वीसलदेव रास

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बीसलदेव रासो पुरानी पश्चमी राजस्थानी की एक सुप्रसिद्ध रचना है। इसके रचनाकार नरपति नाल्ह हैं। इस रचना में उन्होंने कहीं पर स्वयं को "नरपति" कहा है और कहीं पर "नाल्ह"। सम्भव है कि नरपति उनकी उपाधि रही हो और "नाल्ह" उनका नाम हो। बीसलदेव रासो" की रचना चौदहवीं शती विक्रमी की मानी जाती है। बीसलदेव एक प्रतापशाली राजा एवं संस्कृत के अच्छे कवि थे। उन्होंने अपना ‘हरकेलिविजय’ नाटक शिलापट्टों पर खुदवाया तथा राजकवि सोमदेव ने ललित विग्रह नामक नाटक भी लिखा।

बीसलदेव रासो के चार खण्ड है-

  • (१) प्रथम खण्ड- मालवा के परमार भोज की पुत्री राजमती से शाकम्भरी-नरेश बीसलदेव (विग्रहराज) के विवाह का वर्णन,
  • (२) द्वितीय खण्ड- बीसलदेव का राजमती से रूठकर उड़ीसा जाना,
  • (३) तृतीय खण्ड खण्ड - राजमती का विरह-वर्णन
  • (४) चतुर्थ - भोजराज द्वारा अपनी पुत्री को वापस ले आना; बीसलदेव को वहाँ से चित्तौड़ लाने का प्रसंग।

लेकिन यहाँ ऐतिहासिक दृष्टि से असंगति दिखती है क्योंकि भोज एवं बीसलदेव में लगभग 100 वर्षों का अंतर है। बीसलदेव से सौ वर्ष पहले ही घार के प्रसिद्घ राजा भोज का देहांत हो गया था। बीसलदेव की एक परमार वंश की रानी थी,यह बात परमपरा से अवश्य चली आती थी, क्योंकि इसका उल्लेख पृथ्वीराजरासो में भी है। यह भी हो सकता है कि धार के परमारों की उपाधि ही भोज हो। आबू के परमार भी राजपूतानो में फैले हुए थे। अतः राजमती इनहि में से किसी की कन्या हो। दिये गए संवत पर विचार से कवि बीसलदेव का समसामयिक लगता है।

इस काव्य में वीर और श्रींगार का अच्छा मेल है। इसमें श्रींगार ही प्रधान रस है,वीर रस केवल आभास मात्र है। श्रींगार रस की दृष्टीसे विवाह और रूठकर विदेश जाने का मनमाना वर्णन है। यह घटनात्मक काव्य नहीं,वर्णात्मक काव्य लगती है।

इसकी भाषा को देखते हैं तो वह साहित्यिक नहीं राजस्थानी है। साहित्य की सामान्य भाषा हिन्दी है ही थी जो "पिंगल' भाषा कहलाती थी। गेय काव्य होने के कारण इसकी भाषा में भी बहुत कुछ फेरफार हुआ है। इ

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