वापस बुलाने का अधिकार

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वापस बुलाने के अधिकार (राइट टू रिकाल) जनता का वह अधिकार जिसके अनुसार यदि वह अपने किसी निर्वाचित प्रतिनिधि से संतुष्ट नहीं है और उसे हटाना चाहती है तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसे वापस बुलाया (हटाया) जा सकता है।

इतिहास[संपादित करें]

निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार का इतिहास काफी पुराना है। प्राचीन काल में एंथेनियन लोकतंत्र से ही यह कानून चलन में था। बाद में कई देशों ने इस रिकाल को अपने संविधान में शामिल किया। वैसे इतिहास यह है कि इस कानून की उत्पत्ति स्विटजरलैंड से हुई पर यह अमेरिकी राज्यों में चलन में आया। 1903 में अमेरिका के लास एंजिल्स की म्यूनिसपैलिटी, 1908 में मिशिगन और ओरेगान में पहली बार राइट टू रिकाल राज्य के अधिकारियों के लिए लागू किया गया।

भारत में वापस बुलाने का अधिकार[संपादित करें]

बात जब भारतीय परिपेक्ष्य में करते हैं तो यह वापस बुलाने का अधिकार यानी राइट टू रिकाल बिहार की जमीन से उपजा है। सर्वप्रथम लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने चार नवंबर 1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान राइट टू रिकाल का नारा दिया। उन्होंने चुन कर गये जनप्रतिनिधियों की वापसी की बात की। वैसे अब तक राइट टू रिकाल यानी चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार सिर्फ नारों तक ही सीमित दिखता है। इस बाबत किसी भी तरह के ठोस कानून को लेकर किसी भी राजनीतिक दल ने कोई पहल नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक फैसले में यह कहा कि राइट टू रिकाल वर्तमान स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण मैकनिज्म है जिसके माध्यम से लोगों को सशक्त किया जा सकता है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में बिहार म्यूनिसपल एक्ट को संशोधित कर राइट टू रिकाल यानी वापस बुलाने के अधिकार को उसमें शामिल किया है। बिहार के पंचायती राज सिस्टम में निर्वाचित मुखिया को वापस बुलाये जाने का अधिकार पहले से ही यहां है। नगर निकायों के लिए लागू राइट टू रिकाल में यह प्रावधान है कि किसी निर्वाचित निकाय प्रतिनिधि से संबंधित वार्ड के पचास फीसदी से अधिक मतदाताओं को एक हस्ताक्षरित आवेदन नगर विकास विभाग को देना है। विभाग को उस हस्ताक्षरित आवेदन के मेरिट को देखना है। अगर विभाग इस बात से सहमत है कि संबंधित वार्ड काउंसिलर ने दो तिहाई मतदाताओं का विश्वास खो दिया है तो वह उक्त कांउसिलर को हटा सकता है। सरकार ने मतदाताओं को यह अधिकार दिया है कि वह अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुला सकता है जब उसे वह पसंद न आये।

राइट टू रिकाल छत्तीसगढ़ में भी लागू है।

समस्याएँ[संपादित करें]

इस राइट टू रिकाल में सबसे बड़ा पेंच यह है कि आखिरकार सरकारी अधिकारी यह कैसे तय करेंगे कि संबंधित काउंसिलर के खिलाफ दो तिहाई वोटरों का जो हस्ताक्षरित आवेदन आया है वह सही है। सच में वे उस इलाके के वोटर हैं या नहीं? इतने बड़े स्तर पर हस्ताक्षर जुटाने में घपला नहीं हुआ यह कैसे संभव है?

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]