सदस्य:आकांक्षा सक्सेना

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     ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

https://hi.m.wikipedia.org/wiki/सदस्य:आकांक्षा_सक्सेना#/editor/0

पूरा नाम - ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

मेम्बर ऑफ स्क्रिप्ट राईटर ऐसोसिएसन मुम्बई

न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक नेशनल मैग्जीन

ब्लाग "समाज और हम"

www.akaksha11.blogspot.com


https://m.facebook.com/saxenaakanksha/

जिसको लिखने वाली है उत्तर प्रदेश के जिले औरैया की बेटी

ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना |

जिनका जन्म :

अट्ठाईस वर्षीय आकांक्षा सक्सेना जो मथुरा में जन्मीं जिनके पिता का नाम राकेश प्रकाश सक्सेना और माता का नाम मंजुलता है |

पढ़ाई :

जिन्होंने बहुत कठिन हालात और विकट परिस्थितियों से जूझते हुऐ अपनी पढ़ाई पूरी की जिन्होंने जनता इंटर कॉलेज अजीतमल,औरैया से हाईस्कूल और सांफर कॉलेज से इंटरमीडिऐट किया और जनता महाविध्यालय से बी.एस.सी की और सेण्ट्स ऐग्रीकल्चर यूनीवर्सटी इलाहाबाद से एम.ए शिक्षाशास्त्र की उपाधि प्राप्त की और सरस्वती कॉलेज ऑफ प्राफेशनल स्टडी, मेरठ यूनीवर्सटी से बी.एड की उपाधि प्राप्त की | आर्ट एण्ड क्राफ्ट, पिडिलाईट कलाकृति कॉन्टेस्ट की विनर, गायत्री महायज्ञ हरिद्वार की संस्कार परीक्षा प्रमाणपत्र,गोलिया आयुर्वेदिक प्राकृतिक चिकित्सा प्रमाणपत्र,दिल्ली योग प्राणायाम अणुव्रत जैनमुनि केन्द्र से योग सिविर अटेण्ड, प्रेरणा एनजीओ झारखण्ड़, अखिल नागरिक हक परिषद मुम्बई एनजीओ सपोर्ट प्रमाणपत्र, साहित्य परिषद द्वारा काव्य श्री सम्मान, अर्णव कलश साहित्य परिषद हरियाणा द्वारा बाबू बाल मुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान-2017 तथा साहित्य के चमकते दीप साहित्य सम्मान।

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संघर्ष :

पारिवारिक विवादों के चलते बचपन किरायें के घरों के छोटे कमरे में बीता | लोगों की इर्स्या ने लिखा सारा साहित्य जो कम से कम सौ नोटबुक थे सब जला कर राख कर दिया गया | फिर घर में चोरी की वारदात को अंजाम दिया गया और चोरी में सभी के पढ़ाई के सभी दस्तावेज़ सर्टीफिकेट चोरी किये गये | अथक मेहनत से वो सब सर्टीफिकेट दोबारा बनवाने पड़े | और फिर भी मन नही भरा इर्स्यालू लोगों का तो पढाई पूरी ना हो के लिये हर बुरा प्रयास किया गया पर सब नाकाम सिद्ध हुऐ | बुरे लोगों द्वारा दिये गये तानों और व्यंग ने मनोबल तो गिराया पर सपना तोड़ने वो नाकामयाब रहे | उनके द्वारा फेंके गये व्यंग रूपी पत्तथरों को एकत्र करके हमना अपनी कच्ची जमीन को अपना पक्का रास्ता बना लिया और फिर मुड़कर नहीं देखा बस चलते रहे लिखते रहे |

लिखने की प्रेरणा और ब्लाग की शुरूवात :

बचपन में जब किसी गरीब, दुखी को देखती तो मन करता कि इनकी मदद कैसे करें जब मेरे भी हाँथ खाली हैं तो मानसिक बैचेनी को दूर करने के लिये कॉपी पर कहानी बनाती कि वो दुखी व्यक्ति को मैं बहुत अच्छा खाना,कपड़े दे रही हूँ उनको दवा दे रहीं हूँ अब वो स्वस्थ हो गये हैं |ये लिख कर मानसिक सूकून मिलता था| पर कहीं न कहीं सकारात्मक ऊर्जा भी थी कि वो गरीब बोलता बेटी तुम्हारी दी हुई भोजन सामृग्री से मैं ठीक हो गया | क्या किया तुमने तो हम कहते ज्यादा कुछ नहीं बस कहानी लिखी उसमें आपके लिये प्रार्थना की। जिससे आप ठीक हो गये |वो गरीब बोला बड़े दिल से दुआ की है| बेटी रोज लिखा करो | मुझे तो इस बीमार जरूरतमंद से प्रेरणा मिली कि बेटा लिखा करो और मैं लिखती रही जिसमें ढ़ेर सारे नोटबुक शामिल हैं | फिर बड़ी हुई तो देखा समाज का दिखावा और वास्तविकता में बहुत अंतर है | लोग मंच पर तो बड़ी बातें बोलते पर वही बस और ट्रेन में बीमार बृद्ध को थोड़ी सी जगह तक नही दे सकते। कलयुग में दिल इतने संकीर्ण क्यों हो गये? गरीब रिश्तेदार को सोफे पर नहीं बाहर स्टूल पर बिठाओ | संम्बंधों पर पैसा हावी हो गया | बहू नौकरीवाली चाहिये सुन्दर चाहिये बस चाहिये ही चाहिये उसको क्या क्या सुविधायें और सम्मान न देगें और न सोचगें | शादी में इतना धन खर्च होता है फिर भी बेटी की आत्मा रोती है ? ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब दहेज पीड़िता की खबर अखबार में ना आती हो |हद तो तब हो जाती है जब कोर्ट में चक्कर काट -काट कर वो थक जाती और न्याय की जगह तारीख दी जाती है और न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि उसकी पूरी उम्र मुकदमें में बीत जाती | समझ ये नहीं आता जब हर कार्य आज ऑनलाईन है तो न्याय में इतनी देरी क्यों ?

समाज भी ऐसा है कि ससुराल से पीड़ित बेटी को सम्मान की नज़र से नहीं देखता तो वह कहाँ जायें ? बेटी के अस्तित्व का सबसे बड़ा खतरा यह दहेज़ ही है | बुरा लगता है इस समाज का बनावटी और दोहरा स्वभाव देखकर एक ओर जब किसी पचास साल के व्यक्ति की पत्नि मर जाती है तो वह तुरन्त जवान, कुँवारी अपने से आधे उम्र की बच्ची से विवाह कर लेता है तब समाज कुछ नही बोलता | जब यही काम कोई विधवा कर ले तो यही समाज उसको चरित्रहीन कह कर उसका जीना दुश्वार कर देता है | क्या ये अन्याय नहीं है ? समाज हमेशा बेटी पर ही उंगली और पूरा हाँथ क्यों उठाता है ? क्या उसे जीने का हक नहीं है ? समाज क्या करता है कि बेटी की शादी का कार्ड आया और जाकर दावत खा आयेंं। व्यवहार लिखा आये बस हो गयी जिम्मेदारी पूरी | जरा सोचो! बेटी की शादी में हजारों लोग शामिल होते हैं पर जब उसी बेटी को ससुराल से निकाला जाता है तब कोई उसके साथ कोईखड़ा नही होता | शादी में आशीर्वाद देने वाले हजारों हाँथ उस समय कहाँ चले जाते जब उसको ससुराल में जला कर मार दिया जाता? पर नहीं समाज तो बस कमजोर को सताना जानता है बस | आज भी हमारे देश में मृत्युभोज कुप्रथा हावी है। एक तो गरीब व्यक्ति मंहगे इलाज में बर्बाद हो बाद में मर जाये तो कर्ज लेकर मृत्युभोज में और बाद में उसके बच्चे भूखों मरने पर विवश। आखिर! क्यों न बहिष्कृत हो ऐसी कुप्रथा जो समाज को तड़प कर कर्ज में डूब कर घुटने- मरने पर विवश करती हो।

इन्हीं सब समाजिक विंसगतियों, लोगों की परेशानियों ने हमें लिखने पर विवश ही कर दिया | लिखती और अखबारों के पते पर पोष्ट करती पर किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया और न ही अपने अखबार में कभी प्रकाशित किया |पर फिर भी हार नहीं मानी और लिखती रही और फिर कॉपी कलम से निकल कर जब फेसबुक मंच मिला और फेसबुक पर ही मिले लेखक कवि, अभिनेता, पत्रकार और समाजसेवी, मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के ग्राम पड़री (रामपुरवा) में जन्मे उम्दा विचारक, फेमस थियेटर आर्टिस्ट और महान पत्रकार श्री जितेन्द्र देव पाण्डेय विद्यार्थी जी ने सलाह दी की ब्लाग में लिखो |हमने जब उनका जीवन समर ब्लाग पढा और फिर हमारे निवेदन से उन्होंने हमारा ब्लाग बनाया और कहा ब्लाग का नाम तुम लिख लो और लिखना शुरू करो | हमने 2011में ऑनलाईन ब्लाग लिखना शुरू किया और अपने ब्लाग को नाम दिया 'समाज और हम' काफी लम्बी मेहनत के बाद देखने में आया कि लाखों लोग इसे पढ़ने लगे और दहेज पर लिखी कहानी "बवाल पार्ट1&2" और किन्नर दिवस को लोगों ने खूब सराहा औरलोगों का अच्छा रिस्पॉस मिला | एक दिन भारत रत्न डॉ अब्दुल कलाम जी का मेल मिला और हमारी खुशी का ठिकाना न रहा | इसके बाद दैनिक भास्कर के संपादक और टाईम्स ऑफ इंडिया के चर्चित पत्रकार मायटी इकबाल जी के सहयोग से उनकी नेशनल मैग्जीन सच की दस्तक में न्यूज ऐडीटर के रूप में कार्य करने का सुअवसर मिला और लिखने का एक मजबूत और सही प्लेटफार्म मिला।

आकांक्षा का मानना है कि दर्द कम करने की प्राकृतिक औषधि है लिखना और हर हाल में खुश रहने के बहाने ढूंढना|

उद्धेश्य :


आकांक्षा की आकांक्षा यह है कि समाज में सुन्दर परिवर्तन आये और लोग अपनी दकियानूसी मानसिकता से बाहर निकल कर देश के विकास की ओर सोचें और जिस काबिल हो उस तरह से देश की सेवा करें | वह अपने लेख, कविता ,कहानी,भजन के रूप में समाज में बदलाव की आकांक्षी हैं |

पहिचान :

आकांक्षा अपनी सफलता का श्रेय फेसबुक को देती है जिसने उसे एक ब्लागर की पहिचान दी| उनको ब्लाग बनाने का विचार फेसबुक से मिला और फिर लिखने का मंच मिला और लोग जुड़ते गये...और आज ब्लाग "समाज और हम" के डेली हजारों व्यूवर हैं जोकी एक साधारण परिवार की बेटी के लिये बड़ी बात है.. कभी गरीबी दुख झेल कर समाज की सच्चाईयों को लिख डाला ब्लाग में....और समाज को अपनी शब्दों से सही दिशा देने का प्रयास कर रहीं हैं| जिसके ब्लॉग को कलाम सर,मोदी सर, और ऐक्टर,डाईरेक्टर प्रसिद्ध फोटो ग्राफर और इंटरनेशलन कन्ज्यूमर फार्म के प्रेसीडेण्ट अरूण सक्सेना समाजसेविका रूचि भार्गव और मुख्यमन्त्री झारखन्ड रघुवर दास जैसे नामी गिरामी लोग ब्लाग से जुड़े हैं जो एक छोटी जगह की लड़की के लिये बड़ी बात है | इसके अतिरिक्त अखिल भारतीय कायस्थ महासभा की युवा सचिव बनी तथा कायस्थवाहिनी अंतर्राष्ट्रीय संगठन में सचिव(महिला प्रकोष्ठ) बनकर कायस्थ समाज के लिये वर्क किया। इसके अतिरिक्त सर्व समाजहित के लिये कई मुहिम चलाई काम किये जैसै- एक लिफाफा मदद वाला, पॉलीथिन हटाओ कागज उढाओ, अखबार ढाकें, कीटाणु भागें, सेवा व परोपकार भरी मुहिम घर से निकलो खुशियां बाटों व घुमन्तु जाति के गरीब बच्चियों के परिवार को समझाकर उनका स्कूल में दाखिला कराना जैसे काम शामिल हैं। कई बार सामाजिक संस्थाओं ने सोशल वर्क अवार्ड के लिये आमंत्रित किया पर यह कहकर हाथ जोड़ लिया कि सर्व समाज का हित करना हमारा कर्तव्य है इसमें ईनाम और सम्मान क्या लेना आप सम्मान की राशि से गरीब बच्चियों को स्कूल तक पहुंचाइये जरूरतमंदों की मदद कर दीजियेगा जो शॉल हमें उढ़ा रहे हैं वह किसी बृद्ध बीमार जरूरतमंदों को पहना दीजिए बस यही जन सेवा यही नारायण सेवा है।

प्रकाशित लेख :

सबसे पहले कानपुर के जनसामना साप्ताहिक न्यूज पैपर में कृष्ण भजन और उज्जवल प्रदेश कविता प्रकाशित फिर कानपुर के दैनिक जागरण पाठकनामें में गंगा कविता,संगिनी में छोटे ब्लाग प्रकाशित और लखनऊ के द मिड डे एक्टविस्ट न्यूज पैपर में लेख प्रकाशित, मुम्बई के साप्ताहिक न्यूज पैपर रूबी टाईम्स, ग्रीन लेवल भारत, तत्काल न्यूज पैपर में लेख, कविता प्रकाशित, तेलगू मैग्जीन वॉयस ऑफ न्यूज में लेख प्रकाशित, रोशनी दर्शन मैग्जीन, असल न्यूज मैग्जीन में लेख प्रकाशित,हैदराबाद के न्यूज पैपर डेली हिन्दी मिलाप में लेख प्रकाशित,देशबन्धु राष्ट्रीय संस्करण में लेख,भोपाल के न्यूज पैपर ग्राम संदेश, ज्ञान सवेरा न्यूज पैपर, शब्द प्रतिज्ञा, पीथयान पत्रिका, भोपाल के राजधानी न्यूज पैपर में ब्लाग न्यूज प्रकाशित, उत्तराखण्ड़ की मैग्जीन अर्चिता में कविता, गौरखपुर के स्वतन्त्र चेतना न्यूज पैपर में लेख, जबलपुर दर्पण न्यूज पोर्टल, श्रमजीवी जर्नलिस्ट न्यूज पोर्टल,यूनाइटिज न्यूज.कॉम पोर्टल,न्यूज चक्र पोर्टल, सर्च स्टोरी न्यूज पोर्टल , मध्य उदय न्यूज पोर्टल, न्यूज नैशन न्यूज पोर्टल, तेज न्यूज पोर्टल में कहानी प्रकाशित, मध्य प्रदेश के हिन्दी साप्ताहिक अकोदिया सम्राट न्यूज पैपर, हिन्दी साप्ताहिक सनराइज न्यूज इण्ड़िया अमरोहा में प्रकाशित लेख,कानपुर के कर्मकसौटी न्यूज पैपर में ब्लॉग न्यूज प्रकाशित | इसके अतिरिक्त आज भी अनेकों समाचारपत्र में प्रकाशित हो रहे हैं।

उपरोक्त समाचारपत्रों ने आकांक्षा के समाज और हम ब्लाग के लेखों की गम्भीरता को समझा और अपने अखबारों में जगह दी|

इच्छा :

आकांक्षा सक्सेना समाज में श्रेष्ठ बदलाव की आकांक्षा रखतीं हैं |

समाज और बेटियों को संदेश :

समाज उन्नत होगा तो मानवता उन्नत होगी | बेटी सम्मानित होगी तो सृष्टि प्रकाशित होगी | युवाओं से कहना चाहूँगीं आप अपनी प्रतिभा, क्षमता पहिचाने और अपना सपना सच करने में जान लगा दें, हाँ बड़ा सपना जरूर देखें |

   समाज को देश को युवाओं की प्रतिभा, शक्ति और सामर्थ की जरूरत है तो आईये साथ मिलकर अपने भारत निर्माण में अपना योग्यदान दें और इंसान होने का परिचय दें |

बेटा सूर्य है तो बेटी चांद हैं, बेटा जीवन है तो बेटी अस्तित्व है |दोनों ही भगवान ही आंखे हैं | हमारे समाज को इन दोनों आँखों से देश की तकदीर में इंसानियत के नये कीर्तमान गढ़ने हैं | आइये दोस्तों हम सब साथ चलते हैं |

धन्यवाद 🙏🏻💐