाह) क्षत्रिय राजपूत राजवंश का इतिहास

इस प्रकार भगवान श्री राम का जन्म ब्रह्माजी की 67वीँ पिढी मेँ और ब्रह्माजी की 68वीँ पिढी मेँ लव व कुश का जन्म हुआ। भगवान श्री राम के दो पुत्र थे –:

         01 - लव

   02 - कुश

रामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्म स्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया है।

लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।

राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि माना जाता है।

रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने - की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई   देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं। राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा ।

68 – कुश - भगवान श्री राम के पुत्र लव, कुश हुये।

69 - अतिथि - कुश के पुत्र अतिथि हुये।

70 - वीरसेन (निषध) - वीरसेन जो कि निषध देश के एक राजा थे। भारशिव राजाओं में वीरसेन सबसे प्रसिद्ध राजा था। कुषाणों    को परास्त करके अश्वमेध यज्ञों का सम्पादन उसी ने किया था।  ध्रुवसंधि की 2 रानियाँ थीं। पहली पत्नी महारानी मनोरमा कलिंग के राजा वीरसेन की  पुत्री थी और वीरसेन (निषध)  के 1 पुत्री व 2 पुत्र हुए थे:-  1- मदनसेन (मदनादित्य) – (निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र) सुकेत के 22 वेँ शासक राजा मदनसेन ने बल्ह के लोहारा नामक स्थान मे सुकेत की राजधानी स्थापित की। राजा मदनसेन के पुत्र हुए कमसेन जिनके नाम पर कामाख्या नगरी का नाम कामावती पुरी रखा गया।  2 - राजा नल - (निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र) निषध देश पुराणानुसार एक देश का प्राचीन नाम जो विन्ध्याचल पर्वत पर स्थित था।  3 - मनोरमा (पुत्री) - अयोध्या में भगवान राम से कुछ पीढ़ियों बाद ध्रुवसंधि नामक राजा हुए । उनकी दो स्त्रियां थीं । पट्टमहिषी थी कलिंगराज वीरसेन की पुत्री मनोरमा और छोटी रानी थी उज्जयिनी नरेश युधाजित की पुत्री लीलावती । मनोरमा के पुत्र हुए सुदर्शन और लीलावती के शत्रुजित ।

माठर वंश के बाद कलिंग में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया था। माठर वंश के बाद 500 ई० में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया।  वर्तमान उड़ीसा राज्य को प्राचीन काल से मध्यकाल तक ओडिशा राज्य , कलिंग, उत्कल, उत्करात, ओड्र, ओद्र, ओड्रदेश, ओड, ओड्रराष्ट्र, त्रिकलिंग, दक्षिण कोशल, कंगोद, तोषाली, छेदि तथा मत्स आदि भी नामों से जाना जाता था।

नल वंश के दौरान भगवान विष्णु को अधिक पूजा जाता था इसलिए नल वंश के राजा व विष्णुपूजक स्कन्दवर्मन ने ओडिशा में पोडागोड़ा स्थान पर विष्णुविहार का निर्माण करवाया। नल वंश के बाद विग्रह वंश, मुदगल वंश, शैलोद्भव वंश और भौमकर वंश ने कलिंग पर राज्य किया।


71 - राजा नल - (राजा वीरसेन का पुत्र)

नल-दमयंती - विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री दमयंती और निषध के राजा वीरसेन के पुत्र नल राजा नल स्वयं इक्ष्वाकु वंशीय थे। महाकांतार (प्राचीन बस्तर) जिसे मौर्य काल में स्वतंत्र आटविक जनपद क्षेत्र कहा गया इसे समकालीन कतिपय ग्रंथों में महावन भी उल्लेखित किया गया है। महाकांतार (प्राचीन बस्तर) क्षेत्र में अनेक नाम नल से जुडे हुए हैं जैसे -: नलमपल्ली, नलगोंडा, नलवाड़, नलपावण्ड, नड़पल्ली, नीलवाया, नेलाकांकेर, नेलचेर, नेलसागर आदि।

महाकांतार (प्राचीन बस्तर) क्षेत्र पर नलवंश के राजा व्याघ्रराज (350-400 ई.) की सत्ता का उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशास्ति से मिलता है। व्याघ्रराज के बाद, व्याघ्रराज के पुत्र वाराहराज (400-440 ई.) महाकांतार क्षेत्र के राजा हुए। वाराहराज का शासनकाल वाकाटकों से जूझता हुआ ही गुजरा। राजा नरेन्द्र सेन ने उन्हें अपनी तलवार को म्यान में रखने के कम ही मौके दिये। वाकाटकों ने इसी दौरान नलों परएक बड़ी विजय हासिल करते हुए महाकांतार का कुछ क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिया था।वाराहराज के बाद, वाराहराज के पुत्र भवदत्त वर्मन (400-440 ई.) महाकांतार क्षेत्र के राजा हुए।

भवदत्त वर्मन के देहावसान के बाद के पश्चात उसका पुत्र अर्थपति भट्टारक (460-475 ई.) राजसिंहासन पर बैठे। अर्थपति की मृत्यु के पश्चात नलों को कडे संघर्ष से गुजरना पडा जिसकी कमान संभाली उनके भाई स्कंदवर्मन (475-500 ई.) नें जिसे विरासत में सियासत प्राप्त हुई थी। इस समय तक नलों की स्थिति क्षीण होने लगी थी जिसका लाभ उठाते हुए वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन नें पुन: महाकांतार क्षेत्र के बडे हिस्सों पर पाँव जमा लिये। नरेन्द्र सेन के पश्चात उसके पुत्र पृथ्वीषेण द्वितीय (460-480 ई.) नें भी नलों के साथ संघर्ष जारी रखा। अर्थपति भटटारक को नन्दिवर्धन छोडना पडा तथा वह नलों की पुरानी राजधानी पुष्करी लौट आया।


स्कंदवर्मन ने शक्ति संचय किया तथा तत्कालीन वाकाटक शासक पृथ्वीषेण द्वितीय को परास्त कर नल शासन में पुन: प्राण प्रतिष्ठा की। स्कंदवर्मन ने नष्ट पुष्करी नगर को पुन: बसाया  अल्पकाल में ही जो शक्ति व सामर्थ स्कन्दवर्मन नें एकत्रित कर लिया था उसने वाकाटकों के अस्तित्व को ही लगभग मिटा कर रख दिया । के बाद नल शासन व्यवस्था के आधीन कई माण्डलिक राजा थे।


उनके पुत्र पृथ्वीव्याघ्र (740-765 ई.) नें राज्य विस्तार करते हुए नेल्लोर क्षेत्र के तटीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था। यह उल्लेख मिलता है कि उन्होंनें अपने समय में अश्वमेध यज्ञ भी किया। पृथ्वीव्याघ्र के पश्चात के शासक कौन थे इस पर अभी इतिहास का मौन नहीं टूट सका है। नल-दम्यंति के पुत्र-पुत्री इन्द्रसेना व इन्द्रसेन  


ब्रह्माजी की 71वीँ पिढी मेँ जन्में राजा नल से इतिहास में प्रसिद्ध क्षत्रिय सूर्यवंशी राजपूतों की एक अलग शाखा चली जो कछवाह के नाम से विख्यात है ।

72 – ढोला - राजा नल-दमयंती का पुत्र ढोला जिसे इतिहास में साल्ह्कुमार के नाम से भी जाना जाता है ढोला का विवाह राजस्थान के जांगलू राज्य के पूंगल नामक ठिकाने की राजकुमारी मारवणी से हुआ था। जो राजस्थान के साहित्य में ढोला-मारू के नाम से प्रख्यात प्रेमगाथाओं के नायक है ।   

73 – लक्ष्मण - ढोला के लक्ष्मण नामक पुत्र हुआ।-

74 - भानु - लक्ष्मण के भानु नामक पुत्र हुआ।

75 – बज्रदामा - भानु के बज्रदामा नामक पुत्र हुआ, भानु के पुत्र परम प्रतापी महाराजा धिराज बज्र्दामा हुवा जिस ने खोई हुई कछवाह राज्यलक्ष्मी का पुनः उद्धारकर ग्वालियर दुर्ग प्रतिहारों से पुनः जित लिया।      

76 - मंगल राज - बज्रदामा के मंगल राज नामक पुत्र हुआ। बज्र्दामा के पुत्र मंगल राज हुवा जिसने पंजाब के मैदान में महमूद गजनवी के विरुद्ध उतरी भारत के राजाओं के संघ के साथ युद्ध कर अपनी वीरता प्रदर्शित की थी। मंगल राज के मंगल राज के 2 पुत्र हु

01 - किर्तिराज (बड़ा पुत्र) - किर्तिराज को ग्वालियर का राज्य मिला था।

02 - सुमित्र (छोटा पुत्र) - सुमित्र को नरवर का राज्य मिला था।

नरवार किला, शिवपुरी के बाहरी इलाके में शहर से 42 किमी. की दूरी पर स्थित है जो काली नदी के पूर्व में स्थित है। नरवर शहर का ऐतिहासिक महत्व भी है और इसे 12 वीं सदी तक नालापुरा के नाम से जाना जाता था। इस महल का नाम राजा नल के नाम पर रखा गया है जिनके और दमयंती की प्रेमगाथाएं महाकाव्य महाभारत में पढ़ने को मिलती हैं। इस नरवर राज्य को ‘निषाद राज्य भी कहते थे, जहां राजा वीरसेन का शासन था। उनके ही पुत्र का नाम राजा नल था। राजा नल का विवाह दमयंती से हुआ था। बाद में चौपड़ के खेल में राजा नल ने अपनी सत्ता को ही दांव पर लगा दिया था और सब कुछ हार गए। इसके बाद उन्हें अपना राज्य छोड़कर निषाद देश से जाना पड़ा था।

12वीं शताब्दी के बाद नरवर पर क्रमश: कछवाहा, परिहार और तोमर राजपूतों का अधिकार रहा, जिसके बाद 16वीं शताब्दी में मुग़लों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। मानसिंह तोमर (1486-1516 ई.) और मृगनयनी की प्रसिद्ध प्रेम कथा से नरवर का सम्बन्ध बताया जाता है।

77 - सुमित्र - मंगल राज का छोटा पुत्र सुमित्र था।

78 - ईशदेव - सुमित्र के ईशदेव नामक पुत्र हुआ।

79 - सोढदेव - ईशदेव के सोढदेव नामक पुत्र हुआ।

सोढ़देव चरित्र से कुछ पंक्तियाँ -----

कार्तिक कृष्ण जान तिथि नवमी। एक सहस तेबीस विक्रमी।।

ईशदेव सुरलोक सिधाये। सोढ़देव के तिलक कराये।।

सो धर्मज्ञ सु पिता समाना। धीर वीर नृप परम सुजाना।।

जय सिंह तँवर ग्वालियर राया। ताके मन अस भ्रम छाया।।

सोढ़देव पहिं जाय बखाना। मामा राज्य दिया मोहि दाना।।

धीर वीर तुम अति बलधारी। छीन सकहु मम सत्ता सारी।।

दोहा -

अस विचार मोहि रैन दिन,कल न परहिं हे भ्रात।

जीत न पावहुँ तुमहिं मैं, यह जग जानी बात।।16।।

छंद चंद्रकला(सवैया)-

सुनि बानि अयानी गलानि भई चख पानि भरे कह सोढ़हिं यों।

पितु दान दियो सम्मान दियो वह आन भला मैं तोरहूँ क्यों।।

भल प्राण तजै नहिं आन तजूँ रवि आय उगै वरू पश्चिम सौं।

तज शंक निशंकहि भ्रात रहो यह बात अहै ध्रुव सत्यहिं त्यौं।।17।।

दोहा -

सोढ़देव के वचन सुनि, जयसिंह कह कर जोर।

सत्यनिष्ठ हैं आप तो, यह प्रतीति मन मोर।।18।।

चौपाई-

पर संतान आपके होई।

आप समान बली हो सोई।।

सो न लेई मम राज्य छिनाई।यह प्रतीति मोहि किमि हो भाई।।

सोढ़देव कह कहा तुम चाहहु।सोइ काज कर वचन निबावहु।।

कह जयसिंह सहित परिवारा।दूर बसहु सह अमला सारा।।

सोढ़देव निंदरावलि त्यागी।जाय बरेली बसे बड़भागी।।

निज बाहुबल राज्य बढ़ाया।प्रबल प्रताप सकल जग छाया।।

80 - दुल्हराय - सोढदेव के दुल्हराय नामक पुत्र हुआ। दुलहराय जी के 3 पुत्र हुये:-

   01 – कॉकिल देव

   02 - डेलण

   03 – वीकल देव

कांकलदेव खोह की गद्दी पर बैठे कॉकिलदेव जी ने मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया

वीकलदेव जी ने चम्बल नदी के बीहडो से होते हुये मध्य प्रदेश के जिला भिण्ड में इंदुर्खी राज्य में अपनी राजधानी बनाई जो वहा का क्षेत्र जिला भिण्ड में कछवाहघार के नाम से जाना जाता है ।

भारत में कछवाहों की रियासते लवर, मैहर और तलचर भारत में रही है। कछवाहों की सबसे विशाल रियास (राज्य) जयपुर रही है। जयपुर कछवाहों के कबीले के रूप में प्रमुख माना जाता है।

   कछवाहा (कुशवाहा) वंश

कछवाहा (कुशवाहा) वंश सूर्यवंशी राजपूतों की एक शाखा है। कुल मिलाकर बासठ वंशों के प्रमाण ग्रन्थों में मिलते हैं। ग्रन्थों के अनुसार-

             चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

              भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण

(दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है।  इन्हीं में से एक क्षत्रिय शाखा कछवाहा (कुशवाहा) निकली। यह उत्तर भारत के बहुत से क्षेत्रों में फ़ैली। "कछवाहा मौर्य वंश की एक शाखा है")

कछवाह वंश अयोध्या राज्य के सूर्यवंशी राजाओ की एक शाखा है।

भगवान श्री रामचन्द्र जी के ज्येष्ठ पुत्र कुश से इस वंश (शाखा) का विस्तार हुआ है ।

अयोध्या राज्य पर कुशवाह वंश का शासन रहा है। अयोध्या राज्य वंश में ''इक्ष्वाकु'' दानी ''हरिशचन्द्र'',

''सगर'' (इनके नाम से सगर द्वीप जहाँ गंगासागर तीर्थ स्थल है) पितृ भक्त ''भागीरथ '', गौ भक्त ''दिलीप '', ''रघु'' सम्राट ''दशरथ'', मर्यादा पुरूषोत्तम भगबान "रामचंद्र" एवं उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराज ''कुश'' के वंशधर कुशवाहे कहलाये।

बिहार में कछवाहा वंश का इतिहास - महाराजा कुश के वंशजो की एक शाखा अयोध्या से चलकर साकेत आयी और साकेत से, बिहार मे सोन नदी के किनारे रोहिताशगढ़ (बिहार) आकर वहा रोहताशगढ किला बनाया।  

मध्यप्रदेश में कछवाहा वंश का इतिहास -

महाराजा कुश के वंशजो की एक शाखा फिर बिहार के रोहताशगढ से चलकर पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये। कछवाह वंशज के एक राजकुमार तोरुमार नरवर (तोरनमार) पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये।

नरवर (ग्वालियर ) के पास का प्रदेश कच्छप प्रदेश कहलाता था। और वहा आकर कछवाह वंशज के एक राजकुमार तोरुमार ने एक नागवंशी राजा देवनाग को पराजित कर इस क्षेत्र को अपने कब्जे में किया। क्योकि यहा पर कच्छप नामक नागवंशीय क्षत्रियो की शाखा का राज्य था । (महाभारत आदि पर्व श्लोक 71) नागो का राज्य ग्वालियर के आसपास था । इन नागो की राजधानी पद्मावती थी, पदमावती राज्य पर अपना अधिकार करके सिहोनिया गाँव को अपनी सर्वप्रथम राजधानी बनायी थी । यह मध्यप्रदेश मे जिला मुरैना मे पड़ता है।

आगे चलकर यह क्षेत्र राजा नल के कारण नरवर क्षेत्र कहलाया। कुशवाह राजाओं में राजा ''नल'' सुविख्यात रहा है, जिसकी वीरगाथा ढोला गायन के मार्फत सुनते आये हैं। समाज का अतीत अत्यधिक वैभवशाली रहा है।

राजा नल-  दमयंती का पुत्र ढोला जिसे इतिहास में साल्ह्कुमार के नाम से भी जाना जाता है का विवाह राजस्थान के जांगलू राज्य के पूंगल नामक ठिकाने की राजकुमारी मारवणी से हुआ था जो राजस्थान के साहित्य में ढोला-मारू के नाम से प्रख्यात प्रेमगाथाओं के नायक है। इसी ढोला के पुत्र लक्ष्मण का पुत्र बज्रदामा बड़ा प्रतापी व वीर शासक हुआ जिसने ग्वालियर पर अधिकार कर एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। इसी क्षेत्र मे कछवाहो के वंशज महाराजा सूर्यसेन ने सन् 750 ई. मे ग्वालियर का किला बनवाया था।

अत: स्पष्ट है कि कछवाहो के पूर्वजो ने आकर कच्छपो से युद्द कर उन्हे हराया और इस क्षेत्र को अपने कब्जे में किया । इसी कारण ये कच्छप, कच्छपघात या कच्छपहा कहलाने लगे और यही शब्द बिगडकर आगे चलकर कछवाह कहलाने लगा । यहां वर्षो तक कुशवाह का शासन रहा।

नरवर (ग्वालियर) राज्य के राजा ईशदेव जी थे और राजा ईशदेव जी के पुत्र सोढदेव के पुत्र, दुल्हराय जी नरवर (ग्वालियर) राज्य के अंतिम राजा थे।


4 राजस्थान में कुशवाहा (कछवाहा) वंश का इतिहास[संपादित करें]

कछवाहों वंश राजस्थान के इतिहास में बारहवीं शताब्दी से प्रकट हुआ था। सोढदेव का बेटा दुल्हराय का विवाह राजस्थान में मोरागढ़ के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री से हुआ था। रालण सिंह चौहान के राज्य के पड़ौसी दौसा के बड़गुजर राजपूतों ने मोरागढ़ राज्य के पचास गांव अपने अधिकार में कर लिए थे। अत: उन्हें मुक्त कराने के लिए रालण सिंह चौहान ने दुल्हेराय को सहायता हेतु बुलाया और दोनों की संयुक्त सेना ने दौसा पर आक्रमण कर बड़गुजर शासकों को मार भगाया। दौसा विजय के बाद दौसा का राज्य दुल्हेराय के पास रहा।

दौसा का राज्य मिलने के बाद दुल्हेराय ने अपने पिता सोढदेव को नरवर से दौसा बुलालिया और अपने पिता सोढदेव जी को विधिवत दौसा का राज्याभिषेक कर दिया गया। इस प्रकार राजस्थान में दुल्हेराय जी ने सर्वप्रथम दौसा में कछवाह राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी सर्वप्रथम दौसा स्थापित की। राजस्थान में कछवाह साम्राज्य की नींव डालने के बाद दुल्हेराय जी ने भांडारेज, मांच, गेटोर, झोटवाड़ा आदि स्थान जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया।

दौसा से इन्होने ढूंढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था, मॉच (या मॉची) गॉव के पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहरायजी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया । कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवीश्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा।  इस वंश के प्रारम्भिक शासकों में दुल्हराय बडे़ प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। सोढदेवकी मृत्यु व दुल्हेराय के गद्दी पर बैठने की तिथि माघ शुक्ला सप्तमी (वि.संवत ११५४) है I अधिकतर इतिहासकार दुल्हेराय जी का राजस्थान में शासन काल ११५४ से ११८४ वि०सं० के मध्य मानते है I

क्षत्रियों के प्रसिद्ध ३६ राजवंशों में कछवाहा(कुशवाहा) वंश के कश्मीर, राजपुताने (राजस्थान) में अलवर, जयपुर, मध्यप्रदेश में ग्वालियर,मईहर, अमेठी, दार्कोटी आदि राज्य थे। इनके अलावा राज्य, उडीसा मे मोरमंज, ढेकनाल, नीलगिरी, बऊद और महिया राज्य कछवाहो के थे। कई राज्य और एक गांव से लेकर पाँच-पाँच सौ ग्राम समुह तक के ठिकानें , जागीरे और जमींदारीयां थी राजपूताने में कछवाहो की१२ (12) कोटडीया और ५३ (53) तडे प्रसिद्ध थीं।

आमेर के बाद कछवाहो ने जयपुर शहर बसाया, जयपुर शहर से ७ किमी की दूरी पर कछवाहो का किला आमेर बना है और जयपुर शहर से ३२ कि.मी की दूरी पर ऑधी जाने वाली रोड पर जमवारामगढ है। जमवारामगढ से 5 किमी की दूरी पर कछवाहो की कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बना है । इस मंदिर के अंदर तीनमू र्तियॉ विराजमान है, पहली मूर्ति गाय के बछडे के रूप में विराजमान है, दूसरी मूर्ति श्री जमवाय माता जी की है, और तीसरी मूर्ति बुडवाय माता जी की है।  श्री जमवाय माता जी के बारे में कहा गया है, कि ये सतयुग में मंगलाय, त्रेता में हडवाय, द्वापर में बुडवाय तथा कलियुग में जमवाय माता जी के नाम से देवी की पूजा - अर्चना होती आ रही है।


(1)  जमवाय माता जी                            (2) श्री भोमिया जी महाराज


कछवाहों की उत्पति 

वर्तमान कछवाह या कुशवाहा सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख खाप है । राजपूतों की इस खाप की उत्पति कहाँ से और कैसे हुई ? मान्यता की यह कुल राम के पुत्र कुश से उत्पन्न हौवा। परन्तु शोध खोज से मालूम पडता है की किसी भी प्राचीन शिलालेख या साहित्य में कछवाहा शब्द अंकित नहीं किया गया है। ग्वालियर (कच्छपघाट महिपालदेव का ग्वालियर का सास-बहू मंदिर का शिलालेख वि.स. 1150 ) दूबकुण्ड (कच्छपघाट महाराजाधिराज विक्रम सिंह का दूबकुंड शिलालेख वि.स. 1145) आदि संस्कृत शिलालेखों या दानपत्रों मे इसके लिए कच्छपघात,कच्छपा कच्छपारी आदि नाम अंकित मिलते हैं जी बारहवीं शताब्दी के हैं। इससे पूर्व किसी भी शिलालेख या साहित्य में इस खाप के लिए कुछ भी लिखित रुप से प्राप्य नहीं है । ग्वालियर ओर दूबकुंड पर शासन करने वाली इस जाति के वंशधर ही राजस्थान मे आए और दौसा तथा आमेर आदि क्षेत्र मे अधिकार कर यहाँ के शासक बन बैठे और उन्ही के वंशज कछवाहा, कछावा कहलाने लगे। इससे यह तो सिद्ध है की ग्वालियर के कच्छपघातक ही अपभ्रश राजस्थानी भाषा मे कछवाह या कछावा हुआ।

“कछवाह” शब्द का उल्लेख राजस्थान साहित्य में देखें तो 13 शती के विसलदे रासो (गोड़ चढ़या गज केशरी कचवाह कहूँ निरवाण, कोई सोलंकी वाखला कोई चावड़ा कोई चहुवाण) में मिलता है। 14 वीं शती हम्मीर महाकाव्यम ‘कुत्सवाह’ शब्द का प्रयोग कछवाहों के लिए हुआ है। (सोsन्यदा प्रमदानेत्र पावने योवनश्रित। परिणेतु सुता कत्सवाहस्याssभ्रपूरीमगात: 1182 ॥ इसके बाद के साहित्य मे प्रर्थ्वीराज रासो (13 वीं शती से 16 वीं शती) क्यामखाँ रासो (1691 वि. कछवाहिनजब यां कहयो ऐसों कौन मूछारर, जो इन पटीयन माहीं ते हमको देत निकार॥767॥ कयामखाँ रासो पृ.65) नैणसी री ख्यात (रामचन्द्र रा लव नै कुस हुया,....कुस रा कछवाहा हुआ (नैणसी री ख्यात भाग 1 पृ.293)

कछवाहों की खापें निम्न है।

देलणोत ,झामावत ,घेलणोत , राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात , बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधर का,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता, दशरथपोता,बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका, शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता।

कछवाहा राजपूतों के उप वंश
कुलों का परिचय और परिभाषा राजपूत एक शब्द है जिसका उपयोग राजसी क्षत्रियों के लिए किया जाता है। यजुर्वेद में इसका उल्लेख है, जो सबसे पुराना है। सूर्यवंशी या सूर्य राजवंश ने एक नियम का पालन किया क्योंकि मनु वैवस्वत को प्रिमोगिनियर के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अनुसार यदि राजा योग्य हो तो राजा का सबसे बड़ा पुरुष वंश ही सफल हो सकता है। कौन योग्य है और कौन पुजारियों द्वारा न्याय नहीं किया गया। इस नियम के अनुसार, एक राजा के सबसे बड़े पुरुष वंश को उसके बाद सिंहासन दिया गया था। लेकिन छोटे भाइयों की उपेक्षा नहीं की गई, उन्हें पूरे राज्य से भाग दिया गया लेकिन इस शर्त पर कि वे मनु के राज्य और शासन के प्रति वफादार रहेंगे। सबसे अच्छा उदाहरण भरत का है जो राम के छोटे भाई थे। यद्यपि उन्हें अगले राजा के रूप में नामित किया गया था, उन्होंने इसे कभी स्वीकार नहीं किया और अपने बड़े भाई राम के आदेश पर 14 वर्षों तक अयोध्या को शासन के रूप में शासन किया। उन्होंने कभी राज्य का लाभ नहीं उठाया। उन्होंने अयोध्या शहर के बाहर झोपड़ी में एक साधारण जीवन व्यतीत किया। कछवाहों ने उसी नियम का पालन किया। तदनुसार राजा के छोटे भाइयों को भूमि के कुछ हिस्सों को बाद में थिकानास के रूप में जाना जाता था। इस नियम के अनुसार राजा के कबीले को कभी नहीं गिना जाता था। लेकिन उसके युवा भाइयों के कबीले को गिना जाता था। राजा भगवंत दास के समय ही उनकी संतान को एक अलग नाम मिला था। हालाँकि कुछ समय में प्राइमोगिनरी के नियम की उपेक्षा की गई थी। मुगल साम्राज्य की स्थापना के बाद, यह सम्राट पर था कि वह किसी को पहचानता है या नहीं। इसके कई उदाहरण थे। वही कछवाहों का शासन था, राजा उसके अधीन किसी भी प्रमुख को पहचान सकता है, पहचान सकता है, बेदखल कर सकता है। मान्यता के बिना, राज्य या प्रमुख की स्थापना नहीं की जा सकती थी। यहाँ उन व्यक्तियों और स्थानों की सूची दी गई है, जो अम्बर (शहर) में कछवाहा साम्राज्य के मूल संस्थापक दुल्हे राय से प्राप्त हुए थे।
1. Delnot- राजा दूल्हा राय के द्वितीय पुत्र "डेलन" के वंशज डेलानोत के रूप में जाने जाते हैं। लाहौर उनका मुख्य थिकाना था।
2. Bikalpota- राजा दुलाह राय के "बिकल" तृतीय पुत्र के वंशज, मप्र में भिंड के लिए, और जालौन यू.पी.
3. Jhamawat- "झमा" के वंशज अलघराई के पुत्र और राजा कांकिल देव के पोते। मेड और कुंडल उनके मुख्य थिकानास थे।
4. Ghelnot- राजा कंकिल देव के पुत्र घलान के वंशज। ग्वालियर, रामपुरा और उड़ीसा के लिए
5. Ralnot- नैंसी के समय मनोहरपुर में राजा कांकिल देव के पुत्र रतन के वंशज।
6. Delanpota- "देलन" के वंशज राजा कांकिल देव के चौथे पुत्र। ग्वालियर।
7. Jeetalpota - राजा मलयाली देव के पुत्र जीतल के वंशज।
8. तालचर का कछवाहा- बगहा, भोला के वंशज, और राजा बिजल देव के नरो पुत्र। उड़ीसा के कटक में और नया राज्य मिला।
9. अलॉट (जोगी कछवा)- राजा कुंतल देव के पुत्र एलन के वंशज।
10. प्रधान कछवा- राजा पजवान देव के पुत्र भिनवासी और लखनसी के वंशज प्रधान के रूप में जाने जाते हैं।
11. Sawantpota- राजा राजदेव के पुत्र संवत के वंशज।
12. Khinvawat- पाल के पुत्र और राजा राजदेव के पोते खिन्राज के वंशज।
13. Siyapota- राजा सिहदेव के पुत्र "सिहा" के वंशज।
14. Bikasipota- राजा राजदेव के पुत्र "बीकसी" के वंशज, उनके पास कई "खान्स" (उप उप-समूह) हैं
15. Pilawat- "पिला" के वंशज, राजा राजदेव के पुत्र।

16. Bhojrajpota (Radharaka) -  "भोजराज" के वंशज, राजा राजदेव के पुत्र को भोजराजपोटा के नाम से जाना जाता है, राधारका उनके "खानप" में से एक हैं। बीकापोटा, गढ़ का, संवतसिपोटा अन्य खानप्स (शाखाएँ) हैं

17. Bikampota - विक्रमसी के वंशज "राजा राजदेव के पुत्र।

18. Khinvrajpota -  राजा किल्हन देव के पुत्र "खिन्नराज" के वंशज।

19. Dasharathpota - "दशरथ" के वंशज राजा राजदेव के बड़े पोते।

20. Badhwada - "कुथवा" के वंशज, राजा कुंतल देव के पोते।

21. Jasarapota- राजा किशन देव के पुत्र “जसराज” के वंशज।

22. हम्मीरदे का -  राजा कुंतल देव के पुत्र "हम्मीर देव" के वंशज।

23. Mehpani -"नपा" के वंशज या राजा कुंतल देव के पुत्र मेहपा।

24. Bhakharot -"भखार" के वंशज भदासी के पुत्र और राजा कुंतल देव के पोते।

25. Sarawanpota- कुंतल देव के पुत्र "सरवन" के वंशज।

26. Napawat- राजा कुंतल देव के पुत्र "जीतमल" के वंशज। जैतामल के वंशजों में से थे।

27. तुंग्या कछवा- राजा कुंतल देव के पुत्र तुंग्या के वंशज।

28. Sujawat -राजा कुंतल देव के पुत्र "सुजा" के वंशज।

29. Dheerawat -"धीरो" के वंशज खिन्नराज के पुत्र और राजा कुंतल देव के पोते।

30. Ugrawat -"उग्रा" के वंशज, जो राजा जुनसी देव के पुत्र जसकरन के वंशज थे।

31. Someshwarpota - राजा किशन देव के पुत्र "सोमेश्वर" के वंशज उनके खानप। रणघट, चित्तोरिका, आदि अन्य खांप हैं।

32. Singhade - राजा सिंहासन देव के चौथे पुत्र "सिंहा" के वंशज।

33. Kumbhani - "कुंभ" जी के वंशज राजा जुनसी देव के तीसरे पुत्र। जयपुर की बारा कोठरी में से एक। 34. Naruka "नरू" के पुत्र, मरज के पुत्र और नरसिंह के पोते। नरसिंह, राजा उदयिकरन के दूसरे पुत्र थे। दासावत, लालवत, रतनवत उनके खान हैं।

35. Melka- सावंत सिंह के पुत्र मेलाक के वंशज, जो राव बरसिंह देव के पुत्र थे।)

36. शेखावत- "राव शेखा" जी के वंशज। शेखा जी राव मोकल जी के पुत्र थे, और राव बालो जी के पोते, जो अंबर के राजा उदीकरन के तीसरे पुत्र थे। तकनेट, लडखानी, रज्जिका, भोजराजिका, गिरधरजीका आदि उनके खाप हैं।

37. Balapota- "खिंवराज", "गोविंद दास" और "नाथ" बालाजी के पुत्रों के वंशज। उन्होंने शेखाजी के साथ संघर्ष के दौरान राजा चंद्रसेन का पक्ष लिया।

38. Mokawat- बाला जी के पुत्र "मोका" के वंशज।
39. Bhilawat- बाला जी के पुत्र "भीला" के वंशज।
40. Binjhani- बाला जी के पुत्र "बिंझा" के वंशज।
41. संगनी- बाला जी के पुत्र "संगा" के वंशज।
42 Jeetawat- "जीत" के वंशज डूंगर सिंह के बेटे और बाला जी के पोते हैं।
43 Sheobramhpota- "शिवब्रम्ह" के वंशज, राजा उदयिकरन के चौथे पुत्र। बारा कोठरी में से एक।
44 Patalpota- राजा उदितरन के पांचवें पुत्र "पाताल" के वंशज।
45 Peethalpota- राजा उदितरन के छठे पुत्र "पीथल" के वंशज।
46. ​​सामोद का कछवा- राजा नादिकरन के सातवें पुत्र "नपा" के वंशज।
47. Banveerpota- अम्बर के राजा बनवीर के छोटे पुत्रों के वंशज। बारा कोथ्रिस में से एक। बिरमपोटा, मेंगलपोटा, हरजिका उनके खाप हैं।
48. Kumbhawat- अम्बर के राजा चंद्रसेन के पुत्र "कुंभ" के वंशज।
49. भीमपोटा (नरवर कछवा)- वंशज राजा भीम, उनके पुत्र असकरन को अकबर बादशाह द्वारा नरवर का जागीर दिया गया था।
50. Pichyanot(Pichanot)- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "पाच्यन" के वंशज। बारा कोथ्रिस का एक बेटा।
51. Khangarot- राव "खंगार" के वंशज, जगमाल के पुत्र, जो राजा पृथ्वीराज के पुत्र थे। बारा कोठरी में से एक।
52. Ramchandrot- जगमाल के पुत्र "रामचंद्र" के वंशज। रामचंद्र राजा भगवंत दास के साथ कश्मीर गए और वहीं बस गए। उसके बाद वे डोगरा कहलाए।
53. Surtanot-राजा पृथ्वीराज के पुत्र "सूरन" के वंशज। बारा कोथ्रिस का एक पुत्र।
54. Chaturbhujot-राजा पृथ्वीराज के पुत्र "चतुर्भुज" के वंशज। बैरा कोठरीस के एक।
55 Balbhadrot- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "बलभद्र" के वंशज। बाड़ा कोठरी का एक बेटा।
56. Pratappota- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "प्रताप" के वंशज।
57. Ramsinghot- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "रामसिंह" के वंशज।
58. Bhikawat- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "भीका" के वंशज।
59 Nathawat- गोपाल के पुत्र "नाथ" के वंशज और राजा पृथ्वीराज के पोते। बारा कोठरीस के एक।
60. Baghawat- "बाघा" के वंशज गोपाल के पुत्र और राजा पृथ्वीराज के पोते।
61 Devkarnot- गोपाल के पुत्र "देवकरन" के वंशज और राजा पृथ्वीराज के पोते।
62. Kalyanot- राजा पृथ्वीराज के "कल्याण" पुत्र के वंशज। बारा कोठरी के एक।
63. Saindasot- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "संतदास" के वंशज।
64 Rupsinghot- राजा पृथ्वीराज के पुत्र "रूप सिंह" के वंशज)।
65. Puranmalot- अम्बर के राजा "पूरनमल" के वंशज) ।बाड़ा कोठरीस का।
66. Bankawat -"भगवान दास" राजा भारमल के पुत्र और राजा भगवंत दास के छोटे भाई के वंशज हैं।
67. राजावत - राजा भगवंत दास के वंशज। अन्य उप कुलों ने भी राजावत को उपनाम के रूप में उपयोग किया। कीर्तिसिंघोत, दुर्जनसिंह, जुझारसिंहोत आदि उनके खान हैं।
68.Jagannathot- राजा भारमल के पुत्र "जगन्नाथ" के वंशज।
69 Salhedipota- राजा भारमल के पुत्र "सलहेड़ी" के वंशज।
70.Sadoolpota- राजा भारमल के पुत्र "सरदूल" के वंशज।
71 Sundardasot- राजा भारमल के पुत्र "सुंदरदास" के वंशज।

पिचयानोत का इतिहास  

पिचानोत राजपूत सूर्यवंशी या सूर्य राजवंश से निकले है अर्थात पिचानोत राजपूतो की शाखा सूर्य राजवंश है सबसे पहले सूर्यवंशी या सूर्य राजवंश कि शाखा कुशवाह है सूर्यवंशी या सूर्य राजवंश कि दस शाखायें निम्न हैं। - १.कछवाह (कुशवाह) २.राठौड ३.बडगूजर ४.सिकरवार ५.सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०.जुनने

कछवाह (कुशवाह) शाखा ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी के बेटे कुश से निकली हैं। कछवाह (कुशवाह) शाखा आगे चलकर अनके खापों में विभाजित हो गयी थी कछवाह (कुशवाह) वंश कि खाप निम्न हैं। - देलणोत ,झामावत ,घेलणोत , राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात , बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधर का,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता, दशरथपोता,बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका, शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता।

जैसे की मेने पहले सभी खापों का जन्म किस - किस राजाओ से हुआ हैं। ये बताया था अब में बताने वाला हु की पिचानोत खाप का जन्म कैसे और किस राज वंश में हुआ था और कैसे पिचानोत खाप बनी हैं। सूर्यवंशी या सूर्य राजवंश कि कुशवाह शाखा के राजा पृथ्वीराज का शासन था और इसके बाद में राजा पृथ्वीराज के बेटे राजा पाच्यन का शासन चला था। राजा पाच्यन के वंशज आगे चलकर पिचानोत बने। राजा पृथ्वीराज के पुत्र "पाच्यन" के वंशज। बारा कोठरी में से एक। पाच्यन के वंशज आगे चलकर पिचानोत बने.

वंश - सूर्यवंशी सूर्य या राजवंश राजपूतों

                       शाखा - कुशवाह

                       खाप – पिचानोत

                       ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान)

(ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी, कुलदेवी श्री जमवाय माता, लोक देवता श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज)

ठिकाना कैरवाड़ा  का इतिहास

वि.स. १६ (16) में सन १६३५ (1635) में तीन चौकी कैरवाड़ा, खारेडा, खेड़ली थी उस समय मुसलमानो से लड़ाई करते हुए पिचानोत राजपूतो की कैरवाड़ा, खेड़ली चौकी पूरी तरह से समाप्त हो गई और केवल खारेडा चौकी जीवित रही थी तब शहर सामरा नरेश जो की अभी गंगापुर (राजस्थान) में पड़ता हैं। सामरा नरेश के राजपरिवार से ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) में मुसलमानो से आक्रमण करने के लिए भेजा गया इस प्रकार से पिचानोत राजपूत सामरा नरेश के राजपरिवार से थे.

उसके बाद ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) से पांच बेटो को पांच ठिकानों में बसाया गया और वह से मुसलमानो को भगाने का काम किया।

उन पांच बेटो के पांच ठिकाने ये हैं। (१) ठिकाना - ढिगावड़ा, अलवर (२) ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर (३) ठिकाना - खेड़ली पिचानोत, अलवर (४) ठिकाना -धोलापलाश, अलवर   (५ ) ठिकाना - रूपवास, अलवर

ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के पूर्वजो का निवास ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) से पहले पिचानोत राजपूत सामरा नरेश के राजपरिवार से थे जो अभी शहर सामरा गंगापुर (राजस्थान) में पड़ता हैं।

वि.स. १६ (16) में ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने के लिए प्रदान की गयी ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने लगे

ठिकाना कैरवाड़ा पहले से पिचानोत राजपूत परिवार का था परन्तु मुसलमानो से लड़ाई के दौरान ठिकाना कैरवाड़ा और भी ठिकाने पूरी तरह समाप्त हो गये तो ठिकाना कैरवाड़ा को दोबारा से बसाया गया हैं। ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर में १२ (12) घोड़े की जागीर दी गयी थी

ठाकुर साहब शिशराम सिंह

                                                                              ठाकुर साहब राज सिंह

ठाकुर साहब  राज सिंह के बेटे    1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह , 2. ठाकुर साहब  गुमान सिंह ,  3. ठाकुर साहब  धन सिंह , 4. ठाकुर साहब  साहब सिंह,   5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह

1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह -  ठाकुर साहब जोरावर सिंह का  वंश आगे नही चला.

2. ठाकुर साहब  गुमान सिंह -    ठाकुर साहब  गुमान सिंह के चार लड़के जिनमे देवी सिंह , राम सिंह , अखे सिंह , पंध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

अखे सिंह जी के चार लड़के जिनमे गोविन्द सिंह, सावंत सिंह, विसल सिंह, सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब  गुमान सिंह के पोते (अखे सिंह के बेटे ) सावंत सिंह के चार बेटे जिनमे बख्तावर सिंह , पिरथी सिंह, मान सिंह,और मोती सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

3.  ठाकुर साहब  धन सिंह -    ठाकुर साहब  धन सिंह का  वंश आगे नही चला.

4. ठाकुर साहब  साहब सिंह (बड़ी छतरी ओर सीला , भोमिया जी महाराज) -   ठाकुर साहब  साहब सिंह के दो  बेटे    धीरज सिंह,  मोहन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे जिनमे  गुलाब सिंह, संगराम सिंह, सोहल सिंह, भूप सिंह, सालिम सिंह, नवल सिंह , विसन सिंह  ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

1. (ठाकुर साहब  धीरज सिंह जी का वंश)

(ठाकुर साहब  धीरज सिंह के बेटे गुलाब सिंह जी का वंश)

ठाकुर साहब  धीरज सिंह के के बेटे गुलाब सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मगल सिंह, हाकिम सिंह, छीतर सिंह ( छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), रणजीत सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह जी का वंश)

गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह, सुल्तान सिंह, भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह), पध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

रणजीत सिंह के बेटे मोहन सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे जीवन सिंह, नादरा सिंह, भगवंत सिंह, हरेनाथ सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

मोहन सिंह के बेटे भगवंत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे मलजी, ननुलाल सिंह, किशन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुर्जन सिंह) जी का वंश)

रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब  भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह के बेटे रघुमान सिंह, बखतावार सिंह, इन्द्र सिंह, कानसिंह, अमृत सिंह, दोलत सिंह , सुजान सिंह , सहजमरण सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

सोहल सिंह के बेटे अमृत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे हाथी सिंह, फूल सिंह, चमन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

अमृत सिंह के बड़े बेटे हाथी सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे शिवप्रसाद सिंह, मेहताब सिंह सुगन सिंह, गोविन्द सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

अमृत सिंह के दूसरे नंबर वाले बेटे फूल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सुगन सिंह जी को गोद लिया और अपना वंश सुगन सिंह जी को गोद लेकर बढ़ाया।

हाथी सिंह के सबसे बड़े बेटे शिवप्रसाद सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और शिवप्रसाद सिंह ने एक बेटे को जन्म दिया उनका नाम भवर सिंह रखा गया। ठाकुर साहब भवर सिंह को ताजीम की उपाधि भी प्रदान की गयी थी।

ठाकुर साहब भवर सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे तेज सिंह, उमेद सिंह, केहरि सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब तेज सिंह के दो बेटे हैं किशन सिंह और दिनेश सिंह, ठाकुर साहब उमेद सिंह के दो बेटे हैं महेश सिंह और जितेंद्र सिंह, ठाकुर साहब केहरि सिंह के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह और पुरेन्द्र सिंह. अभी भी इनका वंश चल रहा है ये ठिकाना - कैरवाड़ा (पालवाड़ा) में निवास कर रहे है.


(ठाकुर साहब  धीरज सिंह के बेटे संग्राम सिंह जी का वंश)

ठाकुर साहब  धीरज सिंह के के बेटे संग्राम सिंह जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और पदम सिंह जी को गोद लिया, पदम सिंह जी किशन सिंह जी के बेटे थे उनको  संग्राम सिंह जी ने गोद लेकर अपना वंश आगे बढ़ाया। इस प्रकार पदम सिंह के नाम से संग्राम सिंह जी का वंश आगे चला।

(ठाकुर साहब  धीरज सिंह के बेटे भूप सिंह जी का वंश)

ठाकुर साहब  धीरज सिंह के के बेटे भूप सिंह जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया। भूप सिंह जी ने बेरीसाल सिंह और सुल्तान सिंह जी के बेटे चपरा सिंह जी को भी गोद लिया। अर्थात भूप सिंह जी ने बेरीसाल सिंह और चपरा सिंह जी को भी गोद लिया।

बेरीसाल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटे गंगा सिंह जी, शिवचरन सिंह, सादुल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

गंगा सिंह के बेटे गोवर्धन सिंह जी, जसवंत सिंह जी, बहादुर सिंह जी, उमराव सिंह जी, माधो सिंह जी, सम्पत सिंह जी ने जन्म लिया लेकिन गंगा सिंह जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु हो गयी उनमे से गोवर्धन सिंह जी, जसवंत सिंह जी, बहादुर सिंह जी ये तीन थे जिनकी आस्मिक मृत्यु हो गयी थी। गंगा सिंह जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु होने के कारण उन्होंने नाथू सिंह जी के बेटे गनपत सिंह जी को गोद लिया और जतन सिंह जी के बेटे और भूर सिंह जी के बेटे गिरवर सिंह जी को गोद लिया था।  इस प्रकार गंगा सिंह जी का वंश आगे चला।

शिवचरन सिंह जी के बेटे शिम्भू सिंह जी, माधो सिंह जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

शिम्भू सिंह जी के बेटे ग्यान सिंह जी, साधु सिंह जी, चाँद सिंह जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

माधो सिंह जी के बेटे सवाई सिंह, किशोर सिंह जी, भवानी सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।


चपरा सिंह जी के दो बेटो ने जन्म लिया उनमे से केसरी सिंह जी और बने सिंह जी थे इस प्रकार भूप सिंह जी का वंश चपरा सिंह ने बढ़ाया।

(ठाकुर साहब  धीरज सिंह के बेटे विसन सिंह जी का वंश)

ठाकुर साहब विसन सिंह जी के तीन बेटो ने जन्म लिया उनमे से जीवन सिंह जी, अर्जुन सिंह जी और चमन सिंह जी और अपना वंश आगे बढ़ाया।

जीवन सिंह जी ने गोद लिए केसरी सिंह जी और बने सिंह जी को और अपना वंश आगे बढ़ाया। केसरी सिंह जी और बने सिंह जी दोनों चंदर सिंह जी के बेटे थे जिने जीवन सिंह जी ने गोद ले लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

जीवन सिंह जी के बेटे केसरी सिंह जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा शिम्भू सिंह जी ने जन्म लिया।

अर्जुन सिंह जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा हनुत सिंह जी और चंदर सिंह जी जो की गोद गए जीवन सिंह जी के इस प्रकार इनका वंश चला।

2. (ठाकुर साहब मोहन  सिंह जी का वंश)

ठाकुर साहब  मोहन  सिंह जी के बेटे माधो सिंह और रघुनाथ सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया।


5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह  -    ठाकुर साहब संग्राम सिंह  के गोद आये सुर्जन सिंह , दुर्जन सिंह, और बक्स सिंह जी, ये तीन बेटे ठाकुर साहब संग्राम सिंह  ने गोद लिये थे

ठिकाना - कैरवाड़ा के समस्त पिचानोत राजपूत एक ही वंश का हिस्सा है। पिचानोत राजपूत परिवार में कुछ गोद भी आये हैं तो कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे है  सभी पिचानोत राजपूत ठिकाना - कैरवाड़ा के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के वंशज माने जाते है और वर्तमान में पिचानोत राजपूत परिवार की सख्या में बढ़ोतरी हुई तो पिचानोत राजपूतो ने अपना निवास ठिकाना कैरवाड़ा में पालवाड़ा, पुराना कैरवाड़ा, भोमिया जी के मंदिर के पास , हवेली और जोहड़ के पास बना लिया है।


भोमिया शब्द

यह इतिहास बहुत पुराना है परन्तु उतना ही सच है। यह इतिहास ठिकाना कैरवाड़ा अलवर, राजस्थान का है जोकि एक समय में राजपूताना के नाम से जाना जाता था। वर्तमान मै कैरवाड़ा गाव, मालाखेड़ा तहसील के अलवर जिले से 14 किलोमीटर की दूरी ओर जयपुर से 142 किलोमीटर और दिल्ली से 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हैं। अभी कैरवाड़ा (अलवर) दिल्ली एनसीआर में हैं भोमिया शब्द जागीरदारों के लिए उपयोग किया गया राजस्थान के अंदर सर्वाधिक भोमिया पाए जाते हैं जागीरदारों की मृत्यु के बाद पुरानी देवी देवताओं के दारा उनको देव योनी के अंदर प्रवेश लिया जाता है और उन्हें कलयुग का देवता के रूप में लोगों की समस्या को हल करने के लिए उनकी आत्मा को एक मूर्ति के रूप में इस धरती पर प्रतिष्ठित करते हैं राजस्थान के लगभग हर गांव में कई भोमियाजी है उनके अंदर दैविक शक्ति होती है जिससे वह लोगों की समस्याओं को हल करते हैं वे संपूर्ण देव न होकर अर्द्ध  देव कहलाते हैं


भौमिया जी का इतिहास 

जब राजपुताना राज्य में अनेक जगह मुस्लिम आक्रमण होने लगे तब से राज्य में ठिकानों का भी विस्तार होने लगा। उसी ठिकानों के विस्तार में एक ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) भी शामिल है. वर्तमान में ठिकाना धमरेड, राजगढ, अलवर जिले के राजस्थान राज्य में हैं।

ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के पूर्वजो का निवास ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) से पहले पिचानोत राजपूत सामरा नरेश के राजपरिवार से थे जो अभी शहर सामरा गंगापुर (राजस्थान) में पड़ता हैं।

ठिकाना धमरेड से वि.स. १६ (16) में ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी  को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में दी गयी। वर्तमान मै कैरवाड़ा गाव, मालाखेड़ा तहसील के अलवर जिले से 14 किलोमीटर की दूरी ओर जयपुर से 142 किलोमीटर और दिल्ली से 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हैं। अभी कैरवाड़ा (अलवर) दिल्ली एनसीआर में हैं ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी  ठिकाना कैरवाड़ा  अस्थाई रुप से रहने लगे, और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से  ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे।

उस समय उल्वर राज्य (जिसका वर्तमान नाम अलवर हैं) में मेवात सख्या में बढ़ोतरी होने लगी और समाज में परेशानी होने लगी तो उन जगहों में सुधार के लिए ठिकानों का विस्तार होने लगा जिससे समाज में लोगो की परेशानियो में सुधार होने लगा।

ठाकुर साहब राज सिंह के पाँच बेटे उनमे से बेटे जोरावर सिंह, गुमान सिंह, धन सिंह, साहब सिंह, संग्राम सिंह। साहब सिंह शांत स्वभाव के थे साहब सिंह  के घर में दो बेटे  धीरज सिंह,  मोहन सिंह ने जन्म लिए, मानव का जीवन नश्वर होता हैं जिसने धरती पर जन्म लिया हैं उसे एक दिन अपने शरीर को त्याग कर जाना पड़ता हैं और आत्मा हमेशा अमर रहती हैं। वो दिन भी पास आने लगा तो एक दिन साहब सिंह ने अपने दोनों बेटो को पास बुलाया और उनसे कहा की मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्मा ओ की तरह मिट्टी दे देना  

कुछ दिनों बाद फिर से मुस्लिम आक्रमण होने लगा तो राजपूतो और मुसलमानो में युद्ध शुरु हो गया इससे पहले भी अनेको बार मुसलमानो को युद्ध में हराया था

साहब सिंह इस बार के युद्ध में बहुत साहस से लड़े थे लेकिन उनको युद्ध में तलवार लग गयी और इस प्रकार से साहब सिंह जी युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए

पूर्वजो के अनुसार जो युद्ध लड़ा गया वो मुस्लिम शासक औरंगज़ेब के खिलाफ लड़ा गया था  हमने मुस्लिम शासक औरंगज़ेब का इतिहास देखा अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर (3 नवम्बर १६१८ – ३ मार्च १७०७ / 3 November 1618 – 3 March 1707 ) जिसे आमतौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर के नाम से जाना जाता था भारत पर राज्य करने वाला छठा मुग़ल शासक था।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि और सामान्यजनों का दाह संस्कार किया जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है जबकि आम व्यक्ति को इसलिए दाह किया जाता है क्योंकि यदि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति बची हो तो वह छूट जाए। जब यह बात पुरे परिवार, समाज में आग की तरह फेल गई और परिवार और समाज के लोगों ने साहब सिंह की अंतिम इच्छा को एक सिरे से खारिज कर दिया, और कहते हैं ना विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता है लेकिन आज ठिकाना कैरवाड़ा में समाज का फेसला भी अटल था साहब सिंह ने भगवान की भक्ति करते हुए अपना शरीर का त्याग कर दिया। हिन्दू धर्म के अनुसार साहब सिंह की अर्थी तैयार की गयी परिवार शोक में डूब गया. साहब सिंह की अर्थी को अग्नि देने के लिए समसान में ले आये और सभी समाज के लोगो ने साहब सिंह की बोली गयी बात को भी नजर अन्दाज कर दिया (मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्मा ओ की तरह मिट्टी दे देना, किसी को भी उनके द्वारा बोली बात नहीं मानने का दुष्परिणाम का पता नहीं था. साहब सिंह को अग्नि देने के लिए लकडिया लगा दी गयी और पुरे विधि विधान के साथ अग्नि उनके बड़े बेटे धीरज सिंह पास में आगये तभी एक चमत्कार घटना हो गयी वहा उपस्थित सभी समाज और दूसरे समाज से आए लोग डर गए. उस समय एक आकाशवाणी सुनकर वहा उपस्थित सभी समाज और दूसरे समाज से आए लोग हैरान रह गये।

सिला

आसमान से आवाज आने लगी मेने आप लोगो को मना किया था की मुझे अग्नि मत देना मुझे  मिट्टी में दपना देना और बहुत तेज हवाये चलने लगी आसमान से खून की बारिश होने लगे और उसके कुछ समय बाद फूलो की बारिश होने लगी वह पर  खड़े लोग कुछ सोचते और समझते तब तक आसमान से बहुत तेज आवाज के साथ एक सिला ( बहुत बड़ा पत्थर) आकर पड़ा ठाकुर साहब साहब सिंह का शव जमीन में अन्दर चला गया,  इस प्रकार से साहब सिंह का शव समस्त लकड़ियों के साथ धरती में समा गया और केवल ऊपर सिला नजर आने लगी उसके कुछ दिन बाद लोगो ने उस सिला की खुदाई शुरु करने लग गए परन्तु उनको सिला का अंतिम छोर नजर नहीं आया तो उन लोगो ने खुदाई रोक दिया

चमत्कार

Bhomiyaji Sahab Singh Pichanot ke two Tample 1- Kairwara (Alwar), 2- Hathras, Gantaghar and Railway station ke pas UP (India)

हाथरस (उत्तर प्रदेश) के पास कोई सेठ रहता था उसके कोई संतान नहीं थी तो भोमियाजी (साहब सिंह) ने उनको एक सपना दिया की कैरवाड़ा (राजपुताना ) में जाकर वहा राजपूतो का एक समसान घाट हैं वहा पर जाकर मेरा मन्दिर बन जायेगा तो आपके संतान हो जाएगी सेठ कैरवाड़ा में पहुंच गया और अपना सपना गाव के लोगों को बताने लगा और वहा सेठ ने भोमियाजी (साहब सिंह) का मंदिर तैयार करा दिया और उस सेठ को संतान हो गयी  और भोमिया जी की मान्यता सभी जगह फैलने लग गयी और दूर दूर से भक्त गण आने लगे तो राजपूत समाज ने वहा राजपूत समसान घाट बंद कर  दिया और उस जगह पर बगीचा बना दिया जब सभी की मनोकामना पूर्ण होने लगी तो धीरे - धीरे दिल्ली , हरियाणा , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश और भी राज्यों से  यहा लोग यहा आने लगे।

हर साल यहा श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का मेला लगता हैं जब फसल कट जाती है तब गर्मियों में पीपल पुणु का मेला भरता है मेले में अनेको दुकाने आती हैं साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी हजारो की सख्या में भक्त आते है श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं

कुछ लोग मन्नत मांगते हुए पेट के बल परिक्रमा लगाते हैं और शादी होने के बाद जोड़े से लोग श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का ढोक देने एवं प्रसाद चढ़ाने आते हैं साथ में कुछ लोग यहा अपने बच्चे का जडूला उतरवाने भी आते हैं

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की सेवा करने वाले मंदिर के साधु महंत भोलागिरी बताते है की भोमिया जी के प्रसाद रविवार और बृहस्पतिवार के साथ हर महीने की पुणु को चढ़ाया जाता हैं

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की दो छतरी हैं जो सबसे बड़ी छतरी तो ठाकुर साहब साहब सिंह की हैं और छोटी छतरी ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे गुलाब सिंह जी के बेटे छीतर सिंह जी की हैं.



वि.स. १६ से २०२० का इतिहास

वि.स. १६ (16) में सन १६३५ (1635) में तीन चौकी कैरवाड़ा, खारेडा, खेड़ली थी उस समय मुसलमानो से लड़ाई करते हुए पिचानोत राजपूतो की कैरवाड़ा, खेड़ली चौकी पूरी तरह से समाप्त हो गई और केवल खारेडा चौकी जीवित रही थी तब शहर सामरा नरेश जो की अभी गंगापुर (राजस्थान) में पड़ता हैं। सामरा नरेश के राजपरिवार से ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) में मुसलमानो से आक्रमण करने के लिए भेजा गया इस प्रकार से पिचानोत राजपूत सामरा नरेश के राजपरिवार से थे.

उसके बाद ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) से पांच बेटो को पांच ठिकानों में बसाया गया और वहा से मुसलमानो को भगाने का काम किया।

उन पांच बेटो के पांच ठिकाने ये हैं। (१) ठिकाना - ढिगावड़ा, अलवर (२) ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर (३) ठिकाना - खेड़ली पिचानोत, अलवर (४) ठिकाना -धोलापलाश, अलवर   (५ ) ठिकाना - रूपवास, अलवर

ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के पूर्वजो का निवास ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) से पहले पिचानोत राजपूत सामरा नरेश के राजपरिवार से थे जो अभी शहर सामरा गंगापुर (राजस्थान) में पड़ता हैं।

वि.स. १६ (16) में ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने के लिए प्रदान की गयी ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने लगे

ठिकाना कैरवाड़ा पहले से पिचानोत राजपूत परिवार का था परन्तु मुसलमानो से लड़ाई के दौरान ठिकाना कैरवाड़ा और भी ठिकाने पूरी तरह समाप्त हो गये तो ठिकाना कैरवाड़ा को दोबारा से बसाया गया हैं। ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर में १२ (12) घोड़े की जागीर दी गयी थी

ठाकुर साहब शिशराम सिंह

                                                                              ठाकुर साहब राज सिंह

ठाकुर साहब  राज सिंह के बेटे    1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह , 2. ठाकुर साहब  गुमान सिंह ,  3. ठाकुर साहब  धन सिंह , 4. ठाकुर साहब  साहब सिंह,   5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह

                                                      ठाकुर साहब  साहब सिंह  (बड़ी छतरी ओर सीला , भोमिया जी महाराज)

ठाकुर साहब  साहब सिंह  के  बेटे   1. ठाकुर साहब धीरज सिंह, 2. ठाकुर साहब मोहन सिंह

                                                                             ठाकुर साहब धीरज सिंह

ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे  1. ठाकुर साहब गुलाब सिंह, 2. ठाकुर साहब  संगराम सिंह, 3. ठाकुर साहब  सोहल सिंह, 4. ठाकुर साहब  भूप सिंह, 5. ठाकुर साहब  सालिम सिंह, 6. ठाकुर साहब  नवल सिंह , 7. ठाकुर साहब  विसन सिंह.  

ठाकुर साहब गुलाब सिंह


ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे  गुलाब सिंह जी के चार बेटे 1. मगल सिंह, 2. हाकिम सिंह, 3. छीतर सिंह ( छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), 4. रणजीत सिंह.

ठाकुर साहब रणजीत सिंह

गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह, सुल्तान सिंह, भीम सिंह (दुर्जन सिंह), पध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब भीम सिंह (दुर्जन सिंह)

रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब  भीम सिंह (दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया

                                                                               ठाकुर साहब  सोहल सिंह

ठाकुर साहब  सोहल सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब  रघुमान सिंह, 2. ठाकुर साहब  बखतावार सिंह, 3. ठाकुर साहब  इन्द्र सिंह, 4. ठाकुर साहब  कानसिंह, 5. ठाकुर साहब  अमृत सिंह, 6. ठाकुर साहब  दोलत सिंह , 7. ठाकुर साहब  सुजान सिंह , 8. ठाकुर साहब  सहजमरण सिंह.

  ठाकुर साहब  अमृत सिंह

ठाकुर साहब  अमृत सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब हाथी सिंह, 2. ठाकुर साहब फूल सिंह, . 3. ठाकुर साहब चमन सिंह.

ठाकुर साहब हाथी सिंह

ठाकुर साहब हाथी सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब शिवप्रसाद सिंह, 2. ठाकुर साहब मेहताब सिंह, 3. ठाकुर साहब सुगन सिंह, 4. ठाकुर साहब गोविन्द सिंह.

ठाकुर साहब शिवप्रसाद सिंह

ठाकुर साहब  भॅवर सिंह

ठाकुर साहब  भॅवर सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब तेज सिंह, 2. ठाकुर साहब उमेद सिंह, 3. ठाकुर साहब केहरि सिंह

ठाकुर साहब तेज सिंह के दो बेटे हैं किशन सिंह और दिनेश सिंह, ठाकुर साहब उमेद सिंह के दो बेटे हैं महेश सिंह और जितेंद्र सिंह, ठाकुर साहब केहरि सिंह के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह और पुरेन्द्र सिंह.


लेखक का परिचय

                       वंश - सूर्यवंशी या सूर्यराजवंश राजपूत

                       शाखा – कुशवाह (कछवाहा)

                       खाप – पिचानोत

                       ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान)

(ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी, कुलदेवी श्री जमवाय माता, लोक देवता श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज)

                    पुरेन्द्र सिंह पिचानोत, कैरवारा, अलवर (राजस्थान)



                                                        
जय माता दी