शिशु

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30 मिनट पहले जन्मा एक भारतीय नवजात शिशु
एक रोता हुआ नवजात शिशु

शिशु पृथ्वी पर किसी भी मानव (प्राणी) की सबसे पहली अवस्था है। जन्म से एक मास तक की आयु का शिशु नवजात (नया जन्मा) कहलाता है जबकि एक महीने से तीन साल तक के बच्चे को सिर्फ शिशु कहते हैं। आम बोल चाल की भाषा मे नवजात और शिशु दोनो को ही बच्चा कहते हैं। एक दूसरी परिभाषा के अनुसार जबतक बालक या बालिका आठ वर्ष के नहीं हो जाते तब तक वे शिशु कहलाते हैं।

शिशु देखभाल[संपादित करें]

शिशुओं का रोना एक स्वाभाविक क्रिया है, जो उनके लिए संचार का बुनियादी साधन है। एक शिशु रोकर भूख, बेचैनी, उब या अकेलापन जैसी कई भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता है।

स्तनपान की सिफारिश सभी प्रमुख शिशु स्वास्थ्य संगठन करते हैं। अगर किसी कारण वश स्तनपान संभव नहीं है तो शिशु को बोतल से दूध पिलाया जा सकता है जिसके लिए माता का निकाला हुआ दूध या फिर डिब्बे का शिशु फार्मूला दिया जा सकता है।

शिशु चूसने की एक स्वाभाविक प्रवृति के साथ जन्म लेते है और इसके द्वारा वो स्तनाग्र (चुचुक) से या बोतल के निप्पल से दूध चूसते हैं। कई बार शिशुओं को दूध पिलाने के लिये धाय को रखा जाता है पर आजकल यह बिरले ही होता है विशेष रूप से विकसित देशों में।

जैसे जैसे शिशु की आयु मे वृद्धि होती है उसे दूध के अतिरिक्त ठोस आहार की आवश्यकता भी होती है, कई माता पिता इसकी पूर्ति के लिए डिब्बा बंद शिशु आहार (जैसे सेरेलेक) का चयन करते हैं मां के दूध या दुग्ध फार्मूला का पूरक होता है। बाकी लोग अपने बच्चे के आहार की जरूरत के लिए अपने सामान्य भोजन को उसकी आवश्यकताओं को अनुसार अनुकूलित कर लेते है (जैसे पतली खिचड़ी या दलिया)।

जब तक शिशु स्वयं शौचालय जाने के लिए प्रशिक्षित होते है, वो लंगोट, पोतड़ा या डाइपर (औद्योगीकृत देशों में) पहनते हैं।

नवजात अर्भक की विष्ठा

शिशु प्रथम शी (विष्ठा) करता है वह हरी थोडी काले रंग की होती है। पहले दो से तीन दिन यह रंग ऐसा ही होता है। प्रथम शी करने का समय जन्म देने पर ४८ घंटे तक कभी भी रह सकता है। ४ से ५ दिन में काला रंग जाकर पिली रंग की शी होने लगती है। इसमें शिशु शिशु में काफी फरक होता है। कुछ शिशु दिन भर में १२-१५ बार भी शी करते हैं। तो कुछ ४ से ७ दिन में एक बार शी करते हैं। पीली और मध्यम पतली शी होती है तो चिंता करने का कारण नही होता है। बच्चे वयस्कों की तुलना में अधिक सोते है पर जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती है उनके नींद के समय मेंनिंद्राकाल मे गिरावट आती है। नवजात शिशुओं के लिए 18 घंटे तक की नींद की आवश्यकता होती है। जब तक बच्चें चलना सीखते हैं उन्हें गोद में उठाया जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें बच्चागाड़ी या प्राम मे भी बैठा कर या लिटा कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है।

अधिकतर विकसित देशों मे कानूनन मोटर वाहनों में शिशुओं को सिर्फ उनके लिए विशेष रूप से बनी सुरक्षा सीट मे ही बिठाया जाता है।

बालक के जन्म के समय ली जाने वाली सावधानियाँ शिशु का सिर बाहर आनेपर बाकी का शरीर पूर्ण बाहर आने की राह न देखते शिशु का श्वसनमार्ग साफ करना चाहिए। शिशु को उलटा मत पकडों शिशु पर पाणी मारना नही चाहिए। मुँह, गला स्रावनली साफ करना चाहिए। म्यूकस नली नही है तो साफ नरम सुती कपडा अँगुली में लपेट कर शिशु के गले में अँगुली घुमाकर साफसफाई करनी चाहिए। शिशु बाहर आनेपर नाल, नाडी चेक करके वह नाल काटनी चाहिए. तब तक शिशु तुरंत सूखा करना चाहिए। उसके बाद तुरंत गरमी देनेवाले कपडे में लपेट कर रखें। एेसा न करने पर र शिशु के शरीर का तापमान कम होने की संभावना होती है। शिशु को गेल गोल न घुमाएं। नवजात अर्भक का श्वसन और रक्ताभिसरण जन्म के बाद स्वतंत्र श्वसनक्रिया शुरू होना यह शिशु के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। श्वसन का मार्ग साफ होकर शिशु जन्म के उपरांत रोता है। तब श्वसन स्वतंत्र रूप से शुरू होता है।

पहली बार रोने के बाद शांत हुए शिशु का श्वसन रेट औसत प्रत्येक मिनिट को ३० से ४० इतना होता है। उसमें अनियमित लय हो सकती है। त्वचाका रंग गुलाबी होता है। श्वसन के बाद अथवा हृदय और रक्ताभिसरणात कुछ दोष हो तो शिशु के होंठ, आँखों के नीचे का भाग, हाथ, पैर और नाखून इन पर निली झाक होती है। कभी कभी शिशु सफेद और निस्तेज दिखता है। यदि ऐसा हो तो शिशु को अस्पताल ले जाना चाहिए। श्वसनक्रिया में यदि कुछ दोष हो तो श्वसन के समय शिशु के नथुने फुलते है, छाती की पसलियाँ अंदर खींची जाती है(Grunting) और ठोडी और गर्दन उपर-नीचे होती है। श्वसन में ज्यादा गंभीर दोष होगा तो श्वास छोड़ते समय शिशु कर्हाता है। नवजात अर्भकाची की विष्ठा बाळ प्रथम शी (विष्ठा) करते ती हिरवट-काळसर रंगाची असते. पहिले दोन ते तीन दिवस हा रंग टिकतो. प्रथम शी करण्याची