व्येरा लुदीकोवा

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व्येरा लुदीकोवा (चेक भाषा में Věra Ludíková) चेक कवि है। उसका जन्म १६ जून १९४३ हुआ। वह आध्यात्मिक काव्य लिखती है। उसकी कविताओं का बहुत-सी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। अक्सर कविताओं का एस्पेरांतो भाषा में अनुवाद किया गया है। कुछ उसकी कविताएँ हिंदी में भी उपलब्ध हैं। जिन पुस्तकों में हिंदी में लिखा हुआ काव्य मौजूद है उनके नाम नीचे दिये जाते हैं।

आतमा की आवाज़ सुनना (१+१६)[संपादित करें]

यह पुस्तक सन २००० प्रस्तुत हुई। इस किताब में एक कविता है जिसका १६ भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में अनुवाद छेदी लाल और दागमार मारकोवा

कंटाटा[संपादित करें]

यह किताब सन २००१ प्रस्तुत हुई। गगन नामक कविता का अनुवाद स्वेतिस्लव कोस्तिच से किया गया है।

ऋतुराज ‌‌[संपादित करें]

(चेक भाषा में Je jaro) यह किताब सन २००२ प्रस्तुत हुई। इस पुस्तक में एक आध्यात्मिक लेख है जिसका ३७ भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हिंदी में अनुवाद स्वेतिस्लव कोस्तिच

हे प्राग, जब तुझसे विदा ले रहा हूँगा ‌‌[संपादित करें]

(चेक भाषा में Až jednou budu se s tebou loučit, Praho) यह किताब सन २०११ प्रस्तुत हुई। यह कविता सिर्फ़ चेक भाषा में लिखी हुई है लेकिन ज़्देन्येक वाग्नेर (Zdeněk Wagner) ने इस कविता के भाग का हिंदी में अनुवाद किया और दूसरे अनुवादों के साथ उसे सुनाया। हिंदी में अनुवाद अनुवादक के जाल पृष्ठ से उपलब्ध है।

काली बुंद का वज़न क्या है[संपादित करें]

(चेक भाषा में Kolik váží černá kapka) सन २०१८ प्रकाशित थी। यह काव्यात्मक किताब है, एतिहासिक नहीं। रचायित्री इस में प्राचीन सभ्यताओं जैसे प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, प्राचीन चीन, तिब्बत आदि के बारे में लिखती हैं और दिखाती हैं कि इन सभ्यताओं का इतिहास व संस्कृति वर्तमान समय से कैसे संबंधित है। किताब में सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में भी कुछ लिखा जाता है। यह महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प भी है क्योंकि अक्सर यूरोपीय लोग हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ो बहुत कम जानते हैं। किताब के आवरण पृष्ठ पर ऋग्वेद के चार छंद दिखाए जाते हैं।