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'''सरस्वतीकंठाभरण''', काव्यतत्व का विवेचन करनेवाला [[संस्कृत]]-साहित्य-शास्त्र का एक माननीय ग्रंथ है।है यहजिसकी रचना धारेश्वर महाराजके [[परमार भोज|भोजदेव]]महाराज कीभोजराज कृतिने है।की।
 
== परिचय ==
महाराज भोजदेवभोजराज का समय ईसवी सन् 1010-1055 तक इतिहासकारों द्वारा स्वीकृत किया गया है। अतएव सरस्वतीकंठाभरण का रचनाकाल ईसवी ग्यारहवीं शताब्दी का मध्य माना जा सकता है। इसके प्रणेता [[काव्यप्रकाश]] के रचयिता [[मम्मट]] (ई. सन् 1100 के लगभग) से किंचित् पूर्ववर्ती हैं। यद्यपि [[आनंदवर्धन]] द्वारा ध्वनिसिद्धांत की स्थापना हो चुकी थी तथापि उस समय तक काव्यात्मा के रूप में ध्वनि की मान्यता विवादग्रस्त सी ही थी ; अतएव साक्षात् रूप से ध्वनि को काव्य की परिभाषा में आत्मा के रूप में स्थान देने की दृढ़ता न भोजदेव ने ही अपनाई और न भट्ट मम्मट ने ही। दोनों आचार्यों ने काव्य में दोषाभाव तथा गुणवत्ता को प्रधानता दी है। भोजदेव की यह विशेषता है कि उन्होंने अलंकारों की उपादयेता कंठत: स्वीकार की है तथा काव्य के लिए रसान्वित होना आवश्यक समझा है। यों भोजदेव के सरस्वतीकंठाभरण ने अंशत: मम्मट को एवं विश्वनाथ को प्रभावित किया है।
 
== पुस्तक की संरचना एवं विषयवस्तु ==
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