वीरशैव

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वीरशैव धर्म एक ऐसी परम्परा है जिसमें भक्त शिव परम्परा से बन्धा हो। यह दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, ये भारत का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है पर इसके ज़्यादातर उपासक कर्नाटक में हैं और भारत का दक्षिण राज्यो महाराष्ट्र आंद्रप्रदेश केरला ओर तमिलनाड मे वीरशैव उपासक अदिक्तम है। ये एकेश्वरवादी धर्म है। तमिल में इस धर्म को शिवाद्वैत धर्म अथवा लिंगायत धर्म भी कहते हैं। उत्तर भारत में इस धर्म का औपचारिक नाम " शैवा आगम" है। अनुक्रम [छुपाएँ] १ इतिहास २ मुख्य सिद्धान्त ३ १ शिव

 २ अष्टावर्ण
 ३ षटस्थल
 ४ पंचाचार 

४ धर्मग्रन्थ ४ वीरशैव संस्कृति ६.१ वैदिक काल और यज्ञ ६.२ तीर्थ एवं तीर्थ यात्रा ६.३ मूर्तिपूजा ६.४ मंदिर ६.५ शाकाहार ६.६ भक्त ६.७ उदाहरण के पृष्ठ ७ संदर्भ ८ वाह्य सूत्र

इतिहास :[संपादित करें]

भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में वीरशैव धर्म के कई निशान मिलते हैं। इनमें एक मा पारबति मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे शिवलिंग की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के मुतबिक सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं वीरशैव थे और भारत का मूल निवसि माना है।

वीरशैव की सभ्यता को द्राविड सभ्यता कहते हैं। इतिहासकारों के दृष्टिकोण के अनुसार लगभग 1700 ईसापूर्व में वीरशैव अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये। तभी से वो लोग (उनके विद्वान आचार्य ) अपने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद मे शिव भगवान को परमब्रह्म प्रतिपादन को प्रमाण किया श्रीकर भाष्य ने, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद जगद्गुरु श्री वागिश पंडितारध्य शिवाचार्य उपनिषद जैसे ग्रन्थ को प्रस्थान त्रय ग्रन्थ मे शिवोत्तम का प्रतिपाध्य किया गये।

तिरछा पाठ

मुख्य सिद्धान्त[संपादित करें]

वीरशैव धर्म में शिवाद्वैत अथवा षटस्थल सिद्धान्त है जिसे सभी वीरशैव को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक अध्यात्म साधन का मार्ग है। वीरशैव का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई "पोप"। इसकी अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर वीरशैव मानते हैं, इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं) और बेशक, ईश्वर। वीरशैव धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। वीरशैव धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वीरशैव धर्म में चार मुख्य साम्प्रदाय हैं : १) बसवादि शरण साम्प्रदाय ह, २) आचार्य साम्प्रदाय ३ नायनार साम्प्रदाय (तमिळ शैव साम्प्रदाय) ४) कश्मीरि शैव साम्प्रदाय (जो सबि शिव को परमेश्वर मानते हैं), देवी को परमेश्वरि मानते हैं।

शिव[संपादित करें]

वीरशैव धर्मग्रन्थ शैवाग्मो (सिद्धांत शिखामणि) के अनुसार शिव ही परम तत्व है वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। शिव एक और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है। वही परम ज्ञान है। शिव के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म। परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है। वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित और अनन्त आनन्द है। शिव की पूजा लिंगको की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान किया जाता है। प्रणव ॐ (ओम्) शिववाक्य है, जिसे सभी वीरशैव परम पवित्र शब्द मानते हैं। शिव की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है और वीरशैव धर्म की विश्व को अनुपम देन है।

अष्टावर्ण[संपादित करें]

    १ गुरु : वीरशैव धर्म में गुरु को शिव का प्रति रूप माना जाता है। शिष्य कि उद्धरण 
        के लिये गुरु मु़ख्य है ओर शिष्य को धर्म मार्ग पर चलाते है।
    २ लिंगः शिव प्रति रूप यनि विश्वात्मका साकार रूप हि लिंग है। लिंगमे त्रि प्रकार है
        १) इष्टलिंग २) चरलिंग ३) स्थावरलिंग। इष्टलिंग को धर्म उपासकोने कंठमे
         धारण क‍रते है। 
    ३ जंगम : वीरशैव धर्म में जंगमो को सबसे उंचा स्थान है ओर इनका कर्तव्य धर्म
        का प्रचार ओर लोककल्यण धर्म प्रोहित्य 
    ४ पादोदक : यनि गुरु कि चरण को धोये पानि अचमन
    ५ प्रसादः शिवलिंगार्पि नविद्य सेवन
    ६ विभूति : यनि भस्म से माथे प‍र त्रीपुंड धारण करते है वीरशैव 
    ७ रुद्राक्षि : शिखा, मस्तक, कंट, गळा, करण, ओर् रुद्राक्षि से मुकुट बनाके 
         धारण करते है वीरशैव 
    ८ मंत्र : ओम नमः शिवाय पंचाक्षरि जप

षटस्थल :[संपादित करें]

 १ भक्तस्थल २ महेशस्थल ३ प्राणस्थल ४ लिंगस्थल ५ ऐक्यस्थल ६ शरणस्थल

पंचाचार :[संपादित करें]

 १ भर्त्याचार,२लिंगाचार,३सदाचार,४गणचार, ५& शिवाचार


धर्मग्रन्थ :[संपादित करें]

श्रुति वीरशैव धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। इसके अन्तर्गत अठाविस शैवागम (२८) आते हैं : वातुलागम, परमेश्वरागम श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि वीरशैव का मानना है कि इन शैवागम को परमात्मा शिव ने रेणुकाचार्यादि पंचाचार्य को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। शैवागम को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा शिष्यों को दिया जाता था। हर शैवागम में चार भाग हैं। इनके सम्बन्ध के बारे में विवेचना की गयी है। शैवागम ही वीरशैव धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं और अगर अन्य शैव साहित्य और पूराणो में कोई विवाद होता है तो शैवागमही मान्य होगी। शैवागम को छोड़कर अन्य सभी वीरशैव धर्मग्रन्थ प्रस्थान त्र्य कहे जाते हैं, क्योंकि इनमें वो कहानियाँ हैं जिनको लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया और बाद में लिखा। सभी प्रस्थान त्र्य ग्रन्थ शैवागम की प्रशंसा करते हैं। इनको शैवागम से निचला स्तर प्राप्त है, पर ये ज़्यादा आसान हैं और अधिकांश वीरशैवओं द्वारा पढ़े जाते हैं (बहुत ही कम वीरशैव शैवागम पढ़े होते हैं)। प्रमुख प्रस्थान त्र्य हैं:- आचार्यो द्वारा रचित शिद्धंत शिखाणि, वीरशैव पूराण, शिवप्रकाशम, लिंगपूराण् और शिवलिलामर्त, शिव गीता, वचन सहित्य वर्षभेंद्र विजय और प्रभुलिंगलिला, पेरिय पूराण आदि। य सबि संस्क्रत, कन्नड, मराठि, तमिल, ओर हिन्दि मे है।


तीर्थ एवं तीर्थ यात्रा :[संपादित करें]

भारत देश बड़ा विशाल देश है, लेकिन उसकी विशालता और महानता को हम तब तक नहीं जान सकते, जबतक कि उसे देखें नहीं। इस और वैसे अनेक महापुरूषों का ध्यान गया, लेकिन आज से बारह सौ वर्ष पहले जगदगुरु रेणुकाचार्य ने इसके लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होनें चारों दिशाओं में भारत के छोरों पर, पाच पीठ (मठ) स्थापित उत्तर में केदारनाथ के निकट वैराग्य्पीठ ऊकिमठ, दक्षिण में गोकर्ण के निकट रंभापूरि पीठ, दक्षिणि पूर्व में श्रीशैलमे में सूर्य सिंहासन पीठ, मध्य भारत उज्जयन में सद्धर्मपिठ ओर काशि मे विश्वरध्यपिठ। तीर्थों के प्रति हमारे वीरशैव यों में बड़ी भक्ति भावना है। इसलिए रेणुकाचार्य ने इन पीठो की स्थापना करके वीरशैव यों को पूरे भारत के दर्शन करने का सहज अवसर दे दिया। ये पंच तीर्थ पंच पिठ कहलाते है। लोगों की मान्यता है कि जो इन पंच तीर्थ की यात्रा कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।


शाकाहार[संपादित करें]

सबि वीरशैवको शाकाहारी होना ज़रूरी है। मांस, मद्य, परस्त्रिअगमन नीषेध है।

तिरछा पाठ


वीरशैव धर्म    • वीरशैव त्यौहार •   वीरशैव पंचांग •   वीरशैव संस्कार  

श्रुति[संपादित करें]

वेद · उपनिषद · शिवागम, शिवशरण वचन स्मृति: इतिहास (वीरशैवपूराण, शिवपूराण, शिवगीता) ·

स्मृति इतिहास[संपादित करें]

 : वर्षभेंद्र विजय और प्रभुलिंगलिला, पेरिय पूराण, वचन, शैव काव्य

विचार[संपादित करें]

अवतार · आत्मा · जंगम · धर्म · कर्म · मोक्ष · पंचाचार · शिव · लिंग·  · संसार · तत्त्व · अष्टावर्ण· कृतार्थ · गुरु 

दर्श

शीर्षक[संपादित करें]

न मान्यता · प्राचीन वीरशैव धर्म · भक्तस्थल · महेशस्थल · लिंगस्थल · प्राण्स्थल ·शरणस्थल · जंगमस्थल · वीरशैव धर्म एक ऐसी परम्परा है जिसमें भक्त शिव परम्परा से बन्धा हो । यह दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, ये भारत का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है पर इसके ज़्यादातर उपासक कर्नाटक में हैं और भारत का दक्षिण राज्यो महाराष्ट्र आंद्रप्रदेश केरला ओर तमिलनाड मे वीरशैव उपासक अदिक्तम है । ये एकेश्वरवादी धर्म है। तमिल में इस धर्म को शिवाद्वैत धर्म अथवा लिंगायत धर्म भी कहते हैं। उत्तर भारत में इस धर्म का औपचारिक नाम " शैवा आगम" है। अनुक्रम [छुपाएँ] १ इतिहास २ मुख्य सिद्धान्त ३ १ शिव

 २ अष्टावर्ण
 ३ षटस्थल
 ४ पंचाचार 

४ धर्मग्रन्थ ४ वीरशैव संस्कृति ६.१ वैदिक काल और यज्ञ ६.२ तीर्थ एवं तीर्थ यात्रा ६.३ मूर्तिपूजा ६.४ मंदिर ६.५ शाकाहार ६.६ भक्त ६.७ उदाहरण के पृष्ठ ७ संदर्भ ८ वाह्य सूत्र

इतिहास : भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में वीरशैव धर्म के कई निशान मिलते हैं । इनमें एक मा पारबति मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे शिवलिंग की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं । इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के मुतबिक सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं वीरशैव थे और भारत का मूल निवसि माना है ।

वीरशैव    की सभ्यता को द्राविड सभ्यता कहते हैं ।   इतिहासकारों के दृष्टिकोण के अनुसार लगभग 1700 ईसापूर्व में  वीरशैव अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये । तभी से वो लोग (उनके विद्वान आचार्य  ) अपने भगवान शिव  को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे । पहले चार वेद मे शिव भगवान को परमब्रह्म प्रतिपादन को प्रमाण किया श्रीकर भाष्य ने  , जिनमें ऋग्वेद प्रथम था । उसके बाद जगद्गुरु श्री वागिश पंडितारध्य शिवाचार्य  उपनिषद जैसे ग्रन्थ को प्रस्थान त्रय ग्रन्थ मे शिवोत्तम का प्रतिपाध्य किया  गये। 

मुख्य सिद्धान्त

वीरशैव धर्म में शिवाद्वैत अथवा षटस्थल  सिद्धान्त  है जिसे सभी  वीरशैव को मानना ज़रूरी है । ये तो धर्म से ज़्यादा एक अध्यात्म साधन  का मार्ग है । वीरशैव का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है, और न ही कोई "पोप" । इसकी अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है । धर्मग्रन्थ भी कई हैं । फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर  वीरशैव मानते हैं,  इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर ।  वीरशैव धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है ।   वीरशैव धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है । मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।  वीरशैव धर्म में चार मुख्य साम्प्रदाय हैं : १) बसवादि शरण  साम्प्रदाय  ह, २) आचार्य साम्प्रदाय ३ नायनार साम्प्रदाय (तमिळ शैव साम्प्रदाय) ४) कश्मीरि शैव साम्प्रदाय (जो सबि शिव को परमेश्वर मानते हैं),   देवी को परमेश्वरि  मानते  हैं ।

शिव

  वीरशैव  धर्मग्रन्थ शैवाग्मो (सिद्धांत शिखामणि ) के अनुसार शिव ही परम तत्व है  वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है । वो विश्व का आधार है । उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है । शिव एक, और सिर्फ़ एक ही है । वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी । वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है । वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है । वही परम ज्ञान है । शिव के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म । परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है । वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित और अनन्त आनन्द है । शिव की पूजा लिंगको  की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है । उसका ध्यान किया जाता है । प्रणव ॐ (ओम्) शिववाक्य है, जिसे सभी  वीरशैव  परम पवित्र शब्द मानते हैं । शिव की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और   वीरशैव  धर्म की विश्व को अनुपम देन है ।

अष्टावर्ण

       १ गुरु :  वीरशैव धर्म में गुरु को शिव का प्रति रुप माना जाता है। शिष्य कि उद्धरण  
                के लिये गुरु मु़ख्य है ओर शिष्य को धर्म मार्ग पर चलाते है।
       २  लिंगः  शिव प्रति रुप यनि विश्वात्मका साकार रुप हि लिंग है । लिंगमे त्रि प्रकार है
               १) इष्टलिंग २)चरलिंग ३) स्थावरलिंग । इष्टलिंग को  धर्म उपासकोने कंठमे
                 धारण क‍रते है । 
       ३ जंगम : वीरशैव धर्म में जंगमो को सबसे उंचा स्थान है ओर इनका कर्तव्य धर्म
               का प्रचार ओर लोककल्यण धर्म प्रोहित्य 
       ४ पादोदक : यनि गुरु कि चरण को धोये पानि अचमन
       ५ प्रसादः  शिवलिंगार्पि नविद्य सेवन
       ६ विभूति :  यनि भस्म से  माथे प‍र त्रीपुंड धारण करते है वीरशैव  
       ७  रुद्राक्षि  : शिखा,मस्तक,कंट,गळा,करण,ओर् रुद्राक्षि से मुकुट बनाके 
                 धारण करते है वीरशैव 
       ८ मंत्र : ओम नमः शिवाय पंचाक्षरि जप

षटस्थल : १ भक्तस्थल २ महेशस्थल ३ प्राणस्थल ४ लिंगस्थल ५ ऐक्यस्थल ६ शरणस्थल

पंचाचार : १ भर्त्याचार,२लिंगाचार,३सदाचार,४गणचार ,५& शिवाचार धर्मग्रन्थ : श्रुति वीरशैव धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। इसके अन्तर्गत अठाविस शैवागम (२८) आते हैं : वातुलागम ,परमेश्वरागम श्रुति इसलिये कहे जाते हैं क्योंकि वीरशैव का मानना है कि इन शैवागम को परमात्मा शिव ने रेणुकाचार्यादि पंचाचार्य को सुनाया था, जब वे गहरे ध्यान में थे। शैवागम को श्रवण परम्परा के अनुसार गुरू द्वारा शिष्यों को दिया जाता था। हर शैवागम में चार भाग हैं। इनके सम्बन्ध के बारे में विवेचना की गयी है। शैवागम ही वीरशैव धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं, और अगर अन्य शैव साहित्य और पूराणो में कोई विवाद होता है तो शैवागमही मान्य होगी। शैवागम को छोड़कर अन्य सभी वीरशैव धर्मग्रन्थ प्रस्थान त्र्य कहे जाते हैं, क्योंकि इनमें वो कहानियाँ हैं जिनको लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया और बाद में लिखा। सभी प्रस्थान त्र्य ग्रन्थ शैवागम की प्रशंसा करते हैं । इनको शैवागम से निचला स्तर प्राप्त है, पर ये ज़्यादा आसान हैं और अधिकांश वीरशैवओं द्वारा पढ़े जाते हैं (बहुत ही कम वीरशैव शैवागम पढ़े होते हैं)। प्रमुख प्रस्थान त्र्य हैं:- आचार्यो द्वारा रचित शिद्धंत शिखाणि, वीरशैव पूराण, शिवप्रकाशम, लिंगपूराण्, और शिवलिलामर्त, शिव गीता, वचन सहित्य वर्षभेंद्र विजय, और प्रभुलिंगलिला, पेरिय पूराण आदि।य सबि संस्क्रत,कन्नड, मराठि, तमिल, ओर हिन्दि मे है।

तीर्थ एवं तीर्थ यात्रा : भारत देश बड़ा विशाल देश है, लेकिन उसकी विशालता और महानता को हम तब तक नहीं जान सकते, जबतक कि उसे देखें नहीं। इस और वैसे अनेक महापुरूषों का ध्यान गया, लेकिन आज से बारह सौ वर्ष पहले जगदगुरु रेणुकाचार्य ने इसके लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होनें चारों दिशाओं में भारत के छोरों पर, पाच पीठ (मठ) स्थापित उत्तर में केदारनाथ के निकट वैराग्य्पीठ ऊकिमठ, दक्षिण में गोकर्ण के निकट रंभापूरि पीठ, दक्षिणि पूर्व में श्रीशैलमे में सूर्य सिंहासन पीठ , मध्य भारत उज्जयन में सद्धर्मपिठ ओर काशि मे विश्वरध्यपिठ ।तीर्थों के प्रति हमारे वीरशैव यों में बड़ी भक्ति भावना है। इसलिए रेणुकाचार्य ने इन पीठो की स्थापना करके वीरशैव यों को पूरे भारत के दर्शन करने का सहज अवसर दे दिया। ये पंच तीर्थ पंच पिठ कहलाते है। लोगों की मान्यता है कि जो इन पंच तीर्थ की यात्रा कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

शाकाहार 

       सबि  वीरशैवको शाकाहारी होना ज़रूरी है।   मांस ,मद्य, परस्त्रिअगमन नीषेध है।


वीरशैव धर्म       • वीरशैव त्यौहार •      वीरशैव पंचांग •      वीरशैव संस्कार    

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स्मृति इतिहास : वर्षभेंद्र विजय, और प्रभुलिंगलिला, पेरिय पूराण ,वचन ,शैव काव्य

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परम्परा ज्योतिष · आयुर्वेद · आरती · भजन · दर्शन · दीक्षा · मन्त्र · पूजा · सत्संग · स्तोत्र · विवाह · लिंगधारण · जंगमदान

वीरशैव संस्कार अन्तर्गर्भ/ दोष मार्जन गर्भाधान संस्कार · पुंसवन संस्कार · सीमन्तोन्नयन संस्कार

बहिर्गर्भ/ गुणाधान जातकर्म संस्कार · नामकरण संस्कार · निष्क्रमण संस्कार · अन्नप्राशन संस्कार ·लिंगदिक्षा संस्कार · विद्यारंभ संस्कार

जन्म पश्चात कर्णवेधन संस्कार · शिवदिक्षा संस्कार · वेदारंभ संस्कार · जंगम संस्कार

अन्य · सम्वर्तन संस्कार · विवाह संस्कार · अन्त्येष्टि संस्कार · पुण्यतिथि संस्कार


गुरु · रेणुकाचार्य ·एकोरामारध्य शिवाचार्य, विश्वारध्य शिवाचार्य, बसवेश्वर · पंडिताचार्य · अल्लमप्रभु · सिद्धरामेश्वर·उमापति शिवाचार्य, चन्नबसव,वागिश पंडितारध्य शिवाचार्य,सिद्धेश्वर स्वामि ,शिवकूमार स्वामि , डा॥ चंद्रशेखर शिवाचार्य वीरसोमेश्वर शिवाचार्य



युग सत्य युग · त्रेता युग · द्वापर युग · कलि युग


विभाजन : जंगम · लिंगायत · नायनार·दिक्ष लिंगाय्त् ·

वीरशैव तीर्थ क्षेत्र : · कुड संगम, बसव कल्याण· सोलापूर ,उळवि,कोलिपाक् पंच पीठ: रंभापुरि ,उकिमठ ,काशि ,श्रीशैल, उज्जयन ज्योतिर्लिंग:सोमनाथ · द्वारका · महाकालेश्वर · श्रीशैल · भीमाशंकर · ॐकारेश्वर · केदारनाथ · विश्वनाथ · त्र्यंबकेश्वर · रामेश्वरम · घृष्णेश्वर · बैद्यनाथ


श्री शिवानंद शिवाचार्य शिवाद्भैत मठ बाळुर ता|| भाल्कि जि|| बीदर


परम्परा[संपादित करें]

ज्योतिष · आयुर्वेद · आरती · भजन · दर्शन · दीक्षा · मन्त्र · पूजा · सत्संग · स्तोत्र · विवाह · लिंगधारण · जंगमदान

वीरशैव संस्कार[संपादित करें]

अन्तर्गर्भ/ दोष मार्जन गर्भाधान संस्कार · पुंसवन संस्कार · सीमन्तोन्नयन संस्कार 

बहिर्गर्भ/ गुणाधान जातकर्म संस्कार · नामकरण संस्कार · निष्क्रमण संस्कार · अन्नप्राशन संस्कार ·लिंगदिक्षा संस्कार · विद्यारंभ संस्कार

जन्म पश्चात कर्णवेधन संस्कार · शिवदिक्षा संस्कार · वेदारंभ संस्कार · जंगम संस्कार

अन्य · सम्वर्तन संस्कार · विवाह संस्कार · अन्त्येष्टि संस्कार · पुण्यतिथि संस्कार

गुरु[संपादित करें]

· रेणुकाचार्य ·एकोरामारध्य शिवाचार्य, विश्वारध्य शिवाचार्य, बसवेश्वर · पंडिताचार्य · अल्लमप्रभु · सिद्धरामेश्वर·उमापति शिवाचार्य, चन्नबसव, वागिश पंडितारध्य शिवाचार्य, सिद्धेश्वर स्वामि, शिवकूमार स्वामि , डा॥ चंद्रशेखर शिवाचार्य वीरसोमेश्वर शिवाचार्य

तिरछा पाठ



युग सत्य युग · त्रेता युग · द्वापर युग · कलि युग


विभाजन : 
       जंगम · लिंगायत · नायनार·दिक्ष लिंगायत · 
वीरशैव तीर्थ क्षेत्र : · कुड संगम, बसव कल्याण· सोलापूर, उळवि, कोलिपाक पंच पीठ: रंभापुरि 
        , उकिमठ, काशि, श्रीशैल, उज्जयन

ज्योतिर्लिंग:सोमनाथ · द्वारका · महाकालेश्वर · श्रीशैल · भीमाशंकर · ॐकारेश्वर · केदारनाथ · विश्वनाथ ·

       त्र्यंबकेश्वर · रामेश्वरम · घृष्णेश्वर · बैद्यनाथ


--59.92.161.120 १५:४८, २ फ़रवरी २००९ (UTC)बीदर'