सदस्य:आशीष भटनागर/आलेख

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

यह लेख आज का आलेख के लिए कुछ लेखों का संकलन है।

कुतुब मीनार[संपादित करें]

कुतुब मीनार अपने साथी इमारत समूह समेत युनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित है.

कुतुब मीनार विश्व की सर्वोच्च ईंट निर्मित इमारत है, और भारतीय इस्लामी स्थापत्यकला का अनूठा और विशेष नमूना है. यह अट्टालिका भारत के दक्षिण दिल्ली शहर के महरौली भाग में स्थित है. कुतुब मीनार अपने साथी इमारत समूह समेत युनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित है.

कुतुब मीनार 72.5 मीटर (237.86 फीट) ऊँची है, और इसमें ऊपर जाने के लिये 379 सीढियां हैं. इसके आधार पर व्यास 14.3 मी चौडा़ है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) मीटर हो जाता है. इसको घेरे हुए, अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट उदाहरण मिलेंगे, जो इसके निर्माण काल सन 1193 या पूर्व के भी हैं. एक दूसरी मीनार निर्माण की भी योजना थी, जो कि इस मीनार से दुगुनी ऊंची बननी निश्चित की गयी थी, परंतु इसका निर्माण 12 मीटर पर ही आकस्मिक कारणों से रुक गया.

ताजमहल[संपादित करें]

इस लेख के भिन्न भिन्न उपशीर्षकों से कई आलेख बन सकते हैं। इसे तो शायद लेख ऑफ द मंथ बना कर प्रतिदिन एक अवयव या उपशीर्षक आलेख में डाला जा सकता है। उस दौरान निर्वाचित लेख भी ताजमहल को ही बना सकते हैं।

मीनाक्षी मंदिर[संपादित करें]

Madurai Meenakshi temple 2.jpg

मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर या मीनाक्षी अम्मां मन्दिर या केवल मीनाक्षी मन्दिर भारत के मदुरई नगर, तमिल नाडु राज्य में स्थित एक ऐतिहासिक मन्दिर है. यह हिन्दू भगवान शिव (“‘सुन्दरेश्वरर”’ या सुन्दर ईश्वर के रूप में) एवं भार्या देवी पार्वती (मीनाक्षी या मछली के आकार की आंख वाली देवी के रूप में) — इन दोनो को समर्पित है. यह ध्यान योग्य है कि मछली पांड्य राजाओं को राजचिह्न है. यह मन्दिर 2500 वर्ष पुरानी मदुरई नगरी,जो तमिल भाषा का गृह्स्थान है; के हदय में स्थित जीवनरेखा है.

हिन्दु पौराणिक कथानुसार भगवान शिव, सुन्दरेश्वरर रूप में , अपने गणों के साथ, मदुरई शहर में आये, पांड्य राजा मलयध्वज की पुत्री, राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने. मीनाक्षी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है. इस मन्दिर को देवी पार्वती के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है. अन्य स्थानों में मुख्य हैं कांचीपुरम का कामाक्षी मन्दिर, तिरुवनैकवल का अकिलन्देश्वरी मन्दिर एवं वाराणसी का विशालाक्षी मन्दिर

इस मन्दिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है, एवं जिसका कारण इसका विस्मयकारक स्थापत्य ही है। इस इमारत समूह में 12भव्य गोपुरम हैं, जो अतीव विस्तृत रूप से शिल्पित हैं. इन पर बडी़ महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गई है, जो देखते ही बनती है. यह मन्दिर तमिल लोगों का एक अति महत्वपूर्ण द्योतक है, एवं इसका वर्णन तमिल साहित्य में पुरातन काल से ही आता रहा है. हालांकि वर्तमान निर्माण आरम्भिक सत्रहवीं शताब्दी का बताया जाता है.

राष्ट्रपति भवन[संपादित करें]

इसे भी ताजमहल की भांति ही महीने भर प्रयोग कर सकते हैं।

मुगल उद्यान, दिल्ली[संपादित करें]

नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के पिछवाड़े मुगल गार्डन अपने किस्म का अकेला ऐसा उद्यान है, जहां विश्वभर के रंग-बिरंगे फूलों की छटा देखने को मिलती है। मैसूर के वृन्दावन गार्डन को छोड़कर शायद ही और कोई उद्यान इसके मुकाबले का होगा। यहां विविध प्रकार के फूलों की गजब की बहार है।

बनावट के आधार पर मुगल गार्डन के तीन हिस्से हैं- पहला चतुर्भुज आकार का उद्यान मुख्य भवन से सटा हुआ है। इसे चार भागों में बांटा गया है। उद्यान के मध्य भाग में राष्ट्रपति द्वारा स्वागत समारोहों और प्रीति भोजों का आयोजन किया जाता है। दूसरा एक लम्बा उद्यान है, जहां से होकर वृत्ताकार उद्यान के लिए रास्ता जाता है। लम्बे उद्यान में गुलाबों के लम्बे-लम्बे गलियारे हैं जिनमें तराशी गई छोटी-छोटी छतरीनुमा झाड़िया हैं, जो देखने में ऐसी प्रतीत होती है, जैसे एक खूबसूरत रंगीन विशाल गलीचा बिछा हो। वृत्ताकार उद्यान को पर्ल गार्डन या बटर पऊलाई गार्डन भी कहा जाता है। रंगों की छटा बिखेरते इस उद्यान में बीच-बीच में हरित पट्टियां हैं और इसके मध्य में एक फव्वारा भी है।

अन्तर्राष्ट्रीय इकाई प्रणाली[संपादित करें]

चित्र:SI Brochure Cover.jpg
विवरणिका का मुख्य पृष्ठ

अन्तर्राष्ट्रीय इकाई प्रणाली (संक्षेप में SI, फ्रेंच Le Système International d'unités का संक्षिप्त रूप), मीट्रिक प्रणाली का आधुनिक रूप है। इसे सामान्य रूप में दशमलव एवं दस के गुणांकों में बनाया गया है। यह विज्ञान एवं वाणिज्य के क्षेत्र में विश्व की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली प्रणाली है।पुरानी मीट्रिक प्रणाली में कई इकाइयों के समूह प्रयोग किए जाते थे। SI को 1960 में पुरानी मीटर-किलोग्राम-सैकण्ड यानी (MKS) प्रणाली से विकसित किया गया था, बजाय सेंटीमीटर-ग्राम-सैकण्ड प्रणाली की, जिसमें कई कठिनाइयाँ थीं। SI प्रणाली स्थिर नहीं रहती, वरन इसमें निरंतर विकास होते रहते हैं, परंतु इकाइयां अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के द्वारा ही बनाई और बदली जाती हैं।

यह प्रणाली लगभग विश्वव्यापक स्तर पर लागू है और अधिकांश देश इसके अलावा अन्य इकाइयों की आधिकारिक परिभाषाएं भी नहीं समझते हैं। परंतु इसके अपवाद संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन हैं, जहाँ अभी भी गैर-SI इकाइयों उनकी पुरानी प्रणालियाँ लागू हैं।भारत मॆं यह प्रणाली 1 अप्रैल, 1957 मॆं लागू हुई। इसके साथ ही यहां नया पैसा भी लागू हुआ, जो कि स्वयं दशमलव प्रणाली पर आधारित था।

जगन्नाथ मंदिर, पुरी [संपादित करें]

Temple-Jagannath.jpg

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है, जो कि भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। यह भारत के उड़ीसा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का संधि विच्छेद करने पर जगत+नाथ= जगत के नाथ या स्वामी होता है, जो कि इसका अर्थ है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो कि भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर की वार्षिक रथ यात्रा उत्सव प्रसिद्ध है, जिसमें मंदिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र (बलराम) और भगिनी सुभद्रा तीनों, तीन अलग अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर नगर की यात्रा को निकलते हैं। मध्य-काल से ही यह उत्सव अतीव हर्षोल्लस के साथ मनाया जाता है। इसके साथ ही यह उत्सव भारत के ढेरों वैष्णव कृष्ण मंदिरों में मनाया जाता है, एवं यात्रा निकाली जाती है।

यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। यह गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के लिये खास महत्व रखता है, जिसके संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे, और कई वर्षों तक पुरी में रहे भी थे।जगन्नाथ मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की रसोई है। यह रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है। इस विशाल रसोई में भगवान को चढाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए ५०० रसोईए तथा उनके ३०० सहयोगी काम करते हैं।

कोणार्क सूर्य मंदिर[संपादित करें]

Konark Temple.jpg

तेरहवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर (जिसे अंग्रेज़ी में ब्लैक पगोडा भी कहा गया है, भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी जिला के पुरी नामक शहर में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर(ख्ण्डोलाइट) एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से 12361264 ई.पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर, भारत की सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है, एवं युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित है।

यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है, जो कि पाषाण नक्काशी से अतीव सुसज्जित रूप में दर्शित है। संपुर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया गया है। यह कई इतिहासकारों का मत है, कि कोणार्क मंदिर के निर्माणकर्ता, राजा लांगूल नृसिंहदेव की अकाल मृत्यु के कारण, मंदिर का निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया। इसके परिणाआमस्वरूप, अभूरा ढांचा ध्वस्त हो गया। लेकिन यह मत एतिहासिक आंकड़ों द्वारा समर्थित नहीं है। पुरी के मदल पंजी के आंकड़ों के अनुसार, और कुछ 1278 ई. की ताम्रपत्रों से पता चला, कि राजा लांगूल नृसिंहदेव ने 1282 तक शासन किया। कई इतिहासकार, इस मत के भी हैं, कि कोणार्क मंदिर का निर्माण 1253 से 1260 ई. के बीच हुआ था। अतएव मंदिर के अपूर्ण निर्माण का इसके ध्वस्त होने का कारण होना तर्कसंगत नहीं है।


भारत के गवर्नर-जनरल[संपादित करें]

Something went wrong...right|120px| भारत के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर-जनरल]] भारत के गवर्नर-जनरल (या १८५८-१९४७ तक वाइसयॉय एवं गवर्नर-जनरल) भारत में ब्रिटिश राज का अध्यक्ष, और भारतीय स्वतंत्रता उपरांत भारत में, ब्रिटिश शासक का प्रतिनिधि होता था। इनका कार्यालय सन 1773 में बनाया गया था, जिसे फोर्ट विलियम की प्रेसीडेंसी का गवर्नर-जनरल के अधीन रखा गया था। इस कार्यालय का फोर्ट विलियम पर सीधा नियंत्रण था, एवं अन्य ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों का पर्यवेक्षण करता था। सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत पर पूर्ण अधिकार 1833 में दिये गये, और तब से यह भारत के गवर्नर-जनरल बन गये।

१८५८ में भारत ब्रिटिश शासन की अधीन आ गया था। गवर्नर-जनरल की उपाधि उसके भारतीय ब्रिटिश प्रांत (पंजाब, बंगाल, बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत, इत्यादि) और ब्रिटिष भारत, शब्द स्वतंत्रता पूर्व काल के अविभाजित भारत के इन्हीं ब्रिटिश नियंत्रण के प्रांतों के लिये प्रयोग होता है।

भारतीय राष्ट्रीय मिलिटरी कालेज[संपादित करें]

Newcrest.jpg

राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कालिज या आर.आई.एम.सी. दून घाटी में लड़्कों के लिये एक उत्तम निजि विद्यालय है। यही सन 1947 तक प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इण्डियम मिलिट्री कालिज था। यह संस्थान एक महान परंपरा की धरोहर लेये है, जो अब राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एन.डी.ए.) और अन्ततः भारतीय सेना का फीडर संस्थान है। यहां के उत्तीर्ण छात्र, रिम्कॉलियन्स कहलाते हैं (अल्युम्नाई का नाम), और वे इतिहास में अधिकतर सभी, भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के सर्वोच्च श्रेणीधारक रहे हैं।

आरआईएमसी के परिसर में पहुंचने से पहले एक लंबी सुंदर सड़क है। इस संस्थान में अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग भवन हैं। ये सभी ट्यूडर स्थापत्य शैली के हैं। इन सभी भवनों के डिजाइन एक जैसे हैं, इनमें सिर्फ थोड़े परिवर्तन हैं। इस भवन की कुछ विशेषताओं में उभरी हुई भुजाएं और राफ्टर, वेंटीलेटर के साथ दोनों तरफ की लुढ़की हुई और उनकी सामने निकली छतें, लकड़ी के दरवाजे और खिड़की तथा भवन के नीचे वाले तल पर पूरा आर्क कोलोनेड है। फर्श पर पूरी तरह लकडी के तख्‍ते का उपयोग किया गया है और भवन की आंतरिक साज-सज्जा के लिए छद्म छत (फॉल्‍स सीलिंग) का उपयोग किया गया है।

कुरान का सूरा अश-शम्स[संपादित करें]

Corp2740.jpg

सुरा अस-सम्स । यह कुरान का 91वां सूरा है। इसमें 15 [[आयत|आयतें हैं। यह भिन्न आसमानी पवित्र शपथों की शृंखला से आरम्भ होता है, जिसमें प्रथम "सूर के द्वारा" से इस सूरा को नाम मिला है। फिर स्वयं मानवी आत्मा। फिर यह बताता है थमूद के भाग्य के बारे में। थमुद एक पूर्व समृद्ध अरब कबीला था, जो अब विलुप्त हो चुका है। पैगम्बर सलीह ने उन्हें केवल ईश्वर की ही उपासना करने की प्रेरणा दी थी, एवं ईश्वर के नाम पर एक ऊँटनी को संरक्षित करने को कहा था। परंतु उन्होंने उनके सन्देश की अनदेखी की, एवं आज्ञा का उल्लंघन करते रहे। तब ईश्वर ने उन सबों को बर्बाद कर दिया। केवल वे ही बचे, जिन्होंने सलीह की आज्ञा की अवहेलना नहीं की थी।

सन्दर्भ[संपादित करें]