व्यभिचार

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amrutam अमृतमपत्रिका

नारी की मर्जी क्या रहती है?.

नारी से कैसे जीते?..

नारी के बारे में हंसी मजाक बाटे बताएं


नारी शक्ति क्या है? इतनी अमीर भी नहीं होती, वे कि सब कुछ खरीद लें।

पर खुद को गरीब भी नहीं समझती कि खुद बिक जाएँ।

दर्द सहकर चमत्कार करने वाली नारियों को 8 मार्च का दिन समर्पित है! दुःख-दर्द की भी अपनी एक अदा है,

ये तो सहने वालों पर ही फ़िदा है..!!

पहली बार वीमेन डे १९११ में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में मनाया गया था! भरोसा न करें गैरों पर, जब चलना है, खुद के पैरों पर..क महिलाओं की खासियत यह है कि वे किसी भी चीज को चुनोतियों के रूप में लेती हैं। वे परेशानियों से डरती नहीं हैं। लेकिन चूतियों आदमियों की वजह से हिम्मत हार जाती हैं और पुरुष सदैव समस्या ग्रस्त रहता है।

सार इतना है कि नारी बड़ी होशियारी से हर बात को चैलेंज के रूप में और व्यक्ति प्रॉब्लम के रूप में देखता है।

चैलेंज सकरात्मक है और प्रॉब्लम नकारात्मक। इन सबके बावजूद "ज्ञा" सके ज्ञानी पुरुष ही कहलाता है। यह असमानता मान्य नहीं है। अगर गलत बात पर भी महिलाएं सिर हिलाएं, तो ये अच्छी बात नहीं है। अनजान तो रावण भी नहीं था अपने अंजाम से।

मगर ज़िद्द थी उसकी अपने अंदाज़ में जीने की।।

हालांकि एक षड्यंत्र के तहत शिवभक्त दशानन को बदनाम किया गया।

10कंधर दशानन का दुःख…एक बार जज ने जब गीता पर हाथ रखने को कहा, तो रावण बोला… मीलॉर्ड मैंने सीता को कभी छुआ भी नहीं और आप गीता पर हाथ रखने का कह रहे हैं। धर्म के ठेकेदार तहलका मचा देंगे।

कुछ कर कमाने या सफलता के बाद ही लोग किसी के पीछे चलते हैं। इस तरह कि-

आज मैं कुछ भी नहीं हूँ मैंने माना, कल को प्रसिद्ध हो जाऊं, तो कोई रिश्ता मत निकाल लेना..!!

कुछ बिरली महिलाओं ने काली बनकर दुनिया के दिमाग में नारी के प्रति भरी गन्दगी, जिल्लत को मिटाया। घर हो बुद्धि की नाली साफ कर देश में दीवाली मनवाने वाली सभी माँ महाकाली स्वरूप महिलाओं को सादर नमन…

दुर्गा रहस्य के अनुसार एक बार माँ काली ने भी प्रकृति की रक्षा के लिए भारी संघर्ष कर उत्पात मचा दिया था, तब शिव भी चरणों में गिर पड़े। फिर सप्तऋषियों ने माँ से ऐसे प्रार्थना की कि-

जय मां दक्षिणा काली, तेरा वचन न जाये खाली।

बेटी ऐसे बाजीगर की, पागल कर दी मति शंकर की।

महिला के साथ जब हद से ज्यादा अति हो जाती है, तो वो पुरुष या पति, सबकी मति यानी अक्ल ठिकाने लगा देती है। महिलाएं इसलिए भी खामोश रहती हैं कि

अगर बोल देंगी, तो सबकी धज्जियां उड़ा देंगी।

स्त्री के समर्पण में कोई सानी नहीं है। कम उम्र में ही सयानी होकर कल्याणी की भावना से भर जाती है।

माँ रूप में अवतरित महिलाएं हमारे लिए माननीय हैं। जिसने माँ की कद्र कर ली। वो एक दिन भद्र पुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है।

फिर उसे कुछ भी खोजने की जरूरत नहीं है। वैसे भी शिव हो या शिवा खोजने से नहीं, खो-जाने से मिलते हैं।

माँ की महिमा अपरम्पार…ब्रह्मांड में माँ सबसे छोटा ऐसा शब्द है जिसे बोलने के लिए नीचे का पृथ्वी रूपी ओंठ और ऊपर का आकाश रूपी ओंठ को मिलाना पड़ता है।

MOTHER में केवल "M" हटाते ही सारा संसार OTHER हो जाता है।

नवीन युग पीढ़ी से निवेदन है कि अपनी माँ को मम्मी या ममा, मम्मा न बोलकर केवल माँ कहें। माँ के उच्चारण से भी माँ महाकाली, माँ दुर्गा, महासरस्वती की उपासना हो जाती है। किसी सन्त ने लिखा है कि…

स्त्री ना होती जग माहीं, सृष्टि को रचावै कौण। ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों, मन में धारें बैठे मौन। एक ब्रह्मा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।'

अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।


महिलाओं के बारे में मर्दों की मानसिकता विकिपीडिया या गूगल पर अनेक लेख, नेक लोगों ने लिखें हैं, जो ज्ञानवर्धक हैं। किंतु ये कॉमेडी लेख उन रसिया पाठकों को समर्पित हैं, जो कभी रसिया गए ही नहीं। महिलाएं माथा न खपायें, तो ठीक ही रहेगा।

विश्व में अधिकांश आदमी महिलाओं की चर्चा में मग्न ओर प्रसन्न होते हैं। पुरूषों का सबसे बड़ा आकर्षण, वस्त्राभूषण की तैयारी नारी की वजह से ही है।

कन्या कुंवारी हो, तो लड़कों का मन मचलने लगता है। नारी से ब्रह्मचारी भी नहीं बचे।

महिला के मन में मर्दों के बारे में विचार…आदमी इतना बुरा भी नहीं होता, जितना महिलाएं या पत्नी समझती है और इतना अच्छा भी नहीं होता जैसा मां समझती है। वो कैसा और कितना कमीना होता है इसे केवल दोस्त ही जानते हैं। ये अज्ञान दायक ब्लॉग उन मित्रों के लिए है। कुछ कटु-कड़वे वचन, जो चुभन दे सकते हैं।

मर्द और महिला की मानसिकता…मर्द को सामान की और औरतों को सम्मान की बहुत चिन्ता रहती है।

मर्द को मौत से डर लगता है और महिला सौत से घबराती है।

महिला को जितना तरस दुनिया पर आता है उतना पति पर नहीं।

80% पत्नियां अपने पति की आदत बदलना चाहती हैं, तो इतने ही मर्द के मन में अपनी पत्नी बदलने चाह रहती है।

किसी ने सही कहा है कि- ये औरत है साहिब...निभाने पर आ जाये, तो नाली में पड़े शराबी के साथ पृरी जिंदगी गुजार दे और यदि छोड़ने पर आ जाये, तो बिलगेट्स को भी छोड़ दे।

नारी की समझदारी, होशियारी, जिम्मेदारी और यारी-अय्यारी, राय-खुमारी से सन्सार और ब्रह्माण्ड टिका है। कहीं-कहीं नारी की गद्दारी के किस्से भी प्रचलित हैं।

महिला … जाने-मन की, इसलिए आशिक इन्हें जानेमन भी कहते हैं.....

आगे पढ़ें अनोखी बातें-स्त्री तेरे नाम अनेक पुरुष का भाग्य और नारी का चरित्र!

क्या महिलाएं पुरुषों से 7 गुना ज़्यादा सेक्स का आनंद उठाती हैं? जाने-महाभारत की कथा

आप हैरान हो जाएंगे-यह जानकर कि महिलाओं के बहुत से निजी अंग मर्दों के नाम पर ही हैं।

सदियों से सत्य है- पुरुषों का धन लुटता है और औरतों की इज्जत...

कुछ तो खास है-महिलाओं में.... महिलाओं की महानता वेद-पुराण, ग्रन्थों के बखान.... मन्त्र शक्ति का कमाल, जो कर देगा मालामाल.... महिलाओं के लिए विशेष मन्त्र.... महादेव का अर्धनारीश्वर रूप क्यों? क्या भटकना और पुरुषों की आदत होती है?

पुरुष चाहें कितना भी ज्ञानी हो, स्त्री को समझना और समझाना दोनों ही मुश्किल काम है।

पति चाहे कितना ही त्याग कर ले पत्नी सदैव भारी रहती है ओर पति आभारी!! यही नारी की महिमा है।

आदमी का पूरा जीवन मशीनों ओर हसीनों की देखरेख में निकल जाता है।

वैसे तो आदमी शेर होता है पर शादी के बाद शेर पर दुर्गा बैठ जाती है।

जोड़ों का दर्द क्या होता है इसे केवल जोड़े ही जानते हैं कुवारों को कुछ पता नहीं होता। लेना देना नहीं।

मेहरिया और मानसून में एक समानता है कि वे न किसी की मानते है और किसी की सुनते हैं।

लड़कियों में 9 देवी का रूप देखा जाता है। शादी के बाद किस रूप में प्रकट होंगी यह महत्वपूर्ण होता है। यह पति के कर्मों पर निर्भर होता है।

शोले फ़िल्म से सीखा कि औरतें बहुत जिद्दी होती हैं।वीरू के लाख मना करने के बाद भी बसन्ती उन कुत्तों के सामने नहीं नाचना, फिर भी नहीं मानी।

मेल किसी से भेदभाव नहीं करता आप किसी भी मेल में बैठ जाओ सम्मान पूर्वक ठिकाने पर पहुंचाता है!!

मकर संक्रांति के दिन ही पत्नियां केवल-तिल के लड्डू बनाती हैं।-बाकी दिन तिल का ताड़ बना देती है।

पत्नी ने बड़े प्यार से पूछा,….ब्रेड में शहद लगा दू,…पति बोला…, "मधुमक्खी के मुहँ से निकला झूठा नहीं खाता"। पत्नी बोली अंडा बना दू। वो तो वहाँ से निकलता है। अस्पताल में महिला को चौथा बच्चा हुआ। नर्स ने बधाई देकर पूछा? क्या मांगा था…लड़का या लड़की। महिला बोली कुछ नहीं मांगा था। बाथरूम से नहाकर बाहर निकली, तो इसके पापा से टॉवल मांगा था।

सारे ज्वर मादा मच्छर के काटने से होते हैं।

कभी लिपट जाती थी, बादलों के गरजने पर, वो आज बादलों से भी ज्यादा गरजती है।

प्रेमिका को सिरदर्द हुआ, प्रेमी ने चूमा तो आराम मिल गया। फिर आंखे दर्द हुईं, तो प्रेमी ने आँख चूम ली दर्द मिट गया। बगल में एक बुजुर्ग बैठे था उसने चमत्कार देखकर कहा बेटा मुझे बवासीर है, मेरी भी चूम लो तो मुझे भी राहत मिल जाएगी।

बच्चे को नटखट क्यों कहते हैं क्यों कि शादी के बाद में नट ढ़ीला औऱ खट खट बनी रहती है।

गरीबी में आदमी के कपड़े उतर जाते हैं और अमीरी में ओरतें कपड़े उतार फेंकती हैं।

एक्सीडेंट की 3 निशानी गाय भैंस ओर जनानी।

यूक्रेन से मिलने वाला सबक…जब तक जेब में वियाग्रा न हो, तब तक किसी महिला मित्र को आमंत्रित न करें।

आपने देखा होगा महिलाएं मुहँ पर हाथ रखकर रोती है और आदमी रोता है तो आंख पर हाथ रख लेता है। एक रिसर्च के मुताबिक महिला सबसे ज्यादा गुनाह जुबान से ओर मर्द आंखों से करता है।

पुलिस और पत्नी की राशि एक ही है। पुलिस रिमांड से मारती है पत्नी डिमांड से मारती है।

कुछ ही पति अपनी पत्नी को बेपनाह चाहते हैं शेष सब पनाह चाहते हैं।

शादी बच्चों का खेल नहीं, लेकिन खेला बच्चों के लिए जाता है।

दुनिया में हजारों अविष्कार हुए लेकिन पत्नी के सामने पति की दाल गल जाए ऐसा कुकर नहीं बना।

साली-घरवाली में फर्क…जो शादी में जूते चुराए, उसे साली कहते हैं और जो जूते मारे उसे घरवाली कहते हैं।

कुछ महिलाओं में प्रतिभा बहुत होती है लेकिन साधन नहीं।

सिर दबाते हुए पत्नी ने पूछा शादी के पहले कोन दबाता था। हमने कहा कभी दर्द हुआ ही नहीं!!

लोगों के भटकने की वजह…अक्सर कहा जाता है कि एक सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है। इस तरह की बातें सुनकर कुछ युवा भटककर अपना ध्यान पढ़ाई में कम ...और औरतों में ज़्यादा लगाने लगते हैं...!! लेकिन हमने औरतों को घांस नहीं डाली अन्यथा भैंसे क्या खाती।

घर में सबसे ज्यादा सम्मान पत्नी के कपड़े देते हैं, जब अलमारी खोलता हूं, तो 2/3 चरणों में गिर जाते हैं।

अगर आप पत्नी के कहने पर रोज लोकी, करेला, एलोवेरा का जूस, पत्तियां खएँगे तो आपका वजन कम हो जाएगा लेकिन जीने की इच्छा भी खत्म हो जाएगी।

युवा प्रेमी को बहुत अखरता है… जब जिंदगी में सब कुछ हो, पर प्यार न हो। खड़ा हो लेकिन जुगाड़ न हो।

लव मैरिज के बाद लड़के एक बात यह भी याद रखें--अल्पमत सरकार हो या अल्पआय पति, दोनो की ही होती है- हमेशा दुर्गति।

आचार्य चाणक्य के नीतिशास्त्र श्लोकानुसार-

अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदा:।

सेवितव्यं मध्याभागेन राजा बहिर्गुरू: स्त्रियं:।।

अर्थात- राजा या धनशाली व्यक्ति, अग्नि और नारी इन तीनों के ज्यादा करीब और न ही इनसे ज्यादा दूर जाना चाहिए यानि संतुलन बनाकर एक निश्चित दूरी रखनी चाहिए।

किसी स्त्री के अधिक नजदीक जाने से व्यक्ति को ईर्ष्या का और ज्यादा दूरी बनाने से घृणा तथा निरपेक्षता मिलती है। लेकिन लड़के इनमें घुसे ही जा रहे हैं।

प्रेम में आजकल लड़कों का काम निपटने के बाद दिल में बस इतनी याद रह जाती है जैसे अगरबत्ती जलने के बाद स्टैंड पर बची लकडी या सीख।

महिलाओं के हिंदी नाम… एयर होस्टेज-हवाई सुंदरी नर्सेस-दवाई सुंदरी लेडी टीचर-पढ़ाई सुंदरी मैड यानी सफाई सुंदरी वाइफ यानी लड़ाई सुंदरी गर्ल फ्रेंड- प्रेमसुंदरी कहलाती है।

विभिन्न शोहरों की पत्नियां उनसे कैसे लड़ती है़ :

Pilot's wife :- ज्यादा मत उड़ो Teacher's wife :- मुझे मत सिखाओ Painter's wife :- थोबड़ा रंग दूंगी Dhobi's wife :- धो दूंगी Actor's wife :- ज्यादा नाटक मत करो Dentist's wife :- बत्तीसी तोड़ दूंगी Marwadi's wife :- हिसाब से रहो Engineer's wife :- सारे पुर्जे ढ़ीले कर दूंगी Architect's wife :- ढ़ंग से रहो वरना थोबड़े का डिजाईन बदल दूंगी Sunar's wife :- एक जड़ दूंगी Pandit's wife :- घंटी बजा दूंगी Musicians wife :- ढोल बजा दूंगी Driver's wife :- ब्रेक लगा दूंगी Builders wife :- ईंट से ईंट बजा दूंगी Doctors wife :- सही इलाज कर दूंगी Advocate ki wife :- अपनी वकालत कोर्ट तक ही सीमित रख।


व्यभिचार एक अपराध है । व्यभिचार, विवाहित लोगों के मध्य में अपने पति या पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य के साथ किए जाने वाले व्यभिचार को संदर्भित करता है, और यह शब्द पुराने नियम में शाब्दिक और रूपक अर्थात् दोनों में अर्थों में उपयोग किया गया है।

स्त्री पुरुषों की जननेन्द्रियाँ शरीर के अन्य समस्त अंगों की अपेक्षा अधिक चैतन्य सजीव, कोमल, सूक्ष्म, प्राण विद्युत से युक्त होती हैं। मानव शरीर के सूक्ष्म तत्वों को जानने वाले बताते हैं कि स्त्री में ऋण (निगेटिव) और पुरुष में धन (पाजेटिव) विद्युत का भंडार होता है। दर्श स्पर्श से भी यह विद्युत स्त्री पुरुषों में एक विचित्र कम्पन उत्पन्न करती रहती है। परन्तु शरीर के सजीव तम प्राण केन्द्र गुह्य स्थानों का जब दोनों एकीकरण करते हैं तब तो एक शरीर व्यापी तूफान उत्पन्न हो जाता है। दोनों के शरीर के विद्युत परिमाण दोनों के अन्दर अत्यन्त वेग और आवेश के साथ प्रवेश करते हैं और दोनों में एक शक्तिशाली अंतरंग संबंध-प्रेम उत्पन्न करते हैं। एक दूसरे के सूक्ष्म तत्वों का एक दूसरे में बड़ी तीव्र गति से प्रचुर परिमाण में आदान-प्रदान होता है। यही कारण है कि वे एक दूसरे के ऊपर आसक्त हो जाते हैं, उनके बीच एक ऐसा आकर्षण और सामंजस्य स्थापित हो जाता है जिसे हटाना या तोड़ना असाधारण रूप से कठिन होता है। पाँव दाबना, सिर मसलना जैसी शारीरिक सेवाओं में ऐसी कोई हलचल नहीं होती किन्तु यौन संबंध से दो व्यक्तियों के सूक्ष्म प्राण तत्वों में आवेश पूर्ण आदान-प्रदान होता है। इसलिए शरीर सेवा और यौन संबंध को समान नहीं कहा जा सकता।

पतिव्रत और पत्नीव्रत का समर्थन शास्त्र ने इसी वैज्ञानिक आधार पर किया है। एक पुरुष का एक स्त्री से संपर्क होने पर उन दोनों में प्रेम भाव बढ़ता है। एक की शक्ति निश्चित मार्ग से दूसरे को प्राप्त होती है। गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से एक दूसरे के निकट आते हैं और एक प्राण दो शरीर बन जाते हैं। यौन संबंध के द्वारा दोनों के रक्त में सजीव संमिश्रण होता है, किसी बीमारी में किसी रोगी को रक्त का इंजेक्शन देना होता है तो डॉक्टर लोग पति-पत्नी के जोड़े में से ही रक्त लेने को महत्व देते हैं। क्योंकि दम्पत्ति के रक्त में सहवास के कारण एक समान तत्व उत्पन्न हो जाते हैं।

पति-पत्नी के बीच सच्चा प्रेम, वफादारी, सेवा, आत्मीयता, विश्वास तभी रह सकता है जब उनमें ‘एकनिष्ठा’ का व्रत हो। यदि कोई स्त्री अनेक पुरुषों से या कोई पुरुष अनेक स्त्रियों से गुप्त संबंध स्थापित करता है तो उसके शरीर में, रक्त में, मन में, मस्तिष्क में, अनेकों तत्व मिल जाने के कारण अस्थिरता, खींचतान, आकर्षण, विकर्षण के दौर चलने लगते हैं। ऐसी अवस्था में सच्चा प्रेम, वफादारी एवं आत्मीयता असंभव है। व्यभिचारी स्त्री पुरुषों का दाम्पत्ति जीवन कपट, धूर्तता, माया चर और छल से भरा हुआ होता है। वे अवसर पड़ने पर अपने साथी को धोखा दे सकते हैं।

व्यभिचार चोरी, भय, लज्जा और पाप की झिझक के साथ किया जाता है, उसे छिपाने का प्रयत्न किया जाता है। उपयुक्त अवसर ढूँढ़ने के प्रपंच उनके मन में उठा करते हैं। यह पाप वृत्तियाँ कुछ समय लगातार अभ्यास में आते रहने पर मनुष्य के मन में वे गहरी उतर जाती हैं और जड़ जमा लेती हैं। फिर उसके स्वभाव में वे बातें शामिल हो जाती हैं और जीवन के विविध क्षेत्रों में वे प्रकटित होती रहती हैं। यही कारण है कि व्यभिचारी व्यक्ति अक्सर चोर, निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं। वे अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय-समय पर अपनी इस कुप्रवृत्तियों का परिचय देते रहते हैं। उनका विश्वास उठ जाता है, लोगों के मन में उनके लिए प्रतिष्ठा तथा आदर की भावना नहीं रहती, सच्चा सहयोग भी नहीं मिलता, फलस्वरूप जीवन विकास के महत्वपूर्ण मार्ग बन्द हो जाते हैं। पाप वृत्तियों के मन में जम जाने से अन्तःकरण कलुषित होता है। प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता नष्ट होती है और हर क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। यह तीनों ही बातें नरक की दारुण यातना के समान हैं, व्यभिचारी को अपने कुकर्म का दुष्परिणाम इसी जीवन में उपर्युक्त तीन प्रकार से नित्य ही भुगतना पड़ता है।

स्त्री पुरुषों के सम्मिलन से एक का प्रभाव दूसरे पर जाता है। एक के दुर्गुण दूसरे में प्रवेश हुए बिना नहीं रहते। काम भोग करने के साथ दूसरा पक्ष अपनी कुवासनाओं की छाप भी छोड़ता है यह परत दिन पर दिन मजबूत होते जाते हैं और वह दिन-दिन अधिक दुर्गुणी बनता जाता है। व्यभिचार स्त्री और पुरुष दोनों के लिए घातक है, पर स्त्रियों के लिए विशेष रूप से घातक है। कारण यह है कि स्त्रियाँ अपने शरीर के सबसे सूक्ष्म, चेतन एवं प्राण युक्त स्थान गुह्येन्द्रिय में पुरुष का वीर्य ग्रहण करती है। वीर्य पानी की बूँद नहीं है वरन् पुरुष के शरीर और मन का सार भूत प्राण सत्व है। उसकी एक-एक बूँद में मनुष्य उत्पन्न करने की प्रचंड शक्ति भरी हुई है। उस प्रचंड, शक्ति शाली प्राण सत्व के साथ पुरुष की गुह्य और प्रकट शक्तियाँ केन्द्रीभूत होती हैं। इस द्रव प्राण सत्व को योनि मार्ग में धारण करना ऐसा ही है मानो किसी के गुण अवगुणों के सार भाग का इंजेक्शन लेना। यह निश्चित है कि पापी और पतित स्वभाव के व्यक्ति ही व्यभिचारी होते हैं उनका पाप एवं पतन, प्राण सत्व वीर्य के साथ स्त्री के आत्मिक क्षेत्र में व्याप्त हो जाता है और उसमें भी यह दुर्गुण भर देता है।

कितने ही व्यभिचारी पुरुषों के संयोग से उनके अनेकों प्रकार के दोषों को अपने सूक्ष्म शरीर में संचित कर लेने से स्त्री की निर्बल अन्तः चेतना बहुत ही विकृत हो जाती है। एक म्यान में अनेकों तलवार ठूँसने से भयंकर स्थिति उत्पन्न होती है। वैसे ही एक स्त्री के शरीर में नाना प्रकार के गुण, कर्म, स्वभाव एवं प्रभाव प्रवेश कर जाते हैं तो वे आपस में टकराते हैं। उसका प्रभाव मनोभूमि को विकृत कर देता है। व्यभिचारिणी स्त्रियाँ सीधे स्वभाव की नहीं रहती, उनमें चिड़चिड़ापन झुँझलाहट, घबराहट, आवेश, अस्थिरता, रूठना, असत्य, छल, अतृप्ति आदि दुर्गुणों की मात्रा बढ़ जाती है, सिर दर्द, कब्ज, दर्द, खुश्की, प्यास, अनिद्रा, थकावट, दुःस्वप्न, दुर्गन्धि आदि शारीरिक विकार भी बढ़ने लगते हैं एक शरीर में अनेकों पुरुषों के प्राण का स्थापित होना, इस प्रकार के अनेकों दुखदायी परिणाम उपस्थित करता है। वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियों का सान्निध्य ऐसा अनिष्टकर होता है कि पुरुष को बड़े तीव्र झटके के साथ नारकीय यातनाओं के कुण्ड में धकेल देता है।

कई प्रकार के वीर्यों के एक स्थान पर एकत्रित होने से विषैले रासायनिक पदार्थों का निर्माण होता है। जैसे घी और शहद अमुक मात्रा में मिला देने से हानिकारक रसायन बन जाती है वैसे ही अनेक व्यक्तियों के शुक्र कीट, योनि मार्ग में एकत्रित होकर विष बन जाते हैं, यह विष सुजाक, अतिशक, जैसे योनि रोग उत्पन्न करता है। वे रोग जब बढ़ते हैं तो उस स्त्री के संपर्क में आने वाले पुरुषों को लगते हैं पुरुषों की छूत अन्य स्त्रियों को लगती है, इस प्रकार व्यभिचार के कारण ये सत्यानाशी रोग उत्पन्न होते और फैलते हैं। जिसके पीछे यह रोग लग जाते हैं उसका पीछा मुश्किल से छूटता है। यह रोग सड़ा-सड़ा कर और रुला-रुला कर रोगी को मारते हैं। व्याभिचारिणी स्त्रियों का गर्भाशय दूषित हो जाने के कारण या तो उनके संतान होती ही नहीं, होती भी है तो पैतृक रोगों को लेकर होती है। माता-पिता की पापमयी मनोवृत्तियों का प्रभाव संतान पर निश्चित रूप से होता है। उस संतान में अनेक आसुरी दुर्गुण पाये जाते हैं, व्यभिचार से उत्पन्न हुई संतान को ‘वर्ण संकर’ के अपमानजनक घृणास्पद नाम से शास्त्रकारों ने पुकारा है। कारण यह है कि उस संतान में माता-पिता की प्रवृत्तियाँ सन्निहित रहती ही हैं। ऐसे बालकों की अभिवृद्धि होना संसार के लिए अभिशाप रूप है। इसलिए व्यभिचार सर्वथा निन्दनीय है। धर्म की दृष्टि से तो स्त्री और पुरुष दोनों के लिए ही वह एक समान पाप है परन्तु शारीरिक दृष्टि से स्त्रियों के लिए वह और भी बुरा है क्योंकि स्त्रियों के गुह्य अंग में पुरुष के वीर्य की स्थापना होती है, इससे उनके ऊपर अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक प्रभाव विशेष रूप से होते हैं। पुरुष स्त्री के वीर्य को धारण नहीं करता इसलिए किन्हीं अंशों में उसे शारीरिक हानि कुछ कम होती है।

यदि पति-पत्नी में एकनिष्ठा न हो, वे व्यभिचार में प्रवृत्त हों तो घर की आर्थिक दशा ठीक नहीं रह सकती। दोनों का ध्यान अपने तुच्छ स्वार्थ में केन्द्रित रहेगा। यदि पति व्यभिचारी हो तो दूसरी स्त्री को धन देकर अपने आश्रितों को अर्थ हीन बनावेगा। यदि स्त्री व्यभिचारिणी हो तो कभी जार पति की आवश्यकता होने पर घर का धन गुप्त रूप से उसे दे देगी। यदि जार पति से लेगी तो उसे गुप्त रूप से रखेगी, या फैशन आदि में अपव्यय करेगी। व्यभिचार से प्राप्त हुआ धन मुफ्त का सा लगता है वह बुरी तरह फिजूल खर्ची में जाता है। वेश्याएं इतना धन कमाती हैं पर यौवन ढलने पर दूसरों की मुहताज होकर रोटी खाती हैं। उनके पास जमा कुछ नहीं हो पाता। फिजूल खर्ची की आदत यदि स्त्री या पुरुष एक को भी हो तो घर की आर्थिक व्यवस्था ठीक नहीं रह सकती। वहाँ दरिद्रता और अभाव का ही सदा बोलबाला रहेगा, पति-पत्नी की एकनिष्ठा और आत्मीयता होने पर थोड़ी आमदनी में भी किफायत शारी और सावधानी बरतने से आर्थिक कठिनाई नहीं आती, परन्तु दोनों के बीच कपट या शिथिलता होने पर अच्छी आमदनी होते हुए भी अर्थ संकट बना रहता है।

व्यभिचारी व्यक्तियों को अपने प्रेमी को स्वेच्छा पूर्वक प्राप्त करने की सुविधा नहीं होती, जब अवसर भी मिलता है तो थोड़े समय के लिए। वह भी आशंका, भय और झिझक के साथ। ऐसी स्थिति में तृप्ति दायक संयोग सुख, किसी भी प्रकार नहीं मिल सकता। दाम्पत्ति सुख की यह चिह्न पूजा दोनों में से किसी को तृप्ति नहीं दे पाती। मनोविज्ञान शास्त्र के अनुसार यह प्रकट है कि- अतृप्त संयोग मस्तिष्क सम्बंधी विकार और मानसिक दुर्गुण उत्पन्न करता है। इच्छित तृप्ति की सुविधा न होने से व्यभिचारी व्यक्ति अपने प्रिय पात्र के लिए चिंतित रहते हैं। विरह दुख पाते हैं, अवसर के लिए आतुर रहते हैं, जी की जलन बुझाने और प्रेमी को आकर्षित रखने के लिए उसकी समीयता प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार की चेष्टाओं में उनका सारा ध्यान उलझा रहता है। हर घड़ी वही फितूर सवार रहता है, समय का अधिकाँश भाग उन्हीं बातों में खर्च हो जाता है, फलस्वरूप जीवन के अन्य आवश्यक एवं महत्वपूर्ण काम बिगड़ते हैं, अधूरे पड़े रहते हैं, छूट जाते हैं। इस मानसिक उद्वेग में शरीर दिन-दिन घुलता जाता है। ऐसे लोग बीमारी और कमजोरी से ग्रसित होकर अल्पायु में ही काल कवलित हो जाते हैं। असंयम के कारण अधिक वीर्यपात होता है, इस प्राण सत्व के अधिक व्यय के कारण अनेकों नवयुवक तपैदिक के शिकार होकर जीवन लीला समाप्त करते देखे गये हैं।

एक निष्ठा का बंधन शिथिल हो जाने से समाज का संगठन बिल्कुल नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा। स्त्री, बच्चे, माता, पिता आदि के संबंध एक क्षणिक ठेकेदारी मात्रा रह जावेंगे। स्वस्थता, सुन्दरता, स्वभाव या धन की अधिक मात्रा का जहाँ अवसर मिलेगा वहाँ पहले संबंध को छोड़कर लोग दूसरे नये संबंध की स्थापना किया करेंगे। तब किसी भी स्त्री पुरुष को अपने साथी पर विश्वास न रहेगा। सदा यही भय लगा रहेगा कि अधिक अच्छा अवसर मिला कि साथी पल्ला छोड़कर भागा। ऐसी आशंका के बीच किसी सुदृढ़ परिवार की स्थापना किस प्रकार हो सकती है? सुदृढ़ परिवार की, आधार शिला स्त्री पुरुष के बीच सच्ची मित्रता, एकता और आत्मीयता ही है और वह तभी हो सकती है जब एक दूसरे के प्रति वफादार हों, उसके लिए कुछ त्याग करें। इस त्याग और वफादारी की प्राथमिक परीक्षा-एकनिष्ठा, व्यभिचार से बचना ही है। जहाँ एकनिष्ठा न होगी-उन पति-पत्नी के बीच सच्ची आत्मीयता का होना असंभव है। अस्थिर सशंकित और प्रेम रहित परिवारों का समाज संसार के सारे सौंदर्य का और मानव जाति की महत्ता का नाश ही कर देगा। यदि व्यभिचार पर प्रतिबंध न होगा तो एक व्यक्ति दूसरे के और दूसरा तीसरे के घर को ताकेगा और सर्वत्र अशान्ति, अस्थिरता एवं अविश्वास का वातावरण व्याप्त हो जायेगा। स्त्री या पुरुष किसी को सच्चा साथी न मिल सकेगा।

इन सब बातों पर विचार करने से पतिव्रत और पत्नीव्रत की महत्ता स्पष्ट हो जाती है। काम सेवन एक मनोरंजक खेल मात्र नहीं है। यह प्राण विनिमय की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह वह महान रासायनिक क्रिया है जिसके द्वारा दो प्राणों का एकीकरण होता है और उस संयोग से नये प्राणों की बालकों की उत्पत्ति होती है। भावी संतति की पवित्रता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, समाज की स्थिरता, परिवार की निश्चिन्तता आदि जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं का सदाचार से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसमें शिथिलता आते ही इतनी दुखदायी उलझनें उत्पन्न हो जाती हैं जिनके सामने काम सेवन का इन्द्रिय सुख बिल्कुल तुच्छ और उपेक्षणीय है। मनुष्य समाज का सामूहिक हित जिन कामों में निहित है, वे धर्म हैं, जिन कार्यों से सामूहिक अहित होता है, वे पाप हैं। चूँकि व्यभिचार से मनुष्य जाति को सामूहिक हानि है इसलिए वह त्याज्य है एवं अधर्म है। पाठकों को व्यभिचार से दूर रहने का प्रयत्न करना चाहिए।

इन देशो में व्यभिचार की सजा[संपादित करें]

  • अधिकतर इस्लामिक देशों में व्यभिचार एक अपराध है और इसकी कडी सजा है।
  • दुनिया भर के ज्यादातर देशों में व्यभिचार को लेकर बने कानून विवाहित महिलाओं के ही खिलाफ हैं।

हालांकि विवाहित पुरुषों के लिए कम सजा या फिर एक तरह से छूट का प्रावधान है।

  • अमेरिका के भी २० राज्यों में व्यभिचार एक अपराध है। हालांकि वहां इसे लेकर मामले कम ही दिखते हैं।
  • सऊदी अरब में व्यभिचार पर मौत की सजा का प्रावधान है। हालांकि इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम बहुल देश में इस पर बेहद कम मामले दर्ज होते हैं।

भारतीय समाज मे व्यभिचार[संपादित करें]

भारत मे व्यभिचार को बहुत बड़ा खराब माना जाता है । यदि कोई स्त्री या पुरुष अपनी पति अथवा पत्नी के अलावा किसी अन्य से शरीरिक संबंध बनाते हैंं तो उन्हें बुरा समझा जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]