संज्ञानात्मक मनोविज्ञान

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संज्ञानात्मक मानोविज्ञान ध्यान, भाषा का उपयोग करना, स्मृति, धारणा, समस्या को हल करना और सोच आदि मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है। संज्ञानात्मक मानोविज्ञान के बहुत से काम मानोविज्ञानिक अध्ययन के विभिन्न अन्य आधुनिक विषयों में एकीकृत किये गए हैं- सामाजिक मानोविज्ञान, व्यक्तित्व मानोविज्ञान, असामान्य मानोविज्ञान, विकासात्मक मनोविज्ञान, शिक्षा मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र।

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के उपयोग[संपादित करें]

विकृत मनोविज्ञान[संपादित करें]

संज्ञानात्मक क्रांति के बाद और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कई सिद्धांतिक खोजों के परिणाम के रूप में, संज्ञानात्मक उपचार का अनुशासन विकसित हुआ। हारून टी. बेक आम तौर पर संज्ञानात्मक उपचार के पिता के रूप में माने जाते हैं। अवसाद की पहचान और उपचार के क्षेत्र में उनके काम ने दुनिया भर में काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। १९८७ में प्रकशित अपनी पुस्तक "अवसाद के संज्ञानात्मक थेरेपी" में बेक ने तर्क के रूप में तीन प्रमुख बिन्दुओं को रखा है जिसमें वे 'केवल औषधी' वाले दृष्टिकोण की जगह अवसाद का इलाज चिकित्सा या चिकित्सा और अवसादरोधी दवाओं से करने की बात कहते हैं।

  • (१) अवसादरोधी दवाओं के प्रचलित उपयोग के बावजूद, सत्य तो यह है कि सभी रोगी उसका सकारात्मक प्रत्युत्तर नहीं देते। बेक कहते हैं (१९८७ में) कि ६० से ६५ % रोगी ही अवसादरोधी दवाओं का सकारात्मक असर दिखाते हैं, और आधुनिक समय में मोटे तौर पर किये गये विश्लेषण (कई अध्ययनों का एक सांख्यिकीय विश्लेषण करने के बाद) भी इसी प्रकार के नतीजे दिखाता है।
  • (२) अवसादरोधी दवाओं का जवाब जो लोग सकारात्मक रीति से देते हैं उनमें से कई लोग भिन्न-भिन्न कारणों से दवा लेना बन्द कर देते हैं। उनका ऐसा करने का कारण या तो दवा के अन्य प्रभाव, या फिर व्यक्तिगत आपत्ति हो सकता है।
  • (३) बेक कहते हैं कि नशीली दवाएँ अंत में रोगी के मुकाबला करने की अन्तरिम शक्ति के टूटने का कारण हो सकती है। उनका सिद्धांत हैं कि यह मूड में सुधार लाने के लिये रोगी को दवाओं पर निर्भर करा देती है और आम तौर पर अवसादग्रस्तता के लक्षणों के प्रभाव को कम करने के लिए रोगी उन तकनीकियों का अभ्यास करने में विफल रहता है जो स्वास्थ व्यक्त्तियों द्वारा इन लक्षणों से बाहर आने में अभ्यास की जाती है। विफल होने के पश्चात्‌ यदि एक बार रोगी अवसादरोधी को बन्द कर देता है, तो अक्सर उदास मन के सामान्य स्तर से निपटने के लिए और अवसादरोधी दवाओं का उपयोग बहाल करने के लिए प्रेरित महसूस करने में असमर्थ रहता है।[1]

सामाजिक मनोविज्ञान[संपादित करें]

आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान के कई पहलुओं की जड़ें संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में किये गयें शोध में है। सामाजिक अनुभूति संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का एक उप-श्रेणी है जो संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के तरीकों पर विशेष ध्यान देता है। खासकर जब इसे मानव आचार-संहिता पर लागू करते हैं। गॉर्डन बी मोस्कोवित्ज़ सामाजिक अनुभूति को इस प्रकार परिभाषित करते हैं " ..., मानसिक प्रक्रियाओं का वह अध्यन्न जो हमारी सामाजिक दुनिया में लोगों को समझने, मिलने, याद रखने, सोचने और मतलब निकालने में उपयोग में आती है"।

कई सामाजिक सूचना संसाधन के मॉडल (एस आई पी) का विकास आक्रामक और असामाजिक व्यवहार के अध्यन्न में प्रभावशाली रहा है। केनेथ डोज का सिप मॉडल उनमें एक है जो आक्रामकता से संबंधित अधिकांश अनुभवों में एक समर्थित मॉडल है। अपनी शोध में डोज कह्ते हैं कि वे बच्चे जिनमें सामाजिक जानकारी का मूल्यांकन करने की अधिक क्षमता होती है अक्सर उच्च स्थितिय स्वीकृत सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। उनका मॉडल बताता है कि पांच चरण हैं जिनमें हो कर एक व्यक्ति गुज़रता है जब वह अन्य व्यक्तियों के साथ बातचीत (व्यवहार) का मूल्यांकन करता है और वह व्यक्ति उन संकेतों की व्याख्या कैसे करता है, यह प्रतिक्रियावादी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है।

संज्ञानात्मक विज्ञान बनाम संज्ञानात्मक मनोविज्ञान[संपादित करें]

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान और संज्ञानात्मक विज्ञान के बीच की रेखा काफी धुँधली हो सकती है। दोनों के बीच का फर्क संज्ञानात्मक असामान्य के 'लागू मनोविज्ञान' के संबंध के संदर्भ में बेहतर, समझा जा सकता है एवं उनके मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को भी समझा जा सकता है। संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक अक्सर उन मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में जुटे हैं जिनमें उनका लक्ष्य यह जानना है कि मानव प्रतिभागियों के मन बाहरी दुनिया से कैसे जानकारी लेते हैं, उनका अवलोकन करते है और उस प्राप्त जानकारी पर प्रक्रिया प्रदशि॔त करते हैं। इस जानकारी को अक्सर नैदानिक ​​मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रयोग किया जाता है। इस तरह से व्युत्पन्न संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का एक मानदंड यह है कि हर एक व्यक्ति एक स्कीमेता विकसित करता है जो उसे विशेष परिस्थितियों में या उनका सामना करने के लिये खास तरह से सोचने या अमल करने के लिए प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोगों को कतार में इंतजार करने का स्कीमा है। किसी भी सेवा के लिये जहां लोगखिड़की पर कतार में खड़े हैं, आगन्तुक अनायास आकर सबसे आगे खड़ा नहीं होता। किंतु उस परिस्थिति में उनका स्कीमा उन्हें बताता है कि वे कतार में सबके पीछे जाकर खड़े हों। कभी कभी कोई व्यक्ति एक दोषपूर्ण स्कीमेता विकसित कर लेता है जो उसे लगातार एक बेकार ढंग से प्रतिक्रिया करने के लिए बाध्य करता है। इस प्रकार के परिणामों को असामान्य या विकृत मनोविज्ञान के क्षेत्र में माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति में यह स्कीमा है कि वह केह्ता है कि " मैं दोस्त बनाने में अच्छा नहीं हूँ ", तो वह पारस्परिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए इतना अनिच्छुक हो सकता है कि उसे 'तन्हाई में रेहने की आदत' का खतरा हो सकता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]