शल्कपंखी गण

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एलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा २०० गुना आवर्धित करके देखने पर शल्क (स्केल) का दृष्य

शल्कपंखी या लेपिडॉप्टेरा (Lepidoptera), कीटों का एक विशाल गण है, जिसमें तितलियाँ एवं शलभ (moths) के अतिरिक्त बहुत से कीट सम्मिलित हैं। कीटों के वर्गीकरण के लिए लेपिडॉप्टेरा शब्द का उपयोग सर्वप्रथम लिनिअस (Linnaeus) ने किया। यह शब्द लैटिन के लेपिडॉस (lepidos = शल्क) तथा टिरॉन (pteron = पंख) के मिलने से बना है। इस गण में अनुमानतः 174,250 प्रजातियाँ हैं।

इस गण के कीटों की पहचान बड़ी सरल है। तितलियों ने सुंदर होने के कारण मनुष्य का ध्यान सदा से अपनी ओर आकर्षित किया है। सुंदरता के कारण ही मनुष्य तितलियों को अपने संग्रहालय में रखने के लिए लालायित रहता है। इनके पक्ष तथा लगभग संपूर्ण शरीर शल्कों से ढके रहते हैं, अत: इन्हें शल्किपक्षा भी कहते हैं। जब हम इन कीटों को पकड़ते हैं, तो हमारी अँगुलियों पर कुछ धूल सी चिपक जाती है। यदि इस धूल को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाए, तो ज्ञात होगा कि यह धूल नहीं अपितु अनेक शल्क हैं। इन शल्कों का एक निश्चित आकार होता है। लेपिडॉप्टेरा की जिह्वा घड़ी की कमानी के आकार की होती है, जिससे ये अपना भोजन चूसते हैं। इनमें पूर्ण रूपांतरण होता है। इनके डिंभ इल्ली (caterpillar) कहलाते हैं। प्यूपा रेशम से बने कोए में या मिट्टी की कोष्ठिका में रहता है। तितलियों और शलभों की लगभग १,२०,००० जातियाँ अभी तक ज्ञात हो चकी हैं। इनमें से लगभग २०,००० जातियाँ भारत में पाई जाती हैं। यह गण मनुष्य की सबसे अधिक हानि पहुँचाता है। सदस्यों की अधिकतम संख्या की दृष्टि से इस गण का स्थान दूसरा है।

शरीर[संपादित करें]

इस गण के प्राणी का सिर छोटा, लगभग गोलाकार, बड़े संयुक्त नेत्र तथा एक जोड़ी सरल नेत्र होते हैं। शृंगिकाएँ (antenna) अनेक खंडोंवाली होती हैं। अधिकतर शलभों की शृंगिकाओं पर महीन महीन बाल होते हैं। इस प्रकार की शृंगिकाएँ नरों में अधिकतर पाई जाती हैं।

तितलियों की शृंगिकाओं का सिरा डंडे की मूठ के समान मोटा होता है। इनके मुख भाग ऐसे बने होते हैं जिनसे केवल द्रव पदार्थ ही चूसा जा सकता है। मुख भाग इस प्रकार है : मैंडिबल (mandible), या तो अति दुर्बल या अनुपस्थित होते हैं। दोनों मैक्सिला (maxilla) की दोनों गलियाएँ (galeae) बहुत लंबी तथा इस प्रकार आपस में गुथी होती हैं कि एक चूसनेवाली नली सी बन जाती है। इस नली द्वारा ही कीट अपना भोजन चूसता है। इस प्रकार के मुख भाग साइफनी (siphoning) मुख भाग कहलाते हैं। जिस समय यह नली चूसने का कार्य नहीं करती, उस समय घड़ी की कमानी का आकार धारण कर लेती है किंतु फूलों से मकरंद चूसते समय यह नली पूर्ण रूप से सीधी हो जाती है। जंभिका स्पर्शक (maxillary palps) प्राय: दुर्बल होते हैं, या इनका पूर्ण अभाव होता है। लेबियम (labium) भी प्राय: छोटा ही रह जाता है, किंतु इसके दोनों स्पर्शक बड़े तथा तीन तीन खंडोंवाले होते हैं। कुछ लेपिडॉप्टेरा अपनी प्रौढ़ावस्था में कुछ भी भोजन नहीं करते, अत: इनके मुख भाग अपूर्ण होते हैं, अर्थात् इनकी चूषणनली अनुपस्थित रहती है। कुछ शलभों की जिह्वाएँ बहुत ही लंबी होती हैं, जैसे बाजशलभ (hawk moth)। इसकी जिह्वा छह इंच लंबी होती है, जिसके द्वारा यह उन फूलों से भी मकरंद चूस लेता है जिनका मकरंद बहुत ही गहराई पर होता है। कुछ शलभ फलों का रस चूसकर ही अपना जीवननिर्वाह करते हैं। इनकी जिह्वा पर फलों के छिलके काटने के लिए काँटे होते हैं।

वक्ष का अग्रखंड प्राय: कम चौड़े कॉलर (collar) के आकार का होता है, जिसके दोनों ओर एक एक प्रवर्धक होता है, जो चर्मप्रसार (patagium) कहलाता है। मध्यवक्ष (mesothorax) बहुत बड़ा और पश्चवक्ष (metathorax) प्राय: छोटा होता है। पक्ष झिल्लीमय होते हैं और सदा शल्कों से ढँके रहते हैं। शल्कों के अनेक आकार होते हैं। ये बालों की भाँति महीन से लेकर बहुत चौड़े तक हो सकते हैं। शल्क का निचला भाग वृंत (Pedicel) कहलाता है, जो पक्ष की झिल्ली में स्थिति प्याले के आकार की गर्तिका में फंसा रहता है। बहुत सी तितलियों में शल्क नियमानुसार पंक्तियों में लगे होते हैं। शल्क पक्षों को पुष्ट करते हैं और इस प्रकार वेग से उड़ने में सहायक होते हैं। अति वेग से उड़नेवाले शलभों में पक्ष के अग्रभाग के शल्क अत्यधिक पूर्ण रूप से क्रमबद्ध होते हैं। शल्क शरीर की रक्षा करते हैं और इसको विभिन्न प्रकार के रंग प्रदान करते हैं। कुछ नरों के पक्षों पर विशिष्ट प्रकार के शल्क होते है, जो छोटे छोटे दो, या तीन धब्बों की तरह दिखलाई पड़ते हैं और एक प्रकार की ग्रंथि बनाते हैं। ग्रंथि के स्राव में एक विशिष्ट प्रकार की गंध होती है। भिन्न-भिन्न जाति के नरों से भिन्न-भिन्न प्रकार की गंध आती है। संभवत: यह गंध मादा को नर की ओर आकर्षित करती है। एक ओर के दोनों पक्ष एक दूसरे से अटके रहते हैं। ये कई ढंग से अटके रहते हैं। कुछ शलभों के अग्रपक्ष से अँगुली की भाँति एक प्रवर्ध निकला रहता है। यह प्रवर्ध पश्चपक्ष के निचले भाग को ढँक लेता है और जब शलभ उड़ता है उस समय पश्चपक्ष को अग्रपक्ष के साथ अटकाए रखता है। अधिकतर शलभों के पश्चपक्ष पर कड़े बालों का एक समूह होता है, जो अग्रपक्ष के नीचे की ओर रहता है औैर इसके बालों के समूह में फँसा रहता है। नर शलभों के पश्चपक्ष के बाल प्राय: जुड़कर एक मोटा सा बाल बन जाते हैं, जो अग्रपक्ष के नीचे की ओरवाले मुड़े हुए काँटे में फँसा रहता है। पक्षों के शिराविन्यास (venation) का वर्गीकरण में अत्यधिक महत्व है। प्रत्येक पक्ष में अनुप्रस्थ शिरा (cross veins) बहुत कम होती है, श् किंतु एक बड़ी कोशिका अवश्य होती है। अग्रपक्ष का रेडियल सेक्टर (radial sector) चार शाखाओं में विभाजित होता है, किंतु पश्चपक्ष का रेडियल सेक्टर अविभाजित रहता है। मध्य शिरा (median vein) प्राय: तीन शाखाओं में विभाजित हो जाती है। कुछ तितलियों की अग्र टाँगे प्राय: दुर्बल हो जाती है और चलने का कार्य नहीं कर पाती हैं। गुल्फ (tarsus) में पाँच खंड होते हैं।

उदर में दस खंड होते हैं, किंतु प्रथम प्राय: क्षीण हो जाता है और नवें तथा दसवें खंड का आकार परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि बाह्य जननांगों का इन्हीं खंडों से संबंध रहता है। बहुत से लेपिडॉप्टेरों में उदर के अग्र सिरे के दोनों ओर एक एक कर्णपटह पाया जाता है, जिसकी रचना से ऐसा अनुमान होता है कि संभवत: यह एक श्रवण इंद्रिय होगी। नर का बाह्य जननांग इस प्रकार होता है; उदर का नवाँ खंड चक्राकार बन जाता है, इसका नीचे का भाग रेखाबंधनी (vinculum) कहलाता है। एक जोड़ा आलिंगक (clasper) होते हैं, जो रेखाबंधनी से जुड़े रहते हैं। आलिंगक के भीतर की ओर काँटे के आकार के हार्पी (harpe) पाए जाते हैं। नवें खंड के ऊपरी भाग के पिछले किनारे से एक प्रवर्ध, जो अंकस (Uncus) कहलाता है, जुड़ा रहता है। अंकस के नीचे की ओर एक नैथोस (ganthos) भी प्राय: पाया जाता है। अंकस और नैथोस के मध्य गुदा होती है। लिंगाग्रिका (aedeagus) नैथोस के नीचे की ओर रहती है। मादा के उदर के पिछले खंड दुर्बल होकर भीतर की ओर घुसे रहते हैं और बाह्य जननांग बनाते हैं। ये खंड अंडा देने के समय बाहर निकल आते हैं। इस प्रकार उदर का यह भाग बाहर और भीतर हो सकता है और अंडे देने का कार्य करता है।

जीवन चक्र[संपादित करें]

एनिस स्वैलोटेल (Anise Swallowtail) के जीवनचक्र के चार चरण

अंडों के ऊपरी आवरण पर अनेक प्रकार के चिह्न बने होते हैं। तितलियों के अंडों के आवरण पर कई प्रकार की कोशिकाएँ सी बनी रहती हैं। किसी किसी जाति की एक एक मादा एक एक सहस्र या इससे भी अधिक अंडे देती है। कुछ जातियों के शलभों की मादाएँ अपने अंडे उन वनस्पतियों पर गिरा देती हैं जिनको इनकी इल्लियाँ खाती हैं। लेपिडॉप्टेरा के डिंभ इल्लियाँ (larva) कहलाते हैं। इनके मुख भाग भोजन चबा सकते हैं। सभी जातियों की इल्लियों की आकृति एक सी होती है। ये बेलनाकार होती हैं और इनके शरीर में शिर के अतिरिक्त तेरह खंड पाए जाते हैं। अगले तीन खंड वक्ष बनाते हैं और इस प्रत्येक खंड पर एक जोड़ी टाँगें होती हैं। इसके अतिरिक्त उदर पर भी टाँगे पाई जाती हैं, किंतु ये टाँगें छोटी और बिना खंडवाली होती हैं। प्रत्येक टाँग के सिरे पर नन्हें नन्हें काँटे होते हैं, जो पौधे को पकड़े रहने में इनकी सहायता करते हैं। इस प्रकार की टाँगों की संख्या प्राय: पाँच जोड़ी होती है, किंतु किसी किसी में छह जोड़ी भी हो सकती है। ये टाँगें प्राय: तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे और दसवें उदर खंड पर पाई जाती हैं। किन्हीं किन्हीं इल्लियों में इन टाँगों का अभाव रहता है। इल्ली के सिर पर दोनों ओर सरल नेत्र होते हैं, जिनकी संख्या छह जोड़ी तक हो सकती है। शृगिकाएँ बहुत छोटी होती हैं। चिबुकास्थि (mandible) बड़ी और दृढ़ होती हैं, किंतु जंभिकाएँ बहुत छोटी होती हैं। लेबियम के मध्य एक नलिका होती है, जो तंतुग्रंथि (spinneret) कहलाती है और इसमें ही कातनेवाली ग्रंथि की वाहिनी खुलती है। ये लार ग्रंथियाँ होती हैं, जो रेशम उत्पादन करती हैं। लार ग्रंथियाँ बहुत लंबी होती हैं। रेशम के कीड़े की ये ग्रंथियों उसके शरीर से पाँच गुनी लंबी होती हैं। कुछ इल्लियों के शरीर पर ऐसे बाल होते हैं, जिनके छूने से मनुष्य के शरीर में खुजली होने लगती है। ये बाल खोखले होते हैं और कुछ इल्लियों के ऐसे प्रत्येक बाल में एक विशिष्ट प्रकार की ग्रंथि खुलती है। इन ग्रंथियों का स्राव विषैला होता है। इन बालों के कारण ये इल्लियाँ अपने शत्रुओं से अपनी रक्षा करती हैं।

प्यूपा दो प्रकार के होते हैं : अपूर्ण प्यूपा तथा पूर्ण प्यूपा। अपूर्ण प्यूपा के अवयव कुछ कुछ स्वतंत्र होते हैं। पूर्ण प्यूपा के अवयवश् शरीर से चिपके रहते हैं। अत: यह ठोस मालूम पड़ता है। उदर के केवल तीन खंडों में ही गति हो सकती है और ये अधिकतर कोये के भीतर बनते हैं। कोया रेशम, पत्तियों, चबाई हुई लकड़ी, या मिट्टी से बनाया जाता है। तितलियों के प्यूपा के ऊपर कोया प्राय: नहीं होता हैं, अर्थात् यह अरक्षित होता है और रेशम के धागे से लटका रहता है। बहुत से अपूर्ण प्यूपों में एक कड़ा प्रवर्ध होता है, जो कोया फाड़ने का काम करता हैं, किंतु अधिकार प्यूपों में हुक, काँटे आदि कोये को काटने के लिए पाए जाते हैं। पूर्ण प्यूपों के प्यूपावरण (puparium) में कुछ कोमल स्थान होते हैं, जहाँ से प्यूपावरण टूट जाता है और कीट बाहर निकल आता है। कुछ प्यूपा एक स्राव निकालते हैं, जो प्यूपावरण को कोमल कर देता है और इस प्रकार सरलता से कोया टूट जाता है।

प्यूपा से पौढ़ शल्कपंखी बनता है।

लाभ और हानि[संपादित करें]

इल्लियाँ अत्यंत ही हानिकारक हैं। इनमें से अधिकतर फसलों और वन वृक्षों को हानि पहुँचाती हैं। वास्तव में ऐसा कोई भी पौधा अथवा वृक्ष नहीं है जिसको किसी न किसी जाति की इल्ली हानि न पहुँचाती हो। पिरालिडिडी (Pyralididae) कुल के प्ररोह छेदनेवाले, सिरपोफेगा (Scirpophaga) और तना छेदनेवाले आरजीरिया (Argyria) और डाइट्रिया (Diatroea) ईख को अत्यधिक हानि पहुँचाते हैं। धब्बेदार बोड़ी कृमि (ईरिअस, Earias) और गुलाबी बोड़ी कृमि (प्लैटीडेरा, Platydera) कपास को हानि पहुँचाती है। आलू शलभ, जो लगभग सारे संसार में पाया जाता हैं गोदाम में रखे आलू को नष्ट कर देता है। नॉकट्यूइडी (Noctuidae) वंश के स्पोडॉप्टेरा (Spodoptera) धान तथा घास को, हीलिओथिस (Heliothis) दलहन की फलियों को, सिसेमिया (Sessamia) गेहूँ को, लेफिगमा (Laphygma) मक्का आदि को और प्लूसिया (Plusia) मूँगफली को अत्यधिक हानि पहुँचाते हैं। टिनीया (Tinaea) ऊनी कपड़ों, कालीनो आदि को हानि पहुँचाता है। साइटोट्रोगा (Sitotroga) गोदाम में रखे गेहूँ, मक्का आदि का बहुत बड़ा शत्रु है। इन हानिकारक कीटों के अतिरिक्त कुछ वंशों की जातियाँ लाभदायक भी बहुत हैं। वॉबीसाइडी (Bombycidae) और सैंटर्नाइडी (Saturnidae) वंश की इल्लियाँ रेशम बनाती हैं।

प्रौढ़ लेपिडॉप्टेरा प्राय: पुष्पों से मकरंद चूसते हैं, कोई कोई मधु ओस तथा पके हुए फलों का रस भी चूस लेते हैं। कुछ ऐसी भी तितलियाँ हैं जो सड़े गले फलों कर रस चूस लेती हैं। इस प्रकार अधिकतर प्रौढ़ लेपिडॉप्टेरा कोई हानि नहीं पहुंचाते हैं, किंतु कुछ शलभों की जातियाँ प्रौढ़ अवस्था में भी हानिकारक हैं। ये फल-रसचूषण शलभ कहलाते हैं। ये शलभ मध्य भारत में संतरे तथा नारंगियों का रस चूसते हैं जिसके कारण फल अधपके ही वृक्ष से गिर जाते हैं। अधिकतर लेपिडॉप्टेरा शीतकाल में डिंभ अथवा प्यूपा अवस्था में ही शीत निष्क्रियता को प्राप्त होते हैं। लेपिडॉप्टेरा में प्रति वर्ष प्राय: दो ही पीढ़ियाँ होती हैं, किंतु कुछ में प्रति वर्ष पाँच या छह पीढ़ियाँ तक हो जाती हैं।

तितली और शलभ में भेद[संपादित करें]

तितलियाँ प्राय: सुंदर रंगोंवाली होती है, दिन में ही उड़ा करती हैं, जब ये बैठती हैं तो इनके पक्ष शरीर पर सीधे खड़े रहते हैं तथा इनकी शृंगिकाओं का सिर डंडे के सिरे की तरह मोटा होता है। शलभ प्राय: मंद रंग के होते हैं और रात मेंश् उड़ते हैं। जब बैठते हैं तो इनके पक्ष शरीर की ढँके रहते हैं और इनकी शृगिकाओं के सिरे मोटे नहीं होते।

लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism)[संपादित करें]

लेपिडॉप्टेरा के दोनों लिंगों में प्राय: भेद मालूम होता है। कुछ वंशों के नर शलभों की शृगिकाएँ कंघों के आकार की और मादा की शृंगिकाएँ सादे धागे के समान होती हैं। नरों की शृंगिकाओं पर विशेष प्रकार की ज्ञानेद्रियाँ भी हो सकती हैं। संभवत: ये घ्राणेंद्रियाँ हैं, जो मादा को खोजने में सहायक होती हैं। ऐसा अनुमान है कि मादाएँ एक प्रकार की गंध निकालती हैं, जो नरों को आकर्षित करती है। बहुत से लेपिडॉप्टेरा के नरों और मादाओं के रंगों में बड़ा भेद पाया जाता है। पपिलिआनिडी (Papilionidae) वंश की तितलियों के दोनों लिंगों के रंग तथा आकार में बहुत भेद रहता है। ऑरजिया पोस्टिका (Orgyia postica) शलभ की मादा पक्षहीन होती है, किंतु नर के पक्ष पूर्ण रूप से विकसित रहते हैं।

एक ही जाति की कुछ तितलियों के रंग में विभिन्न ऋतुओं में इतना अधिक भेद हो जाता है कि वे विभिन्न जातियों की मालूम होने लगती हैं। सबसे अच्छा उदाहरण अरेशनिआ लिवेना (Araschnia levana) हैं, जो यूरोप में पाई जाती है। इस तितली के दो रूप होते हैं : एक वसंत रूप, जो वसंत ऋतु में पाया जाता है और लिवेना कहलाता है तथा दूसरा, जो ग्रीष्म में ऋतु में मिलता है, प्रोसा (Prosa) कहलाता था। पहले ये दोनों रूपवाली दो जातियाँ समझी जाती थीं। कुछ तितलियाँ तीन तीन रूपों में भी पाई जाती हैं। उत्तरी अमरीका की तितली, (lphiclides marcellus) का, जो शीतकाल के प्यूपों से वसंत ऋतु के आरंभ में निकलती हैं, रूप मारसेलस जैसा होता है, किंतु जो कुछ समय पश्चात् निकलती है उसका रूप टेलोमोनाइडिस (Telamonides) का सा होता है। जो अंडे ग्रीष्मकाल में दिए जाते हैं, उनसे उत्पन्न हुई तितलियों का रंग इन दोनों से भी भिन्न होता है और वे लिकॉन्टी (Lecontei) कहलाती हैं।

लेपिडॉप्टेरा के जीवन में विचित्रताएँ[संपादित करें]

भारत और ऑस्ट्रेलिया में पाई जानेवाली तितली, लिफाइरा ब्रेसोलिस (Liphyra brassolis), के डिंभों के ऊपर कड़े बाह्यत्वक का आवरण होता है और शरीर में किसी प्रकार के खंड दिखाई नहीं पड़ते। ये डिंभ ईकोफिला स्मारग्डिना (Oecophylla smaragdina) नामक चींटी के अंडों को खाते हैं। इनका कड़ा आवरण चीटियों से इनकी रक्षा करता है। प्यूपा डिंभ के आवरण के भीतर ही बन जाता है। जब तितली प्यूपा से निकलती है, उस समय इसके शरीर पर नारंगी और भूरे शल्कों के ऊपर श्वेत वर्ण के शल्क लगे होते हैं। श्वेत वर्ण के शल्क तितलियों की रक्षा करते हैं। ये शीघ्रता से छूटकर गिर जाते हैं और जब चीटियों को चिपट जाते हैं तो उनको क्लेश पहुँचाते हैं। उत्तरी अमरीका के युका शलभ (yueca moth), या टेजिटिकुला ऐल्बा (Tegeticula alba) की मादा के मैक्सिला पर एक लंबी स्पर्शिका (tentacle) होती है, जो युका पुष्प (yucca flower) से पराग एकत्र करने के लिए विशेष प्रकार की बनी होती हैं। जब युका शलभ की मादा पर्याप्त मात्रा में पराग एकत्र कर लेती है, तो अपने अंडों को पुष्प के अंडाशय में रख देती है। प्राय: यह पुष्प वह नहीं होता जिससे इसने पुराग एकत्र किया था। यह अंडे रखने के पश्चात् अपने लाए हुए पराग पुंकेसर के मुख में ठूंस देती है। इस विधि से मादा युका पुष्प के बीज का उत्पादन निश्चित कर देती है, क्योंकि इसके डिंभ इन्हीं बीजों को खाते हैं। जो बीज इन डिंभों के खाने से बच जाते हैं, उनसे युका पौधों का उत्पादन होता रहता है। तीसरा उदाहरण जलवासी शलभों का है। एसिंट्रोपस (Acentropus) जाति के शलभों के डिंभ जल में उगनेवाले पौधों की पत्तियों में सुरंगे बनाकर रहते हैं। जब ये डिंभ बड़े हो जातेश् हैं, तब पत्तियों को मिलाकर एक छोटा सा घर बना लेते हैं। प्यूपा भी इसी प्रकार के बने घर में रहता है। मादा के दो रूप होते हैं। लंबे पक्षवाली मादाएँ हवा में उड़नेवाली होती हैं तथा छोटे पक्षवाली मादाएँ जल के भीतर रहती हैं और अपने पक्षों द्वारा तैरती हैं।

कुछ लेपिडॉप्टेरा ध्वनि भी कर सकते हैं। ऐकरोंशिया (Acherontia) शलभ चीं चीं ध्वनि करता है। यह ध्वनि संभवत: जिह्वा के मध्य से हवा निकालने से उत्पन्न होती है। इल्ली भी तेज चिटकने के सदृश ध्वनि करती है, यह ध्वनि मैंडिबलों की पास लाने से उत्पन्न होती है। कुछ शलभ उड़ते समय अपने अग्रपक्ष को अपनी टाँग पर के काँटों से रगड़कर ध्वनि करते हैं।

प्रवजन[संपादित करें]

लेपिडॉप्टेरा की कुछ जातियाँ संसार के एक भाग से दूसरे भाग का प्रवजन करती हैं। उत्तरी अमरीका की डैनेआस आर्किपस (Danaus archippus) नामक तितलियाँ सहस्रों की संख्या में शीतकाल में दक्षिण की ओर प्रवजन करती हैं, किंतु वसंत ऋतु में फिर उत्तरी भागों में लौट आती हैं। भारत में कोलिया (Colia) नामक तितलियाँ ग्रीष्म ऋतु में हिमालय पर्वत की ओर १७,००० फुट की ऊँचाई तक प्रवजन करती देखी गई हैं। पाइरेमिस कार्डुइ (Pyrameis cardui) नामक तितलियाँ वसंत ऋतु में उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी यूरोप से उत्तर की ओर आइसलैंड तक पहुँच जाती हैं। प्रवजन के समय तितलियों के झुंड महासागरों की ओर से आते हुए देखे गए हैं। कभी कभी ये तितलियाँ उन जहाजों पर भी आ जाती है जो स्थल से कई सो मील दूरी पर महासागर में जा रहे होते हैं।

भौगोलिक वितरण[संपादित करें]

लेपिडॉप्टेरा उन स्थानों में तो अवश्य पाए जाते हैं, जहाँ पुष्पयुक्त पादप उग सकते हैं। ये कीट केवल उन्हीं स्थानों में नहीं रह सकते हैं जो ध्रुवों के पास हैं। उत्तर की ओर ८८ अंश अक्षांश से दक्षिण की ओर ५० अंश अक्षांश तक ये पाए जाते हैं। कुछ जातियाँ तो सारे संसार में पाई जाती हैं। पाइरेमिस कार्डुइ नामक तितली दक्षिणी अमरीका के अतिरिक्त सभी देशों में पाई जाती है। अग्रोटिस इपसिलॉन (Agrotis ypsilon) शलभ सारे संसार में पाया जाता है। भारत में भी अनेकों जातियाँ पाई जाती हैं। संसार की कुछ सबसे सुंदर तितलियाँ भारत में ही पाई जाती है, किंतु सबसे अधिक जातियाँ ब्राज़िल में मिलती हैं।

भूवैज्ञानिक (geological) वितरण[संपादित करें]

उत्तरी अमरीका में आदिनूतन (Eocene) और अल्पनूतन (Oligocene) युग के तितलियों के कुछ अवशेष मिले हैं। तथा कुछ शलभ बॉल्टिक सागर से प्राप्त ऐंबर में पाए गए हैं। वास्तव में लेपिडॉप्टेरा के फॉसिल बहुत थोड़ी संख्या में मिले हैं। इसका कारण संभवत: लेपिडॉप्टेराओं की कोमलता है।

वर्गीकरण[संपादित करें]

पक्षों की रचना के आधार पर लेपिडॉप्टेरा गण दो उपगणों में विभाजित किया गया है :

  • (१) होमोन्यूरा (Homoneura) में दोनों जोड़ी पक्षों का शिराविन्यास एक सा होता है,
  • (२) हेटरोन्यूरा (Heteroneura) के दोनों पक्षों के शिराविन्यास में भेद पाया जाता है। कुछ कीटविज्ञानी इस गण को मादा के बाह्य जननांगों के आधार पर तीन उपगणों में विभाजित करते हैं, किंतु यह विभाजन उचित नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें नर का कोई महत्व ही नहीं रहता।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • ए.डी. इम्ल : ए जेनरल टेक्स्ट बुक ऑव एंटोमॉलोजी, रिवाइज़्ड वाई ओ.डब्लू.-रिचर्ड्स ऐंड आर.जी. डेविस (१९५७);
  • टी.वी.आर. ऐय्यर: ए हैंड बुक ऑव इकोनॉमिक एंटोमॉलोजी फॉर साउथ इंडिया (१९४०);
  • के पी. श्रीवास्तव : मॉरफॉलोजी ऑव लेमन बटरफ्लाई पैपीलियो डिमोलियस, थीसिस (१९५५);
  • एच.एम. लेफराय : इंडियन इंसेक्ट लाइफ़ (१९०९)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]